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दवाओं की ताकत बढ़ाने का ‘सीक्रेट’ मिला, कैंसर उपचार में बड़ी कामयाबी

क्या आपने कभी सोचा है कि बिना किसी बाहरी गर्मी, रोशनी या केमिकल के कोई रासायनिक प्रतिक्रिया अपने आप सेकंडों में पूरी हो सकती है? वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ही अद्भुत और दुर्लभ खोज की है। इस नई खोज ने दवा निर्माण, प्रोटीन विज्ञान और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकास के नए दरवाजे खोल दिए हैं। आइए, इस अहम वैज्ञानिक खोज को डिटेल में समझते हैं। क्या है यह नई रिसर्च? शोधकर्ताओं ने एक पूरी तरह से नई रासायनिक प्रक्रिया की खोज की है, जिसे 'ट्राइसल्फाइड मेटाथेसिस प्रतिक्रिया' नाम दिया गया है। इसके बारे में मशहूर विज्ञान पत्रिका 'नेचर केमिस्ट्री' में प्रकाशित किया गया है। इस प्रतिक्रिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सामान्य कमरे के तापमान पर, बिना किसी बाहरी एजेंट या उत्तेजना (जैसे गर्मी या रोशनी) के अपने आप काम करती है। यह प्रतिक्रिया कुछ ही सेकंडों में पूरी हो जाती है और इसके परिणाम बेहद साफ, सटीक और कुशल होते हैं। सल्फर-सल्फर बांड्स का खेल इस पूरी खोज के केंद्र में 'सल्फर-सल्फर बांड' हैं। ये बांड पेप्टाइड्स, प्रोटीन, दवा के अणुओं और वल्कनाइज्ड रबर जैसे पॉलिमर्स में मौजूद होते हैं। बता दें, ये प्रोटीन को उसकी संरचनात्मक मजबूती और स्थिरता देने के लिए बहुत जरूरी होते हैं। अब तक, बिना किसी बाहरी रसायन या गर्मी के इन बांड्स को अपनी मर्जी से बनाना या तोड़ना बहुत मुश्किल माना जाता था, लेकिन यह नई प्रतिक्रिया इसे स्वचालित रूप से कर सकती है। कैसे हुई यह खोज? इस अनोखी खोज की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया के फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर और यूके के लिवरपूल विश्वविद्यालय के उनके सहयोगी टॉम हैसेल के काम से हुई। उन्होंने शुरुआत में कुछ खास सॉल्वेंट्स में S-S बांड्स के अजीब और हैरान करने वाले व्यवहार पर ध्यान दिया। इसके बाद, उन्होंने एक मॉडल तैयार किया जो यह समझाता है कि ये बांड कैसे टूटते हैं, कैसे फिर से बनते हैं और यह हमारे लिए कैसे उपयोगी हो सकता है। भविष्य के लिए इसके शानदार उपयोग फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस नई प्रतिक्रिया के कई बेहतरीन फायदे बताए हैं, जिनकी मदद से कई क्षेत्रों में क्रांति आ सकती है:     कैंसर की दवाओं में सुधार: चाल्कर लैब के शोधकर्ता हर्षल पटेल के अनुसार, इस प्रतिक्रिया का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कैंसर रोधी दवाओं और दवाइयों की खोज से जुड़े केमिकल को संशोधित करने के लिए किया गया है।     रीसायकल होने वाला प्लास्टिक: इस तकनीक से ऐसे नए और बेहतरीन प्लास्टिक बनाए जा सकते हैं जिन्हें आसानी से आकार दिया जा सकता है, इस्तेमाल किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर रीसायकल करने के लिए तोड़ा जा सकता है। दवा और विज्ञान में तेज विकास: प्राकृतिक उत्पादों और दवाओं के अणुओं को बदलने में यह बेहद काम आ रही है। इसके उच्च प्रतिक्रिया दर की वजह से चिकित्सा से जुड़े यौगिकों को तेजी से तैयार किया जा सकता है। फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर जस्टिन चाल्कर के शब्दों में कहें तो, किसी पूरी तरह से नई प्रतिक्रिया की खोज होना अपने आप में बहुत दुर्लभ है। और यह उससे भी ज्यादा दुर्लभ है कि एक ही खोज इतने सारे अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो। शोधकर्ताओं की टीम इस बात को लेकर बेहद उत्साहित है कि आने वाले समय में इस रसायन विज्ञान को उन तरीकों से भी इस्तेमाल किया जाएगा, जिनकी अभी हमने कल्पना भी नहीं की है।  

