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कोटा का अनोखा रिकॉर्ड: देश का पहला शहर जहां ट्रैफिक लाइट नहीं, फिर भी व्यवस्थित ट्रैफिक

कोटा 

अगर क‍िसी शहर में रेड स‍िग्‍नल न हो और एकदम ट्रैफ‍िक फ्री हो तो सोच‍िए आपको कैसा महसूस होगा? जी हां, इसकी कल्‍पना द‍िल्‍ली- एनसीआर वालों से बेहतर कौन कर सकता है. द‍िल्‍ली-एनसीआर में पीक टाइम के दौरान सड़क के ट्रैफ‍िक और भीड़भाड़ के बीच आपको एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में काफी समय लग जाता है. लेक‍िन इन सबके बीच देश का एक शहर ऐसा भी है, जो एकदम से ट्रैफ‍िक फ्री है. इतना ही नहीं, इस शहर की सड़कों पर आप फर्राटे से भागे चले जाते हैं. कारण सड़कों पर काफी कम ट्रैफ‍िक होना है.

शहर में हर द‍िन आते हैं लाखों स्‍टूडेंट

हम ज‍िस शहर की बात कर रहे हैं, वो है राजस्थान का कोचिंग हब बन चुका कोटा. जी हां, कोटा देश का पहला ऐसा शहर बन गया है जहां एक भी ट्रैफिक लाइट नहीं है. इस शहर में हर द‍िन लाखों लोग और हजारों स्टूडेंट्स आते-जाते हैं, फ‍िर भी इस शहर की सड़कों पर जाम नहीं लगता. कोटा अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (UIT) की तरफ से इस चमत्कार को कर द‍िखाया गया है. अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट (UIT) ने पूरे शहर में आपस में जुड़े हुए र‍िंग रोड्स का जाल बिछा दिया. अब आप कोटा में हर व्यस्त चौराहे को बाइपास कर सकते हो. यहां गाड़ी कभी रुकती नहीं.

24 से ज्यादा फ्लाईओवर और अंडरपास
शहर में इस समय 24 से ज्यादा फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए गए हैं. इनके जर‍िये आप मुख्य जंक्शन पर भी बिना ब्रेक लगाए सीधे न‍िकल सकते हैं. इस सबके कारण शहर में यात्रा का समय घटकर आधा रह गया है. इस बदलाव के बाद शहर में हादसों की संख्‍या में भी अबड़ी ग‍िरावट आई है. इतना ही नहीं शहर के अंदर पेट्रोल-डीजल की खपत में भी कमी आई है और प्रदूषण भी घट गया है. कोटा में यह सब पॉस‍िबल हुआ है सोची-समझी प्लानिंग और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर से. यहां पुराने स‍िग्‍नल सिस्टम को पूरी तरह खत्म किया जाने की तैयारी है.

कोटा शहर पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है. जाम से परेशान दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों के ल‍िए यह शहर नया मॉडल बन गया है. स्मार्ट अर्बन डिजाइन और सही निवेश से ट्रैफिक की समस्या हमेशा के लिए खत्म की जा सकती है. लाखों लोग, हजारों कोचिंग स्टूडेंट्स, फिर भी कहीं रुकने की जरूरत नहीं, बस गाड़ी चलती रहती है. कोटा ने इस सब बदलाव के साथ कर द‍िखाया क‍ि देश में 'नॉन-स्टॉप सिटी' बनाना मुमकिन है. इसके बाद इस तरह का बदलाव लाने की बारी दूसरे शहरों की है.  

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