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इंदौर में अवैध आयुर्वेदिक दवा निर्माण: बिना लैब और डिग्री के चल रही कफ सीरप फैक्ट्री

इंदौर  सांवेर तहसील के धरमपुरी सोलसिंदा स्थित रेबिहांस हर्बल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा घर में अवैध तरीके से आयुर्वेदिक कफ सीरप बनाया जा रहा था। संचालक ने इसके लिए न कोई लैब बना रखी थी और न सुरक्षा मानक थे। यहां अन्य कंपनियों के नाम से भी नकली सीरप बनाए जा रहे थे, जांच के दौरान दूसरी कंपनियों के लैबल पाए गए। दिसंबर में यहां से लिए गए सैंपल जांच में फेल हो गए जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई है। धरमपुरी के एक घर में बिना लैब व बिना सुरक्षा मानकों के आयुर्वेदिक सीरप बनाया जा रहा था। दिसंबर में जिला प्रशासन और आयुष विभाग ने कार्रवाई कर "फैक्ट्री" से सैंपल लिए थे। इन सैंपलों को जांच के लिए ग्वालियर भेजा गया था, जिनकी रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है। ये सैंपल जांच में फेल हो गए हैं। अवैध रूप से संचालित इस फैक्ट्री को प्रशासन ने सैंपल लेने के बाद सील कर दिया था। जांच में कफ सीरप तय मानकों पर खरा नहीं उतर सका। केमिस्ट के पास योग्यता नहीं यह फैक्ट्री सुखलिया निवासी सुरेंद्र सिंह के निर्देशन में संचालित होती थी। जांच के दौरान मौके पर केमिस्ट संजय डेविड कार्यरत मिला, जिसने बीएससी मैथ्स किया था। डेविड ने जांच के दौरान बताया था कि सीरप निर्माण का अनुभव एमको फार्मा में कार्य के दौरान प्राप्त हुआ। केमिस्ट के पास निर्धारित तकनीकी योग्यता नहीं पाई गई। प्रशासन की टीम ने आयुर्वेदिक कफ सीरप कंपनी की जांच की थी। कंपनी के पास लाइसेंस था, लेकिन ग्वालियर जांच के लिए भेजे गए सीरप के सैंपल फेल हुए हैं। कंपनी संचालक पर एफआइआर दर्ज कराई गई है और आगे भी कठोर कार्रवाई की जाएगी। – शिवम वर्मा, कलेक्टर इंदौर 30 प्रकार के सीरप का निर्माण हो रहा था फैक्ट्री में 30 से अधिक प्रकार के कफ सीरप पाए गए थे। ये उत्पाद मनोमय लाइफ केयर प्राइवेट लिमिटेड जिरकपुर पंजाब, रेबिहांस बायोटेक प्रालि देहरादून आदि अंकित पाए गए। जांच के दौरान मौके पर सीरप बनाने को लेकर इन कंपनियों से किसी प्रकार का वैध टाई-अप अनुबंध नहीं दिखाया गया था

इंदौर में आयुर्वेदिक कॉलेज ने 220 कैंसर मरीजों को दी ओजोन थेरेपी, स्वास्थ्य में सुधार

