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प्रदूषण का नया गणित: पराली घटने पर भी क्यों नहीं सुधर रही हवा?

गुरदासपुर 
इस साल गुरदासपुर जिले में खेतों में आग लगाने (स्टबल बर्निंग) के मामलों में करीब 57 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद हवा की गुणवत्ता अभी भी खराब बताई जा रही है। इस समय हवा का गुणवत्ता सूचकांक 134 के करीब है, जो सेहत के लिए ज्यादा अच्छा नहीं माना जाता। बेशक खेतों में आग कम लगी है, जिस कारण प्रदूषण के लिए खेतों में लगाई जाने वाली आग को कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश न होने के कारण हवा का गुणवत्ता सूचकांक डगमगा रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस साल जिले के अंदर खेतों में आग लगाने के सिर्फ 86 मामले सैटेलाइट के माध्यम से रिपोर्ट हुए हैं। यह आंकड़ा पिछले साल 2024 के 199 मामलों से काफी कम है, जबकि 2023 में 359 केस सामने आए थे। इस प्रकार, इस बार खेतों में आग के मामलों में तकरीबन 57 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है, जोकि पराली प्रबंधन अभियान की कामयाबी की ओर इशारा करती है। अधिकारियों के मुताबिक, इस साल किसानों में जागरूकता अभियान, मशीनरी की उपलब्धता और प्रशासन की तरफ से निगरानी व सख्त कार्रवाई के कारण पराली जलाने के इन मामलों में बड़ी कमी आई है।

हवा की गुणवत्ता में सुधार की बजाय गिरावट क्यों?
हालांकि खेतों में आग कम लगी, पर दूसरी ओर गुरदासपुर में हवा का गुणवत्ता सूचकांक बेहतर होने की बजाय कई जगहों पर बढ़ता नजर आ रहा है। प्रदूषण विभाग के मुताबिक, हवा में प्रदूषण बढ़ा हुआ है, और इसका मुख्य कारण लंबे समय से बारिश न होना माना जा रहा है। मौसम विभाग के अनुसार पिछले कई हफ्तों से जिले में बारिश न होने के कारण हवा में मिट्टी और धूल के कण बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। वाहनों की रोजाना आवाजाही और निर्माण कार्यों की धूल भी हवा में मिलकर प्रदूषण को बढ़ा रही है।

आम तौर पर पराली जलाने का रुझान कम होने के कारण हवा की गुणवत्ता में सुधार आना चाहिए, लेकिन इस बार स्थिति विपरीत नजर आ रही है। कुछ दिनों से जिले का हवा सूचकांक 130 से 140 के आस-पास रिकॉर्ड हो रहा है, जो ‘पुअर ज़ोन' में आता है। डॉक्टरों के मुताबिक, प्रदूषित हवा के कारण बुजुर्गों, छोटे बच्चों और दमा के मरीजों के लिए स्थिति चिंताजनक है। खांसी, गले में जलन, आंखों में जलन और सांस संबंधी समस्याओं के मामले बढ़ने लगे हैं।

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