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तनाव और खराब नींद बन सकते हैं खतरा, जानिए मिर्गी के दौरे के 6 कारण

एपिलेप्सी, जिसे मिर्गी भी कहा जाता है, रोजमर्रा के कुछ फैक्टर्स के कारण भी ट्रिगर हो सकता है। इसलिए इन ट्रिगर्स को मैनेज करना काफी जरूरी है। इस बारे में न्यूरोलॉजी बताते हैं कि ये ट्रिगर्स हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य फैक्टर्स ऐसे हैं, जो बार-बार देखने को मिलते हैं। इन ट्रिगर्स को समझना मिर्गी के दौरों को कम करने के लिए काफी जरूरी हैं। नींद की कमी नींद की कमी एपिलेप्टिक सीजर के सबसे अहम ट्रिगर्स में से एक है। अधूरी या सोने की अनियमित आदतें दिमाग की एक्टिविटीज को अस्थिर कर सकती है, जिससे सीजर थ्रेशोल्ड यानी दौरे सहने की क्षमता कम हो जाती है। कुछ व्यक्तियों में केवल एक रात की खराब नींद भी दौरे की संभावना को काफी हद तक बढ़ा सकती है। मानसिक और शारीरिक तनाव ज्यादा चिंता, अचानक भावनात्मक बदलाव या लंबे समय तक बना रहने वाला मानसिक तनाव दिमाग के न्यूरोकेमिकल बैलेंस को बिगाड़ सकता है। इसी तरह, ज्यादा शारीरिक थकावट भी शरीर पर वैसा ही असर डालती है, जिससे दौरे पड़ने का जोखिम बढ़ जाता है। दवाओं में अनियमितता मिर्गी के दौरों को रोकने का सबसे असरदार तरीका दवाएं हैं, लेकिन इन्हें छोड़ना या समय पर न लेना एक बड़ा ट्रिगर बन जाता है। एंटी-एपिलेप्टिक दवाएं ब्लड फ्लो में एक स्थिर स्तर बनाए रखकर काम करती हैं। अगर खुराक छूट जाती है, तो उसका असर कम हो जाता है और दौरे पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। पर्यावरणीय और विजुअल फैक्टर्स कुछ मरीजों में चमकती रोशनी या कुछ खास विजुअल पैटर्न, जैसे- टीवी या गेमिंग स्क्रीन दौरे को ट्रिगर कर सकते हैं। इसे फोटोसेंसिटिविटी कहा जाता है। बिना ब्रेक के लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना इस जोखिम को और ज्यादा बढ़ा देता है। खान-पान और लाइफस्टाइल अक्सर लोग खान-पान से जुड़ी आदतों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन ये भी मिर्गी का दौरा ट्रिगर करने में अहम भूमिका निभाती हैं। खाना स्किप करना, शरीर में पानी की कमी होना, ज्यादा मात्रा में चाय-कॉफी पीना या अल्कोहल के कारण एपिलेप्टिक सीजर का खतरा बढ़ा देती हैं। हार्मोनल बदलाव और बीमारियां महिलाओं में हार्मोनल उतार-चढ़ाव, खासतौर से मेंसुरल साइकिल के दौरान, दौरों के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। इसे कैटामेनियल एपिलेप्सी कहा जाता है। इसके अलावा, बुखार या किसी अन्य बीमारी के दौरान शरीर का स्ट्रेस रिस्पॉन्स भी मिर्गी ट्रिगर कर सकता है।  

चिड़चिड़ापन और थकान से छुटकारा: गर्मियों में अच्छी नींद के लिए अपनाएँ ये एक्सपर्ट टिप्स

