samacharsecretary.com

एकादशी पर करें ये राशि वाले उपाय, हर समस्या होगी दूर

हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है. सालभर में 24 एकादशी व्रत होते हैं. हर माह में 2 बार एकादशी व्रत होता है. मान्यता है कि एकादशी तिथि पर जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है. वहीं, भादो का यह माह बहुत ही पवित्र माना गया है. ऐसे में भादो मास की एकादशी का खास महत्व होता है. कुछ ही दिनों बाद 03 सितंबर को परिवर्तिनी एकादशी आने वाली है. इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायक होती है. उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार इस दिन किया गया राशि अनुसार उपाय से सालभर लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहेगी. राशि के अनुसार जरूर करें यह काम – मेष राशि के जातकों को परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग का फूल अर्पित करना चाहिए. – वृषभ राशि के जातकों को परिवर्तिनी एकादशी के दिन सफेद चीजों का दान करना चाहिए. मान्यता है कि इस दिन सफेद चीजों का दान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. – मिथुन राशि के जातक को इस दिन हरे रंग के वस्त्र भगवान विष्णु को अर्पित करने चाहिए. इससे भगवान प्रसन्न होते हैं. – कर्क राशि के जातकों को परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए खीर का भोग अर्पित करना चाहिए. मान्यता है कि खीर का भोग अर्पित करने से घर में खुशियां आती हैं. – सिंह राशि के जातक को परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले रंग का वस्त्र भगवान विष्णु को अर्पित करना चाहिए. इसके साथ ही पीले रंग का वस्त्र भी धारण करना चाहिए. इससे भगवान प्रसन्न होते हैं. – कन्या राशि के जातक जो कि आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. उन्हें परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए सफेद मिठाई के साथ केसर अर्पित करना चाहिए. ऐसा करने से घर में सालभर सुख-शांति बनी रहेगी. – तुला राशि वाले जातकों को इस दिन सफ़ेद चीजों का दान करना चाहिए. इससे वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ता है. साथ ही सौभाग्य की प्राप्ति भी होती है. – वृश्चिक राशि के जातक नौकरी-व्यापार में तरक्की पाने के लिए इस दिन गुड़ का दान अवश्य करें. इससे नारायण की कृपा हमेशा बनी रहेगी. – धनु राशि के जातक परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए पीले वस्त्र और पीले चंदन का दान करें. साथ ही पीले फल का भी दान करें. इससे नौकरी मिलने के चांस बढ़ते हैं. – मकर राशि के जातक परिवर्तिनी एकादशी के दिन दही और इलायची का भोग अर्पित करें. इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. शादी के योग खुलते हैं. – कुंभ राशि के जातक परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीपल के पेड़ के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं. इससे भगवान प्रसन्न होते हैं. – मीन राशि के जातकों को परिवर्तिनी एकादशी के दिन गरीबों की सेवा करना चाहिए. साथ ही गरीबों को दान करना चाहिए. और भगवान को मिश्री का भोग लगाना चाहिए.

क्या मुख्य द्वार के पास खिड़की बनवाना सही है? जानिए वास्तु का मत

घर के निर्माण से लेकर इसके अंदर की हर एक चीज जैसे दरवाजा, खिड़की, कमरे की दिशा या उनका स्थान का वास्तु में बहुत खास महत्व है। घर का निर्माण केवल ईंटों और दीवारों से नहीं होता, बल्कि उसमें बहने वाली ऊर्जा और सकारात्मकता भी अहम भूमिका निभाती है। अक्सर घर बनवाते समय हम दरवाजे और खिड़कियों की जगह सजावट या रोशनी के हिसाब से तय करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मुख्य दरवाजे के पास खिड़की रखना वास्तु के अनुसार शुभ होता है या अशुभ? तो आइए जानते हैं कि घर में दरवाजे के साथ खिड़किया बनानी चाहिए या नहीं। वास्तु के अनुसार दरवाजे के पास खिड़की सही या गलत? वास्तु शास्त्र के अनुसार, दरवाजे के पास खिड़की रखना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसकी दिशा और दूरी का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। अगर आप सही दिशा और जगह पर खिड़की बनाते हैं, तो यह घर में ताजगी, रोशनी और सकारात्मक ऊर्जा लाने में मदद करती है। सही दिशा क्या होनी चाहिए? पूर्व और उत्तर दिशा में दरवाजे के पास खिड़की बनाना शुभ माना जाता है। इससे सूरज की रोशनी आसानी से घर में आती है, जिससे ऊर्जा और स्वास्थ्य दोनों बेहतर रहते हैं। दक्षिण दिशा में खिड़की रखने से बचना चाहिए, खासकर अगर वह मुख्य दरवाजे के बहुत पास हो। इससे घर में गर्मी और नकारात्मक ऊर्जा का असर बढ़ सकता है। दक्षिण-पश्चिम में दरवाजे और खिड़कियों का निर्माण वास्तु दोष पैदा कर सकता है। इससे धन की हानि और मानसिक तनाव हो सकता है।

