samacharsecretary.com

सोशल मीडिया पर अश्लीलता फैलाने वालों की खैर नहीं, पंजाब सरकार सख्त कार्रवाई के मूड में

 चंडीगढ़ पंजाब में अब सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने की आजादी कानून के दायरे में कसकर तौली जाएगी।  इंस्टाग्राम रील, फेसबुक पोस्ट, यूट्यूब वीडियो या अन्य प्लेटफॉर्म पर अश्लील, भड़काऊ और गैरकानूनी कंटेंट डाल वायरल होने की चाह अब जेल पहुंचा देगी। ऐसा करने वालों के खिलाफ पंजाब पुलिस ने बड़ा अभियान शुरू करने का फैसला लिया है। पंजाब के डीजीपी ने राज्यभर के सभी पुलिस कमिश्नरों और एसएसपी को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि आपत्तिजनक कंटेंट पोस्ट, शेयर या प्रसारित करने वालों पर तुरंत एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए। यह आदेश पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद जारी किया गया है। हाईकोर्ट ने निर्णय लेने को कहा था पीपुल वेलफेयर सोसायटी की ओर से एडवोकेट कुंवर पाहुल सिंह के माध्यम से दाखिल प्रतिनिधित्व में कहा गया था कि सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ रहा अश्लील और अवैध कंटेंट समाज, सार्वजनिक व्यवस्था और महिलाओं की गरिमा को प्रभावित कर रहा है। हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल को राज्य सरकार और पुलिस को इस मुद्दे पर त्वरित निर्णय लेने को कहा था। डीजीपी कार्यालय ने कहा कि सोशल मीडिया की निगरानी होगी। जो भी अश्लील, अपमानजनक या कानून विरोधी सामग्री तैयार करेगा, अपलोड करेगा या वायरल करेगा, उसके खिलाफ तुरंत केस दर्ज किया जाएगा। साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन अब सिर्फ शिकायत का इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि खुद ऐसे कंटेंट की पहचान कर उसका डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित करेंगे। इसके बाद संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिये कंटेंट हटाने या ब्लॉक कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। पंजाब पुलिस ने विशेष रूप से उन पोस्ट और वीडियो पर नजर रखने को कहा है जो हिंसा भड़का सकते हैं, सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकते हैं या महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। इतना ही नहीं, संभावित उपद्रवियों के खिलाफ पहले से निवारक कार्रवाई करने के भी निर्देश दिए गए हैं। डीजीपी ने सभी जिलों को सोशल मीडिया के दुरुपयोग के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश भी दिए हैं।  

कोर्ट की अहम टिप्पणी: AI आधारित जानकारी पर फैसले नहीं, पंजाब हाईकोर्ट ने दिए निर्देश

चंडीगढ़. पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने न्यायिक अधिकारियों से कहा है कि वे फैसले लिखने और कानूनी शोध करने के लिए चैटजीपीटी, जेमिनी और कोपायलट जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) उपकरणों का उपयोग न करें । पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को सोमवार (6 अप्रैल, 2026) को उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार-जनरल द्वारा जारी एक पत्र में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश ने उनसे कहा है कि वे अपने अधीन कार्यरत न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दें कि वे निर्णय लिखने और कानूनी शोध के लिए चैटजीपीटी, जेमिनी, कोपायलट, मेटा इत्यादि सहित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) उपकरणों का उपयोग न करें। इन निर्देशों का उल्लंघन गंभीर रूप से देखा जाएगा। इससे पहले, गुजरात उच्च न्यायालय ने किसी भी प्रकार के निर्णय लेने, न्यायिक तर्क, आदेश तैयार करने, निर्णय तैयार करने, जमानत संबंधी सजा पर विचार करने या किसी भी महत्वपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग पर रोक लगा दी थी । शनिवार (4 अप्रैल, 2026) को जिला न्यायिक न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में अनावरण की गई गुजरात उच्च न्यायालय की एआई नीति के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग न्यायिक तर्क के प्रतिस्थापन के रूप में नहीं, बल्कि न्याय वितरण की गति और गुणवत्ता में सुधार के लिए किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि चीफ जस्टिस ने विनती की है कि अपने अधीन काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों को यह आदेश दिया जाए कि वह फैसले लिखने और कानूनी खोज के लिए Chat GPT, Gemini, Copilot, Meta आदि सहित किसी भी AI टूल्स का इस्तेमाल न करें। इन आदेशों का उल्लंघन गंभीरता से लिया जाएगा।  

‘झाड़ू लगाते बीती जिंदगी, लेकिन नौकरी आज भी अस्थायी’ पर हाईकोर्ट सख्त

चंडीगढ़. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 40 वर्षों से पार्ट टाइम सफाईकर्मी के रूप में सेवा दे रहे कर्मचारी के साथ हरियाणा सरकार के रवैये पर तीखा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक काम लेने के बाद भी कर्मचारी के नियमितीकरण से इनकार करना संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1986 से लगातार सेवाएं दे रहे करनाल निवासी बीर सिंह उर्फ भीरा को आज भी अस्थायी बनाए रखना राज्य द्वारा किया गया संस्थागत शोषण है, जिसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस संदीप मोद्गिल ने कहा कि राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह एक मॉडल एंप्लायर की तरह व्यवहार करे, लेकिन तकनीकी वर्गीकरण का सहारा लेकर दशकों तक श्रम लेने के बाद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना इस अवधारणा को ही खोखला कर देता है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सेवा लेने के बाद कर्मचारी को अनियमित बनाए रखना न्याय और निष्पक्षता की बुनियादी भावना पर चोट है। अदालत के समक्ष यह भी आया कि याचिकाकर्ता का सेवा रिकार्ड पूरी तरह निष्कलंक रहा है और उसकी ईमानदारी या कार्यकुशलता पर कभी सवाल नहीं उठा। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा किया गया कार्य न तो अस्थायी प्रकृति का है और न ही कभी-कभार किया जाने वाला काम है, बल्कि संस्थान के दैनिक संचालन के लिए अनिवार्य और स्थायी काम वह कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारी को वर्षों तक अस्थायी बनाए रखना समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान केवल औपचारिक समानता की बात नहीं करता, बल्कि वह गरिमा, आजीविका और सामाजिक न्याय की ठोस गारंटी देता है। प्रस्तावना में निहित समाजवादी गणराज्य की भावना तब निरर्थक हो जाती है, जब प्रशासनिक ढांचे के सबसे निचले पायदान पर काम करने वालों को जीवन भर की सेवा के बाद भी सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही याचिकाकर्ता को नाममात्र का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कहा गया हो, लेकिन उसके द्वारा किया श्रम सार्वजनिक संस्थानों के सुचारू संचालन की रीढ़ है।