मौसम में बदलाव का असर नींद पर पड़ता है। ऐसा देखा गया है कि गर्मी में लोग सर्दी के मुकाबले कम सोते हैं और इसका सीधा असर उनकी दिनचर्या पर होता है। आखिर क्यों गर्मी में नींद कम होती है और कैसे पाएं सुकून की नींद, बता रहे हैं एक्सपर्ट… गर्मी में स्लीप साइकल में परिवर्तन और तापमान बढ़ने के कारण नींद कम आती है। लंबे समय तक रोशनी रहने से नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन के उत्पादन में बाधा आती है, जिससे सोने और उठने का शरीर का प्राकृतिक चक्र प्रभावित होता है। स्वास्थ्य के लिए सात से आठ घंटे की नींद जरूरी है। ऐसे में नींद पूरी न होने पर कई लोगों को मानसिक तनाव, थकान व चिड़चिड़ेपन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गर्मी में होती है कम नींद गर्मी में नींद कम होना किसी बीमारी का संकेत नहीं है। दरअसल, गर्मी में दिन लंबे और रात छोटी होती हैं और अंधेरा होने के बाद ही मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन शुरू होता है। चूंकि अंधेरा देर से होता है, इसलिए रात हार्मोन कम बनने से नींद कम हो जाती है। सेहत के लिए आपकी कुंडली क्या कहती है — जानें बिल्कुल मुफ्त क्या कहती है स्टडी? बर्लिन में सेंट हेडविग हास्पिटल में नींद पर हुई स्टडी बताती है कि नींद का पैटर्न सकैंडियन रिदम (जैविक घड़ी) के हिसाब से बदलता है। जो शरीर में 24 घंटे सूरज के हिसाब से चलती है। कैसे पाएं गुणवत्ता वाली नींद?     प्राकृतिक धूप लें और शारीरिक गतिविधियां करें।     सही समय पर सोने-जागने का अभ्यास करें।     सोते समय कमरा ठंडा और शांत हो। कमरे में अंधेरा हो।     सोने जाने से पहले चाय- कॉफी न पिएं।     बिस्तर पर जाने से एक घंटे पहले मोबाइल से दूरी बना लें।     सोने से पहले नहा लें और आराम के लिए सूती कपड़े पहनें।     जब सोने का वक्त हो तभी बिस्तर पर जाएं, उससे पहले नहीं।     रात में ज्यादा भारी खाना खाकर सोने से परहेज करें। बदलता मौसम बिगाड़ रहा है आपकी 'बायोलॉजिकल क्लॉक' यह सच है कि मौसम में बदलाव और सूर्योदय सूर्यास्त के समय में परिवर्तन नींद पर असर जरूर डालते हैं, क्योंकि मानव शरीर की जैविक घड़ी सूरज के हिसाब से थोड़ा आगे-पीछे हो सकती है। इसलिए गर्मी में लोग देर से सोने के बावजूद जल्दी उठ जाते हैं और नींद पूरी नहीं हो पाती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि रात की अच्छी नींद के लिए दिन मैं अपनी गतिविधियों पर ध्यान रखें। अगर आपकी दिनचर्या सही रहेगी तो रात की नींद भी पर्याप्त होगी। दरअसल, मानसिक स्वास्थ्य के बहुत जरूरी है। लाइफस्टाइल बनी नींद की दुश्मन आजकल लोगों की बदलती लाइफस्टाइल भी नींद की दुश्मन बन गई है। कई लोग ऐसे हैं, जो देर रात तक आफिस का काम करते हैं, लेकिन सुबह उन्हें जल्दी उठना पड़ता है। ऐसे में नींद पूरी नहीं होती और पूरे दिन थकान लगती है। कई लोग ऐसे हैं, जो देर रात तक मोबाइल देखते हैं, लेकिन सुबह काम की वजह से जल्दी उठना होता है। ऐसे लोगों की नींद भी पूरी नहीं होती और फिर मानसिक तनाव बढ़ने लगता है।  

