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ठगी का हाईटेक जाल: फगवाड़ा में फर्जी कॉल सेंटर से क्रिप्टो-हवाला के जरिए करोड़ों की धोखाधड़ी

फगवाड़ा.

देश और विदेश में साइबर ठगी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। विशेष रूप से “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर की जा रही ठगी ने आम लोगों की नींद उड़ा दी हैं। इसी कड़ी में पंजाब में औघोगिक नगरी और प्रदेश के दोआबा इलाके का गेटवे स्वीकारे जाते फगवाड़ा का नाम बीते कुछ समय से खासी सुर्खियों में हैं क्योंकि कुछ समय पहले जिला कपूरथला की साइबर क्राईम विभाग की पुलिस टीम और थाना सिटी फगवाड़ा की पुलिस द्वारा यहां के घनी आबादी वाले पलाही रोड इलाके में एक विला में चलाए जा रहे एक ऐसे फर्जी कॉल सैंटर का पर्दाफाश किया है।

जिसके तार क्रिपटो करंसी से लेकर हवाला कारोबार और अब डिजीटल अरेस्ट के मामलों से भी जोड़ा जा रहा है? सूत्रों के अनुसार पुलिस जांच में आए दिन चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। चर्चा यह भी है कि फगवाड़ा के इस फर्जी कॉल सैंटर से विदेशों में रह रहे मासूम लोगों को भांति प्रकार के तरीके अपना कथित तौर पर डिजीटल अरेस्ट का डरावा देकर मोटी रकमें वसूल की जाती रही हैं? अभी उक्त सारे मामले की पुलिस जांच का दौर जारी बताया जा रहा है।

कैसे कार्य करते हैं यह फर्जी कॉल सैंटर?
संगठित गिरोहों द्वारा संचालित फर्जी कॉल सेंटर्स से शातिर ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उनसे भारी रकम ऐंठ लेते हैं। यह ठगी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल चुकी है और करोड़ों रुपये की अवैध कमाई का जरिया बन चुकी है। साइबर अपराधियों का यह नेटवर्क बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करता है। ठग पहले सोशल मीडिया, डेटा लीक या अन्य माध्यमों से लोगों की निजी जानकारी जुटाते हैं। इसके बाद वे फोन कॉल या वीडियो कॉल के जरिए संपर्क करते हैं और पीड़ित को बताते हैं कि उनका आधार कार्ड, सिम कार्ड या बैंक खाता किसी गंभीर अपराध जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स तस्करी में इस्तेमाल हुआ है। इसके बाद वे “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर पीड़ित को मानसिक रूप से दबाव में ले आते हैं।

विशेषज्ञों और पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि “डिजिटल अरेस्ट” नाम की कोई भी कानूनी प्रक्रिया भारत में अस्तित्व में नहीं है। यह पूरी तरह से ठगों द्वारा गढ़ी गई एक काल्पनिक अवधारणा है, जिसका उद्देश्य लोगों को भयभीत कर उनसे तुरंत पैसे वसूलना है। असल में, भारत में किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत, पुलिस द्वारा भौतिक रूप से की जाती है ना कि फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से। ठगों का तरीका बेहद चालाकी भरा होता है।

वे पीड़ित को कहते हैं कि वह “जांच के दायरे में” हैं और उसे घर में ही रहकर किसी से संपर्क नहीं करना चाहिए। कई मामलों में वीडियो कॉल पर नकली पुलिस स्टेशन या वर्दीधारी व्यक्ति दिखाकर भरोसा पैदा किया जाता है। इसके बाद “वेरिफिकेशन फीस” या “केस सेटलमेंट” के नाम पर बैंक ट्रांसफर, यूपीआई या गिफ्ट कार्ड के जरिए पैसे मांगे जाते हैं। डर और शर्म के कारण कई लोग बिना किसी से सलाह लिए पैसे भेज देते हैं। हाल ही में सामने आए मामलों में बुजुर्गों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया है। रिटायर्ड कर्मचारियों, गृहिणियों और छात्रों तक को इस जाल में फंसाया जा रहा है। कई पीड़ितों ने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी गंवा दी, जबकि कुछ मामलों में लोग मानसिक तनाव का भी शिकार हुए हैं।

कैसे पहचानें और बचें इस ठगी से
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की ठगी से बचने के लिए सबसे पहले जागरूकता जरूरी हैं। यदि कोई व्यक्ति खुद को सरकारी अधिकारी बताकर फोन पर गिरफ्तारी की बात करता है, तो यह स्पष्ट रूप से धोखाधड़ी का संकेत हैं। कोई भी वैध एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं करती।

  1. अनजान नंबर से आने वाली संदिग्ध कॉल पर भरोसा न करें।
  2. “डिजिटल अरेस्ट” या “ऑनलाइन जांच” जैसे शब्दों से सावधान रहें।
  3. किसी भी स्थिति में ओटीपी, बैंक डिटेल, आधार नंबर या पासवर्ड साझा न करें।
  4. घबराहट में तुरंत पैसे ट्रांसफर करने से बचें।
  5. ऐसे मामलों में परिवार के सदस्यों या विश्वसनीय व्यक्ति से तुरंत सलाह लें।

यदि कोई ब्लैकमेल या धमकी दे तो क्या करें
अगर किसी व्यक्ति को इस प्रकार की धमकी मिलती है तो उसे घबराने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले कॉल काटें और संबंधित नंबर को ब्लॉक करें। इसके बाद तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराएं। भारत सरकार की राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कॉल कर तत्काल सहायता ली जा सकती है। इसके अलावा, आधिकारिक वेबसाइट https://cybercrime.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा भी उपलब्ध है।

पीड़ित को चाहिए कि वह सभी सबूत जैसे कॉल रिकॉर्डिंग, मैसेज, बैंक ट्रांजैक्शन डिटेल सुरक्षित रखें, ताकि जांच एजेंसियों को कार्रवाई करने में आसानी हो। सरकार और पुलिस द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक आम नागरिक सतर्क नहीं होंगे, तब तक इस तरह के अपराधों पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल है। अंततः, यह समझना बेहद आवश्यक है कि “डिजिटल अरेस्ट” केवल एक झूठा डर हैं। कानून की आड़ में ठगी करने वाले इन गिरोहों से बचने का एकमात्र उपाय है। सतर्कता, जागरूकता और सही समय पर सही कदम उठाना।

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