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पीएमईजीपी से शुरू किया बेकरी उद्योग, खुद बने आत्मनिर्भर और 10 लोगों को दिया रोजगार

रायपुर कोरिया में अब कई परिवारों की सुबह सिर्फ ‘गुड मॉर्निंग’ संदेश से नहीं, बल्कि ‘गुड मॉर्निंग बेकरी’ के ताजा ब्रेड, टोस्ट, बिस्किट और केक से भी होती है। ग्राम ओड़गी के दिलीप और सावित्री गुप्ता की जोड़ी ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संचालित प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) का लाभ उठाकर अपने सपने को कारोबार में बदला है।कभी आर्थिक कठिनाइयों से जूझने वाला यह परिवार आज आत्मनिर्भर है और अपने साथ करीब 10 लोगों को रोजगार दे रहा है। मोदी की योजना ने दिखाई राह, सपने को मिला आकार           स्नातक तक पढ़ी सावित्री गुप्ता और दसवीं तक पढ़े उनके पति दिलीप के लिए अपना व्यवसाय शुरू करना आसान नहीं था। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाले दिलीप करीब पांच वर्षों तक दूसरी बेकरी में काम करते रहे। इस दौरान उन्होंने बेकरी उत्पादन, गुणवत्ता, बाजार और ग्राहकों की जरूरतों को करीब से समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनके अपने कारोबार की ताकत बना।           वर्ष 2023-24 में बैकुंठपुर विधायक श्री भैयालाल राजवाड़े के माध्यम से दिलीप को पीएमईजीपी योजना की जानकारी मिली। योजना को समझने के बाद दिलीप और सावित्री ने तय किया कि अब दूसरों के लिए काम करने के बजाय अपना रोजगार खड़ा किया जाए। पीएमईजीपी ने दिया पूंजी का संबल            सावित्री ने पीएमईजीपी के माध्यम से करीब 10 लाख रुपये का ऋण लेकर अपनी जमीन पर बेकरी उद्योग स्थापित किया। परिवार ने भी करीब 2 से 3 लाख रुपये की राशि लगाई। करीब 10 से 12 हजार वर्गफीट क्षेत्र में ‘गुड मॉर्निंग बेकरी’ की शुरुआत हुई। यहां केक, बिस्किट, मीठा गोला, ब्रेड, टोस्ट सहित विभिन्न बेकरी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। कच्चा माल अनूपपुर, मनेंद्रगढ़ और बैकुण्ठपुर सहित आसपास के क्षेत्रों से मंगाया जाता है। दिलीप का अनुभव, सावित्री का संकल्प बना सफलता की ताकत          इस कारोबार की खासियत सिर्फ सरकारी ऋण से शुरू होना नहीं, बल्कि दिलीप के वर्षों के अनुभव और सावित्री के आत्मविश्वास की साझेदारी भी है। दिलीप ने जहां बेकरी के काम का व्यावहारिक अनुभव कारोबार में लगाया, वहीं सावित्री ने परिवार और व्यवसाय की जिम्मेदारियों को संभालते हुए उद्यम को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों की मेहनत का परिणाम है कि गांव में शुरू हुआ कारोबार अब बैकुण्ठपुर के साथ कुदरगढ़, खर्रा और सूरजपुर तक अपने उत्पाद पहुंचा रहा है। एक परिवार की आत्मनिर्भरता से 10 परिवारों की आजीविका तक            पीएमईजीपी से शुरू हुआ यह उद्योग अब केवल दिलीप और सावित्री के परिवार की आय का साधन नहीं है। बेकरी में करीब 10 लोगों को रोजगार मिल रहा है। यानी सरकारी योजना से मिले एक अवसर ने एक परिवार को आत्मनिर्भर बनाने के साथ दूसरे जरूरतमंद परिवारों के लिए भी रोजगार का रास्ता खोला है।   सावित्री कहती हैं कि पीएमईजीपी ने उनकी तकदीर और तस्वीर दोनों बदल दी। कभी अपने व्यवसाय की कल्पना करना कठिन था, लेकिन योजना से मिले आर्थिक सहयोग ने उस सपने को हकीकत में बदल दिया। आज वे स्वयं आत्मनिर्भर होने के साथ दूसरों को रोजगार देने की स्थिति में हैं। मोदी जी की योजना ने हमें अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दिया              प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सावित्री कहती हैं कि पीएमईजीपी जैसी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए आगे बढ़ने का अवसर देती हैं। सही मार्गदर्शन, सरकारी सहयोग और मेहनत से स्वरोजगार को सफल व्यवसाय में बदला जा सकता है।             दिलीप कहते हैं कि योजना का लाभ मिलने के साथ समय का सही उपयोग, अपने काम का अनुभव और निरंतर मेहनत उनकी सफलता के प्रमुख आधार रहे हैं। दूसरे की बेकरी में काम करते हुए जो सीखा, उसे अपने व्यवसाय में लगाया और आज उसी अनुभव ने उन्हें अपनी पहचान बनाने में मदद की है। जोड़ी ने मेहनत की कई परिवारों की सुबह ‘गुड मॉर्निंग’ से            दिलीप और सावित्री की यह जोड़ी सेवा संकल्प की उस भावना को भी मजबूत करती है, जिसमें सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर व्यक्ति स्वयं आत्मनिर्भर बने और आगे बढ़कर दूसरों के लिए भी रोजगार व आजीविका का माध्यम तैयार करे। एक योजना ने अवसर दिया, एक जोड़ी ने मेहनत की और आज उस मेहनत से कई परिवारों की सुबह ‘गुड मॉर्निंग’ हो रही है।

