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विधवा अधिकारों पर सख्त रुख: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा—उत्तराधिकार में भेदभाव अस्वीकार्य

चंडीगढ़.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि संविधान लागू होने के बाद कोई भी ऐसा रिवाज या प्रथागत कानून लागू नहीं किया जा सकता, जो महिला और पुरुष उत्तराधिकारियों के बीच भेदभाव करता हो। अदालत ने विधवा के संपत्ति अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि किसी भी सिविल कोर्ट द्वारा ऐसे भेदभावपूर्ण कस्टमरी लॉ को मान्यता नहीं दी जा सकती।यह महत्वपूर्ण निर्णय जस्टिस निधि गुप्ता की पीठ ने सुनाया।

अदालत एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें मृतक के भाई ने खुद को “निकटतम पुरुष रिश्तेदार” बताते हुए विधवा के पक्ष में दिए गए निचली अदालतों के फैसले को चुनौती दी थी। मामला नूंह का है, जहां एक व्यक्ति की 2015 में बिना संतान के मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उसकी पत्नी ने संपत्ति का एक हिस्सा तीसरे पक्ष को बेच दिया। मृतक के भाई ने इस बिक्री को अवैध बताते हुए दावा किया कि मेव समुदाय की पारंपरिक प्रथाओं के अनुसार विधवा को केवल जीवन-निर्वाह तक सीमित अधिकार होता है और वह बिना पुरुष रिश्तेदारों की अनुमति के संपत्ति का हस्तांतरण नहीं कर सकती।

याचिकाकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में रिवाज ए आम का हवाला देते हुए कहा कि इस परंपरा के तहत संपत्ति का उत्तराधिकार केवल पुरुष वंश में ही चलता है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि “कस्टमरी ला भी संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत ‘कानून’ की श्रेणी में आता है, और यदि वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसे लागू नहीं किया जा सकता।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का उत्तराधिकारी मानने वाली कोई भी प्रथा असंवैधानिक है।हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत कानून और प्रथागत कानून अलग-अलग क्षेत्र हैं। जहां पर्सनल ला धार्मिक ग्रंथों और विधिक परविधान पर आधारित होता है, वहां कस्टमरी ला एक अपवाद के रूप में विकसित होता है, जिसे सख्ती से सिद्ध करना आवश्यक होता है।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता केवल एक पुरानी और भेदभावपूर्ण परंपरा के आधार पर दावा कर रहा था, जिसे न तो पर्याप्त रूप से साबित किया गया और न ही वर्तमान संवैधानिक ढांचे में स्वीकार किया जा सकता है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी और विधवा के संपत्ति अधिकार को पूर्ण रूप से मान्यता दी।

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