महिलाओं को क्यों चाहिए पुरुषों से ज्यादा नींद? वैज्ञानिक कारण जानकर चौंक जाएंगे

अक्सर घरों में देखा जाता है कि दिनभर की भागदौड़ के बाद महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा थकान महसूस करती हैं। यह सच भी है और साइंस इस बात की पुष्टि भी करती है कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है। यह केवल आलस या आराम का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अहम कारण छिपे हैं। आइए समझते हैं कि क्यों महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ज्यादा नींद की जरूरत होती है।    मल्टीटास्किंग और दिमाग की जटिलता नींद के दौरान सबसे जरूरी फंक्शन दिमाग को रिपेयर करने और रिजुविनेट करने का अवसर देना है। रिसर्च बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में मल्टीटास्किंग ज्यादा करती हैं। वे एक ही समय में घर, बच्चों, ऑफिस और भविष्य की योजनाओं के बारे में सोचती हैं। जब दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा जटिल तरीके से और लंबे समय तक किया जाता है, तो उसे रिकवरी के लिए ज्यादा समय की जरूरत होती है। महिलाओं का दिमाग दिन भर में अधिक ऊर्जा खर्च करता है, इसलिए उन्हें गहरी नींद की ज्यादा जरूरत होती है। हार्मोनल बदलाव महिलाओं का शरीर जीवन के अलग-अलग स्टेज में बड़े हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स का स्तर ऊपर-नीचे होता रहता है।     प्रेग्नेंसी- इस दौरान शरीर का वजन बढ़ना और शारीरिक बदलाव थकान को बढ़ा देते हैं।     मेनोपॉज- इस अवस्था में हॉट फ्लैशेस और पसीना आने जैसी समस्याओं के कारण नींद बार-बार टूटती है, जिससे शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता है। नींद की खराब गुणवत्ता महिलाओं की नींद पुरुषों की तुलना में ज्यादा कच्ची होती है। वे घर की आहटों, बच्चों के रोने या किसी भी छोटी हलचल पर जल्दी जाग जाती हैं। इसके अलावा, महिलाएं इनसोम्निया और रेस्टलेस लेग सिंड्रोम जैसी समस्याओं से ज्यादा प्रभावित होती हैं। बार-बार नींद टूटने के कारण उन्हें उस डीप स्लीप का फायदा नहीं मिल पाता, जो शरीर की मरम्मत के लिए जरूरी है। इसीलिए, वे सुबह उठकर भी थकान महसूस करती हैं और उन्हें ज्यादा समय तक सोने की जरूरत महसूस होती है। मानसिक स्वास्थ्य और तनाव सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते महिलाएं अक्सर मानसिक स्ट्रेस और एंग्जायटी का ज्यादा अनुभव करती हैं। तनाव सीधे तौर पर नींद को प्रभावित करता है। जब दिमाग शांत नहीं होता, तो शरीर को रिलैक्स होने में ज्यादा समय लगता है। पूरी नींद न मिलने पर यह तनाव और बढ़ जाता है, जो एक साइकिल की तरह चलता रहता है। बेहतर नींद के लिए क्या करें? महिलाओं के लिए नींद की कमी केवल थकान तक सीमित नहीं है, यह दिल की बीमारियां, एंग्जायटी और डिप्रेशन के खतरे को भी बढ़ा सकती है। इसलिए-     सोने और जागने का एक समय फिक्स करें।     सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बंद कर दें।     चाय या कॉफी दोपहर के बाद न पिएं।  

सोने से पहले कब करें डिनर? आयुर्वेद ने बताया आदर्श समय

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में देर रात खाना खाना और उसके तुरंत बाद सो जाना आम आदत बन गई है। कभी काम की व्यस्तता तो कभी मोबाइल और टीवी की वजह से लोगों को समय का ध्यान ही नहीं रहता। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रात के खाने का समय आपकी नींद, पाचन और कुल सेहत पर सीधा असर डालता है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा, दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि खाने और सोने के बीच पर्याप्त अंतर होना जरूरी है। सोने से कितनी देर पहले खाना चाहिए? आयुर्वेद के अनुसार, बेहतर पाचन और अच्छी नींद के लिए रात का खाना सोने से कम से कम 2 से 3 घंटे पहले कर लेना चाहिए। इससे भोजन को पचने का पूरा समय मिलता है और गैस, एसिडिटी व सीने में जलन जैसी समस्याओं का खतरा कम हो जाता है। जिन लोगों को एसिड रिफ्लक्स या GERD की शिकायत रहती है, उनके लिए यह अंतर 3 घंटे या उससे ज्यादा रखना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। उदाहरण के तौर पर, अगर आप रात 10 बजे सोते हैं तो 7–8 बजे तक खाना खा लेना बेहतर है। खाने और सोने के बीच अंतर क्यों जरूरी है? खाना खाने के बाद शरीर पाचन प्रक्रिया में लगा रहता है और उसे समय चाहिए। तुरंत लेटने से पाचन प्रभावित होता है और पेट का एसिड ऊपर की ओर आ सकता है, जिससे सीने में जलन और खट्टी डकार की समस्या हो सकती है। पेट हल्का रहने पर नींद गहरी आती है, शरीर को सही तरीके से आराम मिलता है और वजन बढ़ने का खतरा भी कम रहता है। रात में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? रात के समय हल्का और आसानी से पचने वाला भोजन करना चाहिए, जैसे उबली या हल्की पकी सब्जियां, दाल, खिचड़ी, थोड़ी मात्रा में रोटी या चावल, हल्का गर्म दूध और सीमित मात्रा में सूखे मेवे। वहीं तला-भुना, ज्यादा मसालेदार खाना, मिठाइयां, कैफीन वाली चीजें और भारी फल खाने से बचना चाहिए। सही समय और सही भोजन अपनाकर नींद और सेहत दोनों को बेहतर बनाया जा सकता है।

