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एनजीटी ने शिवालिक इलाके में निर्माण गतिविधियों पर दिखाई सख्ती, प्रशासन से मांगा जवाब

चंडीगढ़.

पंजाब के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील शिवालिक और कंडी क्षेत्र में वर्षों से जारी निर्माण गतिविधियों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। अधिकरण ने मोहाली, रूपनगर, नवांशहर, गुरदासपुर और पठानकोट के डिप्टी कमिश्नरों को नोटिस जारी कर उन जमीनों का पूरा रिकार्ड पेश करने को कहा है, जिन्हें पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए) के दायरे से बाहर किया गया था।

इन क्षेत्रों में निर्माण और नई राज्य नीति को लेकर उठे सवालों के बीच यह कार्रवाई अहम मानी जा रही है। दरअसल, राज्य सरकार के हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट विभाग ने पिछले वर्ष 20 नवंबर को लो इंपैक्ट ग्रीन हैबिटैट्स (एलआईजीएच) नीति अधिसूचित की थी। इस नीति के जरिए पीएलपीए से बाहर की गई जमीनों पर पहले से मौजूद ढांचों को नियमित करने और सीमित निर्माण गतिविधियों को अनुमति देने का प्रावधान रखा गया। लेकिन इस नीति को पर्यावरण संरक्षण के लिए खतरा बताते हुए सार्वजनिक कार्रवाई समिति के प्रतिनिधि जसकीरत सिंह ने एनजीटी में याचिका दायर की।

जमीनों की वास्तविक सीमा तय नहीं
याचिका में कहा गया कि जिन जमीनों को पीएलपीए से बाहर किया गया, उनका सीमांकन आज तक स्पष्ट रूप से नहीं हुआ। वर्ष 2010 में पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय किया गया था कि इन क्षेत्रों का सीमांकन राष्ट्रीय प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) फंड से कराया जाएगा। इसके बावजूद 15 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जमीनों की वास्तविक सीमा तय नहीं की जा सकी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सीमांकन न होने का फायदा उठाकर शिवालिक की तलहटी और कांडी बेल्ट में सैकड़ों अवैध इमारतें, फार्म हाउस और स्थायी ढांचे खड़े कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत निर्माण
यह निर्माण सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पंजाब इको-टूरिज्म नीति 2018 के विपरीत बताए गए हैं। उक्त नीति में ऐसे क्षेत्रों में स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं है। मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने पांचों जिलों के डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई से पहले विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में संबंधित क्षेत्रों में बने निर्माणों का ब्यौरा, कथित उल्लंघनों की जानकारी, किसे अनुमति दी गई और अवैध निर्माण रोकने के लिए प्रशासन ने क्या कार्रवाई की, यह सब शामिल करना होगा। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी।

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि एलआईजीएच नीति जिन पांच जिलों में लागू की गई है, वे पंजाब के कुल वन क्षेत्र का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा समेटे हुए हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों को नियमित करने की नीति पर्यावरणीय संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। पंजाब में कुल वन क्षेत्र महज 3.67 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय मानक 33 प्रतिशत से काफी कम है।

जानें क्या है मामला
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वर्ष 2005 में इन इलाकों की कुछ जमीनों को पीएलपीए से बाहर किया गया था। इसके बाद 2006 और 2009 में केंद्र के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मंजूरी भी मिली थी। हालांकि यह छूट केवल वास्तविक कृषि और आजीविका संबंधी जरूरतों के लिए थी। व्यावसायिक गतिविधियों और स्थायी निर्माण पर स्पष्ट रोक लगाई गई थी। अब एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद राज्य सरकार की नई नीति, डिलिस्टेड जमीनों पर बने निर्माण और प्रशासन की भूमिका पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। माना जा रहा है कि डीसी की रिपोर्ट के बाद मामले में और सख्त निर्देश सामने आ सकते हैं, जिससे कई निर्माण परियोजनाओं और भूमि उपयोग के मामलों पर असर पड़ सकता है।

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