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यूपी में 75 साल में 21 मुख्यमंत्री बने, ब्राह्मणों का 6 बार शासन, 32 साल से सियासी वनवास में कौन?

लखनऊ 
  उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सत्ता की कमान ब्राह्मण समाज के हाथों में रही है. नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समाज से मुख्यमंत्री नहीं बन सका. सूबे में पिछले 3 दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समाज महज एक वोटबैंक बनकर रह गया है. ऐसे में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की एक बैठक ने इस कड़ाके के ठंड में सियासी गर्मी बढ़ा दी है.

विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान 23 दिसंबर को लखनऊ में कुशीनगर से बीजेपी विधायक पंचानंद पाठक के सरकारी आवास पर ब्राह्मण विधायकों की एक बैठक की, जिसमें 40 से ज्यादा ब्राह्मण समाज के विधायकों ने शिरकत किया था. इसके बाद सूबे में ब्राह्मण पॉलिटिक्स की फिर से चर्चा तेज हो गई.

ब्राह्मण विधायकों को बैठक करने पर यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष पंकज चौधरी ने नसीहत और चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि इस तरह की बैठकें बीजेपी के संविधान में नहीं हैं. इसके बाद पीएन पाठक ने सोमवार देर शाम एक ट्वीट कर जवाब दिया. उन्होंने साफ कहा कि ब्राह्मण हमेंशा से समाज और सनातन धर्म का नेतृत्व करता रहा है. इस तरह से यूपी की जातीय गोलबंदी के बीचसवाल उठता है कि आखिर यूपी में किस-किस जाति के मुख्यमंत्री बने हैं.

यूपी में किस जाति के कितने मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश की सियासत में अब के बने मुख्यमंत्रियों पर नजर डालें तो आजादी के बाद से लेकर अभी तक कुल 21 मुख्यमंत्री हुए, इसमें सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री (6) ब्राह्मण समाज से रहे. इसके अलावा पांच ठाकुर मुख्यमंत्री बने हैं.

ब्राह्मण और ठाकुर के बाद यूपी में तीन यादव मुख्यमंत्री रहे और तीन ही वैश्य समाज से सीएम बने. इसके अलावा एक लोधी समाज से मुख्यमंत्री रहे तो दलित समाज से मायावती एकलौती सीएम रहीं. इसके अलावा जाट और कायस्थ समाज से एक-एक मुख्यमंत्री बने हैं.

यूपी में 6 ब्राह्मण सीएम और 23 साल राज

आजादी के बाद यूपी की सियासत में 1989 तक ब्राह्मण का सियासी वर्चस्व रहा. इस दौरान ब्राह्मण समाज से 6 मुख्यमंत्री बने. गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने. ये सभी कांग्रेस से थे.

ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे तो गोविंद वल्लभ पंत दो बार मुख्यमंत्री पद संभाला. इन छह मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को देखें तो करीब 23 साल तक प्रदेश की सत्ता की कमान ब्राह्मण समाज के हाथ में रही है. इतना लंबे समय तक किसी दूसरे समाज के सीएम सूबे में नहीं रहे, जिसके चलते 1950 से 1989 तक के समय को ब्राह्मण काल भी कहा जाता रहा है.

ठाकुर, यादव और वैश्य समाज के सीएम बने

ब्राह्मण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा सीएम ठाकुर समाज से बने. ठाकुर समाज से पांच सीएम बने, जिसमें सबसे पहले त्रिभुवन नारायण सिंह और उसके बाद विश्‍वनाथ प्रताप सिंह, वीर बहादुर सिंह कांग्रेस के सीएम रहे. इसके अलावा बीजेपी के राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ ठाकुर समाज से सीएम बने. इसके योगी आदित्यनाथ दूसरी बार सीएम हैं जबकि बाकी सभी एक-एक बार सीएम रहे. सूबे में करीब 17 साल तक ठाकुर समाज के सीएम रहे.

यूपी में यादव समाज से तीन सीएम बने, जिसमें सबसे पहले राम नरेश यादव जनता पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री थे. इसके बाद मुलायम सिंह और अखिलेश यादव सीएम बने. 13 साल तक यूपी में सत्ता की कमान यादव समाज के हाथों में रही. इसी तरह से वैश्य समाज से तीन सीएम बने. वैश्य समाज से चंद्र भान गुप्ता, बाबू बनारसी दास और राम प्रकाश गुप्ता सीएम बने. चंद्र भान गुप्ता दो बार सीएम रहे और बाकी दोनों नेता एक-एक बार. राम प्रकाश गुप्ता बीजेपी सरकार में सीएम रहे जबकि दोनों कांग्रेस से थे.

जाट-लोध-दलित और कायस्थ 1-1 सीएम बने

यूपी में ब्राह्मण, ठाकुर, यादव और वैश्य समाज के अलावा जाट, लोध, दलित और कायस्थ समाज से एक-एक मुख्यमंत्री रहे हैं. कायस्थ समाज से डॉ सम्‍पूर्णानन्‍द 1954 से लेकर 1960 तक दो बार सीएम बने. जाट समदाय से चौधरी चरण सिंह यूपी में दो बार मुख्यमंत्री रहे. चरण सिंह पहली बार अप्रैल 1967 मे सीएम बने और उसके बाद 1970 में बने थे.

दलित समाज से मायावती एकलौती नेता हैं, जो यूपी की मु्ख्यमंत्री बनी हैं. मायावती चार बार सीएम रही. पहली बार 1995 में सीएम बनी और उसके बाद 1997, 2002 और 2007 में मुख्यमंत्री का पद संभाला. मायावती ने लगभग पौने सात साल सीएम रही हैं. लोध समाज से कल्याण सिंह दो बार यूपी के सीएम बने. पहली बार 1991 और दूसरी बार 1997 में सीएम बने.

32 साल से ब्राह्मण समाज का वनवास

उत्तर प्रदेश में मंडल और कमंडल की राजनीति ने ब्राह्मण समाज को हाशिए पर धकेल किया. हालांकि, बीजेपी में अटल विहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी से लेकर कलराज मिश्रा जैसे ब्राह्मण नेता चेहरा हुआ करते थे, पर सूबे की सत्ता में कांग्रेस की तरह उनकी हनक नहीं रही. मंडल की राजनीति ने यूपी की सियासत को ओबीसी के इर्द-गिर्द समेटकर रख दिया.

1989 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई है जबकि पिछले दिनों से सपा से लेकर बसपा और बीजेपी की उत्तर प्रदेश में कई बार सरकारें बनी, लेकिन सूबे को ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं मिला. इस तह पिछले 32 सालों में ब्राह्मण समाज से कोई मुख्यमंत्री नहीं बना.

साल 1989 के बाद अब तक कुल सात मुख्यमंत्री बने, चार बीजेपी, दो सपा और एक बसपा से. बीजेपी ने 1989 के बाद से अब तक प्रदेश में चार बार सरकार बनाई है, इसमें उसने दो ठाकुर और एक बनिया और एक लोधी राजपूत को मौका दिया. ऐसे में ब्राह्मण समाज सत्ता की बागडोर संभालने को बेचैन दिख रहा है. यही वजह है कि ब्राह्मण समाज बैठक कर अपने प्रतिनिधित्व के लिए चिंता जता रहा है.

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