‘नागरिक विज्ञान’ से जैव विविधता संरक्षण में भागीदारी करेंगे युवा

रायपुर  सेवा संकल्प अभियान के तहत जशपुर वनमंडल में युवाओं, स्थानीय समुदायों और वन अमले को जलवायु परिवर्तन एवं जैव विविधता संरक्षण से जोड़ने के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री  केदार कश्यप के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में युवाओं को ‘नागरिक विज्ञान’ से जोड़ते हुए स्थानीय जैव विविधता के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।  कार्यक्रम में वन मुख्यालय रायपुर के विषय विशेषज्ञ डॉ. अनिल वास्तव और कृषि महाविद्यालय, अम्बिकापुर के रिसर्च एसोसिएट  यमलेश निषाद ने जलवायु परिवर्तन के कारणों और पर्यावरण एवं जैव विविधता पर उसके प्रभावों की जानकारी दी। उन्होंने बदलती जलवायु परिस्थितियों में वन पारिस्थितिकी तंत्र के प्रभावी प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के विभिन्न पहलुओं से प्रतिभागियों को अवगत कराया। ‘युवान’ पहल से जैव विविधता के दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण       फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी, रायपुर की ‘युवान’ पहल के माध्यम से युवाओं को स्थानीय जैव विविधता के वैज्ञानिक अवलोकन और दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया समझाई गई। ‘मेरा युवा भारत’, जशपुर के स्वयंसेवकों ने भी इसमें भागीदारी की। प्रशिक्षण के दौरान पक्षियों, तितलियों और सरीसृपों के पारिस्थितिक महत्व तथा उनके संरक्षण के संबंध में जानकारी दी गई। प्रकृति भ्रमण और बर्ड वाचिंग के माध्यम से प्रतिभागियों को स्थानीय वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं की पहचान, क्षेत्रीय अवलोकन और उनके अभिलेखीकरण का व्यावहारिक अनुभव भी मिला। कार्यक्रम में जशपुर के वनमंडलाधिकारी  शशि कुमार सहित वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, विषय विशेषज्ञ और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

मुन्नी का हौसला, एम हेल्प वॉटर की धार, महालक्ष्मी समूह से रोजगार की बहार

कोरिया  सेवा संकल्प अभियान केवल सेवा कार्यों तक सीमित नहीं, बल्कि जनभागीदारी से आत्मनिर्भर और सशक्त समाज के निर्माण का संकल्प भी है। इसी भावना को ग्राम डुमरिया की श्रीमती मुन्नी बाई राजवाड़े अपने उद्यम के माध्यम से साकार कर रही हैं। कभी खेतों में मजदूरी और छोटे-मोटे काम करके परिवार चलाने वाली मुन्नी बाई आज सरकारी योजनाओं के सहयोग से सफल महिला उद्यमी बन चुकी हैं। बिहान योजना से स्वयं सहायता समूह का संबल मिला, प्रशिक्षण से आत्मविश्वास बढ़ा और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) ने उनके सपने को कारोबार में बदलने का आर्थिक आधार दिया। आज वे स्वयं आत्मनिर्भर हैं और करीब 10 लोगों को रोजगार भी दे रही हैं। ’समूह से जुड़कर मिली उद्यम की राह’’ मुन्नी बाई बिहान योजना के अंतर्गत महालक्ष्मी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आजीविका गतिविधियों का प्रशिक्षण मिला। रायपुर में प्रशिक्षण के दौरान उन्हें पीएमईजीपी की जानकारी मिली। योजना से प्रभावित होकर उन्होंने जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र पहुंचकर विस्तृत जानकारी ली और अपना व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया। परिवार की सीमित आर्थिक स्थिति के बावजूद उन्होंने गांव में जमीन लेकर पैक्ड पेयजल प्लांट स्थापित करने का फैसला किया। कई महीनों की प्रक्रिया के बाद पीएमईजीपी के तहत करीब 25 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ। ऋण एवं उपलब्ध सहायता से शेड, बाउंड्री और बोरवेल सहित आवश्यक व्यवस्था तैयार की गई। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने ‘एम हेल्प वॉटर’ पैक्ड पेयजल प्लांट शुरू किया। एक उद्यम से 10 लोगों को रोजगार मुन्नी बाई का व्यवसाय अब केवल उनके परिवार की आजीविका तक सीमित नहीं है। प्लांट में उनके पति, बेटा-बेटी, स्वयं सहायता समूह की महिलाएं तथा अन्य कर्मचारी कार्य कर रहे हैं।करीब 10 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है और कर्मचारियों को 6 से 9 हजार रुपये तक प्रतिमाह वेतन दिया जा रहा है। पानी की गुणवत्ता जांच से लेकर बोतल भरने और पैकेजिंग तक के कार्य के लिए कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया गया है। इससे ग्रामीण महिलाओं को गांव में ही रोजगार और नए कौशल का अवसर मिला है। गांव से कई जिलों तक पहुंचा कारोबार मुन्नी बाई के अनुसार पिछले एक वर्ष में करीब एक से डेढ़ लाख पानी की बोतलों की पैकिंग की जा चुकी है। बैकुण्ठपुर के साथ मनेंद्रगढ़, चिरमिरी, अंबिकापुर, प्रतापपुर, विश्रामपुर, सूरजपुर, भैयाथान और कुदरगढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों में ‘एम हेल्प वॉटर’ की आपूर्ति की जा रही है। महालक्ष्मी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद मिली वित्तीय सहायता, बैंक लिंकेज, प्रशिक्षण और उद्योग विभाग के अभिसरण से पीएमईजीपी का सहयोग उनके उद्यम की सफलता में महत्वपूर्ण साबित हुआ। मुन्नी बाई प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहती हैं कि पीएमईजीपी जैसी योजनाओं ने उन्हें अपना व्यवसाय शुरू करने का अवसर दिया। सरकारी सहयोग और मार्गदर्शन से आज वे अपने पैरों पर खड़ी हैं और दूसरों को भी रोजगार दे पा रही हैं। मुन्नी बाई की कहानी बताती है कि सरकारी योजनाओं का लाभ जब जनभागीदारी, संकल्प और मेहनत से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव एक परिवार से आगे बढ़कर पूरे समाज तक पहुंचता है। एक महिला आत्मनिर्भर बनती है, रोजगार के अवसर पैदा करती है और गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहभागी बनती है। सेवा संकल्प अभियान की भावना भी यही है सेवा के साथ जनभागीदारी, आत्मनिर्भरता विकसित समाज के निर्माण में हर व्यक्ति की भागीदारी। मुन्नी बाई इसी संकल्प की एक प्रेरक तस्वीर हैं।