अंतरिक्ष स्टेशन पर खोजा गया कैंसर का नया इलाज, पेम्ब्रोलिजुमाब का इंजेक्शन बनेगा क्रांतिकारी

 नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर की गई वैज्ञानिक रिसर्च ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है. नासा और दवा कंपनी मर्क की टीम ने मिलकर स्पेस में प्रोटीन क्रिस्टल ग्रोथ की स्टडी की, जिससे कैंसर की एक प्रमुख दवा का नया रूप विकसित हुआ. अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने सितंबर 2025 में इस नए इंजेक्शन को मंजूरी दे दी है. अब मरीजों को 2 घंटे लंबी इन्फ्यूजन की जगह सिर्फ 1-2 मिनट का इंजेक्शन लगेगा. यह खबर कैंसर मरीजों के लिए राहत भरी है, क्योंकि इलाज आसान, तेज और सस्ता हो गया है. क्या है यह नया इलाज? यह नया इलाज कंपनी मर्क की दवा पेम्ब्रोलिजुमाब (Pembrolizumab) का सबक्यूटेनियस इंजेक्शन रूप है. यह दवा इम्यूनोथेरेपी की श्रेणी में आती है. कुछ खास तरह के कैंसर (जैसे मेलानोमा, लंग कैंसर आदि) के इलाज में इस्तेमाल होती है. पहले यह दवा कैसे दी जाती थी?     मरीज को अस्पताल या क्लिनिक जाना पड़ता था.     नस में इन्फ्यूजन (IV ड्रिप) से दवा दी जाती थी.     इसमें 1-2 घंटे लगते थे.     बाद में इसे 30 मिनट तक कम किया गया था. अब नया तरीका     त्वचा के नीचे (सबक्यूटेनियस) सिर्फ एक इंजेक्शन.     लगाने में 1 से 2 मिनट लगते हैं.     हर तीन हफ्ते में एक बार.     मरीज का समय बचता है. अस्पताल का खर्च कम होता है. जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है. स्पेस स्टेशन की रिसर्च ने कैसे मदद की? अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) बहुत कम होता है – इसे माइक्रोग्रेविटी कहते हैं. पृथ्वी पर ग्रेविटी की वजह से क्रिस्टल बनाते समय कई समस्याएं आती हैं, जैसे क्रिस्टल छोटे, असमान या कम गुणवत्ता वाले बनते हैं. लेकिन स्पेस में…     क्रिस्टल बड़े, एकसमान और ज्यादा परफेक्ट बनते हैं.     इससे वैज्ञानिक दवा के अणुओं की संरचना को बेहतर समझ पाते हैं. मर्क कंपनी 2014 से ISS पर प्रयोग कर रही है. उन्होंने मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (लैब में बनी प्रोटीन जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है) के क्रिस्टल स्पेस में उगाए. इन क्रिस्टल से पता चला कि दवा के कणों का सबसे अच्छा आकार और संरचना क्या होनी चाहिए, ताकि वे आसानी से घुलकर इंजेक्शन के रूप में दिए जा सकें. यह रिसर्च ISS नेशनल लेबोरेटरी के सपोर्ट से हुई. नासा स्पेस स्टेशन को निजी कंपनियों और वैज्ञानिकों के लिए खुला रखता है, ताकि माइक्रोग्रेविटी का फायदा उठाकर नई खोजें हों. स्पेस रिसर्च के फायदे क्या हैं?     पृथ्वी पर दवाओं का विकास तेज और बेहतर होता है.     कैंसर जैसे जटिल रोगों का इलाज आसान बनता है.     अंतरिक्ष यात्री के लिए लंबी स्पेस मिशन (चंद्रमा और मंगल) की तैयारी भी होती है.     कॉमर्शियल स्पेस इकोनॉमी बढ़ती है – निजी कंपनियां स्पेस में निवेश करती हैं. नासा का कहना है कि स्पेस स्टेशन पर किया गया काम न सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत सुधारता है, बल्कि पृथ्वी पर लाखों लोगों की जिंदगी बेहतर बनाता है. यह उदाहरण दिखाता है कि अंतरिक्ष की खोजें कैसे आम लोगों तक पहुंच रही हैं. भविष्य में स्पेस रिसर्च से और भी कई नई दवाएं और इलाज सामने आ सकते हैं. कैंसर मरीजों के लिए यह नया इंजेक्शन एक बड़ी उम्मीद है.  

