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डॉक्टरों और छात्रों के लिए खास पहल: AIIMS Bhopal में आर्ट थैरेपी से मिलेगा स्ट्रेस से राहत

भोपाल चिकित्सा और पढ़ाई के तनावपूर्ण माहौल के बीच एम्स भोपाल ने अपने संकाय सदस्यों, विद्यार्थियों और कर्मचारियों के लिए एक पहल की है। संस्थान का हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर आगामी 16 से 18 फरवरी तक 'पेपर माचे' कला पर कार्यशाला आयोजित करेगा। लोगों को तनावमुक्त करना है टारगेट इसका उद्देश्य केवल कला सिखाना नहीं, बल्कि 'आर्ट थैरेपी' के माध्यम से संस्थान से जुड़े लोगों को तनावमुक्त वातावरण और मानसिक शांति प्रदान करना है। 'पेपर माचे' एक ऐसी प्राचीन विधा है, जिसमें पुराने अखबारों, गोंद और पानी के मिश्रण का उपयोग कर आकर्षक मूर्तियां, मुखौटे और सजावटी वस्तुएं बनाई जाती हैं।   एम्स प्रशासन का मानना है कि जब हाथ किसी सृजनात्मक कार्य में व्यस्त होते हैं, तो मस्तिष्क को गहरा विश्राम मिलता है। यह कार्यशाला प्रतिभागियों को अपनी छिपी हुई प्रतिभा को पहचानने और दैनिक भागदौड़ से इतर कुछ नया रचने का अवसर देगी। एम्स भोपाल इन दिनों अपने कर्मचारियों और छात्रों के समग्र स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दे रहा है। संस्थान के अनुसार एक स्वस्थ चिकित्सक या कर्मचारी ही बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दे सकता है। इसी सोच के साथ इस रचनात्मक गतिविधि को डिजाइन किया गया है। कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा पेपर माचे की बारीकियां सिखाई जाएंगी, जिससे प्रतिभागी शून्य लागत में घर की रद्दी से खूबसूरत कृतियां बनाना सीख सकेंगे।

एम्स भोपाल में लिफ्ट का गेट खुलते ही महिला का मंगलसूत्र लेकर भागा चोर

भोपाल. भोपाल एम्स को हाई-सिक्योरिटी स्वास्थ्य संस्थान माना जाता है। रविवार शाम को स्त्री रोग विभाग में अटेंडर के साथ हुई वारदात से महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अस्पताल परिसर की लिफ्ट में उनके साथ चेन स्नेचिंग की वारदात हुई। इस घटना का सीसीटीवी वीडियो सोमवार को वायरल हो गया। पीड़िता का नाम वर्षा सोनी है। वह स्त्री रोग विभाग में अटेंडर हैं। ड्यूटी के दौरान ब्लड बैंक के पीछे स्थित लिफ्ट से अकेली आ रही थीं। इसी दौरान मास्क और टोपी पहने एक युवक लिफ्ट में घुसा। वह उनसे नेत्र रोग विभाग का फ्लोर पूछने लगा। लिफ्ट तीसरे फ्लोर पर पहुंची, तो युवक पहले बाहर निकला। फिर अचानक लौटकर महिला के गले से मंगलसूत्र छीनने की कोशिश की। महिला ने विरोध किया, लेकिन युवक ने धक्का देकर खुद को छुड़ा लिया। वह सीढ़ियों से नीच की ओर भाग निकला। वह महिलाका मंगलसूत्र लेकर फरार हो गया। मोतियों की माला टूटकर गिर गई। पूरी वारदात सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई है। इस दौरान लिफ्ट एरिया में कोई भी सुरक्षा गार्ड मौजूद नहीं था। वारदात के बाद पीड़िता दस मिनट तक बैठी रोती रही। उसके बाद राउंड पर आए गार्ड ने इसकी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी। महिला ने बागसेवनिया थाने में शिकायत दर्ज कराई है। रविवार की छुट्टी की वजह से गार्ड थे कम रविवार को छुट्टी रहती है। इसी वजह से सुरक्षा व्यवस्था भी ढीली कर दी गई थी। आरोपी आईपीडी गेट से निकलकर फरार हो गया। एम्स परिसर में पहले चोरी की घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन लिफ्ट के अंदर महिला से चेन स्नेचिंग का यह पहला मामला है। पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपी की तलाश कर रही है।