केरलापेंदा में 21 साल बाद खुले श्रीराम मंदिर के द्वार, फिर से सुनाई देने लगी पूजा की घंटियां, जलने लगे आस्था के दीप

रायपुर कभी जिन रास्तों पर कदम रखने से पहले लोग कई बार सोचते थे, जहां जंगलों के बीच बंदूक की आवाज और बारूदी सुरंगों का डर बस्तर की पहचान बन गया था, उन्हीं इलाकों में अब बदलाव की एक नई कहानी लिखी जा रही है। यह बदलाव केवल सड़कों, सुरक्षा कैंपों या विकास कार्यों में नहीं, बल्कि उन लोगों की जिंदगी में भी दिखाई दे रहा है, जिन्होंने हिंसा का दौर अपनी आंखों से देखा है। दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन सुकमा से जगरगुंडा और केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक का सफर किया। करीब 13 घंटे से अधिक चले इस सफर में उन्होंने बस्तर के उस चेहरे को करीब से देखा, जो लंबे समय तक देश के सामने नक्सल हिंसा की खबरों के जरिए ही आया। पुनर्वास केंद्र में मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से संवाद से लेकर सुरक्षा व्यवस्था को समझने, ‘खूनी सड़क’ से गुजरने, 76 जवानों की शहादत से जुड़े क्षेत्र को देखने, ग्रामीणों से बातचीत करने, 21 साल तक बंद रहे राम मंदिर में पहुंचने और अंत में पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मिलने तक की यह यात्रा बस्तर के अतीत, वर्तमान और बदलती परिस्थितियों की एक जीवंत तस्वीर बन गई। सुबह सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले सुकमा पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से सीधे संवाद किया। बातचीत में उन्होंने उनके जीवन, आत्मसमर्पण के बाद आए बदलाव और सामान्य जीवन की ओर लौटने के अनुभवों को समझा। इन चेहरों के पीछे एक लंबा और कठिन अतीत था, लेकिन उनके सामने खड़े होकर संवाद करते इंफ्लुएंसर्स को बस्तर की कहानी का एक ऐसा मानवीय पक्ष दिखाई दिया, जिसे दूर बैठकर समझना आसान नहीं है। यह कहानी केवल बंदूक छोड़ने की नहीं, बल्कि एक सामान्य जिंदगी को दोबारा पाने की कोशिश की भी है। इसके बाद इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की। उन्होंने क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि बस्तर के दूरस्थ और कभी कठिन माने जाने वाले इलाकों तक सुरक्षा के साथ नागरिक सुविधाओं और विकास की पहुंच किस तरह बढ़ रही है। सुकमा में ही दल ने साइंस पार्क का भ्रमण किया। जंगलों और संघर्ष की छवि से इतर यह पड़ाव बस्तर की उस तस्वीर से परिचित कराने वाला था, जिसमें शिक्षा, विज्ञान और आधुनिक सुविधाओं के लिए भी जगह बन रही है। इसके बाद सफर तोंगपाल की ओर बढ़ा। भोजन के बाद दल जगरगुंडा के लिए रवाना हुआ। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह मार्ग था, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता है। इसी रास्ते से गुजरते हुए इंफ्लुएंसर्स ने उस दौर की जानकारी ली, जब यह क्षेत्र लंबे समय तक नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा। जगरगुंडा पहुंचकर उन्हें उस क्षेत्र के बारे में बताया गया, जो वर्ष 2010 में सुरक्षा बलों के 76 जवानों की शहादत से जुड़े ताड़मेटला हमले की स्मृति से जुड़ा है। 6 अप्रैल 2010 को हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी। यह पड़ाव इंफ्लुएंसर्स के लिए केवल इतिहास जानने का अवसर नहीं था। जिन स्थानों के नाम कभी देशभर में हिंसा की खबरों के साथ सुर्खियों में आते थे, वहां खड़े होकर उस अतीत को समझना उनके लिए बस्तर को एक अलग नजरिए से देखने जैसा था। लेकिन इसी सफर में उन्हें यह भी महसूस हुआ कि बस्तर की कहानी केवल अतीत में अटकी हुई नहीं है। जगरगुंडा से आगे बढ़ते हुए इंफ्लुएंसर्स केरलापेंदा पहुंचे। यहां उन्होंने ग्रामीणों से संवाद किया और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जाना। ग्रामीणों के अनुभवों ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि वर्षों तक संघर्ष से प्रभावित रहे इलाके में सामान्य जीवन की वापसी का अर्थ स्थानीय लोगों के लिए क्या है। केरलापेंदा में उनका सामना बस्तर की इस बदलती तस्वीर के सबसे मार्मिक प्रतीकों में से एक राम मंदिर से हुआ। यह वही मंदिर है, जो डर और भय से करीब 21 वर्षों तक बंद रहा था। मंदिर में भगवान राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। वर्ष 2003 में माओवादी प्रभाव के दौर में ग्रामीणों को मंदिर बंद रखने और वहां पूजा-अर्चना न करने का फरमान दिया गया था। भय का ऐसा वातावरण था कि लोग मंदिर के आसपास जाने से भी बचते थे। मंदिर में पूजा करीब 21 वर्षों तक बंद रही। फिर अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई की गई। करीब 21 वर्षों से बंद मंदिर के कपाट फिर खुले। ग्रामीणों और सीआरपीएफ जवानों ने मिलकर मंदिर परिसर की सफाई की और भगवान राम, माता सीता तथा भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना दोबारा शुरू हुई। जिस मंदिर के दरवाजे कभी भय के कारण बंद हुए थे, वहां फिर पूजा की घंटियां सुनाई देने लगीं। बस्तर की बदलती तस्वीर को समझने के लिए शायद इससे अधिक भावनात्मक दृश्य मुश्किल है, एक ओर बंदूक और भय का अतीत, दूसरी ओर फिर से जलता दीप और मंदिर में लौटती पूजा। केरलापेंदा का यह प्रसंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गांव कभी माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किया गया था।  यही कारण है कि इंफ्लुएंसर्स के लिए केरलापेंदा केवल यात्रा का एक पड़ाव नहीं रहा। यह उनके सामने बस्तर के बदलाव की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरा, जहां कभी भय के कारण पूजा रुक गई थी, वहीं अब ग्रामीण जीवन और धार्मिक गतिविधियों की वापसी दिखाई दे रही है। इसके बाद  इंफ्लुएंसर्स का दल पूवर्ती की ओर रवाना हुआ। जंगलों और दूरस्थ इलाकों से गुजरते हुए कई घंटे की यात्रा के बाद वे रात में पूवर्ती पहुंचे। पूवर्ती  नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक गांव है। यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से संवाद किया। उन्होंने परिवार से गांव की वर्तमान परिस्थितियों, स्थानीय जीवन … Read more