चंद्र ग्रहण 2025 : सूतक काल कब से कब तक, जानिए मान्यताएं और महत्व

7 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा की रात पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा। चंद्र ग्रहण का सूतक ग्रहण से 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है। ये ग्रहण भारत में दिखाई देगा। 2025 में भारत में दिखाई देने वाले ये एक मात्र ग्रहण है। इसके बाद 21 सितंबर को सूर्य ग्रहण होगा, जो कि भारत में नहीं दिखेगा। उज्जैन की जीवाजी वैधशाला के अधीक्षक राजेंद्र गुप्त के मुताबिक, चंद्र ग्रहण 7 और 8 सितंबर की दरमियानी रात होगा। इसकी शुरुआत 7 सितंबर की रात 9.56 बजे से होगी। ग्रहण का मध्य रात 11.41 बजे रहेगा। इस समय पूर्ण चंद्र ग्रहण दिखाई देगा। इसके बाद 8 सितंबर की रात 1.26 बजे ग्रहण खत्म हो जाएगा। ये पूर्ण चंद्र ग्रहण एशिया, हिन्द महासागर, अंटार्कटिका, पश्चिमी प्रशांत महासागर, आस्ट्रेलिया और यूरोप में भी दिखाई देगा। चंद्र ग्रहण कैसे होता है? चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है। चंद्र ग्रहण तब होता है, जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीधी लाइन में आ जाते हैं। इस स्थिति में पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है, तो ये चंद्रमा तक पहुंचने वाले सूर्य के प्रकाश को रोक देती है। इस स्थिति में, चंद्र पर पृथ्वी की छाया पड़ने लगती है। नतीजतन, हमें चंद्र या तो आंशिक रूप से या पूरी तरह से ढंका हुआ दिखाई देने लगता है। तीन प्रकार के होते हैं चंद्र ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण: चंद्रमा पूरी तरह पृथ्वी की गहरी छाया में आ जाता है और लालिमा लिए दिखता है, इसे ब्लड मून भी कहते हैं। आंशिक चंद्र ग्रहण: चंद्रमा का कुछ हिस्सा ही पृथ्वी की छाया में आता है। उपछाया चंद्र ग्रहण: चंद्रमा केवल पृथ्वी की हल्की छाया में आता है, जिससे ये थोड़ा-सा धुंधला दिखता है, यह परिवर्तन मुश्किल से नजर आता है। इस ग्रहण की धार्मिक मान्यता नहीं होती है। ग्रहण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, चंद्र ग्रहण का सूतक ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है। इस बार चंद्र ग्रहण का सूतक दोपहर 12.56 बजे से शुरू होगा और ग्रहण खत्म होने के साथ ही खत्म होगा। सूतक के समय में भगवान की पूजा नहीं की जाती है, इसलिए मंदिरों के पट बंद रहते हैं। ग्रहण के सूतक के समय में मंत्रों का मानसिक जप करना चाहिए। मानसिक जप यानी मन ही मन मंत्रों का जप करें। मंत्र बोलना नहीं है। इस समय में दान-पुण्य करना चाहिए। गायों को हरी घास खिलाएं। चंद्र ग्रहण के बाद मंदिरों में सफाई होती है और फिर मंदिर के पट भक्तों के लिए खोले जाते हैं।​​​​​​