एम्स भोपाल के शोध में बड़ा अलर्ट: रात को जागना और मोबाइल की लत कैंसर के जोखिम को बढ़ा रहे

 भोपाल  अगर आप भी ऐसे लोगों में शुमार हैं जो रात में घंटों मोबाइल की स्क्रीन से चिपके रहते हैं या फिर आपकी नींद का कोई तय समय नहीं है, तो अपनी जीवन शैली बदल डालिए। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के शोध में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि नींद की गड़बड़ी सीधे तौर पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को न्योता दे रही है। शोध के मुताबिक, नींद प्रभावित होने से शरीर का सुरक्षा तंत्र इस कदर कमजोर हो जाता है कि कैंसर कोशिकाएं पैर पसारने लगती हैं। 'कुदरती अलार्म' की महत्ता बताई एम्स भोपाल में जैव रसायन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार और उनकी टीम ने इस शोध के जरिए शरीर में चलने वाले उस 'कुदरती अलार्म' की महत्ता बताई है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'सर्कैडियन रिद्म' यानी जैविक घड़ी कहते हैं। डॉ. अशोक ने बताया कि हमारा शरीर दिन और रात के एक चक्र में काम करने के लिए बना है। यही चक्र हमारी नींद, पाचन, हार्मोन और सबसे महत्वपूर्ण रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को कंट्रोल करता है। देर रात तक जागने, नाइट शिफ्ट में काम करने और अनियमित दिनचर्या से जैविक घड़ी पटरी से उतर जाती है। शरीर की रक्षा कोशिकाएं भी 'सुस्त' पड़ जाती हैं ऐसी स्थिति में शरीर की रक्षा कोशिकाएं भी 'सुस्त' पड़ जाती हैं और कैंसर कोशिकाएं हमारी ऊर्जा प्रणाली पर कब्जा कर लेती हैं। धीरे-धीरे कैंसर कोशिकाएं इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें पहचान कर नष्ट ही नहीं कर पाती। इंटरनेशनल जर्नल में मिली पहचान, मिला सम्मान डॉ. अशोक कुमार ने यह शोध डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव (केजीएमयू लखनऊ), मनेन्द्र सिंह तोमर और मोहित के सहयोग से पूरा किया है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित जर्नल 'स्लीप मेडिसिन रिव्यूज' में प्रकाशित किया गया है। साथ ही डॉ. अशोक कुमार को 'बेस्ट पेपर अवार्ड' से नवाजा गया। आमजन के लिए 'सुरक्षा मंत्र'     सोने का समय तय करें रोज एक तय समय पर सोएं और जागें ताकि जैविक घड़ी संतुलित रहे।     सोने से एक घंटा पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन से दूरी बना लें।     अनियमित खान-पान शरीर के मेटाबॉलिज्म को बिगाड़ता है। समय पर भोजन करें।     नींद और कैंसर के बीच छुपे संबंध पर यह शोध समाज के लिए एक वेक-अप कॉल है। यह वैज्ञानिक उपलब्धि न केवल चिकित्सा जगत के लिए मूल्यवान है, बल्कि आम लोगों को यह समझाने में भी कारगर होगी कि स्वस्थ जीवनशैली ही कैंसर के खिलाफ सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है।     -डॉ. माधवानन्द कर, कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ, एम्स भोपाल।  

नया इनोवेशन: AIIMS और IIT ने बनाई पोर्टेबल 3D एक्स-रे यूनिट, एआई तकनीक से होगी त्वरित जांच