सेवा की कहानी: पहाड़ी कोरवा बस्ती के नन्हे कदमों को मिला बेहतर माहौल, लालमाटी में नया आंगनबाड़ी भवन बना पोषण और सीखने का केंद्र

रायपुर दूरस्थ पहाड़ी कोरवा बस्ती के नन्हे बच्चों को अब पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और नियमित गतिविधियों के लिए बेहतर माहौल मिल रहा है। सरगुजा जिले के लुण्ड्रा विकासखंड की ग्राम पंचायत लालमाटी स्थित पहाड़ी कोरवा बस्ती में 11.69 लाख रुपये की लागत से नया आंगनबाड़ी भवन तैयार किया गया है। स्थायी भवन उपलब्ध होने से बच्चों को एक ही स्थान पर आंगनबाड़ी की विभिन्न सेवाओं से जोड़ने की राह आसान हुई है। वहीं माताओं और किशोरी बालिकाओं को भी पोषण एवं स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं और जानकारियां स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो रही हैं। सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत शासन की योजनाओं और विभागीय अभिसरण के माध्यम से दूरस्थ एवं जनजातीय क्षेत्रों में बच्चों और महिलाओं से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत किया जा रहा है। लालमाटी की पहाड़ी कोरवा बस्ती में बना नवीन आंगनबाड़ी भवन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। 11.69 लाख रुपये में तैयार हुआ नया आंगनबाड़ी भवन पहाड़ी कोरवा बस्ती में नवीन आंगनबाड़ी भवन का निर्माण वीबी जी राम जी और महिला एवं बाल विकास विभाग के अभिसरण से 11.69 लाख रुपये की लागत से किया गया है। नया भवन मिलने से केंद्र की गतिविधियों के नियमित और व्यवस्थित संचालन के लिए स्थायी स्थान उपलब्ध हुआ है। इससे बच्चों के लिए बेहतर वातावरण तैयार होने के साथ आंगनबाड़ी की सेवाओं को समुदाय तक पहुंचाने में भी सहूलियत हुई है। दूरस्थ बस्ती में ही केंद्र उपलब्ध होने से बच्चों और महिलाओं को विभिन्न सेवाओं एवं गतिविधियों से जोड़ना आसान हुआ है। पहाड़ी कोरवा बच्चों को मिला पोषण और सीखने का बेहतर माहौल आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों के पोषण, देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है। लालमाटी की पहाड़ी कोरवा बस्ती में नया भवन बनने से बच्चों के लिए नियमित गतिविधियों के संचालन की बेहतर व्यवस्था हुई है। अब उन्हें निर्धारित स्थान पर पोषण संबंधी सेवाओं के साथ प्रारंभिक शिक्षा और विभिन्न गतिविधियों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। स्थायी भवन से बच्चों को नियमित रूप से केंद्र से जोड़ने और उनके पोषण एवं प्रारंभिक विकास से संबंधित गतिविधियों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने में सहायता मिल रही है। अभिभावकों के लिए भी बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुंचाना सुविधाजनक हुआ है। माताओं और किशोरी बालिकाओं के लिए भी बना सेवाओं का केंद्र नया आंगनबाड़ी भवन केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि गर्भवती एवं शिशुवती माताओं और किशोरी बालिकाओं के लिए भी उपयोगी साबित हो रहा है। केंद्र के माध्यम से उन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग की विभिन्न सेवाओं के साथ पोषण, मातृ एवं शिशु देखभाल तथा स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों से जोड़ा जा रहा है। नया भवन उपलब्ध होने से इन गतिविधियों के आयोजन के लिए भी एक निश्चित स्थान मिला है। बच्चों, माताओं और किशोरी बालिकाओं को एक ही छत के नीचे सेवाओं से जोड़ने की व्यवस्था ने दूरस्थ पहाड़ी कोरवा बस्ती में आंगनबाड़ी केंद्र की पहुंच और उपयोगिता को मजबूत किया है। विभागीय अभिसरण से दूरस्थ जनजातीय बस्ती तक पहुंची सुविधा वीबी जी राम जी और महिला एवं बाल विकास विभाग के अभिसरण से तैयार यह भवन दूरस्थ जनजातीय बसाहटों में आवश्यक अधोसंरचना विकसित करने की दिशा में उपयोगी पहल बनकर सामने आया है। इससे बच्चों के पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के साथ महिलाओं एवं किशोरी बालिकाओं के लिए भी स्थानीय स्तर पर सेवाओं की उपलब्धता बेहतर हुई है। सेवा संकल्प अभियान के तहत लालमाटी की पहाड़ी कोरवा बस्ती की यह ‘सेवा की कहानी’ बताती है कि योजनाओं के अभिसरण से दूरस्थ क्षेत्रों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाकर बच्चों और महिलाओं को उनके गांव में ही बेहतर सेवाओं से जोड़ा जा सकता है।

