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भोपाल में शुरू होगा बिना चीरफाड़ वाला पोस्टमॉर्टम, आधे घंटे में पूरी होगी प्रक्रिया, एम्स को मिली मंजूरी

भोपाल   डिजिटल अटॉप्सी ' सेंटर अपनी योजना के अनुसार कामयाब रहा तो यह सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से क्रांतिकारी कदम होगा। इसके तहत बिना चीर-फाड़ किए पोस्टमॉर्टम किया जा सकेगा। इससे शव को सम्मान दिया जा सकेगा और अंतिम समय में लोग अपने प्रियजन के शरीर को बगैर क्षत-विक्षत हुए विदाई दे सकेंगे।  भोपाल जल्द ही देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो सकता है, जहां बिना चीरफाड़ के पोस्टमॉर्टम किया जाएगा। जापान और अन्य विकसित देशों की तर्ज पर एम्स भोपाल में वर्चुअल ऑटोप्सी शुरू करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया गया है।  एम्स भोपाल प्रबंधन ने भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी की बैठक में इसका औपचारिक प्रस्ताव रखा है। खास बात यह है कि इस प्रस्ताव को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से पहले ही सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी थी। अब इसे वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि मंडल के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। सांसद आलोक शर्मा ने कहा कि प्रस्ताव पर रिस्पॉन्स सकारात्मक रहा है और जल्द ही इसके लिए फंड जारी होने की संभावना है। यह परियोजना मंजूर होती है तो एम्स भोपाल मध्यप्रदेश का पहला ऐसा अस्पताल होगा, जहां वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा शुरू होगी। शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि फांसी के मामलों में वर्चुअल ऑटोप्सी और पारंपरिक ऑटोप्सी के नतीजों में 90 प्रतिशत तक समानता रही। डिजिटल एविडेंस होते हैं तैयार विशेषज्ञों के अनुसार, वर्चुअल ऑटोप्सी से तैयार होने वाली रिपोर्ट डिजिटल साक्ष्य के रूप में बेहद मजबूत होती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति की मौत नस में ब्लॉकेज के कारण हुई है, तो रिपोर्ट में उस नस की 3डी तस्वीर होगी। यह तस्वीर तीन स्तरों में होगी- पहले पूरे शरीर में ब्लॉकेज की स्थिति, फिर संबंधित अंग और अंत में उस खास नस की क्लोज-अप इमेज। इन डिजिटल साक्ष्यों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और अदालत में भी प्रमाण के तौर पर पेश किया जा सकता है। परिजनों के आक्रोश का नहीं करना होगा सामना कई मामलों में परिजन धार्मिक या सामाजिक कारणों से शव की चीरफाड़ नहीं चाहते। इसे लेकर अस्पतालों में विवाद की स्थिति भी बन जाती है। जिसका सामना कई बार मौजूद डॉक्टरों को करना पड़ता है। पुलिस कानूनी प्रक्रिया के तहत पोस्टमार्टम कराती है, लेकिन इससे परिवार मानसिक रूप से आहत होता है। वर्चुअल ऑटोप्सी इस समस्या का समाधान बन सकती है, क्योंकि इसमें शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए जांच पूरी की जाती है। इससे परिजनों को शव सही अवस्था में सौंपा जा सकेगा। आधा घंटे में पूरी प्रक्रिया एम्स के फॉरेंसिक विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, जहां पारंपरिक पोस्टमॉर्टम में कई घंटे लग जाते हैं, वहीं वर्चुअल ऑटोप्सी की प्रक्रिया लगभग आधे घंटे में पूरी हो सकती है। यह तकनीक विशेष रूप से ट्रॉमा केस, सड़क हादसों और संक्रामक बीमारियों से जुड़ी मौतों में बेहद उपयोगी मानी जा रही है। कोविड जैसी महामारियों के दौरान यह स्टाफ के लिए संक्रमण के खतरे को भी कम करती है। देश में 38 वर्चुअल ऑटोप्सी सेंटर बनाने का टारगेट भारत में सबसे पहले 2021 में एम्स दिल्ली में वर्चुअल ऑटोप्सी की शुरुआत हुई थी। अब 2026 की शुरुआत तक देशभर में 38 से अधिक विशेष वर्चुअल ऑटोप्सी लैब स्थापित करने की योजना है। एम्स दिल्ली के अलावा शिलॉन्ग स्थित एनईआईजीआरआईएचएमएस में भी वर्चुअल ऑटोप्सी की सुविधा मौजूद है। इसके अलावा एम्स ऋषिकेश में भी यह सेटअप तैयार करने की मंजूरी दी गई है। कम होगा भार  एक अधिकारी ने बताया कि पारंपरिक तरीके से किए जाने वाले पोस्टमॉर्टम में काफी समय जाता है। इस तरीके से किए जाने वाले पोस्टमॉर्टम रात में नहीं किए जाते हैं। पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल आने वाले 70 प्रतिशत मामले सामान्य मौत के होते हैं। यानी केवल इनकी मौत का कारण पता करना होता है। हालांकि 30 प्रतिशत ऐसे मामले होते हैं, जिनमें कानूनी अड़चनें होती हैं। इस मशीन के जरिए 70 प्रतिशत सामान्य पोस्टमॉर्टम को करने में काफी मदद मिलेगी।  पश्चिमी देशों में इस तकनीकी का बहुत इस्तेमाल किया जाता है। डिजिटल अटॉप्सी के जरिए 30 मिनट के अंदर पोस्टमॉर्टम हो जाता है, जबकि पारंपरिक तरीके से होने वाले पोस्टमॉर्टम में 1-2 घंटे या उससे भी अधिक समय लग सकता है। बता दें कि नायर अस्पताल में सालाना 2000-2500 पोस्टमॉर्टम होते हैं। इनमें से तकरीबन 400 कानूनी मामलों से जुड़े पोस्टमॉर्टम होते हैं। ऐसे करेगा काम सामान्य मौत के मामलों में यह वर्चुअल अटॉप्सी मशीन काफी फायदेमंद साबित होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, एमआरआई की तरह इस मशीन में उच्च क्वॉलिटी का स्कैनर लगा होता है। शव को मशीन के अंदर भेजा जाता है, जिससे शरीर के अंदर प्रभावित हुए अंगों के बारे में पता चलता है। स्कैन के जरिए कंप्यूटर पर शरीर के अंदर की चीजों को आसानी से रेडियोलॉजिस्ट और फरेंसिक विशेषज्ञ देखते हैं और मौत के कारणों का पता लग सकता है। दुर्घटनाग्रस्त मामलों या ‘मास कैज्युअलिटी’ के दौरान इस तरह की मशीन से काफी मदद मिल सकती है।

