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जामा मस्जिद के पास अवैध निर्माण पर कोर्ट का स्टे खत्म, कार्रवाई जल्द

संभल यूपी के संभल में कब्रिस्तान की जमीन पर अवैध रूप से बनी दुकानों और मकानों को हटाने का रास्ता लगभग साफ हो गया है. प्रशासन की टीम ने बीते दिनों पैमाइश की थी. इसके बाद संभल सिविल कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई पर स्टे लगा दिया था. उसे अब सिविल कोर्ट ने खारिज कर दिया है. इसी के साथ अब तहसीलदार कोर्ट से अवैध निर्माण को हटाने का अंतिम आदेश जारी होगा, जिसके बाद प्रशासन जल्द कब्जा हटाने की कार्रवाई कर सकता है. दरअसल, संभल की जामा मस्जिद के बराबर में स्थित कब्रिस्तान की भूमि पर कब्जा किए जाने की शिकायत एडवोकेट सुभाष चंद्र त्यागी ने डीएम को पत्र देकर की थी. इसके बाद प्रशासन ने दो दर्जन से अधिक राजस्व कर्मियों की टीम बनाकर 30 दिसंबर 2025 को उस जमीन पर बने मकानों और दुकानों की पैमाइश की थी. इस दौरान कब्रिस्तान की भूमि पर अवैध तरीके से कब्जा होने की बात सामने आई थी. इसके बाद तहसीलदार कोर्ट ने कब्जा करने वालों को नोटिस कर जवाब मांगा था, लेकिन कब्जेदारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. मगर हाई कोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिली. हाई कोर्ट ने कब्जा करने वालों को तहसीलदार के सामने अपना पक्ष रखने को कहा था. इसके बाद जनवरी में 18 में से 15 लोगों ने संभल सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें प्रदेश सरकार की तरफ से डीएम व तहसीलदार, नगर पालिका के अधिकारी, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल बैंक बोर्ड के सीओ को प्रतिवादी बनाया गया था. सिविल कोर्ट में याचिका दायर करने वालों में शामिल 15 लोगों में से चार लोगों ने याचिका वापस ले ली थी. इसके बाद सिविल जज ललित कुमार ने फरवरी में मामले में सुनवाई पूरी होने तक प्रशासनिक कार्रवाई पर स्टे लगा दिया था. मार्च में अलग-अलग तारीख पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 27 मार्च को आदेश रिजर्व कर लिया था. वहीं अब 10 अप्रैल को सिविल कोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई पर लगाए गए स्टे को हटा लिया है. इसी के साथ अब जामा मस्जिद के बराबर में स्थित कब्रिस्तान की भूमि पर बनीं 18 दुकानें और मकानों के अवैध निर्माण को हटाने का रास्ता साफ हो चुका है. एडवोकेट नलिन जैन का कहना है कि सिविल जज ललित कुमार ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद आदेश रिजर्व कर लिया था . कब्जा करने वालों ने संभल कोर्ट को भ्रमित करते हुए जो स्टे ले लिया था, उसको निरस्त कर दिया गया है. कब्रिस्तान पर अब कोई स्टे नहीं है.

अतिक्रमण के कारण रोक: गोविंदपुरा-मंडीदीप-पीथमपुर में 6000 एकड़ औद्योगिक जमीन पर कब्जा, निवेश रुके हुए

