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ग्वालियर की पीएचडी स्कॉलर डॉ. ललिता ने बनाई नेचुरल क्रीम, डायबिटीज मरीजों के घाव होंगे जल्दी भरने लगे

ग्वालियर: 
आमतौर पर शरीर में घाव होने पर उसे भरने में कई दिन लगते हैं और मरीज को डायबिटीज हो तो घाव भरने की गारंटी तक नहीं होती, लेकिन ग्वालियर की डॉ ललिता ने ऐसी नेचुरल क्रीम तैयार की है. जिसे लगाने पर डायबिटिक मरीजों के घाव एक से तीन महीने में भर जाते हैं. नीम, एलोवेरा जैसे औषधीय गुणों वाले प्लांट्स से तैयार इस नेचुरल क्रीम का उन्होंने 200 वालंटियर मरीजों पर सफल ट्रायल किया. अब सस्ते दाम में बिना साइड इफेक्ट वाला अपना हर्बल ऑइंटमेंट वे मार्केट में उतारने की तैयारी में हैं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को उनकी रिसर्च का फायदा मिल सके.

7 साल की मेहनत और तैयार हुआ पूरी तरह नेचुरल ऑइंटमेंट

ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय के बायोकेमिस्ट्री विभाग में गेस्ट फैकल्टी रही पीएचडी स्कॉलर डॉ ललिता कुशवाह ने 7 वर्षों की मेहनत और रिसर्च से एक नेचुरल और हर्बल क्रीम तैयार की है. ये मरहम मुख्यरूप से ऐसे मरीजों के लिए बनाया है, जो डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारी में उनके घाव ठीक कर सकता है. डॉ ललिता ने इसे एलोवेरा, नीम, गेंदे के फूल, करक्यूमिन और घमरा जैसे औषधीय पौधों से तैयार किया है.

'फाइटोकेमिकल' बेस्ड है ऑइंटमेंट, कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं

 डॉ ललिता कुशवाह ने बताया कि, "उन्होंने इस प्राकृतिक मरहम को मुख्य रूप से डायबिटिक मरीजों के लिए बनाया है. वे कहती हैं कि, उनका ऑइंटमेंट फाइटोकेमिकल (पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक रसायन) आधारित है. इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है. इससे मरीजों पर इस्तेमाल में किसी तरह की एलर्जी या रिएक्शन का खतरा नहीं होता.

आम घाव और डाइबिटिक मरीजों के घाव में क्या फर्क?

आमतौर पर जब किसी चोट की वजह से कोई घाव बनता है, तो वह तेजी से हील (ठीक) होता है, लेकिन डायबिटीज के बीमारी होने पर ब्लड शुगर लेवल ज्यादा होने पर जब किसी को कोई घाव या छाले होते हैं, तो वह बहुत धीमी गति से ठीक होते हैं. कई बार कई केसेस में यह ठीक भी नहीं होते और घाव गैंगरीन में तब्दील हो जाता है. जिसका इलाज आसानी से नहीं हो पाता. जिसका नतीजा यह होता है कि, एक छोटा सा घाव डायबिटीज की वजह से इस कदर खराब हो जाता है कि शरीर के उस हिस्से को ही अलग करना पड़ जाता है.

एनिमल ट्रायल में 12 दिन में ठीक हुआ डायबिटिक वाउंड

ललिता कुशवाह बताती हैं कि, इस ऑइंटमेंट को तैयार करने के बाद इसका ट्रायल भी किया गया था. सबसे पहले इसे सामान्य जानवरों पर टेस्ट किया गया था. इसका रिजल्ट बहुत अच्छा मिला, इसके बाद कुछ टेस्ट में एनिमल्स का ब्लड शुगर बढ़ाया गया और उनके घाव पर जब इसे टेस्ट किया गया तो 400 एमएम स्क्वायर का घाव महज 12 दिनों में हील हो गया. इसके साथ ही अन्य पैरामीटर में भी अच्छे रिजल्ट मिले, इसमें इंफ्लेमेशन रिड्यूस हुआ, स्किन एंड सेल रीजेनरेशन तेज हुआ. कॉलेजिन फास्ट हुआ, ऐसे में कहा जाए तो एनिमल ट्रायल का रिजल्ट बहुत अच्छा मिला. इसी आधार पर फिर ह्यूमन ट्रायल किए गए.

200 मरीजों पर सफल ह्यूमन ट्रायल

ह्यूमन ट्रायल के लिए भी हर्बल ऑइंटमेंट अप्लाई कर नॉन डायबिटिक मरीजों के घाव की हीलिंग को डायबिटिक वाउंड्स की हीलिंग से तुलना की गई तो दोनों में ही काफी अच्छे नतीजे मिले. इसके लिए जीआरएमसी कॉलेज की डॉ मनीषा जादौन मेडम ने मरीज उपलब्ध कराए. जीआरएमसी के 200 से ज़्यादा वॉलेंटियर डायबटिक मरीजों पर मेडिकल कॉलेज में जाकर ऑइंटमेंट अप्लाई कर ट्रायल पूरा किया था.

30 से 90 दिनों में ठीक हुआ छोटे से बड़ा घाव

टेस्ट रिजल्ट के लिए डायबिटिक मरीजों के घाव तीन कैटेगरी में बांटे गए, क्योंकि घाव कितना बड़ा और गहरा है हीलिंग उस पर निर्भर करती है. छोटे घाव कम समय में जबकी बड़े घाव ठीक होने में ज्यादा समय लगता है. इसलिए इन्हें तीन कैटेगरी में बांटा गया था. स्मॉल वाउंड्स, मीडियम वाउंड्स और मॉडरेट वाउंड्स. जिसमें ऑइंटमेंट लगाने पर स्मॉल वाउंड लगभग 30 दिनों में जबकि उनके आकार के हिसाब से मीडियम और मॉडरेट वाउंड 80 से 90 दिनों के अंदर पूरी तरह ठीक हो गए.

जल्द मार्केट में दिखेगा हर्बल ऑइंटमेंट, पेटेंट के लिए भी अप्लाई

आगे की प्लानिंग बताते हुए डॉ ललिता कुशवाह ने बताया कि, उनकी कोशिश है की वे अपने इस हर्बल प्रोडक्ट को जल्द से जल्द मार्केट में लेकर आएं, जिससे इसका फायदा समाज और जरूरतमंद मरीजों को मिल सके. उन्होंने अपना हर्बल मरहम तैयार करने के बाद उसके पेटेंट के लिए अप्लाई कर दिया है. जिस पर प्रोसेस चल रही है, पेटेंट मिलने के बाद वे इसे बाजार में भी लॉन्च करेंगी.

'कम से कम दाम में मरीजों को उपलब्ध करा सके दवा

डॉ ललिता कहती है कि, जब वे ग्वालियर के गजराराजा मेडिकल कॉलेज में जाती थी, तो वहां वे ऐसे कई मरीजों को देखती थीं. जिनके पास इलाज तक के लिए रुपये नहीं होते थे. इनमें कई मरीज डायबिटीज की वजह से होने वाले शारीरिक समस्याओं से ग्रसित मिलते थे. इसलिए उन्होंने ये फैसला लिया कि, वे ऐसे मरीजों के लिए कम से कम दाम में दवा उपलब्ध कराएंगी. जिससे मरीजों को उसका फायदा मिले, तभी उनकी पीएचडी, रिसर्च और मेहनत सफल हो पाएगी."

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