जीवन के 5 कड़वे सच: जिन्हें अपनाकर रहेंगे हमेशा खुश और बेफ़िक्र

हर इंसान अपनी लाइफ में खुश रहना चाहता है, लेकिन फिर भी कई बार दुख, परेशानी और तनाव हमें घेर ही लेते हैं। दरअसल, ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि हम जीवन के कुछ बेहद सरल लेकिन गहरे सच को नजरअंदाज कर देते हैं। जो व्यक्ति इन बातों को समझ लेता है, वो छोटी-छोटी बातों में उलझता नहीं और हर हाल में खुश रहना सीख जाता है। जबकि जो इंसान इन सच्चाइयों को नजरअंदाज करके बेवजह की उम्मीद लगाए बैठा रहता है, उसे दुख और परेशानी के सिवा कुछ नहीं मिलता है। यकीन मानिए खुश रहना इतना भी मुश्किल नहीं है। बस जरूरत है तो कुछ चीजों को जानने की और उन्हें एक्सेप्ट करने की। आइए जानते हैं जीवन से जुड़े इसी सच को। हर चीज पर हमारा कंट्रोल नहीं हो सकता हम अक्सर सोचते हैं कि सब कुछ हमारे हिसाब से हो, हर परिस्थिति वैसी बने जैसी हम चाहें। लेकिन सच्चाई तो यही है कि जीवन में बहुत सी चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं, जैसे-पूरी मेहनत के बाद भी फल ना मिलना, किसी दूसरे का आपके साथ बुरा व्यवहार करना या अचानक कोई मुश्किल खड़ी हो जाना। जब हम ये मान लेते हैं कि हर चीज को नियंत्रित करना नामुमकिन है, तो मन को शांति मिलने लगती है। नियंत्रण की जरूरत कम हो जाती है और हम चीजों को स्वीकार करना सीख जाते हैं। यही बात हमारी चिंता को घटाकर खुश रहने की राह खोलती है। परिवर्तन संसार का नियम है कहने को तो ये बात बेहद छोटी है, लेकिन इसमें एक गहरी सच्चाई छुपी हुई है। लोग ये बात सुन तो लेते हैं लेकिन मानने को तैयार नहीं होते कि समय के साथ चीजें बदल जाती हैं। अच्छे दिन आते हैं और चले भी जाते हैं, वैसे ही बुरे वक्त भी हमेशा के लिए नहीं होते। अगर हम इन बातों को समझ लें कि हर चीज बदलने वाली है, तो हम दुख के समय टूटते नहीं और सुख के समय घमंड नहीं करते। परिवर्तन को जीवन का हिस्सा मानना हमें संतुलित बनाए रखता है और लाइफ के इस बैलेंस में ही सच्चा सुख छिपा हुआ है। तुलना करना दुख की सबसे बड़ी जड़ है इंसान के दुख की सबसे बड़ी वजह है कि वह दूसरों से अपनी तुलना करता है। किसी और की जिंदगी को देखकर, खुद को कम आंकने लगता है। आजकल सोशल मीडिया के दौर में तो ये चीजें और भी बढ़ गई हैं। अगर सुखी जीवन जीना है तो दूसरों से तुलना करना बंद करना होगा। हर इंसान को यह समझना चाहिए कि हर इंसान की जिंदगी का सफर अलग-अलग होता है। जब दो लोगों के चेहरे एक से नहीं होते तो भला दो इंसानों की जिंदगी एक जैसी कैसे हो सकती है। बस ये छोटी सी बात जो समझ जाता है, उसका जीवन बहुत आसान और सुलझा हुआ हो जाता है। सब कुछ हमेशा परफेक्ट नहीं होता जीवन में सब कुछ ठीक हो, हर काम बिना रुकावट के पूरा हो, ऐसी उम्मीद करना भी दुख का एक कारण है। असल जिंदगी में अधूरे काम, अधूरे सपने और उलझने हमेशा रहेंगी। कई बार परफेक्शन का पीछा करना ही दुख का कारण बन जाता है। जब हम लाइफ की इसी अनसर्टेनिटी को अपनाते हैं, तो हम प्रेजेंट में जीना सीखते हैं और यही प्रेजेंट हमें खुश रहने का रास्ता दिखाता है। हर नया दिन ईश्वर का दिया हुआ एक तोहफा है हम अक्सर भविष्य की चिंता में या बीते कल के पछतावे में खो जाते हैं, जो हमारे दुख का एक बड़ा कारण बन जाता है। लेकिन हर किसी को समझना चाहिए कि हर नया दिन, जीवन की नई शुरुआत है। ईश्वर हमें एक नया दिन जीने का मौका दे रहे हैं, इसके लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए और उसे भगवान का एक खूबसूरत तोहफा समझकर नई एनर्जी के साथ जीना चाहिए। जो इंसान हर नए दिन को नई शुरुआत मानकर जीना शुरु कर देता है, उसके जीवन के दुख खुद ब खुद कम हो जाते हैं।  

रसोई में मां अन्नपूर्णा की कृपा पाने का आसान उपाय: इन रंगों की तस्वीरें करें स्थापित