इंदौर  इंदौर के शासकीय अष्टांग आयुर्वेदिक कॉलेज में ओजोन थेरेपी के माध्यम से देशभर के कैंसर मरीजों को लाभ मिल रहा है। गत पांच महीनों में 220 से अधिक मरीजों को यह थेरेपी दी जा चुकी है। ओजोन थेरेपी शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाकर कैंसर मरीजों को ऊर्जा प्रदान करती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऑक्सीजन मानव शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूषित पर्यावरण, फेफड़ों की बीमारियों और अन्य कारणों से शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में ओजोन थेरेपी शरीर में ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है। अस्पताल में हर वर्ष एक हजार से अधिक मरीज कैंसर का इलाज करवाने के लिए आते हैं। इनमें कई मरीज देश के विभिन्न राज्यों से होते हैं। ओजोन थेरेपी द्वारा शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाकर बीमारियों को समाप्त किया जा सकता है, जिससे स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिलती है। आयुर्वेदिक इलाज से मिला लाभ     सुदामा नगर निवासी 66 वर्षीय महिला लाइपोसार्कोमा कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने ऑपरेशन करवाया और फिर कीमोथेरेपी भी करवाई, लेकिन समस्या कम नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने आयुर्वेदिक इलाज लेना शुरू किया और अब तक 15 ओजोन थेरेपी ले चुकी हैं, जिससे वे स्वस्थ महसूस कर रही हैं। नवीन आर्य को आंत का कैंसर है। ऑपरेशन हो चुका है और कीमोथेरेपी भी ले चुके हैं। ओजोन थेरेपी के बाद उन्हें आराम मिला है। बैतूल निवासी 55 वर्षीय महिला को स्तन कैंसर है, जिसमें गांठ बनी हुई है। उन्होंने ऑपरेशन नहीं करवाया है और इंदौर में रहकर ओजोन थेरेपी ले रही हैं, जिससे वे स्वस्थ महसूस कर रही हैं। इंदौर के 53 वर्षीय शिवदत्त जोशी को जीभ का कैंसर है। वे पिछले कुछ समय से ओजोन थेरेपी ले रहे हैं, जिससे उन्हें कैंसर की समस्या में राहत मिल रही है। पिछले पांच माह में ओजोन थेरेपी लेने वाले मरीज माह     मरीज अगस्त     41 सितंबर     102 अक्टूबर     46 नवंबर     24 दिसंबर     19 (अब तक) अन्य बीमारियों में भी सहायक यह थेरेपी अन्य बीमारियों में भी सहायक है। थेरेपी द्वारा शरीर की कोशिकाएं अधिक आक्सीजन अवशोषित करती हैं, जिससे शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अस्पताल की यूनिट में डॉ. श्वेता वर्मा, डॉ. शेखर पटेल, भारत प्रजापति, कमलेश पटेल एवं निशा मालवीय मरीजों का इलाज कर रहे हैं। तीन हजार वर्ष पुरानी पद्धति विशेषज्ञों का कहना है कि यह चिकित्सा पद्धति नई नहीं है। लगभग तीन हजार वर्ष पहले पतंजलि योग सूत्रों में भी प्राणायाम के माध्यम से शरीर में ऑक्सीजन बढ़ाने की बात कही गई थी। आधुनिक यूरोपीय देशों में ओजोन थेरेपी का लंबे समय से उपयोग किया जा रहा है और इसे विज्ञानी रूप से लाभकारी माना गया है। सप्ताह में दो दिन की जाती है थेरेपी     ओजोन, ऑक्सीजन का एक सक्रिय रूप है, जो शरीर के रक्त, लसिका और ऊतकों में जाकर कोशिकाओं से जुड़ता है। इस थेरेपी में एक विशेष मशीन के माध्यम से शरीर में ऑक्सीजन प्रवाहित की जाती है। इससे कैंसर कोशिकाओं को समाप्त करने, शरीर को डिटॉक्स करने और घावों को भरने में सहायता मिलती है। यह थेरेपी सप्ताह में दो दिन दी जाती है। – डॉ. अखिलेश भार्गव, विभागाध्यक्ष, शल्य तंत्र विभाग  

गले में दर्द, सूजन और खराश? अपनाएं ये आसान आयुर्वेदिक उपाय

भोपाल   मौसम के बदलाव के साथ ही गले में खराश और सूजन एक आम समस्या बन जाती है। यह शुष्क हवा, हीटर का अधिक उपयोग, ठंडी हवा में सांस लेना, प्रदूषण और अनियमित खान-पान जैसे छिपे कारणों से भी ट्रिगर होती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में कफ दोष का संचय बढ़ता है, जो गले में जलन और सूजन पैदा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू उपाय कफ को संतुलित कर गले को राहत प्रदान करते हैं। सर्दियों में हवा सूखी हो जाती है, जिससे गले की म्यूकस लेयर ड्राई होकर वायरस के प्रवेश को आसान बनाती है। हीटर के सामने बैठना गले को और शुष्क करता है, जबकि सुबह ठंडी हवा और ठंडे-गर्म पेय का मिश्रित सेवन सूजन बढ़ाता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे उपाय प्रभावी हैं जो कफ निकालकर गले को नमी और गर्माहट देते हैं। इनमें हींग-शहद का लेप है। हींग के एंटीवायरल गुण कफ को ढीला कर जलन कम करते हैं। मिश्री-सौंफ-काली मुनक्का को उबालकर काढ़ा बनाएं और इसे पीने से गला नम रहता है, सूजन शांत होती है। गुनगुने पानी में हल्दी और कुचली लौंग मिलाकर गरारा करना भी लाभदायी होता है। हल्दी में करक्यूमिन होता है, जो सूजन घटाता है, जबकि लौंग दर्द में राहत देता है। अदरक और गुड़ गर्म कर उसका भाप लेने से कफ ढीला होता है और खराश में तुरंत आराम मिलता है। नींबू के छिलके गर्म कर गर्दन पर रखें। इसके लिमोनीन से गला मॉइस्चराइज होता है। तुलसी का चूर्ण शहद में मिलाकर लें। तुलसी के एंटीसेप्टिक गुण वायरस रोकते हैं। इसके साथ ही गुनगुना तिल का तेल नाक में 2-2 बूंद डालें। यह गले के सूखेपन को दूर कर नमी प्रदान करता है। ये उपाय न केवल लक्षणों को कम करते हैं, बल्कि कफ असंतुलन की समस्या भी दूर करते हैं। एक्सपर्ट के अनुसार, इन देसी नुस्खों को मौसम के अनुसार अपनाएं। गंभीर मामलों में डॉक्टर से परामर्श लें।