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अफीम और गांजे पर पुलिस का बड़ा प्रहार, राजस्थान में 5860 पौधे नष्ट और 7 गिरफ्तार

जयपुर राजस्थान पुलिस की एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (एएनटीएफ) ने नशे के खिलाफ अभियान को तेज करते हुए एक ही दिन में राज्य के सात जिलों में 7 बड़ी कार्रवाइयां की हैं. इस अभियान में 5860 अफीम के पौधे नष्ट किए गए, 85 किलोग्राम अवैध डोडा पोस्त और लगभग 15 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया. कुल 7 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें गुजरात पुलिस का वांछित अपराधी भी शामिल है. इन जिलों में हुई कार्रवाई राजसमंद (खमनोर थाना): ऑपरेशन गांजाजुली के तहत 5860 अफीम के पौधे नष्ट किए गए. 12.130 किलोग्राम गांजा बरामद कर 1 आरोपी गिरफ्तार.     बाड़मेर (सदर थाना): 76.108 किलोग्राम डोडा पोस्त बरामद, 1 आरोपी गिरफ्तार.     बाड़मेर (गुढ़ामलानी थाना): 7.960 किलोग्राम डोडा-चूरा बरामद.     कोटा (कुन्हाड़ी थाना): 1.750 किलोग्राम गांजा बरामद, 1 आरोपी गिरफ्तार.     कोटा (नयापुरा थाना): 432.984 ग्राम गांजा बरामद, 1 आरोपी गिरफ्तार.     जयपुर (पत्रकार कॉलोनी थाना): 16.20 ग्राम गांजा, 154 ग्राम डोडा पोस्त पाउडर और 2780 रुपये नकद बरामद, 1 आरोपी गिरफ्तार. प्रतापगढ़: गुजरात पुलिस का वांछित अपराधी गिरफ्तार. पुलिस का दावा एएनटीएफ की इन सातों कार्रवाइयों से नशे के तस्करों पर बड़ा प्रहार हुआ है. पुलिस का कहना है कि नशे के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा और किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

डेढ़ साल से फरार नकल गिरोह का मुख्य आरोपी चढ़ा पुलिस के हत्थे, हाई कोर्ट एलडीसी और ईओ-आरओ भर्ती में की थी धांधली

जयपुर राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान दल (एसओजी) ने दो सार्वजनिक परीक्षाओं में ब्लूटूथ् डिवाइस से नकल करने का आरोपी राजेश कुमार रेवाड़ को गिरफ्तार कर लिया है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एसओजी) विशाल बंसल ने शनिवार को बताया कि इस मामले में आरोपी राजेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया है। बंसल ने बताया कि राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा लिपिक ग्रेड द्वितीय के पदों पर सीधी भर्ती के लिए संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा 2022, 12 मार्च एवं 19 मार्च 2023 को आयोजित की गई थी और संगठित नकल गिरोह के मुख्य अभियुक्त राजेश कुमार निवासी रुखासर रतनगढ चुरु का परीक्षा 19 मार्च को परीक्षा केंद्र नेहरु ज्योति सीनीयर सेकेंडरी स्कूल जयपुर था। प्रश्न पत्र के उत्तरों की नकल करवाई गिरोह के मुख्य अभियुक्त पौरव कालेर द्वारा सालासर से मोबाइल फोन से राजेश कुमार को परीक्षा केंद्र में ब्लूटूथ डिवाइस के माध्यम से प्रश्न पत्र के उत्तरों की नकल करवाई थी। राजस्व अधिकारी ग्रेड द्वितीय एवं अधिशाषी अधिकारी (ईओ एवं आरओ) वर्ग चतुर्थ (स्वायत शासन विभाग ) प्रतियोगी परीक्षा वर्ष 2022 में भी राजेश कुमार वांछित है। ब्लूटूथ डिवाइस के माध्यम से नकल यह परीक्षा 14 मई को आयोजित की गई थी और इसमें भी ब्लूटूथ डिवाइस के माध्यम से नकल की थी। इन दोनों मामलों में राजेश कमार डेढ़ वर्ष से फरार चल रहा था और इसकी गिरफ्तारी के लिए एसओजी जयपुर द्वार 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित किया हुआ था।