भोपाल   भारत में सड़क हादसों और ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर इलाज न मिल पाना मौतों का सबसे बड़ा कारण है। विशेषकर सीटी स्कैन जैसी जांचों के लिए बड़े शहरों पर निर्भरता के चलते मरीज 'गोल्डन आवर' में दम तोड़ देते हैं। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए AIIMS भोपाल और IIT इंदौर ने हाथ मिलाया है। दोनों संस्थान मिलकर दुनिया की पहली ऐसी एआई-बेस्ड पोर्टेबल 3D एक्स-रे यूनिट विकसित कर रहे हैं, जो अस्पताल पहुंचने से पहले ही सीटी स्कैन जैसी हाई-डेफिनेशन रिपोर्ट दे सकेगी। ICMR ने दी 8 करोड़ की फंडिंग भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने इस क्रांतिकारी प्रोजेक्ट को अपनी मंजूरी दे दी है। देशभर से प्राप्त 1224 रिसर्च प्रस्तावों में से केवल 38 का चयन किया गया, जिनमें मध्य प्रदेश से एकमात्र इसी प्रोजेक्ट को चुना गया है। इसके विकास के लिए ICMR ने 8 करोड़ रुपये की फंडिंग स्वीकृत की है। कैसे काम करेगी यह तकनीक? वर्तमान में सीटी स्कैन मशीनें भारी और महंगी होती हैं, जिन्हें एंबुलेंस में नहीं ले जाया जा सकता। इसके उलट नई यूनिट पूरी तरह पोर्टेबल होगी। कम रेडिएशन: यह मशीन सामान्य सीटी स्कैन की तुलना में 500 गुना कम रेडिएशन उत्सर्जित करेगी। AI का कमाल: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से यह यूनिट एक्स-रे इमेज को मल्टी-एंगल से कैप्चर कर 3D इमेज में बदल देगी। तत्काल रिपोर्ट: जांच रिपोर्ट सीधे मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन पर देखी जा सकेगी, जिससे डॉक्टर मौके पर ही चोट की गंभीरता का मूल्यांकन कर सकेंगे। तीन चरणों में होगा विकास प्रोजेक्ट के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. बी.एल. सोनी और डॉ. अंशुल राय ने नवभारत टाइम्स डॉट कॉम को बताया कि इस मशीन को तीन चरणों में तैयार किया जाएगा। पहले चरण में सिर और चेहरे (फेस एंड हेड) की इमेजिंग, दूसरे में फुल-बॉडी स्कैनिंग और तीसरे चरण में कैंसर रेडिएशन मैपिंग के लिए यूनिट तैयार की जाएगी। बचेगी हजारों की जान अकेले मध्य प्रदेश में हर साल करीब डेढ़ लाख लोग सड़क हादसों का शिकार होते हैं। यह मशीन एंबुलेंस और आपदा स्थलों पर तैनात की जा सकेगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों को बिना रेफर किए तत्काल सटीक इलाज मिल सकेगा। सफल परीक्षण के बाद इसे व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने की योजना है ताकि दुनिया भर में आपातकालीन चिकित्सा को सस्ता और सुलभ बनाया जा सके।  

चिकित्सा का चमत्कार: AIIMS Bhopal में महाधमनी की हाई-रिस्क सर्जरी, मरीज को मिला नया जीवन