कम समय, कम खर्च और आसान प्रक्रिया—साविता ने महसूस किया पंजीयन सेवाओं में बदलाव

रायपुर कभी संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए अधिक समय लगना और उसके बाद नामांतरण के लिए अलग से प्रक्रिया पूरी करना नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बनता था। पंजीयन सेवाओं में किए गए सुधारों से अब यह तस्वीर बदल रही है। सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र अंतर्गत ग्राम जमकानी निवासी श्रीमती साविता पैंकरा ने इस बदलाव को स्वयं महसूस किया। कम समय में उनकी रजिस्ट्री पूरी हुई, महिला होने के कारण पंजीयन शुल्क में 50 प्रतिशत की रियायत मिली, पंजीयन के बाद नामांतरण की प्रक्रिया तत्काल आगे बढ़ी और रजिस्ट्री की प्रति भी सीधे मोबाइल पर प्राप्त हो गई। ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत पंजीयन विभाग से संवाद में उन्होंने अपना अनुभव साझा किया। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और वित्त एवं पंजीयन मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी की पहल से पंजीयन सेवाओं को सरल, सुगम, पारदर्शी और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए तकनीक आधारित सुधार किए गए हैं। महिलाओं को पंजीयन शुल्क में राहत देने के साथ रजिस्ट्री और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को डिजिटल माध्यम से आसान बनाया जा रहा है। इन सुधारों से नागरिकों का समय और खर्च कम होने के साथ कार्यालयों की अनावश्यक दौड़भाग भी घट रही है। पहले एक दिन में नहीं होता था काम, अब कम समय में पूरी हुई रजिस्ट्री श्रीमती साविता पैंकरा ने बताया कि पहले संपत्ति पंजीयन की प्रक्रिया में अधिक समय लगता था और कई बार एक दिन में काम पूरा नहीं हो पाता था। नई व्यवस्था में उन्हें कम समय में पंजीयन की प्रक्रिया पूरी होने की सुविधा मिली। महिला हितग्राही होने के कारण पंजीयन शुल्क में 50 प्रतिशत की रियायत से रजिस्ट्री का खर्च भी कम हुआ। इस तरह साविता को एक साथ दोहरी राहत मिली—एक ओर शुल्क में बचत हुई, वहीं दूसरी ओर कम समय में पंजीयन पूरा होने से समय और अनावश्यक दौड़भाग से भी राहत मिली। रजिस्ट्री के साथ नामांतरण ने खत्म किया अलग प्रक्रिया का इंतजार पंजीयन के बाद नामांतरण की प्रक्रिया को भी अधिक सुविधाजनक बनाया गया है। ऑटोम्यूटेशन व्यवस्था के माध्यम से रजिस्ट्री होने के बाद राजस्व अभिलेखों में नामांतरण की प्रक्रिया स्वतः आगे बढ़ती है। इससे नागरिकों को नामांतरण के लिए अलग से आवेदन करने और संबंधित कार्यालयों में बार-बार जाने की आवश्यकता कम हुई है। श्रीमती साविता पैंकरा को भी इस सुविधा का लाभ मिला। पंजीयन के बाद उनके नाम से नामांतरण की प्रक्रिया तत्काल आगे बढ़ी। इससे संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद अलग से नामांतरण के लिए इंतजार और कार्यालयीन प्रक्रिया की परेशानी कम हुई। मोबाइल पर मिली रजिस्ट्री की प्रति, डिजिटल सुविधाओं ने आसान किया काम तकनीक के उपयोग से पंजीयन की प्रक्रिया को अधिक सरल और पारदर्शी बनाया गया है। आधार आधारित प्रमाणीकरण के माध्यम से क्रेता, विक्रेता और गवाहों की पहचान सत्यापित की जाती है। ऑनलाइन अपॉइंटमेंट, ऑनलाइन भुगतान और डिजिटल दस्तावेज जैसी सुविधाओं से नागरिकों के लिए रजिस्ट्री की प्रक्रिया अधिक सुविधाजनक हुई है। पंजीयन शुल्क का भुगतान नेट बैंकिंग और यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों से भी किया जा सकता है। श्रीमती साविता को रजिस्ट्री पूरी होने के बाद उसकी प्रति सीधे मोबाइल पर प्राप्त हुई। इससे पंजीकृत दस्तावेज प्राप्त करने की प्रक्रिया भी उनके लिए आसान हुई। साविता की कहानी—बदलती पंजीयन व्यवस्था का जमीनी अनुभव श्रीमती साविता पैंकरा का अनुभव पंजीयन सेवाओं में आए बदलाव की जमीनी तस्वीर प्रस्तुत करता है। कम समय में रजिस्ट्री, महिलाओं को पंजीयन शुल्क में 50 प्रतिशत की राहत, ऑटोम्यूटेशन से आसान नामांतरण और मोबाइल पर रजिस्ट्री की प्रति—इन सुविधाओं ने उनके लिए पूरी प्रक्रिया को पहले की तुलना में अधिक सहज बनाया। ‘सेवा संकल्प अभियान’ के माध्यम से पंजीयन विभाग हितग्राहियों से सीधे संवाद कर इन्हीं बदलावों के अनुभव और सुझाव संकलित कर रहा है। साविता की कहानी बताती है कि तकनीक और प्रक्रिया के सरलीकरण से पंजीयन सेवा अब कम समय, कम खर्च और अधिक सुविधा की दिशा में आगे बढ़ रही है।