मदद के नाम पर खाली हो सकता है आपका बैंक खाता, ‘एक कॉल’ वाले इस नए साइबर फ्रॉड से ऐसे बचें

जयपुर भीड़भाड़ वाले बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या किसी पार्क में अगर कोई घबराया हुआ शख्स आपसे कहे भाई साहब, एक जरूरी कॉल करनी है” तो जरा ठहर जाइए। यह मासूम सी लगने वाली गुजारिश अब एक खतरनाक साइबर साजिश का हिस्सा बन चुकी है। राजस्थान में तेजी से फैल रहे इस नए फ्रॉड ने पुलिस और आम लोगों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। राजस्थान पुलिस की साइबर क्राइम शाखा ने इस खतरे को लेकर अलर्ट जारी किया है। पुलिस के मुताबिक, साइबर ठग अब सीधे डिजिटल फ्रॉड करने के बजाय लोगों की भावनाओं और इंसानियत को निशाना बना रहे हैं। “एक कॉल” का बहाना बनाकर वे कुछ ही सेकंड में ऐसा खेल कर जाते हैं कि पीड़ित को देर तक पता ही नहीं चलता कि उसके साथ क्या हो गया। कैसे रचते हैं ठगी का जाल? डीआईजी साइबर क्राइम शांतनु कुमार सिंह के अनुसार, ठग पहले सार्वजनिक जगहों पर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो जल्दी मदद करने को तैयार दिखें। फिर वे इमरजेंसी का हवाला देकर मोबाइल मांगते हैं कभी कहते हैं बैटरी खत्म हो गई, कभी किसी परिजन की तबीयत खराब होने की बात करते हैं। जैसे ही मोबाइल उनके हाथ में आता है, वे तेजी से एक खास कोड डायल करते हैं। यही वह पल होता है, जब खेल शुरू हो जाता है। इस कोड के जरिए कॉल फॉरवर्डिंग एक्टिव कर दी जाती है, जिससे आपके फोन पर आने वाले ओटीपी सीधे ठग के नंबर पर पहुंचने लगते हैं। इसके बाद ठग को आपके बैंक खाते, यूपीआई ऐप, सोशल मीडिया या व्हाट्सएप तक पहुंच बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता। वह आराम से पासवर्ड रीसेट करता है और खाते से पैसे साफ कर देता है और आपको भनक तक नहीं लगती। स्पाइवेयर का भी खतरा मामला यहीं खत्म नहीं होता। कई मामलों में ठग आपके फोन में चुपके से स्पाइवेयर या की-लॉगर इंस्टॉल कर देते हैं। ये ऐसे खतरनाक टूल होते हैं जो आपके हर टाइप किए गए शब्द, पासवर्ड, बैंक डिटेल और निजी बातचीत को रिकॉर्ड कर लेते हैं। यानि, एक बार फोन हाथ में देने के बाद आपकी पूरी डिजिटल जिंदगी किसी अनजान व्यक्ति के नियंत्रण में जा सकती है। रिश्तों का भी कर सकते हैं दुरुपयोग साइबर अपराधी यहीं नहीं रुकते। वे आपके कॉन्टैक्ट्स चुरा लेते हैं और फिर आपके परिवार या दोस्तों को मैसेज या कॉल कर “इमरजेंसी” का ड्रामा रचते हैं। “मैं मुसीबत में हूं, तुरंत पैसे भेजो” ऐसे मैसेज भेजकर वे आपके करीबी लोगों से भी पैसे ठग लेते हैं। कानूनी झंझट में भी फंस सकते हैं आप इस पूरे खेल का एक और खतरनाक पहलू है। अगर कोई ठग आपके फोन से किसी गैरकानूनी गतिविधि के लिए कॉल करता है, तो जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड में आपका नंबर सामने आएगा। ऐसे में आप बिना गलती के भी पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकते हैं। कैसे बचें इस ‘एक कॉल’ के जाल से? राजस्थान पुलिस ने लोगों से अपील की है कि मदद जरूर करें, लेकिन सतर्कता के साथ। अगर कोई कॉल करने के लिए कहता है, तो फोन खुद अपने हाथ में रखें, नंबर खुद डायल करें और स्पीकर पर बात कराएं। किसी भी अनजान व्यक्ति को अनलॉक मोबाइल देना खतरनाक हो सकता है। अगर गलती से आपने फोन दे दिया है, तो तुरंत अपने मोबाइल में *#21# डायल कर कॉल फॉरवर्डिंग चेक करें और ##002# डायल कर उसे बंद कर दें। साथ ही अपने सभी पेमेंट ऐप्स पर मजबूत पिन और बायोमेट्रिक लॉक जरूर लगाएं। शिकायत कहां करें? अगर आप या आपका कोई परिचित इस तरह की ठगी का शिकार हो जाता है, तो तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें या आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। समय पर कार्रवाई से नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर अंतरराष्ट्रीय IVR कॉल से ठगी, राजस्थान पुलिस ने लोगों को किया अलर्ट