कैंसर मरीजों को बड़ी राहत, अब जीन थेरेपी से बदलेगा इलाज का तरीका

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने कैंसर मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने जीन थेरेपी के क्षेत्र में अग्रणी कंपनी इम्यूनोएक्ट को फंडिंग प्रदान की है, ताकि जीन वितरण प्रणाली को मजबूत किया जा सके। इससे कैंसर का इलाज सस्ता और सुलभ हो सकेगा। चिमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी-सेल (सीएआर-टी) थेरेपी कैंसर के इलाज में क्रांतिकारी सफलता के रूप में सामने आई है, जो मरीज की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग करके कुछ प्रकार के कैंसर से लड़ती है। विश्व स्तर पर किए गए क्लीनिकल ट्रायल्स में अंतिम चरण के मरीजों, विशेष रूप से एक्यूट लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया से पीड़ितों में यह थेरेपी आशाजनक परिणाम दिखा चुकी है। आईआईटी बॉम्बे की स्पिन-ऑफ कंपनी इम्यूनोएक्ट ने दुनिया की पहली मानवीकृत सीएआर-टी थेरेपी 'नेक्सकार19' को बाजार में उतारा है। आधिकारिक बयान में क्या कहा गया? एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि बायोई3 नीति के तहत जैव विनिर्माण पहल के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने उत्पादन बढ़ाने और इस नई चिकित्सीय पद्धति को अधिक किफायती बनाने के लिए इम्यूनोएक्ट को वित्त पोषण दिया है। इसके तहत 200एल जीएमपी लेंटिवायरल वेक्टर और प्लास्मिड प्लेटफॉर्म स्थापित किया जाएगा। बयान में कहा गया कि लेंटिवायरल वेक्टर और प्लास्मिड प्लेटफॉर्म में उन्नत बायोरिएक्टर प्रौद्योगिकियां शामिल की जाएंगी, जो उच्च घनत्व वाली कोशिका वृद्धि और निरंतर उत्पादन को आसान बनाएंगी। इससे लेंटिवायरल वेक्टरों की उच्च पैदावार और बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित होगा। आगे बताया गया कि जीएमपी ग्रेड जीन डिलीवरी वेक्टर प्रति वर्ष कम से कम 1,000 मरीजों को कोशिका और जीन थेरेपी की सुविधा प्रदान कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उभरते विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी) में क्यूएसआईपी क्वांटम सुरक्षा चिप और 25-क्यूबिट क्यूपीयू (भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप) के साथ भारत के तीन प्रमुख नवाचारों में सीएआर-टी सेल थेरेपी को शामिल किया। बयान में जोर दिया गया कि भारत की पहली जीवित दवा 'नेक्सकार19' ने वैज्ञानिक कठोरता या मरीज सुरक्षा से समझौता किए बिना जीन थेरेपी को सस्ती और सुलभ बना दिया है।