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बिजली दरों में वृद्धि का विद्युत नियामक आयोग की जनसुनवाई में विरोध

रायपुर. छत्तीसगढ़ मिनी स्टील प्लांट एसोसिएशन ने आज विद्युत नियामक की जनसुनवाई में अपना प्रतिवेदन पेश किया। इसमें एसोसिएशन ने आगामी वर्ष 2026–27 में विद्युत दरों में किसी भी प्रकार की वृद्धि होने के खिलाफ पुरजोर विरोध किया। एसोसिएशन ने 13 बिंदुओं में अपनी मांगें रखी। एसोसिएशन ने विद्युत नियामक आयोग के सचिव को सौंपे अपने प्रतिवेदन में बताया है कि छत्तीसगढ़ प्रदेश के औद्योगिक विकास में लौह उद्योगों का पारस्परिक सहयोग रहा है। छत्तीसगढ़ के औद्योगिक नीति के वजह से औद्योगिक विकास में अग्रणी बनने जा रहा है। जैसा कि भारत देश में छत्तीसगढ़ राज्य स्टील हब के नाम से जाना जाता है क्योंकि छोटे-छोटे लौह उद्योग जो कम पूंजी में अधिक उत्पादन करते हैं। साथ ही सबसे अधिक मात्रा में छत्तीसगढ़ के मूल निवासियों को रोजगार प्रदान करने में सक्षम है। उल्लेखनीय है कि विगत वर्षों में लौह उद्योगों औद्योगिक वातावरण को विद्युत नियामक आयोग द्वारा गतिशील बनाये रखा। फलस्वरूप प्रदेश में औद्योगिक विकास दर एवं प्रदेश का घरेलू सकल उत्पादन जी.डी.पी. की सर्वोच्च ऊंचाई को छू रहा है। नतीजन लौह उद्योगों का विस्तार एवं नये लौह उद्योग लगते जा रहे है। विदित है कि छत्तीसगढ़ में 100 इकाईयों की 300 मिनी स्टील प्लांट (फर्नेस) उद्योग है जो छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल के कुल उत्पादन के लगभग 30 से 35% के सबसे बड़े उपभोक्ता (power intensive industry) है, जो प्रतिवर्ष लगभग 750 करोड़ यूनिट खपत करने वाले उद्योग है इस उच्च श्रेणी के सबसे अधिक बिजली खपत करने वाले उद्योगों द्वारा छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल को प्रतिवर्ष लगभग 5 से 6 हजार करोड़ का राजस्व देने वाले है। छत्तीसगढ़ का पूरा लौह उद्योग जीएसटी टैक्स के माध्यम से राज्य शासन एवं भारत सरकार को प्रति वर्ष लगभग 9 से 10 हजार करोड़ से अधिक राजस्व प्रदान करते हैं। यह उद्योग लगभग दो लाख परिवारों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करता है एवं छत्तीसगढ़ के मिनी स्टील प्लांट उद्योग 110 स्पंज आयरन एवं 250 रोलिंग मिलों की बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। ज्ञातव्य है कि वर्तमान विद्युत दर पर मिनी स्टील प्लांट उद्योग बहुत कठिन हो गया है। अतः आपसे निवेदन है कि निम्नलिखित सुझावों एवं मांगों पर त्वरित निर्णय लेने की कृपा करें। ये हैं 13 मांगे मल्टी-ईयर टैरिफ (MYT) 5 वर्ष का होना चाहिए। जो अगले 5 वर्षों के लिए टैरिफ को लगभग स्थिर रखा जाए। कुछ अतिआश्यक पड़ने में उचित सीमा के अंदर बदलाव करे, जिससे उद्योग अपने विस्तार की योजना बना सके। जो अत्यधिक विद्युत उपभोग (Power intensive) (जिनका लोड फैक्टर 50% से ज्यादा एवं कॉन्टैक्ट डिमांड 2500kVA या उससे ज्यादा है) के लिए एक अलग विद्युत श्रेणी (category) बनाया जाये। जिससे उनकी विकास एवं समस्यओं पर आसानी से ध्यान रखा जा सके और राज्य शासन एवं नियामक आयोग कोई रक्षात्मक (protective) पॉलिसी बना सें। अत्यधिक विद्युत उपभोग करने वाले (power intensive) HV4- मिनी स्टील प्लांट उद्योगों के लिए विद्युत दर एवरेज बिलिंग दर लगभग रूपये 5.50 प्रति यूनिट होना चाहिए, जिससे उड़ीसा, झारखंड, दोमादर वेली (DVC) आदि जैसे दूसरे बड़े स्टील बनाने वाले राज्यों के समकक्ष हो। अत्यधिक विद्युत उपभोगक्ता से एवरेज बिलिंग लगभग वोल्टेज-वाइज कॉस्ट ऑफ सप्लाई (वर्ष 25-25 रूपये 5.55 प्रति यूनिट 33 केवी सप्लाई के लिए, जैसा नियामक आयोग ने टैरिफ ऑर्डर 24-25 में तय किया है (पिछले रेवेन्यू गैप को छोड़कर) नियामक