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Varanasi-Kolkata Expressway को बड़ा बूस्ट: बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद 35,000 करोड़ की परियोजना ने पकड़ी रफ्तार

कलकत्ता
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार जो हुआ, उसने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सबको चौंका दिया. कभी बंगाल की राजनीति पर पूरी पकड़ रखने वाली ममता बनर्जी की पार्टी TMC को बड़ा झटका लगा और BJP ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर दी. अब शुभेंदु अधिकारी सूबे के नए मुख्यमंत्री बन चुके हैं. इस बदलाव का असर सिर्फ सत्ता बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से अटके पड़े बड़े प्रोजेक्ट्स भी तेजी पकड़ते नजर आ रहे हैं. इन्हीं में सबसे बड़ा नाम है 'वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे'. जिस प्रोजेक्ट की फाइलें सालों से मंजूरियों, रूट बदलाव और पर्यावरणीय अड़चनों में फंसी थीं, अब उसे तेजी से पूरा करने की तैयारी हो रही है।

देश के पूर्वी हिस्से में रोड कनेक्टिविटी को नई रफ्तार देने के लिए केंद्र सरकार अब वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है. करीब 35 हजार करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस एक्सप्रेसवे को लेकर सरकार काफी गंभीर नजर आ रही है. हालांकि पश्चिम बंगाल में पर्यावरण मंजूरी और रूट बदलाव से जुड़ी दिक्कतों की वजह से परियोजना के कुछ हिस्सों में अभी भी देरी जरूर है. लेकिन केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट को तय समय पर पूरा करने के प्रयास कर रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी (EAC) ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को झारखंड और पश्चिम बंगाल के हिस्सों में 200 किलोमीटर से ज्यादा लंबे हिस्से के निर्माण की मंजूरी दे दी है. इस क्लियरेंस के बाद एक्सप्रेसवे के रुके हुए हिस्सों पर काम तेज होने की उम्मीद है और इस मेगा प्रोजेक्ट को बड़ा बूस्ट मिला है. माना जा रहा है कि यह एक्सप्रेसवे पूर्वी भारत की कनेक्टिविटी, व्यापार और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को नई रफ्तार देगा, हालांकि इसके लिए पश्चिम बंगाल में 103 हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि का डायवर्जन भी करना होगा।

6 घंटे में वाराणसी से कोलकाता!
करीब 610 किलोमीटर लंबे इस 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे को काशी-बंगाल एक्सप्रेसवे के नाम से भी जाना जा रहा है. यह एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल को बेहतर तरीके से जोड़ने का काम करेगा. सबसे बड़ी बात यह है कि इसके शुरू होने के बाद वाराणसी से कोलकाता तक का सफर, जो अभी 12 से 14 घंटे में पूरा होता है, वह घटकर करीब 6 से 7 घंटे का रह जाएगा. इससे माल ढुलाई और व्यापारिक गतिविधियों को भी बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।

बिजनेस टुडे को सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में इस परियोजना का करीब 50 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है. वहीं बिहार में निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है और झारखंड में वन विभाग से जरूरी मंजूरियां भी मिल चुकी हैं. इन राज्यों में प्रोजेक्ट की रफ्तार थोड़ी बताई जा रही है।

कहां अटक रहा प्रोजेक्ट?
दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में यह परियोजना अभी धीमी गति से आगे बढ़ रही है. इसकी बड़ी वजह रूट अलाइनमेंट में बदलाव, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया और पर्यावरण मंजूरियों में देरी बताई जा रही है. सूत्रों के अनुसार अगर वन्यजीवों से जुड़ी चिंताओं का जल्द समाधान नहीं निकला तो केंद्र सरकार बंगाल वाले हिस्से के रूट में कुछ बदलाव भी कर सकती है।

यह मुद्दा हाल ही में संसद में भी उठाया गया था. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा था कि, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में निर्माण कार्य के ठेके पहले ही दिए जा चुके हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा मूल रूट में बदलाव की मांग किए जाने के बाद वहां काम की रफ्तार धीमी पड़ गई. उन्होंने बताया कि वाराणसी-रांची-कोलकाता वाले मूल रूट को केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी थी और 3 जनवरी 2023 को पश्चिम बंगाल सरकार की सहमति भी मिल गई थी. लेकिन राज्य सरकार की ओर से मांगे गए संशोधित रूट को अक्टूबर 2024 में मंजूरी मिली, जिससे आगे की प्रक्रिया में देरी हुई।

इन इलाकों में वन्यजीवों के लिए अंडरपास
अधिकारियों के अनुसार पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर, हुगली और हावड़ा जिलों से गुजरने वाले हिस्सों में वन और वन्यजीवों की सेफ्टी एक बड़ी चिंता है. वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने एक्सप्रेसवे पर कई वन्यजीव अंडरपास बनाने का प्रस्ताव दिया है, ताकि जानवरों की आवाजाही प्रभावित न हो।

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