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एम्स दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में ट्रामा सेंटर, रोबोटिक सर्जरी से मिलेगा इलाज

भोपाल  एम्स भोपाल में करीब एक हजार करोड़ रुपये के विस्तार की योजना को लेकर सोमवार को दिल्ली में भारत सरकार की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (एसएफसी) की बैठक हुई। भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव को विस्तार का पूरा प्लान सौंपा। इस महायोजना के तहत एम्स परिसर में ही हेलीपैड बनाया जाएगा, जिससे एयर एम्बुलेंस का संचालन सुलभ हो सकेगा। कैंसर अस्पताल और ट्रामा सेंटर का निर्माण सांसद शर्मा ने बताया कि एम्स में 200 बेड का अत्याधुनिक अपेक्स आन्कोलॉजी सेंटर (कैंसर अस्पताल) बनाया जाएगा। आंकड़ों के अनुसार, एम्स भोपाल में हर साल 36 हजार से ज्यादा कैंसर मरीज आते हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत मरीज भोपाल के बाहर के जिलों जैसे आगर मालवा, रायसेन और विदिशा से होते हैं। इसके साथ ही एम्स दिल्ली के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा 'लेवल-1 अपेक्स ट्रामा सेंटर' भी भोपाल में तैयार होगा। 150 बेड वाले इस सेंटर के पहले चरण के लिए 295 करोड़ रुपये का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा गया है। रोबोटिक सर्जरी और हाई-टेक सुविधाएं एम्स भोपाल का यूरोलॉजी विभाग अब दुनिया की सबसे उन्नत 'द विंची रोबोट 4.0' प्रणाली से लैस होगा। लगभग 30 करोड़ की लागत वाले इस सिस्टम के लगने के बाद एम्स भोपाल सेंट्रल इंडिया का पहला सरकारी संस्थान बनेगा, जहां रोबोटिक तकनीक से प्रोस्टेट कैंसर और किडनी ट्यूमर जैसे जटिल ऑपरेशन न्यूनतम चीर-फाड़ के साथ हो सकेंगे। इसके अलावा वर्चुअल ऑटोप्सी और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाओं के विस्तार पर भी प्रेजेंटेशन दिया गया। मरीजों की बढ़ती संख्या और बजट की उम्मीद बता दें कि एम्स में मरीजों का भार तेजी से बढ़ रहा है। साल 2022 में जहां 36 हजार मरीज आए थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 85 हजार से अधिक हो गई है। बैठक में एम्स निदेशक डॉ. माधवानंद कर और डिप्टी डायरेक्टर संदेश जैन सहित मंत्रालय के आला अधिकारी मौजूद रहे। इन प्रोजेक्ट्स के लिए बजट जल्द ही स्वीकृत हो जाएगा, जिससे मध्य प्रदेश सहित पूरे मध्य भारत के मरीजों को विश्वस्तरीय इलाज मिल सकेगा।  