आयोग ने टैरिफ ऑर्डर में वर्ष 25-26 के लिए वोल्टेज-वाइज कॉस्ट ऑफ सप्लाई तय नहीं की है) के बराबर होना चाहिए। लोड फैक्टर प्रोत्साहन पूर्व की भांति जारी रखा जाये यानी 50% लोड फैक्टर पर 1% प्रोत्साहन से शुरू करके हर 1% बढ़ोतरी पर प्रोत्साहन 1% बढ़ाया जाए जो ज्यादा से ज्यादा 74% तक हो। शटडाउन एवं साप्ताहिक अवकाश के दिनों को ध्यान में रखते हुए, पॉवर ऑफ के घंटे को बढ़ाकर हर माह औसतन 72 घंटे किए जाए, जिससे उद्योगों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी को भी मेंटेनेंस के काम के लिए काफी समय मिल सके। लोड शेडिंग के दौरान हर महीने नॉर्मल पॉवर ऑफ आवर्स के अलावा, असल लोड शेडिंग पीरियड के आधार पर एक्स्ट्रा पॉवर ऑफ आवर्स दिए जाए। फ्यूल एवं पॉवर परचेस एडजस्टमेंट सरचार्ज (FPPAS) को जीरो पर रीसेट किया जाए क्योंकि वर्ष 25-26 के दौरान एनर्जी चार्ज पर यह 18% तक बढ़ गया है। FCA और FPPA सरचार्ज के कैलकुलेशन की इंडिपेंडेंट चेकिंग के लिए एक ठीक और पारदर्शी तरीका शुरू किया जाये। सोलर पॉवर बैंकिग को एड्रेस करने के लिए सोलर आवर्स के दौरान कॉन्ट्रैक्ट डिमांड को अधिकतम सीमा 20% तक पार करने पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लगाया जाये। बिजली बिल विलम्ब भुगतान पर सरचार्ज के बराबर एडवांस पेमेंट पर छूट (APR) (अभी DPS बिल का 1.5% हर महीने या उसके हिस्से के लिए है और APR सिर्फ 1.25% है) दिया जा सकता है ताकि बिजली बिलों का एडवांस पेमेंट बढ़ाया जा सके जिससे छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी का कैश फ्लो बेहतर होगा। उद्योगों को स्मार्ट (प्रीपेमेंट) एनर्जी मीटर लगाने का विकल्प दिया जाए। अत्यधिक विद्युत उपभोग करने वाले (power intensive) उद्योग के लिए विलम्ब भुगतान सरचार्ज को हर दिन के हिसाब से तय किया जाना चाहिए (देरी वाले दिनों की संख्या पर 0.05% हर दिन) क्योंकि उनकी बिजली बिल की राशि बहुत अधिक होती है और थोड़ी सी भी देरी से उन पर बहुत अधिक DPS का बोझ पड़ता है। सभी अत्यधिक विद्युत उपभोग करने वाले (power intensive) उद्योग अपनी डिमांड को अनुमेय सीमाएँ (permissible limits) के अंदर कंट्रोल करने के लिए आटोमेटेड डिमांड सिस्टम लगाती है, लेकिन यह देखा गया है कि कुछ मामलों में ऐसे सिस्टम के थोड़े समय के लिए खराब होने की वजह से डिमांड अनुमेय सीमाएँ से ज्यादा हो जाती है, जिससे ऐसे उपभोक्ता पर पेनल्टी चार्ज के तौर पर भारी पैसे का बोझ पड़ता है, इसलिए ऐसी किसी भी स्थिति को (जैसे साल में एक बार) उन उपभोक्ता के लिए छूट कर दिया जाना चाहिए जिन्होंने आटोमेटेड डिमांड कंट्रोल सिस्टम लगवाया है। सोलर पॉवर प्लांट को लगाने को बढ़ावा देने के लिए प्रोसेस / परमिसेंस को आसान बनाना चाहिए और राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए सोलर पॉवर पर किसी भी कॉस सब्सिडी सरचार्ज को माफ किया जाना चाहिए। मिनी स्टील प्लांट एसोसिएशन ने निवेदन करते … Read more

हरियाणा बिजली टैरिफ पर डिस्कॉम ने नहीं दी वोल्टेज-सर्विस कास्ट अध्ययन रिपोर्ट

चंडीगढ़. हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) के समक्ष उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम (UHBVNL) और दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम (DHBVNL) द्वारा दाखिल टैरिफ याचिकाओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पूर्व विद्युत मंत्री प्रोफेसर संपत सिंह ने आयोग को सौंपी। उन्होंने आरोप लगाया है कि आयोग के बार-बार निर्देशों के बावजूद डिस्कॉम ने वोल्टेज व उपभोक्ता वर्गवार सर्विस कास्ट अध्ययन रिपोर्ट दाखिल नहीं की। फिर भी वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 3000 करोड़ रुपए की भारी टैरिफ वृद्धि को मंजूरी दे दी गई। यह निर्णय न तो किसी विधिवत याचिका पर आधारित था और न ही उपभोक्ताओं एवं हितधारकों को सुनवाई का अवसर दिया गया। 