हर घर जल रिपोर्टेड गांवों में 2 अक्टूबर को आयोजित होंगे जल अर्पण कार्यक्रम, पूर्ण योजनाएं संचालन के लिए ग्राम पंचायतों को सौंपी जाएंगी

रायपुर जल जीवन मिशन के अंतर्गत हर घर जल रिपोर्टेड ऐसे गांव जहां काम पूर्ण हो चुके है और 15 दिनों का सफल ट्रायल रन पूरा हो चुका है, उन गांवों में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर जल अर्पण कार्यक्रमों का आयोजन कर पेयजल योजनाओं को संचालन के लिए ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित किए जाएंगे। जल जीवन मिशन के संचालक ने सभी कलेक्टरों को परिपत्र जारी कर इस संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। मिशन संचालक द्वारा कलेक्टरों को जारी परिपत्र में कहा गया है कि जल जीवन मिशन के अंतर्गत जिले के ऐसे 'हर घर जल' (HGJ) रिपोर्टेड ग्राम, जहाँ पेयजल आपूर्ति योजनाओं से संबंधित कार्य शत-प्रतिशत पूर्ण हो चुके हैं, किन्तु अब तक न तो उनका 'हर घर जल' (HGJ) प्रमाणीकरण हुआ है और न ही संबंधित ग्राम पंचायत एवं समुदाय को योजनाओं का हस्तांतरण किया गया है, ऐसे सभी 'हर घर जल' रिपोर्टेड ग्रामों में पेयजल आपूर्ति योजनाओं का न्यूनतम 15 दिनों का सफल ट्रायल रन पूर्ण करते हुए 'हर घर जल' प्रमाणीकरण एवं "जल अर्पण दिवस" कार्यक्रम के माध्यम से योजनाओं को संबंधित ग्राम पंचायत एवं समुदाय को निर्धारित हैंडओवर-प्रोटोकॉल के अनुसार विधिवत हस्तांतरण किया जाना है। मिशन संचालक ने 2 अक्टूबर को ग्राम पंचायतों में आयोजित विशेष ग्राम सभा के दौरान अधिक से अधिक 'हर घर जल' रिपोर्टेड ग्रामों में "जल अर्पण" कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने जलापूर्ति योजनाओं के हस्तांतरण हेतु निर्धारित हैंडओवर-प्रोटोकॉल के अनुसार आवश्यक मापदंडों का पूर्व सत्यापन एवं नियमानुसार दस्तावेजीकरण समय-सीमा में पूर्ण करने को कहा है, ताकि विशेष ग्राम सभा में हस्तांतरण एवं प्रमाणीकरण की कार्यवाही सुचारू रूप से संपन्न हो सके। मिशन संचालक ने जल अर्पण कार्यक्रम के माध्यम से हस्तांतरित योजनाओं एवं 'हर घर जल' प्रमाणन से संबंधित ग्रामों की सभी अद्यतन प्रगति/डॉटा/रिपोर्ट, पूर्णता प्रमाण-पत्र, ओएंडएम मैनुअल, एज-बिल्ट ड्राइंग्स (As-built drawings), जल गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और प्रिवेन्टिव मेन्टेनेंस शेड्यूल (Preventive Maintenance Schedule) इत्यादि को जल जीवन मिशन के आईएमआईएस पोर्टल (Jal Arpan Digital Module) पर नियमित एवं समयबद्ध रूप से एंट्री सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। कलेक्टरों को आईएमआईएस पोर्टल में ये सभी प्रविष्टियां जल अर्पण कार्यक्रम के आयोजन के एक सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्ण करने को कहा गया है।