AIIMS Bhopal को मिलेंगी गामा नाइफ और पेट स्कैन जैसी हाईटेक सुविधाएं

भोपाल. नए साल 2026 का आगाज मध्य प्रदेश के मरीजों के लिए बड़ी स्वास्थ्य सौगातें लेकर आया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल इस वर्ष अपने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक विस्तार करने जा रहा है। संस्थान ने वर्ष 2026 के लिए जो रोडमैप तैयार किया है, उससे गंभीर बीमारियों, विशेषकर कैंसर और ट्यूमर के इलाज के लिए मरीजों को अब दिल्ली, मुंबई या अन्य महानगरों की दौड़ नहीं लगानी पड़ेगी। एम्स प्रबंधन का पूरा फोकस इस वर्ष डायग्नोस्टिक सेवाओं को विश्वस्तरीय बनाने व क्रिटिकल केयर की क्षमता बढ़ाने पर रहेगा। गामा नाइफ और पेट स्कैन से मिलेगी राहत वर्ष 2026 में एम्स भोपाल में गामा नाइफ और पेट स्कैन जैसी अत्याधुनिक मशीनें स्थापित की जाएंगी। ब्रेन ट्यूमर और मस्तिष्क के अन्य जटिल रोगों के इलाज में गामा नाइफ तकनीक वरदान साबित होगी, क्योंकि इससे बिना चीरा लगाए सटीक रेडिएशन के जरिए ट्यूमर का इलाज संभव होगा। मरीजों को नया जीवन मिल सकेगा वहीं, कैंसर की सटीक स्टेज और शरीर में फैलाव का पता लगाने के लिए पेट स्कैन मशीन की सुविधा शुरू होने से जांच में लगने वाला समय कम होगा और इलाज जल्द शुरू हो सकेगा। गंभीर मरीजों की जान बचाने के लिए एम्स में अंग प्रत्यारोपण सेवाओं को और सुदृढ़ किया जा रहा है। इस वर्ष संस्थान में 'ट्रांसप्लांट' के लिए समर्पित एक अलग ऑपरेशन थिएटर शुरू करने की योजना है। इस ओटी के शुरू होने से हृदय, लिवर और किडनी ट्रांसप्लांट एक ही छत के नीचे संक्रमण रहित वातावरण में किए जा सकेंगे। इससे वेटिंग लिस्ट कम होगी और अधिक मरीजों को नया जीवन मिल सकेगा। चार मंजिला आईसीयू और रोबोटिक ट्रेनिंग सेंटर गंभीर मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए कैंसर ब्लाक के समीप एक नया चार मंजिला अत्याधुनिक आईसीयू भवन तैयार किया जाएगा। यह भवन क्रिटिकल केयर सुविधाओं से लैस होगा। इसके साथ ही सर्जरी में सटीकता लाने के लिए रोबोटिक सर्जरी का विस्तार किया जाएगा और नए डाक्टरों को प्रशिक्षित करने के लिए एक रोबोटिक ट्रेनिंग सेंटर की भी शुरुआत होगी। एम्स भोपाल ने जनवरी 2025 में यहां मध्य प्रदेश का पहला सफल हृदय प्रत्यारोपण किया। संस्थान ने अब तक तीन सफल हृदय प्रत्यारोपण और 17 किडनी प्रत्यारोपण किए। जटिल बीमारियों का इलाज यहीं पर होगा एम्स का उद्देश्य मरीजों को न्यूनतम दर पर विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है। वर्ष 2026 के लिए हमने डायग्नोस्टिक और क्रिटिकल केयर को मजबूत करने का रोडमैप तैयार किया है। गामा नाइफ, पेट स्कैन और समर्पित ट्रांसप्लांट ओटी के शुरू होने से हम जटिल से जटिल बीमारियों का इलाज यहीं करने में सक्षम होंगे। – डॉ. केतन मेहरा, पीआरओ, एम्स

मासूम के लिए वरदान बनी एयर एंबुलेंस: रीवा से भोपाल AIIMS तक मिनटों में पहुंचाई बच्ची

