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आर्थिक संकट, ब्यावर के खनिज उद्योग में छाई खामोशी और 5000 मजदूरों का पलायन

ब्यावर

 ईरान और इजराइल के बीच छिड़ी जंग की तपिश अब राजस्थान के 'मिनरल हब' कहे जाने वाले ब्यावर जिले की गलियों में महसूस होने लगी है। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव ने यहां के फलते-फूलते खनिज उद्योग की कमर तोड़ दी है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि ब्यावर की करीब 1100 फैक्ट्रियों में से 1000 इकाइयों पर ताले लटक गए हैं। मशीनों का शोर अब सन्नाटे में बदल चुका है और औद्योगिक क्षेत्रों में छाई यह खामोशी हजारों परिवारों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।

ग्लोबल वॉर का 'लोकल' जख्म
ब्यावर का मिनरल उद्योग मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय मांग और सुगम सप्लाई चेन पर निर्भर है। ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं और लॉजिस्टिक्स खर्च आसमान छू रहा है। इसका सीधा असर डिमांड पर पड़ा है। निर्यात ठप होने और नई डिमांड न आने के कारण उद्यमियों ने उत्पादन बंद करना ही बेहतर समझा। सिर्फ ब्यावर ही नहीं, इसका असर गुजरात के मोरबी तक फैला है, जहां करीब 2300 से ज्यादा मिनरल ग्राइंडिंग यूनिट्स बंद हो चुकी हैं।

'साहब, अब घर जाने के अलावा चारा नहीं'
इस औद्योगिक संकट की सबसे करुण तस्वीर उन प्रवासी मजदूरों की है, जो बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से हजारों किलोमीटर दूर सुनहरे भविष्य की तलाश में यहां आए थे। आंकड़ों की मानें तो पिछले कुछ दिनों में 5000 से ज्यादा मजदूरों की नौकरी जा चुकी है। ब्यावर के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर अब उन मजदूरों की भीड़ दिखने लगी है, जो अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर पलायन करने को मजबूर हैं।

फैक्ट्री मालिक ने हाथ खड़े कर दिए हैं। काम नहीं है तो तनख्वाह कहां से मिलेगी? कमरे का किराया और खाने के लाले पड़ रहे हैं।

6 लाख लोगों की रोजी-रोटी दांव पर
लघु उद्योग भारती के जानकारों का कहना है कि राजस्थान के करीब 14 जिलों में यह सेक्टर फैला है, जिससे 6 लाख लोग सीधे तौर पर जुड़े हैं। हर फैक्ट्री औसतन 30 टन उत्पादन करती थी, जो अब शून्य पर पहुंच गया है। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो ब्यावर का मिनरल मार्केट पूरी तरह तबाह हो सकता है। फिलहाल, उद्यमियों और मजदूरों की नजरें अंतरराष्ट्रीय हालातों के सुधरने पर टिकी हैं।
पुलकित सक्सेना

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