100 रुपए की बचत से शुरू हुआ सफर, आटा-दाल चक्की ने शशिकला को बनाया आत्मनिर्भर

​रायपुर "मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है; पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।" आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की यह कहावत छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। जीवन में बड़ा बदलाव लाने के लिए हमेशा किसी बड़ी पूंजी की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि दृढ़ संकल्प, अनवरत मेहनत और सही मार्गदर्शन से छोटी-सी शुरुआत भी सफलता की एक नई इबारत लिख सकती है। सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड अंतर्गत ग्राम बिलाईगढ़ की निवासी मती शशिकला साहू की कहानी आज प्रदेश की लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा की एक नई किरण बनकर उभरी है। कभी साधारण आर्थिक परिस्थितियों के बीच परिवार की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए सीमित रहने वाली शशिकला, आज स्वयं की आटा और दाल चक्की की एक सफल उद्यमी के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। 'सेवा संकल्प अभियान' के दौरान सामने आई उनकी यह प्रेरक यात्रा राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और महिला श्रमशक्ति के अनूठे मेल की सुंदर मिसाल पेश करती है।           ​ पति  रूपनारायण साहू के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए शशिकला के मन में लंबे समय से स्वयं की आय का एक स्थायी साधन खड़ा करने की तीव्र इच्छा थी। उनकी इस सोच को धरातल पर उतारने का अवसर तब मिला, जब उन्होंने 11 सितंबर 2018 को गांव के 'दुर्गा स्वयं सहायता समूह' से जुड़कर स्वावलंबन की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ाया। इस सफर की शुरुआत बेहद सामान्य थी, जहाँ उन्होंने समूह में हर महीने महज 100 रुपये की छोटी बचत से शुरुआत की। अनुशासन और नियमितता के बल पर जमा की गई यही छोटी-सी राशि आगे चलकर उनके स्वरोजगार की मजबूत बुनियाद बनी।          ​ छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन 'बिहान' से जुड़ने के बाद शशिकला को वित्तीय प्रबंधन के साथ-साथ आजीविका के नए रास्ते तलाशने का दिशा-निर्देश मिला। समूह में उनके अनुशासित योगदान को देखते हुए छह महीने के भीतर बैंक द्वारा समूह को 1 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया गया। इस आर्थिक संबल ने शशिकला के सपनों को नई उड़ान दी और उन्होंने इस राशि से गांव में ही अपनी पहली आटा चक्की स्थापित की। इससे न केवल ग्रामीणों को अपने ही गांव में गेहूं पिसाने की सुविधा मिलने लगी, बल्कि शशिकला को भी अपने घर-परिवार के पास रहकर ही 150 से 200 रुपये की दैनिक आय होने लगी। इस प्रारंभिक सफलता से मिले आत्मविश्वास ने उनके हौसले को और बढ़ा दिया।        ​ व्यवसाय की बढ़ती मांग को देखते हुए शशिकला ने अपने काम का विस्तार करने का फैसला किया और बैंक से दूसरी बार ऋण लेकर दाल और गेहूं पिसाई के लिए अलग-अलग आधुनिक मशीनें लगाईं। इस विस्तार से उनकी सेवाओं का दायरा बढ़ा और आमदनी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। आज वे इस प्रसंस्करण इकाई के जरिए प्रतिदिन 200 से 300 रुपये तक कमा रही हैं, जिससे उनकी मासिक आय लगभग 9 हजार रुपये तक पहुँच गई है। जो सफर महज 100 रुपये की मासिक बचत से शुरू हुआ था, वह आज एक समृद्ध स्वरोजगार का रूप ले चुका है।         ​ अपनी इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए मती शशिकला साहू भावुक होकर कहती हैं कि बिहान योजना ने उनके जीवन को एक नई दिशा और पहचान दी है। इससे उन्हें आर्थिक संबल तो मिला ही है, साथ ही समाज में सिर उठाकर जीने का आत्मविश्वास भी हासिल हुआ है। आज वे अपने परिवार के महत्वपूर्ण निर्णयों में बराबरी की भागीदार हैं और इसके लिए वे बिहान योजना तथा छत्तीसगढ़ सरकार का हृदय से आभार व्यक्त करती हैं। सारंगढ़-बिलाईगढ़ के दूरस्थ अंचल से उभरी शशिकला साहू की यह कहानी यह सिद्ध करती है कि जब योजना से मिला अवसर मेहनत और संकल्प से जुड़ता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी बदलाव आता है। आज शशिकला न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि पूरे गांव की महिलाओं के लिए स्वावलंबन का एक चमकता हुआ प्रतीक बन चुकी हैं।

