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आखिरकार सबके लिए खुल गए दरवाज़े

लखनऊ

‘हेरिटेज ऑफ अवध‘ नामक ट्रस्ट द्वारा एक नाटक ‘दरवाज़े खोल दा‘ का मंचन इंटीग्रल युनिवर्सिटी,कुर्सी रोड,लखनऊ में किया गया । जिसमें विभिन्न किरदारों ने अपनी कला से र्दशकों को लगातार नाटक से जोड़े रखा । देश में करोड़ो लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर में जाते रहते है । इस दौरान जो सबसे बड़ी समस्या से सबको गुज़रना पड़ता है वह है सही किराये में और सही जगह पर एक अदद मकान की । जिसमें वह व्यक्ति अपने परिवार के साथ सुकून से रह सके । इसी किराये के मकान की तलाश में आने वाली दिक्कतों को इस नाटक में अच्छी तरह से दिखाया गया है ।

नाटक में कई मकानों के मालिक गुरुदत्त पांडे ने रामदयाल के रुप में अच्छा प्रदर्शन किया जिसमें वह किरायेदारों के इंटरव्यू लेते दिखते हैं और किसी न किसी वजह से वह किसी को भी मकान नहीं देते हैं । किरायेदारों के रुप में कई परिवार रामदयाल से मकान लेने आते हैं जिसमें मुख्य रुप से पहले किरायेदार कृपा राम भारद्वाज व उनकी पत्नी सावित्री देवी नकली नाम से आते हैं लेकिन जब उनकी असलियत पता लगती है कि वह मुसलमान हैं तो पंडित रामदयाल काफी नाराज़ होकर उनको घर से भगा देते है। दूसरे किरायेदार के रुप में मुन्नन(रोहित श्रीवास्तव) आते है जो लखनऊ के कायस्थ फैमिली से होते है इनको भी पंडित रामदयाल मकान इस वजह से मकान नहीं देते हैं कि यह उर्दू बोलते हैं और मांस मछली खाते है । तीसरे किरायेदार हिन्दू पठान आफताब रॉय (सौरभ शुक्ला)आते है । उनको भी रामदयाल मकान नहीं देते है क्योंकि वह भी मांस मछली खाते है और शराब और मुजरे के भी शौकीन है ।

 चौथे किरायेदार के रुप में दक्षिण भारतीय वेल्लू (जावेद अहमद)आता है जो कि काफी बड़ा आदमी है लेकिन बाद में पता चलता है कि वह दलित है इस कारण पंडित रामदयाल उनसे बहुत नाराज ़होते है। और कहते हैं कि हम किसी दलित को मकान नहीं देेंगे । अन्त में एक क्रिशिचियन डाक्टर और उनकी बेटी आते है पंडित रामदयाल उनको भी मकान देने से इस वजह से मना करते है कि यह तो अंग्रेज है यह तो सब कुछ खाते होंगे । लेकिन यहीं पर पंडित रामदयाल को अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है । पंडित रामदयाल को दौरा पड़ने के कारण उनका बेटा कमलकान्त डाक्टर कोएलू (बी डी नकवी)से खुशामद करता है कि वह उसके पिता जी को देख लें वह मरने वाले है तब डाक्टर कोएलू राज़ी होते हैं पंडित रामदयाल को चेक करते है और उनको दवा देते है जिससे रामदयाल सही हो जाते है । रामदयाल दोबारा जीवित होते हैं तब उनकी आत्मा भी जीवित हो जाती जिससे उनका मन भी बदल जाता है । पंडित रामदयाल कहते है कि मुझे रास्ते में मेरी आत्मा मिली जिसने मुझसे कहा कि इस रास्ते पर चलकर ना तुम कभी मंजिल पर पहुंच सकोगे न मैं। क्योंकि यह रास्ता पुराना हो गया है । अब यह रास्ता कहीं नहीं जाता। मैंने पूछा तो आगे जाने की तरकीब क्या है? वह बोली आगे वही लोग जाते हैं जो अपने घर के दरवाजे खुले रखते हैं । यह घर जैसे हिंदू मुसलमान सिख ईसाई पारसी यहूदी ने मिलकर बनाया है । अगर यह सब मिलकर इस घर में नहीं रहेंगे तो यह घर कैसे आबाद होगा । और कैसे तरक्की करेगा । और कैसे इसका झंडा आसमान पर बुलंद होगा।

इस बेहतरीन नाट्य रूपांतर को देखने के लिए इंटीग्रल यनिवर्सिटी के प्रोफेसर व बड़ी तादाद में स्टूडेन्ट व अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।नाटक का निद्रेशन बी0डी0नकवी (रिटायर्ड जज) , सहायक निद्रेशक रियाज़ अल्वी,जावेद एवं विनीता सिंह, कार्यशाला निद्रेशक रहमान खान , प्रोडयूसर मुजतबा खान व म्यिुजिक डायरेक्टर धीरेन्द्र, सेट डिजाइन-शकील अहमद मेकअप-सोनी , स्टेज इंचार्ज -तारिक़ खान , डांस डायरेक्टर -नावेद ने हिस्सा लेकर इस नाटक को कामयाब बनाने में अपना योगदान दिया ।

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