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कठिन राह, अटूट विश्वास: 282 सीढ़ियां चढ़कर होते हैं चिलाय माता के पावन दर्शन

कोटपूतली-बहरोड़

कोटपूतली-बहरोड़ जिले के सरूंड गांव में स्थित चिलाय माता मंदिर स्थानीय श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर लगभग 650 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है, जहां तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 282 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। मुख्य प्रवेश के बाद सात द्वारों को पार कर भक्त माता के दर्शन करते हैं।

 पांडवों से जुड़ी मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान की थी। यहां विराजमान चिलाय माता को ग्रामीण क्षेत्रों में रोगों और संकटों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
 
इतिहास और मान्यताओं का उल्लेख
मंदिर के महंत नंदकिशोर शर्मा के अनुसार, मुगल काल में सम्राट अकबर ने इस प्रतिमा की शक्ति की परीक्षा लेने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो सके। बाद में यहां एक गुंबद का निर्माण करवाया गया।
 
परिसर में अन्य देवस्थल और परंपराएं
मंदिर परिसर में एक पीपल का पेड़ स्थित है, जिस पर श्रद्धालु कलावा बांधकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसके अलावा चौंसठ योगिनियां, भैरू बाबा और शनिदेव के मंदिर भी यहां स्थापित हैं, जिन्हें मुख्य मंदिर की रक्षा करने वाला माना जाता है। यहां माता को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा भी प्रचलित है।

नवरात्र और मेलों का विशेष महत्व
नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। अष्टमी और नवमी के दिन विशेष मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि सरूंड माता करीब 100 गांवों की रक्षा करती हैं। ग्रामीणों के अनुसार, माता की कृपा से गांव में बीमारियों का प्रभाव नहीं पड़ता। कोरोना काल के दौरान जनहानि नहीं होने को भी इसी आस्था से जोड़ा जाता है।

दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सीढ़ियों पर फाइबर शेड और रेलिंग लगाई गई है। पहाड़ी तक सामग्री पहुंचाने के लिए रोप-वे ट्रॉली की व्यवस्था भी की गई है। सरूंड माता को कई समाजों द्वारा कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। जयपुर, दिल्ली, सीकर, अलवर, नारनौल, पाटन और कोलकाता सहित विभिन्न स्थानों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर में मुंडन, जात, जलवा और भंडारे जैसे धार्मिक आयोजन भी आयोजित किए जाते हैं।

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