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सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी का हमला और ऐतिहासिक विनाश की कहानी

 

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में अमृत महोत्सव मनाया गया. सोमनाथ के वैभव का आकर्षण सात दरिया पार तक है, क्योंकि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग में स्वयं ही शक्तिशाली चुंबकीय प्रभाव है. आत्मिक ऊर्जा के साथ परमात्मिक शक्ति का चुंबकीय गुण भी इसमें है. तभी तो इस दिव्य मंदिर की संपदा को लूटने का लालच अफगानिस्तान के गजनी के लुटेरे महमूद गजनवी को यहां खींच लाया था. एक हजार साल पहले कड़ाके की ठंड में ऊटों, घोड़ों पर सवार 30 हजार की लुटेरी सेना के साथ वह थार का रेगिस्तान पार कर सोमनाथ पहुंचा था.

सन 1026 में जनवरी की शुरुआत थी. गजनवी के लोगों ने सोमनाथ का किला घेर लिया. तीरों से हमले किए. दो दिन तो स्थानीय परमार और चालुक्य राज की सेना ने गजनवी के आक्रांता लुटेरों को खदेड़ दिया. लेकिन तीसरे दिन वो मंदिर में घुसने में कामयाब हो गए. मंदिर के पुजारी और रखवाले छिपकर देख रहे थे कि भगवान सोमनाथ शायद प्रकट होकर आक्रांताओं का संहार कर देंगे. जब पुजारी और रक्षक छुप गए तो सोमनाथ भी शायद अंतर्धान हो गए.

हजार साल पहले इस घटनाक्रम के साक्षियों ने कई जगह लिखा और बताया है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में झूलता था. इसमें जबरदस्त चुंबकीय शक्ति थी. उसी से तालमेल बिठाते हुए प्राचीन भारतीय वास्तु शिल्पियों ने मंदिर के गर्भगृह की दीवारों और शिखर गुंबद में जगह-जगह समुचित कोण पर शक्तिशाली चुंबक फिट किए थे. गजनवी की सेना जब मार-काट मचाती हुई मंदिर के गर्भगृह में पहुंची तो हवा में लटके ज्योतिर्लिंग को तोड़ने के लिए तलवार लेकर आगे बढ़ी. लेकिन उनकी तलवारें शक्तिशाली ज्योतिर्लिंग से चिपक गईं. यह देखकर गजनवी चौंक गया. उसके एक साथी ने भाला पकड़ाया. जैसे ही उसने भाला उठाया, वो हाथ से छूटकर पीछे दीवार में फिट चुंबक में जाकर चिपक गया. यह देखकर गजनवी की पूरी सेना डर गई.

लकड़ी के लट्ठों से ध्वस्त किया शिवलिंग
तभी उसके साथ मौजूद आक्रांताओं ने दिमाग लगाया. फिर लकड़ी के भारी भरकम लट्ठों से शिवलिंग ध्वस्त किया गया. गर्भगृह और मंडप की दीवारों पर लगे बेशकीमती पत्थर और हीरे-जवाहरात निकाले गए. दरवाजों पर जड़ा सोना नोंच लिया गया. मंदिर में भगवान सोमनाथ के रत्नजड़ित स्वर्ण छत्र, चंवर, पूजा के बर्तन और खजाने में मौजूद अकूत संपदा लूट ली गई.

मंदिर का गर्भगृह अमूमन तीसरे प्रकोष्ठ में होता था. लिहाजा वहां अंधेरा ही रहता था. अंदर प्रज्वलित बड़े दीपक का प्रकाश दीवारों में जड़े रत्नों से परावर्तित होकर पूरे गर्भगृह को रोशन कर देता था. गजनी के लुटेरों ने मंदिर में लगे चंदन के दरवाजे तक उखाड़ लिए, जिन पर सोने के मोटे परतों की नक्काशी थी. मारकाट और लूटपाट के बाद गजनवी की सेना फौरन सोमनाथ से भाग खड़ी हुई. क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि चालुक्य और परमार राजा सेना लेकर उसे खदेड़ने कभी भी आ सकते हैं.