भोपाल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के कार्डियोथोरेसिक एवं वैस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) विभाग के विशेषज्ञों ने एक 35 वर्षीय मरीज की अत्यंत जटिल सर्जरी कर उसे नया जीवन प्रदान किया है। यह मरीज पिछले आठ महीनों से पेट के असहनीय दर्द से जूझ रहा था और कई अस्पतालों में इलाज के बाद भी उसे राहत नहीं मिली थी। जानलेवा थी बीमारी, महाधमनी में सूजन एम्स में हुई जांच में सामने आया कि मरीज ''सुप्रा-रीनल एब्डामिनल एआर्टिक एन्यूरिज्म'' नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित था। इसमें पेट की महाधमनी (शरीर की सबसे बड़ी रक्त नली) में खतरनाक सूजन आ गई थी। यह सूजन आंतों और दोनों किडनियों को रक्त पहुंचाने वाली प्रमुख धमनियों तक फैल चुकी थी। स्थिति इतनी नाजुक थी कि मरीज की बाईं किडनी ने काम करना पूरी तरह बंद कर दिया था। यदि समय रहते सर्जरी न होती, तो महाधमनी के फटने से मरीज की जान जा सकती थी। छाती और पेट के रास्ते हुई सर्जरी सीटीवीएस विभाग के प्रमुख डॉ. योगेश निवारिया के नेतृत्व में यह मैराथन सर्जरी की गई। डॉक्टरों ने पेट और छाती के हिस्से से चीरा लगाकर ऑपरेशन शुरू किया। प्रक्रिया के दौरान सूजनग्रस्त महाधमनी को हटाकर उसकी जगह ग्राफ्ट (कृत्रिम रक्त नली) लगाई गई। साथ ही खराब हो चुकी बाईं किडनी को शरीर से अलग किया गया। सर्जरी का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा दाईं ओर की स्वस्थ किडनी और आंतों की प्रमुख धमनियों को ग्राफ्ट में फिर से जोड़ना (प्रत्यारोपित करना) था, जिसे टीम ने बखूबी अंजाम दिया। विशेषज्ञों की टीम का समन्वय सर्जरी के बाद मरीज को कुछ दिन आईसीयू में निगरानी में रखा गया और अब वह पूरी तरह स्वस्थ है। इस सफलता में डॉ. निवारिया के साथ डॉ. एम किशन, डॉ. सुरेंद्र सिंह यादव, डॉ. राहुल शर्मा, डॉ. विक्रम वट्टी और डॉ. आदित्य सिरोही शामिल थे। इसके अलावा यूरोलाजी विभाग से डॉ. माधवन, डॉ. केतन मेहरा, एनेस्थीसिया से डॉ. हरीश और सर्जिकल आन्कोलाजी से डॉ. अंकित जैन का विशेष सहयोग रहा।  

एम्स भोपाल में शुरू हुई एडवांस्ड स्ट्रोक ट्रीटमेंट यूनिट, 24 घंटे उपलब्ध रहेगा इलाज

 भोपाल  एम्स भोपाल में अब एडवांस्ड स्टोक टीटमेंट यूनिट शुरू की गई है। जहां बिना ओपन सर्जरी ब्रेन की बंद धमनी से थक्का (क्लॉट) निकालकर रक्त प्रवाह सामान्य किया जाएगा। इस तकनीक से मरीज की जान बचाना संभव होगा। विशेषज्ञों के अनुसार ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण दिखें तो 60 मिनट के भीतर अस्पताल पहुंचे। यह मध्य भारत में अपनी तरह की पहला केन्द्र होगा। यहां न्यूरोलॉजिस्ट, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन और क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट की टीम 24 घंटे मौजूद रहेगी। एम्स के कार्यपालक निदेशक डॉ. माधवानंद कर ने कहा कि स्ट्रोक के लक्षणों की तुरंत पहचान और अस्पताल पहुंचकर जीवन को बचाया जा सकता है। इसके लिए थिंक एफएएसटी अभियान चलाया गया है। एम्स की यह यूनिट मध्य भारत में स्ट्रोक मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण है। क्या है मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी यह एक मिनिमली इनवेसिव तकनीक है जिसमें पैर या कलाई की धमनी के जरिए पतली ट्यूब (कैथेटर) से ब्रेन की बंद धमनी तक पहुंचकर थक्का निकाला जाता है। इसमें ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती। इससे लकवा जैसी बीमारी से बचा जा सकता हैं। एडवांस्ड स्ट्रोक की विशेषताएं     इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी से तुरंत इलाज     सीटी और एमआरआइ परफ्यूजन इमेजिंग से सटीक निदान     यह पहचानना कि मरीज को थ्रोम्बेक्टोमी का लाभ मिलेगा या नहीं     पारंपरिक समय के बाद भी नई तकनीक कारगर स्ट्रोक के शुरुआती 5 संकेत     चेहरे पर झुकाव     हाथ-पैर में अचानक कमजोरी     बोलने में दिक्कत     दृष्टि धुंधली या दोहरी     तेज सिरदर्द और चक्कर