9 जनवरी को एचईआरसी इसको लेकर 9 जनवरी को सुनवाई करने जा रहा है। 4484 करोड़ रुपए का घाटा संपत सिंह ने एचईआरसी को लिखे लेटर में कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 की याचिका में भी यह देखा गया है कि वितरण कंपनियों ने 4484.71 करोड़ रुपए से अधिक के संयुक्त राजस्व घाटे का अनुमान लगाया है जबकि इस घाटे को पूरा करने के लिए कोई कार्यप्रणाली भी नहीं बताई है। इस तरह की गैर-अनुपालन को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और पिछले वित्तीय वर्ष की तरह उपभोक्ताओं की जानकारी के बिना कोई भी टैरिफ नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। हजारों करोड़ का पूंजीगत व्यय प्रोफेसर ने लिखा है कि डीएचबीवीएन ने 2738.69 करोड़ रुपए के पूंजीगत व्यय का प्रस्ताव रखा है, जबकि आवर्ती राजस्व (APR) 1900 करोड़ रुपए है और टू-अप (2024 25) का दावा 1658.36 करोड़ रुपए है, जो निराधार प्रतीत होता है। एकीकृत योजना के संबंध में स्पष्ट रूप से विचारहीन है। इसी प्रकार यूएचबीवीएन ने 2056 करोड़ रुपए के पूंजीगत व्यय का प्रस्ताव रखा है। प्रतिपूर्ति विवरण और लागत-लाभ विश्लेषण के बिना पूंजीगत व्यय अर्थहीन है इसलिए प्रत्येक मद के तहत विस्तृत जानकारी और हानि में कमी, आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ भार वृद्धि पर उनके प्रभाव को हस्तक्षेप कर्ताओं द्वारा विश्लेषण और टिप्पणी के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए। एआरआर रिपोर्ट पर उठाए सवाल अनुमानित राजस्व 28,112 करोड़ रुपए (डीएचबीवीएन) है, जो 4116 करोड़ रुपए की राजस्व वृद्धि है। जिसका मुख्य कारण निश्चित शुल्कों में वृद्धि है। यह राशि टैरिफ में कमी के रूप में उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए थी। विभिन्न वार्षिक रिपोर्ट (ARR) रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2022-23 के लिए वितरण हानियां 11.42 प्रतिशत थी जबकि वर्ष 2023-24 के लिए यह 11.35 प्रतिशत थी। 27 नवंबर 2025 के ज्ञापन अनुसार वर्ष 2024-25 के लिए वितरण हानियां 9.54 प्रतिशत निर्धारित की गई हैं। सप्लाई लॉस बढ़ाया गया इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026-27 के लिए लक्ष्य 9.75 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। वितरण हानियों को कम करने की दिशा में प्रयास वार्षिक एआरआर चर्चाओं में प्रमुख बिंदुओं में से एक रहा है। सप्लाई लॉस के लक्ष्य को 9.54 प्रतिशत से और कम करने के बजाय इसे बढ़ा दिया गया है। आयोग इस पर विचार कर सकता है और एक कम करने योग्य लक्ष्य निर्धारित कर सकता हैं ताकि डीएचबीवीएन इसे प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर सके। कंपनियों का प्रबंधन नहीं पूर्व ऊर्जा मंत्री ने लिखा है कि भारी पूंजीगत व्यय के बावजूद डीएचबीवीएन ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वितरण हानि 9.54 प्रतिशत और यूएचबीचीएन ने 9.85 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। ये आंकड़े उनके द्वारा बताए गए वास्तविक पाटे से अधिक हैं। वितरण कंपनियां परिचालन की दृष्टि से अक्षम बनी हुई हैं। एफआरपी और उदय से पहले के आंकड़ों से इनको तुलना करना निरर्थक है। एचटी-एलटी अनुपात में सुधार को देखते हुए इस प्रकार की हानि 6 से 8 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। दोनों डिस्कॉमों द्वारा प्राप्तियों का प्रबंधन लगातार सुस्त बना हुआ है। जिसके परिणामस्वरूप कार्यशील पूंजी की आवश्यकता और उस पर ब्याज में काफी वृद्धि हुई है।