इंदौर में रियल एस्टेट गतिविधियों में तेजी, विजयनगर और बायपास में रजिस्ट्री में उछाल

 इंदौर  शहर में रियल एस्टेट गतिविधियां लगातार गति पकड़ रही हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में संपत्ति की खरीदी-बिक्री का रुझान बीते वित्तीय वर्ष 2024-25 की तुलना में 2.28 प्रतिशत बढ़ा है। इस बढ़ोतरी में सबसे बड़ा योगदान विजय नगर स्थित इंदौर-3 पंजीयन कार्यालय का रहा, जहां पंजीयन में 16.51 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यहां वर्ष 2024 की तुलना में वर्ष 2025 में 4320 अधिक दस्तावेज पंजीकृत हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार विजय नगर, बायपास और देवास नाका क्षेत्र में आवासीय और व्यावसायिक संपत्तियों की खरीदी-बिक्री बढ़ी है। दस्तावेजों के पंजीयन में इजाफा इंदौर जिले में वित्तीय वर्ष 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर तक नौ माह की अवधि में पंजीयन कार्यालयों में कुल 1 लाख 26 हजार 328 दस्तावेज पंजीकृत हुए, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष इसी अवधि में 1 लाख 23 हजार 512 दस्तावेज दर्ज हुए थे। इस तरह कुल 2816 दस्तावेज अधिक पंजीकृत हुए। हालांकि, दस्तावेज पंजीयन बढ़ने के बावजूद राजस्व लक्ष्य हासिल करने में विभाग पीछे रहा। राजस्व संग्रहण और वार्षिक लक्ष्य इंदौर पंजीयन कार्यालय को 3500 करोड़ रुपये का वार्षिक लक्ष्य दिया गया था, जिसमें नौ माह में 2328 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया जाना था। लेकिन अब तक विभाग केवल 1730 करोड़ रुपये ही एकत्र कर सका है। फिर भी यह राशि वर्ष 2024 की समान अवधि में जुटाए गए 1659 करोड़ रुपये से अधिक है। पंजीयन कार्यालयवार आंकड़ों पर नजर डालें तो नौ माह में इंदौर-4 कार्यालय में सर्वाधिक 34,632 दस्तावेज पंजीकृत हुए, जबकि सबसे अधिक राजस्व 479.08 करोड़ रुपये इंदौर-3 कार्यालय से प्राप्त हुआ। पुराने क्षेत्रों में मांग कमजोर मोती तबेला स्थित पंजीयन कार्यालय में दस्तावेज पंजीयन में 15.30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो शहर के कुछ पुराने क्षेत्रों में संपत्तियों की मांग कमजोर होने का संकेत देती है।

