महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है. यह ऐसा महाग्रंथ है, जिसमें धर्म-अधर्म के संघर्ष के साथ-साथ रिश्तों, वचनों, त्याग, बदले और कर्म की कई कहानियां छिपी हुई हैं. कुरुक्षेत्र के इस युद्ध में भाई ने भाई के खिलाफ हथियार उठाया, शिष्य ने अपने गुरु से युद्ध किया और एक ही परिवार के लोग एक-दूसरे के सामने खड़े हो गए. महाभारत की यही खासियत है कि इसे जितनी बार पढ़ा जाए, हर बार कोई न कोई नई कथा या रहस्य सामने आता है. आज हम आपको महाभारत से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रसंग बताएंगे, जिनका संबंध सीधे कुरुक्षेत्र युद्ध और उसके प्रमुख पात्रों से है.
अंबा की कहानी और शिखंडी का जन्म
महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु के पीछे शिखंडी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन शिखंडी के पीछे एक ऐसी कहानी थी, जो वर्षों पुराने अपमान और प्रतिशोध से जुड़ी थी. शिखंडी का पूर्वजन्म अंबा के रूप में बताया जाता है. अंबा काशी नरेश की पुत्री थीं. उनके साथ हुई घटनाओं के बाद उनके मन में भीष्म के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ. उन्होंने भीष्म के वध का संकल्प लिया और भगवान शिव की कठोर तपस्या की.
मान्यता है कि भगवान शिव ने उन्हें वर दिया कि अगले जन्म में वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेंगी. इसके बाद अंबा ने अगले जन्म में शिखंडी के रूप में जन्म लिया था. कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भीष्म शिखंडी के सामने अस्त्र उठाने से पीछे हट गए, क्योंकि वे शिखंडी को अंबा का पुनर्जन्म मानते थे. इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर अर्जुन ने भीष्म पर बाण चलाए और अंततः भीष्म शरशय्या पर जा गिरे थे.
अंबिका और अंबालिका के पुत्र कौन थे?
अंबा के अलावा काशी नरेश की दो अन्य पुत्रियां थीं, अंबिका और अंबालिका. दोनों का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार विचित्रवीर्य से हुआ था. लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई. उनके कोई संतान नहीं थी. ऐसे में हस्तिनापुर के राजवंश और सिंहासन के भविष्य को लेकर सत्यवती चिंतित हो उठीं.
तब सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया. धार्मिक परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, वंश को आगे बढ़ाने के लिए नियोग की व्यवस्था के तहत अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न करने की बात सामने आई. जब अंबिका वेदव्यास के सामने गईं तो भय के कारण उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं. मान्यता है कि इसी वजह से उनके पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हुए. वहीं अंबालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गईं. उनके पुत्र पांडु के शरीर का वर्ण पीला बताया गया.
सत्यवती को जब यह पता चला कि दोनों राजकुमारों में कुछ विशेष शारीरिक परिस्थितियां हैं, तो उन्होंने स्वस्थ संतान की इच्छा से दोबारा प्रयास करने को कहा. लेकिन अंबिका खुद नहीं गईं और उन्होंने अपनी दासी को भेज दिया. उस दासी से विदुर का जन्म हुआ. विदुर आगे चलकर हस्तिनापुर के अत्यंत बुद्धिमान और नीति-कुशल मंत्री बने.
यक्ष ने पांडवों से पूछे थे कठिन सवाल
महाभारत का एक बेहद प्रसिद्ध प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है. वनवास के दौरान एक दिन पांडवों को बहुत प्यास लगी. पानी की तलाश में नकुल एक सरोवर के पास पहुंचे. वहां उन्हें एक अदृश्य आवाज सुनाई दी. आवाज ने चेतावनी दी कि सरोवर का पानी पीने से पहले उसके सवालों का जवाब देना होगा. लेकिन नकुल ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और पानी पी लिया. कथा के अनुसार, वह वहीं अचेत होकर गिर पड़े.
जब नकुल वापस नहीं लौटे तो सहदेव उन्हें खोजने गए. उनके साथ भी यही हुआ. इसके बाद अर्जुन और भीम वहां पहुंचे, लेकिन उन्होंने भी उस चेतावनी को नजरअंदाज किया और सरोवर का पानी पीते ही अचेत होकर गिर पड़े. अंत में युधिष्ठिर वहां पहुंचे. उन्होंने अपने चारों भाइयों को इस हालत में देखा तो दुखी हुए. जब वह सरोवर का पानी पीने के लिए आगे बढ़े, तो वही आवाज फिर सुनाई दी. युधिष्ठिर ने जल्दबाजी करने के बजाय उस अदृश्य सत्ता की बात मान ली और उसके सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए.
यक्ष के सवालों का युधिष्ठिर ने दिया जवाब
यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवन और धर्म से जुड़े कई कठिन सवाल पूछे. इन सवालों को महाभारत के 'यक्ष प्रश्न' के नाम से जाना जाता है. यक्ष ने पूछा कि हवा से भी तेज क्या चलता है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- मन.
इसके बाद पूछा गया कि पृथ्वी से भारी क्या है? युधिष्ठिर ने माता को इसका उत्तर बताया. आकाश से ऊंचा क्या है? इस पर उन्होंने पिता को उत्तर दिया. इसी तरह यक्ष ने उनसे धर्म, जीवन, मृत्यु और मनुष्य के आचरण से जुड़े कई प्रश्न पूछे. युधिष्ठिर ने सभी प्रश्नों के संतुलित उत्तर दिए.
युधिष्ठिर ने नकुल को ही क्यों चुना?
