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भगोरिया मेले में रील क्रेज़, 5 दिन में 3000 फॉलोअर्स बढ़े, ₹500 में मिल रही इंस्टेंट एडिटिंग सर्विस

झाबुआ  मांदल की थाप, उड़ता हुआ गुलाल और पारंपरिक वेशभूषा… भगोरिया का मेला हमेशा से अपनी इसी रौनक के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन इस बार मेले की तस्वीर थोड़ी बदली-बदली नजर आई। अब यहां युवा सिर्फ नाचने-गाने नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने भी आ रहे हैं। ढोल बजते ही मोबाइल के कैमरे ऑन हो जाते हैं और देखते ही देखते अलीराजपुर और झाबुआ का यह पारंपरिक त्योहार इंस्टाग्राम की फीड पर छा जाता है। 5 दिन में 3 हजार फॉलोअर्स भगोरिया से जुड़े वीडियो पोस्ट करने वाले दीपक बताते हैं कि महज पांच दिनों में उनके पेज पर 3,000 नए फॉलोअर्स जुड़ गए। आलम यह है कि दिल्ली और मुंबई में रहने वाले लोग मैसेज करके पूछ रहे हैं कि अगला मेला कब और कहां लगेगा? पलायन की वजह से जो युवा बाहर चले गए थे, उनके लिए अब भगोरिया सिर्फ घर वापसी का जरिया नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी जड़ों को दिखाने का एक बड़ा मंच बन गया है। गहनों के साथ चश्मा और ब्रांडेड जूते मेले में आई कॉलेज स्टूडेंट रेखा लोहारिया कहती हैं, 'यह हमारा सबसे बड़ा त्योहार है। इसे सिर्फ यहां के लोग ही क्यों देखें? मेरे सूरत और अहमदाबाद के दोस्त हर साल मेरे वीडियो का इंतजार करते हैं।' दिलचस्प बात यह है कि इस बार फैशन में भी बदलाव दिखा। पारंपरिक चांदी के गहनों और कढ़ाई वाले ब्लाउज के साथ युवा धूप का चश्मा और ब्रांडेड जूते पहनकर कैमरे के सामने पोज देते नजर आए। ₹200 से ₹500 में 'इंस्टेंट रील' का धंधा इस ट्रेंड का फायदा स्थानीय फोटोग्राफर्स भी उठा रहे हैं। वे ₹200 से ₹500 के बीच मौके पर ही प्रोफेशनल रील्स बनाकर, एडिटिंग और म्यूजिक के साथ दे रहे हैं। हालांकि, बुजुर्ग इस बदलाव से थोड़े असहज हैं। झाबुआ के नत्थू सिंह कहते हैं, 'पहले लोग त्योहार में शामिल होने आते थे, अब सिर्फ रिकॉर्ड करने आते हैं।' बुजुर्गों की चिंता पर युवाओं का तर्क बुजुर्गों की चिंता पर युवाओं का अपना तर्क है। गुजरात की टेक्सटाइल यूनिट में काम करने वाले राकेश कहते हैं, 'हम अपनी पहचान दुनिया को दिखा रहे हैं। अगर हम इसे पोस्ट नहीं करेंगे, तो कोई और हमारी कहानी अपने तरीके से बताएगा।' भगोरिया अब सिर्फ एक मेला नहीं रह गया है, बल्कि एक डिजिटल ग्लोबल स्टेज बन चुका है।

भगोरिया हाट में मची उत्सव की रौनक, युवा और बुजुर्ग पारंपरिक अंदाज में हुए शामिल

धूलकोट  जिले के धूलकोट में  आदिवासी लोक संस्कृति के प्रमुख पर्व भगोरिया हाट का आयोजन उत्साह और उल्लास के साथ किया गया। मेले में आसपास के ग्रामीण अंचलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष, युवा और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे पहुंचे। रंग-बिरंगे परिधानों और पारंपरिक आभूषणों से सुसज्जित युवक-युवतियों की छटा देखते ही बन रही थी। कई युवा और बालिकाएं एक समान वेशभूषा में समूह बनाकर मेले की रौनक बढ़ाते नजर आए।  मेले में खानपान की दुकानों पर भी अच्छी-खासी भीड़ रही। जलेबी, गुड़, सेव, भजिया सहित पारंपरिक व्यंजनों का लोगों ने परिवार सहित आनंद लिया। वहीं कुल्फी, लस्सी और बर्फ के गोले का स्वाद लेते युवाओं की टोलियां खासा उत्साहित दिखीं। परिवार और मित्रों के साथ पहुंचे लोगों ने मेले के पलों को मोबाइल कैमरों में कैद किया और जमकर सेल्फी ली। होली पर्व को ध्यान में रखते हुए हार, कंकण, खजूर, चना और रंग-गुलाल की दुकानों पर भी खरीदारों की भीड़ उमड़ी। महिलाओं ने पारंपरिक आभूषणों की खरीदारी की, जबकि बच्चों ने खिलौनों की दुकानों पर मोलभाव किया। मेले में मिकी माउस झूला, आकाश झूला, जहाज झूला और जंपिंग झूलों का बच्चों व युवाओं ने भरपूर आनंद उठाया। कई बालिकाएं हाथों में अपना नाम गुदवाती नजर आईं, वहीं परिवारों ने फोटो स्टूडियो में समूह फोटो खिंचवाकर इस दिन को यादगार बनाया। मादल और ढोल-मांडल की थाप पर बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं पारंपरिक नृत्य में थिरकते दिखाई दिए। पूरे हाट परिसर में उत्सव जैसा माहौल बना रहा। समाजजनों ने एक-दूसरे को भगोरिया हाट और होली पर्व की शुभकामनाएं दीं। उल्लेखनीय है कि गुरुवार को सतपुड़ा के वनांचल ग्राम काबरी में भी भगोरिया हाट का आयोजन होगा, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीणों के पहुंचने की संभावना है।