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नगर निगम अपर आयुक्त विनोद पाण्डेय ने जोन 8 में राजस्व वसूली की गहन समीक्षा की

नगर निगम अपर आयुक्त विनोद पाण्डेय ने जोन 8 में राजस्व वसूली की गहन समीक्षा की सभी एआरआई जोन 8 के सभी 7 वार्डों के घर – घर, दुकान – दुकान जाकर फील्ड में उतरकर राजस्व वसूली करें, कोई भी घर, कोई भी  दुकान 31 मार्च 2026 तक राजस्व वसूली से छूटने ना पाए रायपुर  आज रायपुर नगर पालिक निगम के आयुक्त विश्वदीप के आदेशानुसार नगर निगम अपर आयुक्त विनोद पाण्डेय ने नगर निगम जोन 8 महोबा बाजार पहुंचकर जोन 8 के सभी 7 वार्डों में राजस्व वसूली अभियान की गहन समीक्षा नगर निगम जोन 8 जोन कमिश्नर श्रीमती राजेश्वरी पटेल और जोन सहायक राजस्व अधिकारी महादेव रक्सेल एवं सभी राजस्व निरीक्षकों और सहायक राजस्व निरीक्षकों की उपस्थिति में की. अपर आयुक्त विनोद पाण्डेय ने दिए गए निर्धारित लक्ष्य अनुसार 31 मार्च 2026 तक शत – प्रतिशत राजस्व वसूली करना नगर निगम हित में सर्वोच्च प्राथमिकता से हर हाल में सुनिश्चित करने के निर्देश दिए. अपर आयुक्त ने जोन 8 के अंतर्गत सभी 7 वार्डों के प्रत्येक घर और प्रत्येक दुकान में जाकर घर – घर और दुकान – दुकान फील्ड में उतरकर नगर निगम जोन 8 राजस्व विभाग के लिए राजस्व वसूली करने सभी सहायक राजस्व निरीक्षकों को निर्देशित किया. अपर आयुक्त ने निर्देश दिए कि 31 मार्च तक जोन 8 अंतर्गत किसी भी वार्ड में कोई भी घर और कोई भी दुकान राजस्व वसूली से छूटने ना पाए , यह सभी सहायक राजस्व निरीक्षक हर हाल में नगर निगम हित में सुनिश्चित करें.

रायपुर: स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएं, साधारण जीवन के असाधारण दस्तावेज

रायपुर : स्वर्गीय  विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएं साधारण मनुष्य के असाधारण जीवन का दस्तावेज रायपुर साहित्य उत्सव में  शुक्ल और उनके साहित्य का स्मरण 'स्मृति शेष स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां' विषय पर हुई परिचर्चा छत्तीसगढ़ ने बीते 200 वर्षों में हिंदी साहित्य को बार-बार नई दिशा दी, इनमें  शुक्ल भी शामिल : डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी रायपुर   नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन  देश के शीर्षस्थ साहित्यकार स्वर्गीय  विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य का स्मरण किया गया। ‘स्मृति शेष स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य, प्रशासन, पत्रकारिता और फिल्म से जुड़े वक्ताओं ने  उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर भावपूर्ण संवाद किया। वक्ताओं ने  शुक्ल और उनकी रचनाओं से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए उनके साहित्य को मानवीय संवेदना और मौलिक अभिव्यक्ति का अद्वितीय उदाहरण बताया। रायपुर साहित्य उत्सव में  शुक्ल और उनके साहित्य का स्मरण परिचर्चा के प्रथम वक्ता भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी ने कहा कि वे वर्ष 1973 से लगातार विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े रहे। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ ने पिछले 200 वर्षों में हिंदी साहित्य को बार-बार दिशा दी है। ठाकुर जगमोहन सिंह, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय से लेकर विनोद कुमार शुक्ल तक की परंपरा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि  शुक्ल ने किसी विचारधारा या कवि का अनुगमन नहीं किया, उनका संपूर्ण लेखन मौलिक है। उनकी रचनाओं में साधारण मनुष्य अपनी पूरी गरिमा और संवेदना के साथ उपस्थित होता है। शोषितों का जीवन, खुद के गढ़े हुए मुहावरे, सरल भाषा और गहरी अनुभूति उनके साहित्य की पहचान है। उनके उपन्यासों में ‘घर’ सबसे खूबसूरत और मानवीय प्रतीक के रूप में उभरता है। नई दिल्ली की युवा कथाकार एवं पत्रकार सु आकांक्षा पारे ने कहा कि कई लोग विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं को दुरूह कहकर खारिज कर देते हैं, लेकिन बहुत से पाठकों को इन्हीं रचनाओं से गहरा और आत्मीय लगाव है। उन्होंने कहा कि  शुक्ल मनुष्यता के पुजारी थे, उनकी रचनाएं मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं। जनसंपर्क विभाग के उप संचालक एवं युवा साहित्यकार  सौरभ शर्मा ने कहा कि स्वर्गीय  विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य यह सिखाता है कि सामान्य जीवन जीते हुए भी मनुष्य कैसे खुश रह सकता है। वे बड़े कवि और लेखक तो थे ही, उससे भी बड़े इंसान थे। उन्होंने  शुक्ल के साथ बिताए समय को याद करते हुए कहा कि उनके साथ बैठना सुकून से भर देता था, समय का पता ही नहीं चलता था। उन्होंने बताया कि ‘स्मृति’ का प्रयोग  शुक्ल के साहित्य में विपुलता से हुआ है। उनकी रचनाएं पाठकों में कौतुक और उत्सुकता जगाती हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं लेखक  अनुभव शर्मा ने कहा कि  विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ने के बाद उन्होंने उनके साहित्य को जिया है। उनकी रचनाओं में आए प्रतीक और बिंब हमें अपने आसपास के जीवन में दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया कि  शुक्ल ने उन्हें भी लिखने के लिए प्रेरित किया। ‘पेड़ों का हरहराना, चिड़ियों का चहचहाना’ जैसे छोटे-छोटे प्रतीक उनकी रचनाओं में हर जगह मिलते हैं। उनकी कथाएं हमारी मिट्टी से उपजे शब्दों में अपनी बात कहती हैं और प्याज की तरह परत-दर-परत खुलती जाती हैं। अभिनेत्री सु टी.जे. भानु ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि साहित्य उन्हें बचपन से संबल देता रहा है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहली बार  विनोद कुमार शुक्ल की कविता पढ़ी, तो लगा कि यही वे बातें हैं, जिन्हें वे स्वयं कहना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि वे हर वर्ष 1 जनवरी को  शुक्ल के जन्मदिन पर रायपुर आती थीं और उनसे मिलती थीं। उनकी किताबों में जनमानस की सच्ची और आत्मीय बातें हैं। परिचर्चा की सूत्रधार डॉ. नीलम वर्मा ने समापन करते हुए कहा कि स्वर्गीय  विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य की एक नहीं, अनेक खिड़कियां हैं। उनके लेखन में गहरी मानवीय करुणा और संवेदना समाई हुई है। वे किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी रचनाएं पूरी दुनिया को जोड़ती हैं।