रीवा   विंध्य क्षेत्र में शुरू की गई एयर एंबुलेंस सेवा लगातार जिंदगियां बचाने में अहम अपनी भूमिका निभा रही है. हाली ही में रीवा से एक बार फिर एयर एंबुलेंस ने समय रहते एक मासूम की जान बचाने का काम किया है. मऊगंज निवासी 6 साल की बच्ची गंभीर लीवर फेल्योर की समस्या से पीड़ित थी और उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी. बच्ची को तत्काल उच्च स्तरीय इलाज की आवश्यकता थी, जिसके बाद स्थानीय डॉक्टरों ने उसे भोपाल एम्स रेफर कर दिया. इसके बाद बच्चे के लिए पीएम श्री एयर एंबुलेंस बुधवार को रीवा पहुंची और उसे तत्काल एयर लिफ्ट कर भोपाल एम्स मे भर्ती कराया गया. बिना समय गंवाए मंगाई गई एयर एंबुलेंस मऊगंज निवासी रोहित दुबे की 6 वर्षीय बच्ची अनवी दुबे को बीते दिनों संजय गांधी अस्पताल में एडमिट कराया गया था. डॉक्टर्स ने पाया कि बच्ची का लिवर फेल होने की स्थिति में आ गया है और बिना समय गंवाए उसे भोपाल एम्स भेजना होगा. रीवा के डॉक्टर्स ने परिवार की सहमति ली, जिसके बाद बिना समय गंवाए एयर एंबुलेंस की व्यवस्था की गई. मेडिकल टीम की निगरानी में बच्ची को सुरक्षित रूप से रीवा हॉस्पिटल से डॉ. अभिनव अवस्थी और 108 एम्बुलेंस चालक आजाद शाह सावधानी के साथ रीवा एयरपोर्ट ले गए. यहां एयर एम्बुलेंस पहुंचते ही बच्ची को एयर लिफ्ट कर भोपाल के एम्स हॉस्पिटल ले जाया गया. संजय गांधी हॉस्पिटल के अधीक्षक राहुल मिश्रा ने बताया, " मऊगंज निवासी 6 वर्षीय अनवी दुबे को लिवर फेलियर हुआ था. दो दिनों तक उसका इलाज संजय गांधी हॉस्पिटल में हुआ, जिसके बाद गंभीर अवस्था होने पर बच्ची उसे स्पेशल ट्रीटमेंट देने की जरूरत थी. इसके लिए डिप्टी सीएम के निर्देश से कलेक्टर प्रतिभा पाल और मेडिकल कॉलेज के डीन सुनील अग्रवाल की सहमति के बाद एयर एम्बुलेंस बुलवाई गई और बच्ची को एयर लिफ्ट करके भोपाल एम्स हॉस्पिटल मे इलाज के लिए रेफर किया.'' बच्ची के परिजनों ने शासन और प्रशासन का जताया आभार डॉक्टर्स के मुताबिक भोपाल के एम्स हॉस्पिटल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा बच्ची का इलाज शुरू कर दिया गया है.चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे गंभीर मामलों में समय पर एयर एंबुलेंस की सुविधा मिलना जीवन रक्षक साबित होता है. वहीं, परिजनों ने इस त्वरित और संवेदनशील व्यवस्था के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला के साथ ही प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का आभार व्यक्त किया है.

भोपाल AIIMS: डॉ. रश्मि के आत्महत्या प्रयास में ब्रेन डैमेज, डॉ. यूनुस को HOD पद से हटाया गया

भोपाल  राजधानी भोपाल में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा द्वारा आत्महत्या का प्रयास करने के मामले में संस्थान में हड़कंप मचाकर रख दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई लेवल कमेटी गठित की गई है, जो इस पूरे मामले की जांच करेगी। साथ ही, ट्रॉमा एवं इमरजेंसी विभाग के हेड ऑफ डिपार्टमेंट (HOD) डॉ. यूनुस को उनके पद से हटा दिया गया है। आपको बता दें कि, ये हैरान कर देने वाली घटना 11 दिसंबर की रात की है। यहां डॉ. रश्मि वर्मा ड्यूटी पूरी कर घर लौटने के बाद एनेस्थीसिया की हाई डोज खुद को इंजेक्ट कर लिया था। इससे उनका दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहा, जिससे उनके दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचा है। एमआरआई रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई है। मौजूदा समय में डॉ. रश्मि वर्मा वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं। इलाज में जुटे चिकित्सकों की मानें तो उनकी हालत नाजुक बनी हुई है। HOD पद से हटाए गए डॉ. यूनुस एम्स प्रबंधन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच आपात बैठक हुई, जिसमें मामले की गहन जांच के निर्देश दिए गए। बैठक के दौरान चर्चा हुई कि, डॉ. यूनुस पर पहले भी डॉक्टरों को प्रताड़ित करने के आरोप लग चुके हैं, जिसके चलते उन्हें पद से हटाया गया है। संस्थान के सूत्रों के अनुसार, कार्यस्थल पर तनाव और प्रताड़ना के आरोपों की जांच की जा रही है। एम्स प्रबंधन ने मामले पर संवेदनशीलता दिखाते हुए सभी पक्षों से जानकारी जुटाई जा रही है।