किचन यानी रसोई घर वह जगह है जहां परिवार के लिए भोजन बनाया जाता है और घर की खुशहाली बनी रहती है। हमारे भारतीय धर्म और परंपरा में मां अन्नपूर्णा को भोजन और अन्न की देवी माना जाता है। उनकी पूजा से घर में अन्न का भंडार कभी खाली नहीं होता और सदैव परिवार में समृद्धि बनी रहती है। वास्तु के अनुसार, कुछ खास रंगों की तस्वीरें किचन की ऊर्जा को सकारात्मक बनाती हैं और मां अन्नपूर्णा की कृपा को बढ़ावा देती हैं। तो आइए जानते हैं कि मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किचन में कौन से रंग की तस्वीरें लगानी चाहिए। लाल रंग की तस्वीर लाल रंग शक्ति, उत्साह और समृद्धि का प्रतीक है। किचन में लाल रंग की मां अन्नपूर्णा की तस्वीर लगाना शुभ होता है क्योंकि यह परिवार में ऊर्जा और खुशहाली लाता है। पीला रंग की तस्वीर पीला रंग ज्ञान, स्पष्टता और सकारात्मकता से जुड़ा होता है। मां अन्नपूर्णा की पीली तस्वीर से किचन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और भोजन में स्वाद भी बढ़ता है। सफेद रंग की तस्वीर सफेद रंग शांति और पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। सफेद रंग की मां अन्नपूर्णा की तस्वीर से घर में शांति और संतुलन बना रहता है।

कब है वामन जयंती? जानें पूजा का समय और विधि

वामन जयंती का पर्व भगवान विष्णु के पांचवें स्वरूप के लिए मनाया जाता है. हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन द्वादशी या वामन जयंती के रूप में मनाया जाता है. कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप के अवतार का जन्म हुआ था और यह शुभ दिन श्रवण नक्षत्र और अभिजीत मुहूर्त में मनाया जाता है. इस बार वामन जयंती 4 सितंबर को मनाई जाएगी.  वामन जयंती 2025 शुभ मुहूर्त  वामन जयंती की द्वादशी तिथि 4 सितंबर को सुबह 4 बजकर 21 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 5 सितंबर को सुबह 4 बजकर 8 मिनट पर होगा. क्योंकि यह त्योहार श्रवण नक्षत्र में तो इस दिन यह नक्षत्र 4 सितंबर, रात 11 बजकर 44 मिनट से लेकर 5 सितंबर रात 11 बजकर 38 मिनट पर समापन होगा.  वामन जयंती 2025 पूजन विधि  इस दिन सुबह जल्दी उठकर भगवान वामन की पूजा-आराधना करना शुभ माना जाता है. पूजा के बाद चावल, दही जैसे फल और वस्तुओं का दान करना भी बहुत लाभकारी होता है. शाम को व्रती लोग भगवान की पूजा करते हैं, व्रत कथा सुनते हैं और पूरे परिवार में प्रसाद बांटते हैं. इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मुरादें पूरी होती हैं. जो लोग व्रत रखते हैं उन्हें वामन भगवान की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर पंचोपचार पूजा करनी चाहिए. पूजा की शुरुआत पूर्व दिशा की ओर हरे कपड़े पर वामन देव की मूर्ति या तस्वीर लगाकर की जाती है. वामन जयंती 2025 राशिनुसार करें ये उपाय  मेष– मेष राशि के लोग इस दिन 'तप रूपाय विद्महे..' मंत्र का जाप करें. वृषभ- वृष राशि के लोग मिश्री का भोग लगाएं.  मिथुन– मिथुन राशि के लिए घी का दीप जलाएं. कर्क– कर्क राशि वाले चावल-दही और चांदी का दान करें.  सिंह- सिंह राशि वाले चंदन से पूजा करें.  कन्या– कन्या राशि के लिए तुलसी पत्र और रक्त चंदन जरूरी है.  तुला- तुला राशि के लोग खीर चढ़ाएं.  वृश्चिक– वृश्चिक राशि वाले  'तप रूपाय विद्महे..' मंत्र का जाप करें.  धनु– धनु राशि वाले फलाहार खाएं. मकर– मकर राशि वालों को कांसे के दीपक से पूजा करनी चाहिए.  कुंभ– कुंभ राशि वालों को भी घी का दीपक जलाना उचित है. मीन- मीन राशि वाले दान-धर्म का कार्य करें.