AIIMS भोपाल में शुरू हुई अत्याधुनिक छाती कैंसर इलाज सुविधा, मरीजों को अब लंबा सफर नहीं

भोपाल  अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल ने कैंसर के इलाज में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अस्पताल के सर्जिकल आंकोलाजी विभाग में अब विशेष रूप से छाती के कैंसर (फेफड़ों और भोजन नली) के इलाज के लिए एक 'समर्पित थोरासिक आंकोलाजी सुविधा' शुरू की गई। अब मध्य भारत के कैंसर रोगियों के लिए यह सुविधा मिलती रहेगी, अब इलाज के लिए बड़े शहरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। इस नई सुविधा की शुरुआत के साथ ही एक बेहद जटिल आपरेशन को अंजाम दिया गया है। डॉक्टरों ने एक मरीज की भोजन नली (इसोफेगस) के कैंसरग्रस्त हिस्से को निकाला। इसके बाद पेट के एक हिस्से से एक नई नली बनाकर उसे गले तक जोड़ा गया। यह पूरी सर्जरी दूरबीन और कैमरे वाली अत्याधुनिक थोरोस्कोपिक और लैप्रोस्कोपिक तकनीक से की गई। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें मरीज को बड़े चीरे नहीं लगाए जाते, जिससे दर्द कम होता है और वह जल्दी ठीक हो पाता है। एम्स भोपाल का सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग पहले से ही मध्य प्रदेश और आसपास के राज्यों के लगभग 20 हजार कैंसर मरीजों का हर साल इलाज करता है। अब तक छाती से जुड़े जटिल कैंसर के ऑपरेशन के लिए मरीजों को दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाना पड़ता था, जो काफी खर्चीला और मुश्किल होता था। अब यह विश्वस्तरीय सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होने से हजारों मरीजों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। विशेषज्ञ नेतृत्व और मजबूत टीम इस महत्वपूर्ण पहल का नेतृत्व प्रो. डॉ. माधवानंद कर रहे हैं, जो न केवल एक बेहतरीन सर्जन हैं, बल्कि एक कुशल शिक्षक भी हैं। उन्होंने देश के कई एम्स संस्थानों का मार्गदर्शन किया है और लगातार युवा डाक्टरों को प्रशिक्षित करते रहते हैं। उनके नेतृत्व में डॉ. विनय कुमार (विभागाध्यक्ष, सर्जिकल आंकोलाजी), डॉ. अंकित, डॉ. वैशाली, डॉ. जैनब और डॉ. शिखा सहित एक विशेषज्ञ टीम ने पहली जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा किया।

उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने एम्स भोपाल की व्यवस्थाओं का किया अवलोकन

प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने विभिन्न विषयों पर की चर्चा भोपाल  उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने एम्स भोपाल का दौरा कर वहाँ की चिकित्सा व्यवस्थाओं एवं अधोसंरचना का अवलोकन किया। उप मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने एम्स भोपाल द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सहज एवं सुलभ बनाने के लिए किए जा रहे विभिन्न नवाचारों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने कहा कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए एम्स जैसे अग्रणी संस्थानों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानंद ने एम्स की वर्तमान स्वास्थ्य सेवाओं तथा भविष्य की योजनाओं की विस्तार से जानकारी प्रदान की। उप मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने विश्वास व्यक्त किया कि एम्स भोपाल के अनुभव एवं नवाचार प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक प्रभावी व गुणवत्तापूर्ण बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। इस दौरान प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को नई तकनीक एवं आधुनिक संसाधनों से सशक्त करने, अनुसंधान आधारित चिकित्सा सेवाओं को बढ़ावा देने तथा जनसामान्य को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने संबंधी विभिन्न आयामों पर वृहद चर्चा हुई। इस दौरान उप संचालक प्रशासन श्री संदेश जैन सहित एम्स के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।  

