रांची
झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग ने बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत अंतिम संवर्ग विभाजन के बाद पारस्परिक आधार पर स्थानांतरित कर्मियों की वरीयता निर्धारण को लेकर एक महत्वपूर्ण संशोधन जारी किया है।
सरकार के सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो के हस्ताक्षर से जारी इस पत्र में बताया गया है कि यह निर्णय झारखंड में पारस्परिक स्थानांतरण के आधार पर आए कर्मियों की वरीयता को लेकर चल रहे विवादों को स्पष्ट दिशा देगा। दरअसल, विभागीय परिपत्र संख्या-6160 दिनांक 23.09.2024 के द्वारा पूर्व में जारी कुछ निर्णयों को संकलित किया गया था।
इसमें कार्मिक विभाग के पत्र संख्या-5626 को विलोपित करते हुए और गृह (विशेष) विभाग, बिहार के पत्रों का हवाला देते हुए कार्मिक विभाग, झारखंड के पत्रांक-4450 दिनांक 19.07.2008 के द्वारा परिचारित राज्य सरकार के पूर्व के निर्णय को 19.07.2008 के भूतलक्षी प्रभाव से वापस प्रभावी किया गया था।
इसके अनुसार, अंतिम संवर्ग विभाजन के बाद पारस्परिक स्थानांतरण के आधार पर झारखंड आने वाले कर्मियों को मूल वरीयता का लाभ नहीं मिलता है और वे अपने कोटि में अपने बैच के कर्मियों की तुलना में सबसे कनीय माने जाते हैं।
अब सरकार ने विभागीय परिपत्र संख्या-6160 की कंडिका-7 में 7(ii) के पश्चात एक नई उप कंडिका-7(iii) जोड़ने का निर्णय लिया है। इस नई उप कंडिका के अनुसार“उपयुक्त कंडिका-7(ii) में उल्लेखित परिपत्र की शर्तें केवल उन्हीं कर्मियों पर लागू होंगी।
जिनके पारस्परिक स्थानान्तरण आदेश में ‘वरीयता का दावा मान्य नहीं होगा’ अथवा ‘कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग, झारखंड के पत्र के आलोक में वरीयता निर्धारित होगा’, का उल्लेख रहेगा।
इस आदेश की प्रतिलिपि नोडल पदाधिकारी पीएमयू कोषांग को वेबसाइट पर अपलोड करने हेतु, विभागीय वरीय प्रभारी प्रशाखा पदाधिकारी को भेजा गया है। यह निर्णय झारखंड में पारस्परिक स्थानांतरण के आधार पर आए कर्मियों की वरीयता को लेकर चल रहे विवादों को स्पष्ट दिशा देने वाला माना जा रहा है।