यक्ष युधिष्ठिर के जवाबों से प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वह अपने चारों भाइयों में से किसी एक को जीवित कर सकते हैं. युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने की इच्छा जताई. यक्ष ने पूछा कि उन्होंने भीम या अर्जुन को क्यों नहीं चुना, जबकि युद्ध के समय उनकी आवश्यकता अधिक थी.
युधिष्ठिर ने कहा कि वह माता कुंती के पुत्र हैं और नकुल माता माद्री के. कुंती का एक पुत्र जीवित है, इसलिए माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए. युधिष्ठिर की इस बात से यक्ष प्रसन्न हुए. महाभारत की कथा के अनुसार, वह यक्ष वास्तव में धर्मदेव थे. उन्होंने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया और उनके सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया.
श्री कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां क्यों माफ कीं?
महाभारत में श्रीकृष्ण को केवल योद्धा या अर्जुन के सारथी के रूप में ही नहीं, बल्कि अपने वचन का पालन करने वाले व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है. राजसूय यज्ञ के दौरान युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के योग्य माना. लेकिन शिशुपाल इससे बेहद नाराज हो गया और भरी सभा में कृष्ण का अपमान करने लगा.
शिशुपाल की मां श्रीकृष्ण की बुआ थीं. शिशुपाल के जन्म से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वह सामान्य बालक की तरह पैदा नहीं हुआ था. उसके तीन नेत्र और चार भुजाएं थीं. भविष्यवाणी की गई थी कि जिस व्यक्ति की गोद में जाने के बाद उसके अतिरिक्त अंग सामान्य हो जाएंगे, वही आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण बनेगा.
जब शिशुपाल को श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया तो उसके अतिरिक्त नेत्र और दो भुजाएं गायब हो गईं. यह देखकर उसकी मां चिंतित हो गईं और उन्होंने कृष्ण से शिशुपाल को क्षमा करने का वचन मांगा. कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वह शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा करेंगे. राजसूय यज्ञ के दौरान शिशुपाल लगातार कृष्ण का अपमान करता रहा. जब उसके सौ अपराध पूरे हो गए, तब कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया था.
रुक्मिणी को लेकर शिशुपाल के मन में क्यों था आक्रोश?
शिशुपाल का विवाह रुक्मिणी से होना तय बताया जाता है, लेकिन रुक्मिणी श्रीकृष्ण को अपना पति बनाना चाहती थीं. उन्होंने श्री कृष्ण को संदेश भेजकर अपनी इच्छा बताई थी. इसके बाद कृष्ण रुक्मिणी को लेकर विदर्भ से चले गए और दोनों का विवाह हुआ.
रुक्मिणी से जुड़ी इस घटना को भी शिशुपाल के मन में कृष्ण के प्रति बढ़ती शत्रुता से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, शिशुपाल और कृष्ण की दुश्मनी के पीछे केवल यही एक कारण नहीं माना जाता.
दुर्योधन को गांधारी से मिला था वज्र जैसा शरीर?
महाभारत से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में एक गांधारी और दुर्योधन की भी है. कुरुक्षेत्र युद्ध के 18वें दिन से पहले गांधारी अपने 100 पुत्रों में से केवल दुर्योधन को जीवित देख रही थीं. वह अपने आखिरी पुत्र को भी खोना नहीं चाहती थीं.
एक प्रचलित कथा के अनुसार, वर्षों तक आंखों पर पट्टी बांधकर रहने के कारण गांधारी ने ऐसी तपस्या-शक्ति प्राप्त कर ली थी, जिससे उनकी दृष्टि अत्यंत शक्तिशाली हो गई थी. उन्होंने दुर्योधन को आदेश दिया कि वह स्नान करके बिना वस्त्रों के उनके सामने आए.
कथा के लोकप्रिय संस्करण में बताया जाता है कि रास्ते में श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को अपनी मां के सामने इस तरह जाने पर संकोच कराया. इसके बाद दुर्योधन ने अपनी जंघा को पत्तों से ढक लिया. जब गांधारी ने अपनी आंखों की पट्टी हटाकर दुर्योधन को देखा तो उनकी दृष्टि से उसके शरीर का अधिकांश हिस्सा वज्र के समान कठोर हो गया. लेकिन पत्तों से ढकी उसकी जंघाएं वैसी नहीं बन सकीं.
भीम ने दुर्योधन की जंघा पर ही क्यों किया वार?
अगले दिन भीम और दुर्योधन के बीच गदा युद्ध हुआ. दुर्योधन को गदा युद्ध में बेहद कुशल योद्धा माना जाता था. युद्ध के दौरान भीम के कई प्रहार दुर्योधन पर प्रभावी नहीं हो रहे थे. इसी बीच श्रीकृष्ण ने भीम को दुर्योधन की जंघा की ओर संकेत किया.
इसके बाद भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और वह गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा. हालांकि, दुर्योधन के शरीर को गांधारी की दृष्टि से वज्र के समान बनने और कृष्ण द्वारा उसे पत्तों से ढकने की कथा महाभारत की लोकप्रिय परंपराओं में मिलती है, जबकि इसके विवरण विभिन्न ग्रंथीय संस्करणों में अलग-अलग मिलते हैं. इसलिए इसे एक ही रूप में सभी पाठों का समान वर्णन नहीं माना जाना चाहिए.
महाभारत की यही विशेषता है कि इसमें युद्ध के साथ-साथ मनुष्य के निर्णय, वचन, धर्म, रिश्तों और कर्म के परिणामों की भी गहरी कथाएं मिलती हैं. शिखंडी की प्रतिशोध की कहानी हो, यक्ष के सामने युधिष्ठिर की परीक्षा, शिशुपाल और कृष्ण का प्रसंग या दुर्योधन का अंतिम युद्ध, हर कथा अपने भीतर एक अलग संदेश और धार्मिक परंपरा समेटे हुए है.





