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काशी के रक्षक भगवान कालभैरव: समय के स्वामी की अद्भुत कथा

आज भगवान कालभैरव की जंयती मनाई जा रही है. हर साल लोग मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव की जयंती भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाते हैं. इस दिन व्रत और भगवान कालभैरव का पूजन किया जाता है. उनसे भय, पाप और संकट से मुक्ति की कामना की जाती है. भगवान कालभैरव की जयंती एक धार्मिक पर्व है.

हालांकि, ये दिन शिव जी के रौद्र रूप की भी याद दिलाता है, क्योंकि भगवान कालभैरव शिव जी के ही रौद्र रूप हैं. भगवान कालभैरव को लोग काशी के कोतवाल के रूप में भी जानते हैं. काशी भगवान शिव की नगरी मानी जाती है. कहा जाता है ये नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है. आखिर क्यों भगवान कालभैरव को काशी नगरी की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है. क्या कारण है कि भगवान कालभैरव को ‘काशी का कोतवाल’ कहा जाता है? आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार…

स्कंद पुराण में भगवान शिव के रौद्र रूप कालभैरव के बारे में विस्तार से बताया गया है. पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्राह्मा जी, श्रीहरि विष्णु और भगवान शिव के बीच इस बात को लेकर बहस और विवाद हो गया कि तीनों में सर्वश्रेष्ट कौन है. तीनों ने स्वंय को सर्वश्रेष्ट कहा. अंत में जब इस विवाद नहीं सुलझा तो इसका फैसला ऋषि-मुनियों पर छोड़ दिया गया.

ऋषि-मुनियों ने गहन विचार-विमर्श के बाद भगवान शिव को सर्वश्रेष्ठ बताया. यह सुनकर ब्रह्मा जी को ईर्ष्या हई. उनको क्रोध आ गया. वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हुए. क्रोध में आकर उन्होंने भगवान शिव को अपमानजनक बातें कहीं. ब्रह्मा जी के इस व्यवहार से भगवान शिव को बहुत क्रोध आ गया. उसी समय उन्होंने रौद्र रूप धारण किया. भगवान शिव के उस तेजस्वी रूप से कालभैरव प्रकट हुए.

कालभैरव ने ब्रह्मा जी के पांचवां सिर काट दिया. इस वजह से उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा. कारभैरव इस पाप से मुक्ति पाने के सभी तीर्थों पर गए, लेकिन वो पाप मुक्त न हो सके. तीर्थयात्रा के दौरान जब भैरव भगवान विष्णु के पास पहुंचे, तो उन्होंने उनको सलाह दी कि वो काशी जाएं. इसके बाद भगवान कालभैरव काशी पहुंचे. वहां उन्होंने गंगा और मत्स्योदरी के संगम में स्नान किया.

क्यों कहे जाते हैं ‘काशी के कोतवाल’?

इसके बाद उनके हाथ से ब्रह्मा का कपाल गिर गया, जिससे वो ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त हो गए. उन्हें आंतरिक शांति मिली. इसके बाद भगवान विश्वनाथ स्वयं काशी में प्रकट हुए. भगवान शिव ने कालभैरव को वरदान देते हुए कहा कि काल भी तुमसे डरेगा. साथ ही महादेव ने कालभैरव को काशी की रक्षा की जिम्मेदारी दी. तभी से कालभैरव समय और मृत्यु पर नियंत्रण रखने वाले देव कहे जाने लगे. उन्हें ‘काशी का कोतवाल’ कहा जाने लगा.

कालभैरव की अनुमति से ही व्यक्ति काशी में आता है. मान्यताओं के अनुसार, बिना उनकी अनुमति के काशी में कोई प्रवेश नहीं कर सकता. भक्तों की यात्रा भी उनके दर्शन से ही शुरू होती है.

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