दांतों की बीमारियों से परेशान MP: एम्स सर्वे में सामने आई चौंकाने वाली रिपोर्ट

भोपाल  एम्स भोपाल ने मध्यप्रदेश में दांत और मुंह की बीमारियों पर अब तक का सबसे बड़ा राज्यव्यापी सर्वेक्षण पूरा किया है। 2002-03 के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर मौखिक स्वास्थ्य की स्थिति दर्ज की गई है। इस रिपोर्ट को हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साउथ-ईस्ट एशिया जर्नल आफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित किया है। यह सर्वेक्षण एम्स भोपाल के दंत विभाग और रीजनल ट्रेनिंग सेंटर फार ओरल हेल्थ प्रमोशन एंड डेंटल पब्लिक हेल्थ के नोडल अधिकारी डा. अभिनव सिंह के नेतृत्व में किया गया। इसमें मध्यप्रदेश शासन के स्वास्थ्य सेवाएं संचालनालय ने सहयोग दिया। अध्ययन में प्रदेश के 41 जिलों के शहरी और ग्रामीण इलाकों से करीब 48 हजार लोगों को शामिल किया गया। नतीजे चौंकाने वाले सर्वे के मुताबिक, प्रदेश में दांतों में कीड़े लगना 40 से 70 प्रतिशत लोगों में पाया गया। मसूड़ों की बीमारी 50 से 87 प्रतिशत और मुंह के कैंसर दो से 17 प्रतिशत तक देखी गईं। सबसे गंभीर स्थिति यह रही कि 70 प्रतिशत से अधिक बुजुर्ग और लगभग 50 फीसद 5 साल के बच्चे दांतों की सड़न यानी कैविटी से जूझ रहे हैं। देश का पहला मौखिक स्वास्थ्य डेटा बैंक एम्स भोपाल ने केवल सर्वे ही नहीं किया, बल्कि इसके आधार पर देश का पहला मौखिक स्वास्थ्य डेटा बैंक भी बनाया है। डब्ल्यूएचओ माडल पर आधारित इस डेटा बैंक में जिलेवार मौखिक स्वास्थ्य की स्थिति और सेवाओं का ब्योरा दर्ज है। सरकार और नीति-निर्माता अब इस आधार पर नई योजनाएं बना सकेंगे। तकनीक से आई पारदर्शिता सर्वेक्षण को पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए मोबाइल एप और जीपीएस तकनीक का उपयोग किया गया। साथ ही एम्स भोपाल ने अपने ट्रेनिंग सेंटर के माध्यम से डॉक्टरों, शिक्षकों और काउंसलरों को विशेष प्रशिक्षण देने की भी शुरुआत की है, ताकि रोकथाम और उपचार की सुविधाएं सीधे समाज तक पहुंच सकें। विशेषज्ञों की राय डॉ. अभिनव सिंह का कहना है कि अब जब मौखिक स्वास्थ्य की वास्तविक तस्वीर सामने आ चुकी है तो जनजागरुकता बढ़ाने, बचाव और उपचार के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। यह सर्वे मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में मौखिक स्वास्थ्य को नई दिशा देगा।     दांतों में कीड़े (कैविटी) – 40% से 70%     मसूड़ों की बीमारी (गम डिजीज) – 50% से 87%     मुंह के कैंसर से पहले की अवस्थाएं – 2% से 17%     बुजुर्गों में दांतों की सड़न – 70% से अधिक     5 साल के बच्चों में कैविटी – लगभग 50%