AIIMS भोपाल के डॉक्टरों का कमाल, वेस्टेज गर्भनाल से 13 लोगों की आंखों की रोशनी लौटी

भोपाल  गर्भनाल, गर्भस्थ शिशु के लिए रक्षा कवच का काम करता है. जबकि शिशु का जन्म होने के बाद इस कवच को वेस्टेज समझ के फेंक दिया जाता था, लेकिन एम्स भोपाल के डाक्टर अब इस इस गर्भनाल की झिल्लियों से आंखे खो चुके मरीजों के जीवन में फिर से रोशनी लाने का काम कर रहे हैं. दीपावली के दौरान कार्बाइड गन से घायल 13 लोग आंखों का इलाज कराने के लिए एम्स भोपाल पहुंचे थे. जहां डाक्टरों ने एमनियोटिक मेम्ब्रेन यानि गर्भनाल की झिल्लियों का उपयोग कर उनकी आंखों की रोशनी लौटाई. घाव भरने और पारदर्शिता बनाए रखने में करती है मदद एम्स भोपाल के सर्जन डॉक्टर समेंद्र खुरकुर ने बताया कि "नवजात शिशुओं के जन्म के बाद उनके गर्भनाल को पहले फेंक दिया जाता था, लेकिन अब यही आंखों की गंभीर समस्याओं में दवाई का काम कर रही है. गर्भनाल की जीवित झिल्ली घाव भरने में मदद करती है. इसके साथ ही आंखों की पारदर्शिता बनाए रखने में भी मदद करती है. वहीं निजी अस्पतालों में जहां इस तरह के इलाज में 40 से 50 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं. भोपाल एम्स में आयुषमान कार्डधारकों का यह इलाज निशुल्क किया जा रहा है. जबकि जिनके पास आयुष्मान कार्ड नहीं है, उनसे भी केवल 250 रुपए लिए जा रहे हैं. मरीजों की आंखों का 80 प्रतिशत विजन लौटा डॉक्टर समेंद्र खुरकुर ने बताया किए मनियोटिक मेम्ब्रेन तकनीकी ऐसे लोगों के लिए कारगर है, जिनकी आंखें केमिकल के पटाखों से खराब हुई है. उनके कार्नियल अल्सर या संक्रमण की स्थिति में और एलर्जिक सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों के इलाज में बेहतर रिजल्ट मिलता है. इसके साथ ही इसका इस्तेमाल ट्रामा या सर्जरी के बाद ऊतकों की बेहतर रिकवरी के लिए भी किया जाता है. उन्होंने बताया कि एम्स भोपाल में जिन मरीजों का इलाज चल रहा है, उनका विजन 80 प्रतिशत से अधिक लौट चुका है. इनमें अधिकतर मरीजों की आंखें कार्बाइड गन से डैमेज हुई थी. इस तरह किया जाता है एमनियोटिक मेम्ब्रेन से इलाज आंखो में चोट, इंफेक्शन या पटाखों से आंखों की ऊपरी सतह झुलसने पर यदि दवाइयों से घाव ठीक नहीं होते तो एमनियोटिक मेम्ब्रेन ग्राफ्टिंग की जाती है. सबसे पहले डिलेवरी के बाद नवजात शिशु को इससे अलग किया जाता है. फिर इसे स्टरलाइज करने के बाद नार्मल स्लाइन से साफ किया जाता है. इसके बाद इसे एंटीबायोटिक या बीटाडीन सॉल्यूशन से साफ किया जाता है. इसके बाद आंखों के क्षतिग्रस्त हिस्से को साफ कर टांकों के माध्यम से इसकी ग्राफ्टिंग की जाती है. इससे घाव जल्द भरते हैं और मरीज की रिकवरी जल्दी होती है. जानिए क्या होता है एमनियोटिक मेम्ब्रेन एमनियोटिक मेम्ब्रेन एक पतली और मजबूत झिल्ली होती है, जो गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को घेरे रहती है. विशेष रूप से, यह एमिनियोटिक थैली की आंतरिक या भीतरी परत होती है, जो भ्रूण को धारण करने वाला आवरण होती है. एमनियोटिक थैली में एमनियोटिक द्रव और एक बाहरी परत भी होती है, जिसे कोरियोन कहा जाता है. ये संरचनाएं मिलकर भ्रूण के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण बनाती हैं, ताकि वह बढ़ सके और विकसित हो सके.