जयपुर राजस्थान पुलिस ने प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए आम लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। साइबर अपराधियों ने ठगी का नया तरीका अपनाया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय आईवीआर कॉल के जरिए लोगों को डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर ठगा जा रहा है। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक वीके सिंह के निर्देश पर साइबर अपराध प्रकोष्ठ द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। इसी दौरान साइबर क्राइम थ्रेट एनालिटिक्स यूनिट ने इस खतरनाक ट्रेंड का खुलासा किया है। एसपी साइबर क्राइम शांतनु कुमार सिंह के अनुसार अपराधी सबसे पहले विदेशी नंबरों से ऑटोमेटेड आईवीआर कॉल करते हैं। फोन उठाने पर रिकॉर्डेड आवाज खुद को पुलिस, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण, फेडएक्स या दूरसंचार विभाग का अधिकारी बताती है। इसके बाद पीड़ित को बताया जाता है कि उसके मोबाइल नंबर या उसके नाम से भेजा गया कोई पार्सल अवैध गतिविधि में पकड़ा गया है। अपराधी गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पीड़ित को मानसिक दबाव में लेते हैं और डिजिटल अरेस्ट का नाटक करते हैं। डर के माहौल में वे बैंक डिटेल्स, ओटीपी या सीधे पैसे ट्रांसफर करवाकर ठगी कर लेते हैं। इन नंबरों से रहें सावधान जांच में सामने आया है कि अपराधी अपनी पहचान छिपाने के लिए सैटेलाइट और विदेशी नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेष रूप से इनमारसैट (+870) सैटेलाइट नेटवर्क का दुरुपयोग ज्यादा देखा गया है। इसके अलावा पाकिस्तान (+92), बांग्लादेश (+880), नेपाल (+977), अफगानिस्तान (+93), दक्षिण कोरिया (+82), ईरान (+98), कंबोडिया (+855), सऊदी अरब (+966), संयुक्त अरब अमीरात (+971), यूनाइटेड किंगडम (+44), ऑस्ट्रेलिया (+61) सहित कई देशों के कोड से आने वाली कॉल संदिग्ध हो सकती हैं। क्या करें नागरिक पुलिस ने लोगों से अपील की है कि अनजान अंतरराष्ट्रीय नंबर से आने वाली कॉल को तुरंत काट दें और इसकी सूचना संचार साथी पोर्टल या ऐप पर दें। किसी भी अनजान व्यक्ति को अपनी निजी या बैंक संबंधी जानकारी साझा न करें। यदि कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार होता है तो तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें। इसके अलावा राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल https://cybercrime.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत भी दर्ज कराई जा सकती है।

राजस्थान पुलिस ने लिया कड़ा कदम, अपराधियों की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करने पर रोक