इंदौर /भोपाल  मप्र में कागजों पर उद्योगों के लिए डेढ़ लाख एकड़ जमीन उपलब्ध है लेकिन हकीकत उलट है। प्रदेशभर के औद्योगिक क्षेत्रों की 5-6 हजार एकड़ जमीन अवैध कब्जों से घिरी है। इनमें अवैध कॉलोनियां, गोदाम और व्यावसायिक कब्जे शामिल हैं। नए उद्योगों के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही है। इसे मुक्त करा लिया जाए तो 90 हजार लोगों को रोजगार मिल सकता है, वहीं, 4 से 5 हजार करोड़ निवेश भी आ सकता है। लेकिन, राजनीतिक दखल के चलते ये प्रयास सफल नहीं हो पा रहे। भोपाल में 700 एकड़ में फैले गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र में 180 एकड़ से अधिक अतिक्रमण है। 141 एकड़ जमीन का विवाद एक बिल्डर समूह से हाई कोर्ट में सालों से लंबित है तो 10-15 एकड़ क्षेत्र में 3 झुग्गी बस्तियां बसी हुई हैं। ​पीथमपुर में ही 50 एकड़ जमीन मुक्त कराई गई है। इधर, मप्र औद्योगिक विकास निगम के एमडी चंद्रमौलि शुक्ला कहते हैं, भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के औद्योगिक क्षेत्रों में महिला हॉस्टल बन रहे हैं। अवैध कॉलोनियों और झुग्गियों में रह रही महिला श्रमिकों को इनमें बसाया जाएगा। प्रति एकड़ निवेश टेक्सटाइल में एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ से लेकर फार्मा में 6 करोड़ तक निवेश आता है। मल्टी स्टोरी क्लस्टर में 10-12 करोड़ तक है। वहीं, प्रति एकड़ निवेश पर अलग-अलग सेक्टर में 20 से 150 लोगों को नौकरियां मिलती हैं। 15 साल बाद प्रस्ताव पर पहल मंडीदीप इंडस्ट्री एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजीव अग्रवाल ने कहा, 15 साल पहले हमने पास में खाली पड़ी सरकारी जमीन पर इंडस्ट्रियल टाउनशिप बनाने का प्रस्ताव दिया था ताकि कब्जे न हों और श्रमिकों को आवास मिलें। अब ये पहल हुई है। श्रमिकों के आवास बनेंगे पीएम आवास योजना के तहत निजी बिल्डरों की मदद से औद्योगिक क्षेत्रों के पास श्रमिकों के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट और रेंटल प्रोजेक्ट के तहत आवास बनेंगे। -संकेत भोंडवे, आयुक्त नगरीय विकास एवं आवास किस तरह के अतिक्रमण…     40% गुमठियां, पार्किंग     35% झुग्गी बस्तियां     25% भूखंड धारकों के अवैध निर्माण  

अवैध कब्जों पर हाईकोर्ट की फटकार- ‘कमेटी नहीं, कार्रवाई बताइए’

रांची. झारखंड में जमीन पर अवैध कब्जा और फर्जी खरीद-बिक्री के मामलों पर अदालत का रुख और कड़ा हो गया है। झारखंड हाई कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से साफ शब्दों में कहा कि “कमेटी पर कमेटी बनाने का कोई औचित्य नहीं, जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए।” अदालत ने मुख्य सचिव से स्पष्ट जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 अप्रैल को होगी। सीएनटी लागू होने के बाद भी भूमाफिया पर कार्रवाई नहीं होने से कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की। SOP बनी नहीं, समीक्षा किस बात की? चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब अवैध कब्जे रोकने के लिए एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) अभी तक बनी ही नहीं, तो उसकी समीक्षा के लिए नई कमेटी बनाने का क्या मतलब है? पूर्व में गठित पांच सदस्यीय कमेटी ने नए कानून की जरूरत से इनकार करते हुए कहा था कि राज्य में पहले से ही सीएनटी और एसपीटी एक्ट लागू हैं। जरूरत सख्त अमल और स्पष्ट एसओपी की है। बावजूद इसके सरकार की ओर से एक और कमेटी गठित करने की बात अदालत को रास नहीं आई। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की जमीन पर कब्जे की कोशिश मामला तब और गंभीर हो गया जब सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस इकबाल की जमीन पर कब्जे की कोशिश सामने आई। इसके बाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर सरकार से जवाब तलब किया। न्याय मित्र अतनु बनर्जी ने अदालत में पक्ष रखा और राज्य में दखल-दिहानी, फर्जी रजिस्ट्री व अवैध कब्जों पर सख्त कार्रवाई की मांग दोहराई। RIMS जमीन बिक्री कांड: ACB के नोटिस से मची खलबली इधर, रांची में बहुचर्चित RIMS जमीन बिक्री मामले में जांच कर रही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने बड़गाईं अंचल के वर्तमान व तत्कालीन सीओ, अंचल कर्मियों, स्थानीय अमीन, राजस्व कर्मचारियों और कथित जमीन दलालों को नोटिस भेजा है। सभी से पूछताछ की तैयारी है। जांच में प्रारंभिक तौर पर सामने आया है कि वर्ष 1993 के बाद से अधिग्रहित जमीन पर अवैध कब्जे और गलत रजिस्ट्री के प्रमाण मिले हैं। रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद दाखिल-खारिज और निबंधन किए जाने में लापरवाही व संभावित मिलीभगत की बात जांच में उभरकर आई है। गौरतलब है कि यह जांच हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई थी। क्या होगा आगे? मुख्य सचिव से कोर्ट में विस्तृत जवाब एसओपी पर स्पष्ट टाइमलाइन ACB की पूछताछ के बाद संभावित एफआईआर/चार्जशीट अवैध रजिस्ट्री रद्द करने और कब्जा हटाने की कार्रवाई झारखंड में जमीन से जुड़े घोटालों और अवैध कब्जों पर अब कानूनी शिकंजा कसता दिख रहा है। अदालत के सख्त तेवर और एसीबी की सक्रियता से आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासे संभव हैं।