6 घंटे की नींद से शरीर पर पड़ रहे हैं गंभीर असर, डॉक्टरों ने दी चेतावनी- नींद है शरीर का रीसेट बटन

इंदौर  बॉलीवुड अभिनेता आयुष्मान खुराना का एक वीडियो इन दिनों खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह बताते हैं कि उनकी नींद अधिकतम छह घंटे ही हो पाती है। यह बात भले ही सामान्य लगे, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ औसतन छह घंटे की नींद युवाओं के लिए गंभीर खतरे का संकेत मान रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छह घंटे की नींद को सामान्य मानना एक भ्रम है। कम नींद दिमाग और शरीर पर धीमे जहर की तरह असर डालती है। इसका तात्कालिक प्रभाव एकाग्रता में कमी, कमजोर निर्णय क्षमता, मूड में बदलाव और धीमे रिएक्शन टाइम के रूप में दिखता है, जबकि भीतर ही भीतर इम्यून सिस्टम कमजोर और हार्मोनल संतुलन बिगड़ता जाता है। इसी वजह से आगे चलकर अल्जाइमर, डिमेंशिया और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इंदौर में आयोजित न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी आफ इंडिया की 73वीं राष्ट्रीय कान्फ्रेंस ‘एनएसआइकान-2025’ में सम्मिलित हुए विशेषज्ञों ने कम नींद को चिंताजनक बताया। उनका सुझाव सात से आठ घंटे की औसत नींद का है। शरीर और दिमाग के मरम्मत का समय रात की नींद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में 33 वर्ष सेवाएं दे चुके प्रोफेसर सुरेश्वर मोहंती ने एनएसआईकान में कहा कि शरीर और दिमाग दोनों की मरम्मत का असली समय रात की नींद ही होता है। जब व्यक्ति लगातार छह घंटे से कम या केवल छह घंटे की नींद पर निर्भर रहता है, तो हृदय व मस्तिष्क संबंधी जोखिम बढ़ जाते हैं। उनका मानना है कि एक स्वस्थ आदमी को सात से आठ घंटे की नींद अवश्य लेनी ही चाहिए, ताकि उसका ब्रेन अपनी पूरी क्षमता से काम कर सके और मेटाबालिज्म संतुलित रहे। नींद शरीर का रीसेट बटन फोर्टिस मोहाली में न्यूरोसर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. वीके खोसला के अनुसार, लोग समझते हैं कि कम सोने से प्रोडक्टिविटी बढ़ती है, लेकिन यह बिल्कुल गलत है। नींद शरीर का रीसेट बटन है। अगर इसे कम कर देंगे, तो सेहत को नुकसान ही होगा। वह सुझाव देते हैं कि प्रतिदिन सात से नौ घंटे की अच्छी नींद से सेहत भी ठीक रहती है और काम करने की क्षमता भी बेहतर होती है। ऐसे नुकसान पहुंचाती है सिर्फ छह घंटे की नींद     दिमाग में टॉक्सिन : ग्लिम्फेटिक सिस्टम पूरी सफाई नहीं कर पाता।     कमजोर याददाश्त : प्रीफ्रंटल कार्टेक्स की गतिविधि घटती है। इसका असर सोचने-समझने पर पड़ता है। स्मरणशक्ति और निर्णय क्षमता कमजोर हो जाती है।     स्ट्रोक-हार्ट का खतरा : कम नींद लेने वालों में स्ट्रोक का जोखिम कई गुना अधिक होता है।     मूड स्विंग व तनाव : सेरोटोनिन-डोपामिन गड़बड़ाते हैं, एंग्जायटी-डिप्रेशन बढ़ता है।     इम्यून सिस्टम कमजोर : साइटोकाइन्स कम बनते हैं, संक्रमण जल्दी पकड़ता है।     दिमाग जल्दी बूढ़ा होता है : न्यूरान डैमेज और ग्रे मैटर लास तेज होता है। आदर्श नींद कितनी होनी चाहिए?     सामान्य व्यक्ति (18-60 वर्ष): सात से नौ घंटे प्रतिदिन     वरिष्ठ नागरिक (60+): सात से आठ घंटे     किशोर (13-18 वर्ष): आठ से 10 घंटे (स्रोत- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद) जिससे प्यार करते हो, उसे सोने दो…     मुझे सोना पसंद है। अगर आप किसी से वाकई प्यार करते हो, तो उसे सोने दो। नींद से उठाने वाला आपका सबसे बड़ा दुश्मन हो सकता है। मैं छह घंटे से ज्यादा नहीं सो पाता हूं। – आयुष्मान खुराना, अभिनेता का कथन