2 सितम्बर 2025 का राशिफल: बदल जाएगी इन राशियों की तकदीर, मिलेगा शुभ समाचार

मेष राशि- मेष राशि वालों के लिए दिन सामान्य रहेगा। आत्मविश्वास में कमी रहेगी। मन परेशान हो सकता है। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहेगी। इस समय धन का खर्च सोच-समझकर ही करें। व्यापार में किसी पर भी आंख मूंदकर विश्वास न करें। लवर के साथ समय व्यतीत करेंगे। वृषभ राशि- वृषभ राशि वालों के लिए आज का दिन अच्छा कहा जा सकता है।वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। धार्मिक कार्यों में मन लगेगा। स्वास्थ्य में सुधार होगा। पिता का साथ मिलेगा। परिवार के साथ यात्रा पर जा सकते हैं। आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। विभिन्न स्तोत्रों से धन लाभ होगा। मिथुन राशि- मिथुन राशि वालों का दिन सामान्य रहेगा। मानसिक तनाव हो सकता है। कार्यक्षेत्र में काम की अधिकता रहेगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। परिवार का साथ मिलेगा। कारोबार की स्थिति में सुधार होगा। आर्थिक पक्ष मजबूत रहेगा। निवेश करने से पहले किसी मित्र या सलाहकार से सलाह अवश्य लें। कर्क राशि- कर्क राशि वालों के लिए आज का दिन शुभ नहीं कहा जा सकता है। मानसिक स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती है। जीवन में भागदौड़ अधिक रहेगी। वाद-विवाद से दूर रहें। नौकरी में किसी दूसरे स्थान पर जाना पड़ सकता है। प्रेमी के साथ भी मनमुटाव संभव है। आर्थिक स्थिति ठीक रहेगी, लेकिन धन खर्च सोच-समझकर ही करें। सिंह राशि– सिंह राशि वालों के जीवन में आज बड़े बदलाव हो सकते हैं। नौकरी और व्यापार में लाभ होगा। परिवार के साथ घूमने का प्लान बना सकते हैं। आज के दिन खर्चे भी बढ़ेंगे लेकिन विभिन्न स्तोत्रों से धन का आगमन हो जाएगा। लव लाइफ अच्छी रहेगी। करियर में तरक्की के अवसर मिलेंगे। कन्या राशि- कन्या राशि वाले आज अपने मन को शांत रखें। धैर्यशीलता बनाए रखने का प्रयास करें। जल्दबाजी में कोई भी काम न करें। वाहन धीरे चलाएं। अति उत्साही होने से बचें। नौकरी और व्यापार में समझदारी से काम लें। आर्थिक पक्ष आज ठीक रहेगा। प्रेम जीवन भी में सुख का अनुभव करेंगे। तुला राशि- तुला राशि वालों के लिए आज का दिन अच्छा रहेगा। मानसिक तनाव दूर होगा। धैर्य से काम करेंगे। नौकरी और व्यापार में लाभ होगा। तरक्की के अवसर मिल सकते हैं। आत्मविश्वास भरपूर रहेगा। परिवार का साथ मिलेगा। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। वृश्चिक राशि- वृश्चिक राशि वालों के लिए अच्छा दिन। नौकरी और व्यापार में लाभ होगा। किसी मित्र के सहयोग से आय के स्तोत्रों में भी वृद्धि होगी। परिवार के सहयोग से रुके हुए कार्य भी चल पड़ेंगे। मान-सम्मान की में वृद्धि होगी। प्रेमी का भरपूर साथ मिलेगा। धनु राशि- धनु राशि वालों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएंगे। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। मन शांत रहेगा। जीवनसाथी के साथ समय व्यतीत करेंगे। नौकरी और व्यापार में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। निवेश करने के लिए आज का दिन शुभ रहेगा। मकर राशि- आज का दिन मकर राशि वालों के लिए अच्छा रहने वाला है। नौकरी, व्यापार, प्रेम सबकुथ बढ़िया रहेगा। आप आज जो भी कार्य करेंगे उसमें आपको सफलता मिलेगी। परिवार के साथ समय व्यतीत करेंगे। शादी की बात भी आज पक्की हो सकती है। धर्म-कर्म में भी रुचि बढ़ेगी। कुंभ राशि- कुंभ राशि वालों को आज मिलेजुले फल मिलेंगे। आत्मविश्वास काफी रहेगा। नौकरी और व्यापार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। आय में वृद्धि हो सकती है। आज क्रोध से बचें। वाद-विवाद की स्थिति से बिल्कुल दूर रहें। मानसिक तनाव संभव है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। मीन राशि- मीन राशि वाले आज थोड़ा सावधान रहें। धन खर्च सोच-समझकर ही करें नहीं तो कर्ज की स्थिति आ सकती है।नौकरी और व्यापार में अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें और प्रेमी के साथ अधिक समय व्यतीत करें।