सोमनाथ और वेरावल के दस हजार से अधिक गांवों, कस्बों और शहरों के लाखों कारोबारी श्रद्धालु मंदिर में बड़ी श्रद्धा से लाभ का निश्चित हिस्सा अपने आराध्य को अर्पित करते थे. गजनवी हजारों ऊंटों पर लादकर वो संपदा ले गया. यह गजनवी का भारत पर अंतिम हमला बताया जाता है, क्योंकि इसके बाद उसके बहुत सारे सैनिक और ऊंट, घोड़े मारे गए. हालांकि गजनी वापस पहुंचने पर गजनवी को वहां के शासक ने कई उपाधियां दी.

वहीं, सोमनाथ मंदिर कुछ साल बाद फिर गर्व से सिर उठाए शान से खड़ा हुआ. जैसे अमावस्या के बाद आई पूर्णिमा की रात. सोमनाथ मंदिर को पूरे 17 बार ध्वस्त किया गया. लेकिन मंदिर हर बार ध्वस्त होकर संवरता रहा, क्योंकि यह ज्योतिर्लिंग स्वयं प्रकाश है और जगत प्रकाशक भी.

सोमनाथ के शिवलिंग के अवशेष आज कहां है?
दिव्य चुंबकीय शक्ति से युक्त सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हवा में लटकने वाला ऐसा शिवलिंग था, जिसे स्पर्श नहीं किया जाता था. खंडित होने के हजार साल बाद उस ज्योतिर्लिंग के अवशेष एक बार फिर आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर ने सार्वजनिक किए. दक्षिण भारत के एक श्रद्धालु परिवार ने ठीक हजार साल पहले सुनसान पड़े सोमनाथ मंदिर के गर्भगृह से ज्योतिर्लिंग के बचे हुए अवशेष सहेजकर रख लिए. दक्षिण भारतीय ब्राह्मण परिवार के उन वंशजों ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अंग अवशेषों की हजार साल तक अपने निजी मंदिर में आराधना की. फिर उन्होंने श्री श्री रविशंकर को सौंप दिया.

दिल्ली में जब रविशंकर ने इसके दर्शन जनता को कराए तो मैंने साक्षात्कार के दौरान जिज्ञासा की कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग तो चुंबकीय शक्ति से युक्त था. इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमने भी सबसे पहले यही गुण देखा था. उन्होंने जब चांदी की थाली में रखे लगभग तीन इंच की गोलाई वाले दिव्य शिवलिंग के थोड़ा ऊपर दूसरे शिवलिंग को घुमाया तो थाली में रखा शिवलिंग भी घूमने लगा. फिर उन्होंने थाली के नीचे एक शिवलिंग घुमाया, तब भी वैसा ही दृश्य दिखा

यह प्रमाण सिद्ध करने को काफी है कि मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग कितना दिव्य और शक्तिशाली रहा होगा. साथ ही, मंदिर की दीवारों, ऊंचे गुंबदों और शिखर में प्रयुक्त चट्टानों में किस तरह शक्तिशाली चुंबक फिट कर इस ज्योतिर्लिंग की शक्ति को चैनलाइज किया होगा. कल्पना कीजिए जब दुनिया में ज्ञान का अंधेरा था तो भारतीय स्थापत्य और वस्तु शिल्प कला कितनी उन्नत रही होगी. इसके प्रमाण सिर्फ सोमनाथ मंदिर ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के अनेक मंदिर हैं, जिनमें कहीं खंभे हवा में झूल रहे हैं तो कहीं पत्थर के खंभों और सीढ़ियों पर थाप मारने पर उनसे संगीत के सधे स्वर निकलते हैं.

 

 

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