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आंवला नवमी पर पढ़ें मां लक्ष्मी की पौराणिक कथा, दूर होगी दरिद्रता और मिलेगा आशीर्वाद

कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी भी कहा जाता है. इस दिन भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है. शास्त्रों में कहा गया है कि आंवले के नीचे की गई पूजा हजार यज्ञों के समान फल देती है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु आंवले के वृक्ष में निवास करते हैं. जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस वृक्ष की पूजा करता है उसे आरोग्य, संतान, सौभाग्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है. कहा जाता है कि इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करने से सारे रोग और पाप दूर होते हैं. इस बार आंवला नवमी की पूजा 31 अक्टूबर को की जाएगी. दरअसल, नवमी तिथि की शुरुआत अक्टूबर 30 को 10 बजकर 06 मिनट पर हुई है और इसका समापन 31 अक्तूबर को 10 बजकर 03 मिनट पर होगा. आंवले के पेड़ की पूजा करने का समय 31 अक्टूबर को 06:32 से 10:03 बजे तक है यानी 03 घंटे 31 मिनट्स तक शुभ मुहूर्त है, ऐसे में पूजा करते समय आंवले की कथा जरूर पढ़नी चाहिए. आंवला नवमी को पढ़ें ये कथा एक समय की बात है, माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण के लिए निकलीं. भ्रमण करते हुए उनके मन में विचार आया कि वह एक साथ भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करें, लेकिन यह समझ नहीं पा रहीं थीं कि दोनों देवताओं की एकसाथ पूजा किस प्रकार संभव है. ध्यान करते हुए लक्ष्मी जी ने पाया कि आंवले का वृक्ष ही ऐसा स्थान है जहां तुलसी की पवित्रता और बेल के पावन गुण दोनों साथ मिलते हैं. उन्होंने निश्चय किया कि वे आंवले के वृक्ष की पूजा करेंगी. माता लक्ष्मी ने शुद्ध मन और विधि-विधान से आंवले के वृक्ष की पूजा की, जल अर्पित किया, दीप जलाया और भगवान विष्णु व शिव का ध्यान किया. पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिव जी दोनों स्वयं प्रकट हुए और देवी लक्ष्मी को आशीर्वाद दिया कि जो भी श्रद्धा और भक्ति से आंवले के वृक्ष की पूजा करेगा, उसके जीवन में कभी दरिद्रता नहीं आएगी और उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी. इसके बाद माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन तैयार किया और उसी स्थान पर भगवान विष्णु और भगवान शिव को भोजन अर्पित किया. दोनों देवताओं ने प्रसन्न होकर वह प्रसाद स्वीकार किया. तत्पश्चात, माता लक्ष्मी ने भी वही भोजन प्रसाद रूप में ग्रहण किया. उसी दिन से कार्तिक शुक्ल नवमी के अवसर पर आंवला नवमी व्रत और पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई. आंवला वृक्ष की पूजा विधि     सुबह उठकर स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें.     किसी पवित्र स्थल या घर के आंगन में आंवले का वृक्ष सजाएं.     वृक्ष के चारों ओर जल, हल्दी, रोली, चावल और फूल चढ़ाएं.     आंवला वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं और विष्णु जी की आरती करें.     आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें.     परिवार सहित वृक्ष के नीचे भोजन ग्रहण करें. इसे आंवला भोजन कहा जाता है.  

आंवला नवमी के दिन भूलकर भी न करें ये गलती, वरना चली जाएगी घर की लक्ष्मी

आंवला नवमी 2025 का दिन धर्म, स्वास्थ्य और समृद्धि का संगम है। इस दिन श्रद्धा से आंवले के वृक्ष की पूजा करने से जीवन में अक्षय पुण्य और ईश्वरीय आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। यह पर्व हर आयु वर्ग के लिए सरल और पवित्र साधना का अवसर है। जहां प्रकृति, भक्ति और स्वास्थ्य एक सूत्र में बंध जाते हैं। आंवला नवमी का दिन धन, आरोग्य और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इस दिन आंवले के सेवन और पूजा से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है तथा पापों का क्षय होता है। यह दिन संतान सुख, पारिवारिक समृद्धि और वैवाहिक सुख प्रदान करने वाला माना गया है। आंवला नवमी मुख्य लाभ विष्णु व शिव की कृपा से घर में धन और शांति बढ़ती है। रोग, दुर्भाग्य और दरिद्रता दूर होती है। वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता आती है। व्यक्ति को मोक्ष और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। आंवला नवमी व्रत विधि प्रातःकाल स्नान कर पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। आंवले के वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं और जल से सिंचन करें। रोली, चावल, धूप, पुष्प, दीप, अक्षत और मिठाई से पूजा करें। भगवान विष्णु और भगवान शिव का ध्यान करते हुए आंवले की 7 परिक्रमा करें। परिवार सहित वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करें, इसे अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। आंवला नवमी के विशेष उपाय आंवले के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं और विष्णु-लक्ष्मी का ध्यान करें। जरूरतमंदों को आंवले, वस्त्र या मिठाई दान करें। ॐ नारायणाय नमः मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें। यदि संभव हो तो आंवला वृक्ष लगाएं, यह अत्यंत शुभ होता है।