AIIMS भोपाल में नई तकनीक की शुरुआत, एक ही मशीन से 230+ बीमारियों की होगी जांच, रिपोर्ट भी फास्ट

भोपाल  एम्स भोपाल में अब मरीजों को जांच के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। अस्पताल के जैव रसायन विभाग में कोबास प्रो एडवांस्ड इंटीग्रेटेड क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्री एनालाइज़र के जरिए जांच प्रक्रिया को और ज्यादा आधुनिक व तेज बना दिया गया है। यह मशीन प्रति घंटे 2,000 से अधिक टेस्ट करने की क्षमता रखती है, जिससे बड़ी संख्या में मरीजों को समय पर और सटीक रिपोर्ट मिल सकेगी। लगभग 3 करोड़ की लागत वाली यह मशीन मध्यप्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल में पहली बार स्थापित की गई है। यह एम्स भोपाल को न सिर्फ प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी तकनीकी रूप से अग्रणी बनाती है। ये सभी जांचें एक ही मशीन से संभव – ब्लड शुगर (डायबिटीज) – लीवर फंक्शन टेस्ट (LFT) -किडनी फंक्शन टेस्ट (RFT) -हार्ट प्रॉफाइल -थायरॉयड और अन्य हार्मोन -विटामिन्स और कैंसर मार्कर्स -यह मशीन 230 से ज्यादा प्रकार की जांचें करने में सक्षम है। तकनीकी दक्षता और भरोसेमंद रिपोर्टिंग कोबास प्रो मशीन एक पूरी तरह से एकीकृत, ऑटोमेटेड जैव रसायन विश्लेषक है जो न सिर्फ तेज़ परिणाम देती है, बल्कि उसकी रिपोर्टिंग में सटीकता भी बनी रहती है। मरीजों को कम समय में भरोसेमंद परिणाम मिलना एम्स भोपाल की स्वास्थ्य सेवाओं को नई ऊंचाई देगा। स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार जांच प्रक्रिया तेज़ और सहज होगी। रिपोर्ट वितरण में काफी तेजी आएगी। मरीजों को कम समय में इलाज की शुरुआत मिल सकेगी। जांच की सटीकता और गति दोनों में बेहद प्रभावशाली जैव रसायन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि कोबास प्रो ई-800 एक पूरी तरह से एकीकृत, अत्याधुनिक क्लिनिकल बायोकेमिस्ट्री एनालाइज़र है। यह मशीन जांच की सटीकता और गति दोनों में बेहद प्रभावशाली है। अब मरीजों को रिपोर्ट के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा और डॉक्टरों को भी समय पर सटीक जानकारी मिलेगी, जिससे इलाज में देरी नहीं होगी।  मरीजों के लिए एक बड़ी राहत डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि एम्स भोपाल में शुरू की गई यह अत्याधुनिक जांच सुविधा मरीजों के लिए एक बड़ी राहत है। इससे जहां जांच की गति बढ़ेगी, वहीं इलाज में भी देरी नहीं होगी। यह पहल न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाएगी, बल्कि सरकारी अस्पतालों की क्षमता और भरोसे को भी मजबूत करेगी।  