एम्स दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में ट्रामा सेंटर, रोबोटिक सर्जरी से मिलेगा इलाज

भोपाल  एम्स भोपाल में करीब एक हजार करोड़ रुपये के विस्तार की योजना को लेकर सोमवार को दिल्ली में भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (एसएफसी) की बैठक हुई। भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव को विस्तार का पूरा प्लान सौंपा। इस महायोजना के तहत एम्स परिसर में ही हेलीपैड बनाया जाएगा, जिससे एयर एम्बुलेंस का संचालन सुलभ हो सकेगा। कैंसर अस्पताल और ट्रामा सेंटर का निर्माण सांसद शर्मा ने बताया कि एम्स में 200 बेड का अत्याधुनिक अपेक्स आन्कोलॉजी सेंटर (कैंसर अस्पताल) बनाया जाएगा। आंकड़ों के अनुसार, एम्स भोपाल में हर साल 36 हजार से ज्यादा कैंसर मरीज आते हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत मरीज भोपाल के बाहर के जिलों जैसे आगर मालवा, रायसेन और विदिशा से होते हैं। इसके साथ ही एम्स दिल्ली के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा 'लेवल-1 अपेक्स ट्रामा सेंटर' भी भोपाल में तैयार होगा। 150 बेड वाले इस सेंटर के पहले चरण के लिए 295 करोड़ रुपये का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा गया है। रोबोटिक सर्जरी और हाई-टेक सुविधाएं एम्स भोपाल का यूरोलॉजी विभाग अब दुनिया की सबसे उन्नत 'द विंची रोबोट 4.0' प्रणाली से लैस होगा। लगभग 30 करोड़ की लागत वाले इस सिस्टम के लगने के बाद एम्स भोपाल सेंट्रल इंडिया का पहला सरकारी संस्थान बनेगा, जहां रोबोटिक तकनीक से प्रोस्टेट कैंसर और किडनी ट्यूमर जैसे जटिल ऑपरेशन न्यूनतम चीर-फाड़ के साथ हो सकेंगे। इसके अलावा वर्चुअल ऑटोप्सी और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाओं के विस्तार पर भी प्रेजेंटेशन दिया गया। मरीजों की बढ़ती संख्या और बजट की उम्मीद बता दें कि एम्स में मरीजों का भार तेजी से बढ़ रहा है। साल 2022 में जहां 36 हजार मरीज आए थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 85 हजार से अधिक हो गई है। बैठक में एम्स निदेशक डॉ. माधवानंद कर और डिप्टी डायरेक्टर संदेश जैन सहित मंत्रालय के आला अधिकारी मौजूद रहे। इन प्रोजेक्ट्स के लिए बजट जल्द ही स्वीकृत हो जाएगा, जिससे मध्य प्रदेश सहित पूरे मध्य भारत के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज मिल सकेगा।