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कोयला गैसीकरण परियोजनाओं से बिहार में बड़े निवेश की संभावना, केंद्र ने जताया भरोसा

पटना
 कोयला गैसीकरण से संबंधित परियोजनाओं के माध्यम से बिहार में 8000 से 12000 करोड़ के निवेश की संभावना है। यह आकलन केंद्र सरकार का है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलकर केंद्रीय कोयला व खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे इस संदर्भ में विचार-विमर्श भी कर चुके हैं।

आकलन है कि इस परियोजना के क्रियान्वयन से बिहार में 2500 लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। देश में कोयले का प्रचुर भंडार है, लेकिन कच्चा तेल, एलपीजी, प्राकृतिक गैस, मेथनाल आदि के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता है। वित्त वर्ष 2025 में मेथनाल, अमोनिया, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य प्रतिस्थापन योग्य उत्पादों के लिए भारत का आयात बिल 2.77 लाख करोड़ रुपये रहा था।

कोयला गैसीकरण सीधे तौर पर इस बिल को प्रभावित करेगा। ऐसे में सरकार यह मानकर चल रही कि अगले दशक में कोयला गैसीकरण भारत के सबसे उभरते क्षेत्रों में से एक होगा।

कई प्रकार के उत्पाद देने वाली इस तकनीकी के जरिये तीन लाख करोड़ तक के आयात को प्रतिस्थापित करने की क्षमता है। इसीलिए सरकार ने भी खजाने का मुंह खोल दिया है। इस वर्ष 37500 करोड़ से पहले जनवरी, 2024 में 8500 करोड़ रुपये के पैकेज को स्वीकृति दी गई थी।

बिहार से विशेष अपेक्षा
दुबे ने बताया कि भारत में 2021 में राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू हुआ। 2030 तक प्रतिवर्ष 10 करोड़ टन कोयले के गैसीकरण का लक्ष्य निर्धारित है। बहरहाल परियोजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय ने आरएफपी को सार्वजनिक किया है और सभी हितधारकों से सुझाव मांगा है। इसी क्रम में बिहार से भी अपेक्षा है।

जोखिम भी अधिक
वर्ष 2024 में कोयला मंत्रालय ने झारखंड में भारत की पहली भूमिगत कोयला गैसीकरण पायलट परियोजना शुरू की थी। 2030 तक 25 परियोजनाओं की स्थापना का लक्ष्य है। इसका आशय यह नहीं कि सब कुछ सहजता से हो जाएगा। इसमें पूंजीगत लागत अधिक है, क्रियान्वयन का जोखिम वास्तविक है और नीतिगत समर्थन महत्वपूर्ण।

कोयला गैसीकरण संयंत्रों का निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है और बड़े पैमाने पर इन्हें स्थापित करने में 10 से 15 वर्ष लग सकते हैं। बहरहाल इस मिशन को गति देने और उद्योग जगत की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से 18 जून को मुंबई में तीसरा रोड-शो भी हो चुका है।

क्या है कोयला गैसीकरण
इसमें कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे सिंथेटिक गैस (मुख्य रूप से कार्बन मोनोआक्साइड और हाइड्रोजन) में बदला जाता है। उस गैस का उपयोग ईंधन, उर्वरक और रसायन बनाने में होता है। जैसे कि मेथनाल, अमोनिया, यूरिया, हाइड्रोजन, तरल ईंधन आदि।

संभावना
कभी बिहार का अंश रहे झारखंड में भी कोयला के बड़े खदान हैं। ओडिशा भी निकटवर्ती है। बिहार तक कोयला आपूर्ति में अपेक्षाकृत कम लागत आएगी, लिहाजा उत्पाद का मूल्य नियंत्रण में होगा। l कोयले के गैसीकरण में पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। बिहार जल संसाधन से समृद्ध है। कमी यहां पानी के संचयन की है। संरचना बनाकर बाढ़ का पानी संचय किया जा सकता है।

समस्या
20 लाख टन प्रतिवर्ष क्षमता वाले संयंत्र की स्थापना पर 600 करोड़ से 2000 करोड़ रुपये के बीच लागत आती है। इतनी बड़ी पूंजी लगाने से पहले निवेशक औद्योगिक परिवेश का आकलन करेंगे। बड़े व्यावसायिक संयंत्र के लिए लगभग 250 से 500 एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। बिहार की विपुल जनसंख्या और कृषि पर निर्भरता के कारण भूमि अधिग्रहण तनिक दुरुह है।

 

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