एम्स भोपाल में नया हृदय सर्जरी केंद्र, मरीजों के लिए तेज और बेहतर इलाज संभव

भोपाल  अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के हार्ट पेशेंट का इलाज पहले से आधुनिक और त्वरित होने वाला है। हृदय रोगियों, गर्भ में बच्चों का हृदय दोष और ऑपरेशन के लिए 6 एडवांस मशीनें आने वाली है। करीब 22 करोड़ रुपए की लागत से एम्स में एक नया कार्डियक सेटअप तैयार किया जाएगा। साथ ही हाई-टेक बाइप्लेन कार्डियक कैथलैब लगाई जाएगी। इस व्यवस्था से इलाज के लिए ज्यादा समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों का तत्काल इलाज मिल पाएगा। एम्स के उपसंचालक संदेश जैन ने नवभारत टाइम्स डॉट कॉम को बताया कि यह सुविधा कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत प्रारंभ की जाएगी। नवंबर से रोगियों को इस सुविधा का लाभ मिलने की उम्मीद है। एम्स में आएगी ये 6 अत्याधुनिक मशीनें बाई प्लेन कार्डियक कैथलैब यह एक नई लैब है जो एक साथ दो अलग-अलग एंगल से एक्सरे वाली इमेज देती है। इस रिपोर्ट को देखकर डॉक्टर हार्ट और धमनियों का दो तरह का दृश्य देख सकता है। बच्चों में जन्मजात हृदय रोग जटिल ब्लॉकेज, वाल्व रिपेयर, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों के बारे में आसानी से जानकारी लग पाती है। होल्टर मशीन इस मशीन के द्वारा लगातार 24 से 48 घंटे तक हार्टबीट को रिकॉर्ड किया जाता है। इससे हार्ट की धड़कन में अनियमितता जैसी समस्याओं का पता चल जाता है। वर्तमान में इस जांच में मरीजों को दो महीने तक इंतजार करना पड़ता है। आधुनिक ट्रेडमिल एक्सरसाइज मशीन यह मशीन हार्ट और फेफड़ों की क्षमता की जांच करती है। जब किसी रोगी का हार्ट सर्जरी होती है तो उसकी रिकवरी का आकलन किया जाता है। अभी इस जांच के लिए करीब 3 से 4 महीने इंतजार करना पड़ता है। ट्रांस ईसोफेगल इकोकार्डियोग्राफी मशीन इस मशीन के द्वारा हृदय की 2D, 3D और 4D तस्वीर निकाल कर आती हैं। जन्मजात हृदय दोष, हार्ट वाल्व ऑपरेशन के लिए यह बेहद कारगर है। ऑप्टिकल कोहरेंस टोमोग्राफी इस तंत्र के द्वारा धमनियों का 3D दृश्य मिलता है। रक्त का प्रवाह को मापा जाता है। दवा देने के दौरान मरीज को इसका असर होगा या नहीं? इस जांच में आसानी होती है। इंट्रावैस्कुलर अल्ट्रासाउंड तंत्र इस तंत्र के द्वारा धमनियों के अंदर की बहुत ही हाई डेफिनेशन वाली फोटो मिल जाती है। इससे ब्लॉकेज का सही आकलन किया जा सकता है। इस मशीन के द्वारा डॉक्टर अनुमान लगाते हैं कि क्या स्टंट के द्वारा इलाज संभव है या दवा देने जरूरत है। मरीजों की लंबी कतार आपको बता दें कि वर्तमान में भोपाल एम्स में दो कैथलैब हैं। लेकिन यहां मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई बार हार्ट अटैक के पेशेंट को तुरंत इलाज नहीं मिल पाता। 22 करोड़ से मिलने वाली 6 मशीन से मरीज का इंतजार खत्म होगा।वर्तमान में एम्स भोपाल में हर दिन करीब 200 से 300 एंजियोग्राफी, एंजियोप्लास्टी और पेसमेकर जैसी इलाज होते हैं। मशीनों की कमी के चलते मरीजों को इको और कैथलैब प्रोसीजर के लिए ढाई से तीन माह तक इंतजार करना पड़ता है। नई कैथ लैब और मशीनों के जुड़ने से वेटिंग टाइम लगभग आधा रह जाएगा। इसके साथ ही हमीदिया में भी नई कैथलेब शुरू होने दिल के रोगियों को काफी मदद मिलेगी