नवरात्रि में मां का भवन सजाने के वास्तु नियम, घर में आएगी सुख-समृद्धि

आप नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के मंदिर को न केवल सुंदरता से सजा सकते हैं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति का भी संचार कर सकते हैं। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के मंदिर की सजावट करने के लिए वास्तु शास्त्र के अनुसार कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए जा रहे हैं। इन उपायों से आप नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के मंदिर को सुंदरता और भक्ति के साथ सजा सकते हैं, जिससे वातावरण में विशेष ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होगा: स्थान का चयन: मंदिर को घर के उत्तर-पूर्व दिशा में सजाना शुभ माना जाता है। यह दिशा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। साफ-सफाई: सबसे पहले मंदिर को अच्छे से साफ करें। धूल और गंदगी को हटाएं ताकि वातावरण पवित्र और सुगंधित हो। पवित्रता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से सफाई करें। फूलों की सजावट: मां दुर्गा की प्रतिमा को ताजे फूलों से सजाएं। लाल, पीला और सफेद फूल शुभ माने जाते हैं। आप फूलों की माला भी बना सकते हैं। दीप जलाना: तेल अथवा गाय के शुद्ध देसी घी के दीये जलाएं। यह रोशनी और ऊर्जा का प्रतीक हैं। सुबह और शाम दीयों को जलाने का विशेष महत्व है। रंगोली: मंदिर के सामने रंगोली बनाएं। यह स्वागत का प्रतीक है और वातावरण को खुशनुमा बनाता है। भोग और प्रसाद: मां को भोग के लिए फल, मिठाइयां और अन्य खाद्य पदार्थ रखें। इसे सुंदर तरीके से सजाकर अर्पित करें। ताम्बूल और वस्त्र: देवी को ताम्बूल (पान, सुपारी) अर्पित करें। नए वस्त्र और आभूषण भी अर्पित करना शुभ होता है। लाइटिंग: मंदिर में रंग-बिरंगी लाइट्स लगाएं। इससे वातावरण में उत्सव का रंग छा जाएगा। संगीत और मंत्र: देवी के भजन या मंत्र का जाप करें। इससे सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