डेटा लेबलिंग और एआई में बलरामपुर ने रचा इतिहास

रायपुर छत्तीसगढ़ का बलरामपुर-रामानुजगंज जिला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा लेबलिंग के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए प्रदेश का पहला ऐसा जिला बन गया है, जहाँ कॉग्निटिव डेटा एनोटेशन सेंटर की स्थापना की जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य जिले के शिक्षित ग्रामीण युवाओं और स्व-सहायता समूह की महिलाओं को एआई आधारित अत्याधुनिक रोजगार और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराना है। प्रिज्मा एआई के साथ हुआ एमओयू कलेक्ट्रेट कक्ष में जिला प्रशासन बलरामपुर-रामानुजगंज और प्रिज्मा एआई के बीच इस सेंटर की स्थापना के लिए एक गैर-वित्तीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस दौरान जिला पंचायत सीईओ श्री आशुतोष चतुर्वेदी, प्रिज्मा एआई के सीईओ डॉ. श्रीराम अय्यर, सीओओ श्री अमिताभ राय चौधरी, सीटीओ श्री विनीत कुमार झा तथा स्व-सहायता समूह की सदस्य सुश्री सपना व सुश्री अनुजा प्रमुख रूप से उपस्थित रहीं। पायलट चरण की मुख्य विशेषताएं  पायलट चरण के तहत बलरामपुर में 10 सीटों का सेंटर शुरू होगा, जिसमें एक समर्पित प्रशिक्षक और गुणवत्ता पर्यवेक्षक तैनात रहेंगे। चयनित प्रतिभागियों को एआई साक्षरता, डिजिटल कौशल, डेटा लेबलिंग, इमेज एवं ऑब्जेक्ट टैगिंग, वर्गीकरण, सत्यापन और गुणवत्ता समीक्षा का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। अभ्यर्थियों की पहचान, छंटनी और चयन एक संरचित प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा। डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ेंगी लखपति दीदी  कलेक्टर बलरामपुर-रामानुजगंज श्रीमती चंदन त्रिपाठी ने बताया कि जिले में 12वीं उत्तीर्ण और स्नातक सदस्यों वाले स्व-सहायता समूहों का बड़ा दायरा है जो स्मार्टफोन और कंप्यूटर चलाने में दक्ष हैं। यह केंद्र पारंपरिक आजीविका से जुड़ी दीदियों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़कर स्थानीय स्तर पर ही सम्मानजनक और नियमित आय दिलाएगा, जिससे लखपति दीदी के लक्ष्य को गति मिलेगी। व्यय और जिम्मेदारियों का विभाजन एमओयू के तहत केंद्र की तकनीक, संचालन, प्रशिक्षण, गुणवत्ता पर्यवेक्षण, प्रतिभागियों के पारिश्रमिक, प्रोत्साहन राशि और इंटरनेट कनेक्टिविटी का पूरा खर्च प्रिज्मा एआई द्वारा वहन किया जाएगा। वहीं, जिला प्रशासन परिसर व बुनियादी ढांचे की पहचान, हितग्राहियों के चयन, एनआरएलएम व कौशल विकास विभागों से समन्वय और सुरक्षा व्यवस्था में सहयोग करेगा। यह अनूठी पहल जनजातीय बहुल क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में एक मील का पत्थर साबित होगी।

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने मंत्रालय स्थित कार्यालय में आगंतुकों से की मुलाकात

रायपुर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री  राजेश अग्रवाल ने मंत्रालय, नवा रायपुर स्थित कार्यालय में आज विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे नागरिकों एवं आगंतुकों से मुलाकात की। मंत्री  अग्रवाल ने सभी से आत्मीयता से संवाद करते हुए उनकी समस्याओं, अपेक्षाओं और सुझावों को गंभीरता से सुना तथा संबंधित विषयों की जानकारी ली। मुलाकात के दौरान विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं और आवश्यकताओं से मंत्री  अग्रवाल को अवगत कराया। मंत्री ने प्रत्येक आगंतुक की बात ध्यानपूर्वक सुनी और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि नागरिकों द्वारा प्रस्तुत समस्याओं का नियमानुसार परीक्षण कर उनका यथासंभव शीघ्र समाधान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, जिन मामलों में अन्य विभागों से समन्वय की आवश्यकता है, उनमें संबंधित विभागों से समन्वय कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। मंत्री  अग्रवाल ने कहा कि सरकार की योजनाओं और नीतियों का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए जनता से निरंतर संवाद और उनकी समस्याओं को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधि और सरकार के बीच जनता का सीधा संवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाता है। उन्होंने कहा कि ’जनता से जुड़े रहना और उनकी बात सुनना ही सुशासन की पहली सीढ़ी है।' नागरिकों की समस्याओं को सुनकर उनके समाधान की दिशा में प्रभावी पहल करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि आम नागरिकों की शिकायतों और सुझावों को संवेदनशीलता के साथ लेते हुए नियमानुसार समयबद्ध कार्रवाई की जाए। मंत्रालय में मंत्री से मिलने पहुंचे लोगों ने भी अपनी बात सुने जाने और समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक पहल किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों से आए नागरिकों ने अपने क्षेत्र के विकास, जनहित से जुड़े विषयों तथा अन्य आवश्यकताओं से संबंधित सुझाव भी साझा किए। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री  अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ के विकास में जनभागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका है। जनता के सुझावों और अनुभवों से शासन को जमीनी स्तर की आवश्यकताओं को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि सरकार जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप विकास कार्यों को आगे बढ़ाने और जनहित से जुड़े विषयों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।