भगवान विष्णु के दशावतारों का संयुक्त पूजन दशावतार व्रत

भारतीय परंपरा व सनातन धर्म में विभिन्न देवताओं के अवतार की मान्यता है। विष्णु, शिव और अन्य देवी-देवताओं के कई अवतार माने गये हैं। मान्यतानुसार धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होने पर सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए इनका अवतरण होता है। त्रिदेवों में से एक भगवान विष्णु ब्रह्मांड के निर्माण के बाद उसके विघटन तक उसका संरक्षण, पालन- पोषण करते हैं। मानवता को अन्याय व अधर्म के गर्त से निकालकर उसे सत्य मार्ग प्रदर्शन हेतु अवतरित होने वाले भगवान विष्णु के आमतौर पर दस अवतार माने गये हैं। भगवान विष्णु के इन दस अवतारों को संयुक्त रूप से दशावतार कहा जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार भगवान विष्णु के अब तक सतयुग में मत्स्य, कूर्म, वराह, त्रेतायुग में नरसिंह, वामन, परशुराम, राम और द्वापर युग में बलराम, श्रीकृष्ण अवतार हो चुके हैं, और दुष्टों को दंडित, भलों को पुरस्कृत, धर्म व सत्य के प्रतिस्थापन और सतयुग का उद्घाटन करने के लिए वर्तमान कलियुग के अन्त में श्रीविष्णु के दशम अवतार कल्कि का प्रकटन होगा। और उनके द्वारा आततायी राक्षस कलि का वध होगा। कलि का वध करने के कारण ही इन्हें कल्कि (कल्किं/ कल्की) संज्ञा अभी से ही प्राप्त है। कतिपय पौराणिक ग्रन्थों में विष्णु के दस अवतारों में बलराम को नहीं शामिल कर उनके स्थान पर वेंकटेश्वर अथवा बुद्ध को शामिल किया गया है। और बलराम को श्रीकृष्ण के पूर्व तथा वेंकटेश्वर को श्रीकृष्ण के पश्चात अवतरित होना बताया गया है। दशावतार के संबंध में विभिन ग्रन्थों में अंकित सूचियों में अंतर अथवा भिन्नता भी है। एक मान्यतानुसार श्रीकृष्ण ही परमात्मा हैं और दशावतार श्रीकृष्ण के ही दस अवतार हैं। इसलिए उनकी सूची में श्रीकृष्ण नहीं, बल्कि उनके स्थान पर बलराम होते हैं। कुछ लोग बलराम को एक अवतार मानते हैं, बुद्ध को नहीं। सामान्यतः बलराम को आदिशेष अर्थात विष्णु के विश्राम के आधार का अवतार माना जाता है। वैदिक मतानुसार सर्वत्र व्यापक, सर्वशक्तिमान, निराकार परमात्मा का अवतरण संभव नहीं, लेकिन पौराणिक मान्यताओं में अवतार का अर्थ प्रायः उतरना माना जाता है। पौराणिक  मान्यतानुसार पंचम भूमि असंसक्ति अवस्था है। इस अवस्था में योगी समाधिस्थ हों अथवा उससे उठे हों, वह ब्रह्मभाव से कभी विचलित नहीं होते अथवा संसार के दृश्यों को देखकर विमुग्ध नहीं होते। यही शुद्ध, पक्की योगारूढ़ावस्था है। इस अवस्था में रहकर सब काम किया भी जा सकता है और नहीं भी किया जा सकता है। साधारणतः महायोगीश्वर पुरूष तथा अवतारी पुरुष इसी अवस्था में रहते हैं और इसी अवस्था में रहकर समस्त जगत लीला का संपादन करते हैं। भागवत पुराण के अनुसार समस्त जगत लीला का संपादन करने के लिए विष्णु के असंख्य अवतार हुए हैं, किन्तु उनके दस अवतारों अर्थात दशावतार को प्रमुख अवतार माना जाता है। भागवत पुराण, अग्निपुराण और गरुड़पुराण में उल्लिखित विष्णु के दस अवतार से संबंधित सूची में मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, वेंकटेश्वर, कल्कि नाम शामिल हैं। भागवत पुराण की भविष्यवाणी के अनुसार इस युग के अंत में कल्कि अवतार होगा। इससे अन्याय और अनाचार का अंत होगा तथा न्याय का शासन होगा जिससे सत्य युग की फिर से स्थापना होगी। पुराणों के अतिरिक्त आम भारतीयों में सर्वप्रचलित ग्रंथ सुखसागर के अनुसार भगवान विष्णु के चौबीस अवतार हैं- सनकादि ऋषि, वराहावतार, नारद मुनि, हंसावतार, नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभदेव, पृथु, मत्स्यावतार, कूर्म अवतार, धन्वन्तरि, मोहिनी, हयग्रीव, नृसिंह, वामन, श्रीहरि गजेंद्रमोक्ष दाता, परशुराम, वेदव्यास, राम, कृष्ण, वेंकटेश्वर, कल्कि। सिखों के दशम गुरु गुरु गोविन्द सिंह द्वारा रचित दशम ग्रंथ में विष्णु के चौबीस अवतारों में मछ (मत्स्य), कच्छ (कच्छप या कूर्म), नारायण, महा मोहिनी (मोहिनी), बैरह (वाराह), नर सिंह (नृसिंह), बावन (वामन), परशुराम, ब्रह्म, जलन्धर, बिशन (विष्णु), शेशायी (शेष), अरिहन्त देव, मनु राजा, धन्वन्तरि, सूरज, चन्दर, राम, बलराम, कृष्ण, नर (अर्जुन), बुद्ध. कल्कि शामिल हैं। भारतीय संस्कृति व परंपरा में अवतारवाद की व्याख्या कई प्रकार से की गई हैं। आध्यात्मिक, पौराणिक ढंग से तो इनकी व्याख्या पौराणिक ग्रंथों व रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों में की ही गई है, अन्य ढंग से इनकी व्याख्या समय-समय पर की जाती रही है, उनमें पस्पर असमानताएं, विषमताएं व विरोधाभास भी है। एक मत के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतार की कथाएं सृष्टि की जन्म प्रक्रिया को दर्शाते हैं। इस मतानुसार जल से ही सभी जीवों की उत्पति हुई। इसलिए भगवान विष्णु सर्वप्रथम जल के अन्दर मत्स्य रूप में प्रगट हुए। फिर कूर्म बने। तत्पश्चात वराह रूप में जल तथा पृथ्वी दोनों का जीव बने। नरसिंह, आधा पशु- आधा मानव, पशु योनि से मानव योनि में परिवर्तन का जीव है। वामन अवतार बौना शरीर है, तो परशुराम एक बलिष्ठ ब्रह्मचारी का स्वरूप है, जो राम अवतार से गृहस्थ जीवन में स्थानांतरित हो जाता है। कृष्ण अवतार एक वानप्रस्थ योगी, और बुद्ध पर्यावरण के रक्षक हैं। पर्यावरण के मानवी हनन की दशा सृष्टि को विनाश की ओर धकेल देगी। अतः विनाश निवारण के लिए कलंकि अवतार की भविष्यवाणी पौराणिक ग्रन्थों में पूर्व से की गई है। एक अन्य मतानुसार दस अवतार मानव जीवन के विभिन्न पड़ावों को दर्शाते हैं। मत्स्य अवतार शुक्राणु है, कूर्म भ्रूण, वराह गर्भ स्थति में बच्चे का वातावरण, तथा नर-सिंह नवजात शिशु है। आरम्भ में मानव भी पशु जैसा ही होता है। वामन बचपन की अवस्था है, परशुराम ब्रह्मचारी, राम युवा गृहस्थी, कृष्ण वानप्रस्थ योगी तथा बुद्ध वृद्धावस्था का प्रतीक है। कलंकि मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म की अवस्था है। दशावतार को विकासवादी डार्विन के सिद्धान्त से जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। इस विचार के अनुसार अवतार जलचर से भूमिवास की ओर बढ़ते क्रम में हैं, फिर आधे जानवर से विकसित मानव तक विकास का क्रम चलते गया है। इस प्रकार दशावतार क्रमिक विकास का प्रतीक अथवा रूपक की तरह है। भारतीय संस्कृति में भगवान विष्णु के इन दशावतारों के स्वतंत्र व संयुक्त रूप से पूजन- अर्चन की भी परंपरा है। स्वतंत्र रूप से पृथक-पृथक अवतरण दिवस तथा संयुक्त रूप से दशावतार व्रत विधि- विधान से मनाए जाने का वृहत उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में हुआ है। भगवान विष्णु के दस अवतारों को समर्पित दशावतार व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को किए जाने की पौराणिक परिपाटी है। यह व्रत समस्त पाप नाश, सम्पूर्ण कष्ट निवारण और मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है। मान्यता है कि इस तिथि को भगवान विष्णु … Read more

कब है अनंत चतुर्दशी? जानें दिन और गणेश विसर्जन का सही समय

अनंत चतुर्दशी हिंदू धर्म का एक बड़ा खास त्योहार है, जो भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की खास पूजा होती है और गणेश उत्सव का भी समापन होता है. यानी इस दिन गणेश जी का विसर्जन किया जाता है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और अनंत भगवान की पूजा करने से सारे दुख-दर्द खत्म हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. इस बार अनंत चतुर्दशी का पर्व 6 सितंबर, शनिवार को मनाया जाएगा.  अनंत चतुर्दशी 2025 महत्व  अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के लिए एक खास धागा होता है जिसे अनंत सूत्र कहते हैं. ये धागा चौदह गांठों वाला होता है, जो भगवान विष्णु के चौदह लोकों का प्रतीक है. जो कोई भी इस व्रत को विधि-पूर्वक रखता है और अनंत सूत्र को पहनता है, उसे जीवन में सब कामयाबी और खुशहाली मिलती है. साथ ही, गणेश उत्सव का समापन भी अनंत चतुर्दशी को ही होता है. इस दिन सारे भक्त बड़े शौर्य के साथ 'गणपति बप्पा मोरया' कहते हुए गणेश जी को विदा करते हैं. अनंत चतुर्दशी 2025 शुभ मुहूर्त  अनंत चतुर्दशी की तिथि 6 सितंबर को सुबह 3 बजकर 12 मिनट से शुरू होगी और तिथि का समापन 7 सितंबर को अर्धरात्रि 1 बजकर 41 मिनट पर होगा.  अनंत चतुर्दशी का पूजन मुहूर्त 6 सितंबर को शाम 6 बजकर 02 मिनट से लेकर 7 सितंबर की अर्धरात्रि 1 बजकर 41 मिनट तक रहेगा.  गणेश विसर्जन का मुहूर्त  अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के 5 पांच मुहूर्त हैं, जो कि चौघड़िया मुहूर्त में बन रहे हैं- प्रातः मुहूर्त (शुभ) – सुबह 7 बजकर 36 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 10 मिनट तक अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत) – दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से लेकर शाम 05 बजकर 02 मिनट तक सायाह्न मुहूर्त (लाभ) – शाम 06 बजकर 37 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 02 मिनट तक रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर) – रात 09 बजकर 28 मिनट से लेकर अर्धरात्रि 1 बजकर 45 मिनट तक 7 सितंबर को उषाकाल मुहूर्त (लाभ) – सुबह 4 बजकर 36 मिनट से लेकर सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक 7 सितंबर को अनंत चतुर्दशी 2025 पूजन विधि  पूजा की शुरुआत सुबह स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनकर होती है. फिर घर के साफ जगह पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर रखकर पूजा की जाती है. पूजा में रोली, चावल, फूल, फल, मिठाई और तांबे के पात्र का इस्तेमाल होता है. अनंत सूत्र को पूजा के बाद हाथ में बांधा जाता है, महिलाएं इसे बाएं हाथ में पहनती हैं. पूजा के बाद अनंत चतुर्दशी की कथा सुनी जाती है और अंत में आरती करके प्रसाद बांटा जाता है.