 जयपुर  राजस्थान पुलिस ने गिरफ्तार किए गए आरोपियों की निजता और उनके मानवीय अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस (अपराध शाखा), डॉ. हवा सिंह घुमरिया ने एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करते हुए प्रदेश के सभी पुलिस कमिश्नर और जिला पुलिस अधीक्षकों को सख्त निर्देश दिए हैं कि किसी भी अभियुक्त की फोटो या वीडियो अब सार्वजनिक नहीं करेंगे। यह निर्णय राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर द्वारा  दिए गए एक आदेश की अनुपालना में लिया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। पुलिस के अनुसार, "अभियुक्त केवल आरोपित होता है, दोषी नहीं", इसलिए गिरफ्तारी के बाद उसकी निजता को भंग करना कानून सम्मत नहीं है। नए दिशा-निर्देशों की मुख्य बातें : सोशल मीडिया पर पाबंदी : पुलिस अब किसी भी आरोपी की फोटो या वीडियो अपने आधिकारिक या अनौपचारिक सोशल मीडिया हैंडल पर अपलोड नहीं कर सकेगी। मीडिया ट्रायल पर रोक : प्रेस ब्रीफिंग के दौरान आरोपी को अपमानजनक स्थिति में पेश नहीं किया जाएगा। पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसी किसी भी गतिविधि को बढ़ावा न दें जिससे 'मीडिया ट्रायल' की स्थिति पैदा हो। मर्यादित शब्दावली : पुलिस ब्रीफिंग के दौरान अभियुक्तों के लिए उपयोग किए जाने वाले शब्दों में गरिमा और सावधानी बरतनी होगी। विशेष संवेदनशीलता : महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्ग के आरोपितों के साथ व्यवहार के दौरान विशेष संवेदनशीलता रखने के निर्देश दिए गए हैं। सुरक्षित हिरासत और सभ्य व्यवहार SOP में यह भी कहा गया है कि अभियुक्त को बैठाने, ले जाने और हिरासत में रखने की व्यवस्था सुरक्षित और सभ्य होनी चाहिए। पुलिस अब किसी भी आरोपी को सार्वजनिक रूप से अपमानित या अपराधी की तरह प्रदर्शित नहीं कर पाएगी। यह आदेश तत्काल प्रभाव से पूरे राजस्थान में लागू कर दिया गया है। इसकी प्रतियां महानिदेशक पुलिस (DGP) सहित सभी महत्वपूर्ण विभागों को भेज दी गई हैं ताकि इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

जब भ्रम टूटा और सच्चाई जीती: राजस्थान पुलिस ने कायम की भरोसे की मिसाल

जयपुर राजस्थान की वीर धरा पर 'खाकी' केवल एक वर्दी नहीं, बल्कि लाखों युवाओं का स्वाभिमान और प्रदेश की सेवा का संकल्प है। जब एक युवा पुलिस मुख्यालय की सीढ़ियां चढ़ने का सपना देखता है, तो उसके पीछे सालों की तपस्या, माता-पिता की उम्मीदें और एक निष्पक्ष व्यवस्था का भरोसा होता है। हाल ही में राजस्थान पुलिस दूरसंचार विभाग द्वारा कांस्टेबल (ऑपरेटर/चालक) भर्ती-2025 के जो परिणाम जारी किए गए हैं, वे इसी अटूट विश्वास और अटूट पारदर्शिता की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरे हैं। ​ भ्रामक खबरों का अंत: केवल योग्यता को सलाम ​अक्सर देखा गया है कि जब भी कोई बड़ी भर्ती प्रक्रिया अपने अंतिम चरणों में होती है, तो कुछ स्वार्थी तत्व और अफवाहों के सौदागर प्रक्रिया को धूमिल करने की कोशिश करते हैं। लेकिन राजस्थान पुलिस ने स्पष्ट कर दिया है कि "न्याय केवल तथ्यों और योग्यता के आधार पर होगा, न कि धारणाओं के आधार पर।" ​ पुलिस मुख्यालय द्वारा जारी प्रेस नोट इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि विभाग हर एक पहलू पर पैनी नज़र बनाए हुए है। विभाग ने उन चर्चाओं को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे थे। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान परिणाम 'अस्थाई' (Tentative) है। इसका अर्थ यह है कि अभी केवल लिखित और शारीरिक दक्षता के अंकों के आधार पर एक सूची तैयार हुई है, लेकिन अंतिम चयन की अग्निपरीक्षा अभी बाकी है। ​ दस्तावेज़ सत्यापन: जहां दूध का दूध और पानी का पानी होगा ​राजस्थान पुलिस की कार्यप्रणाली की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी बहुस्तरीय जांच प्रक्रिया (Multi-layered verification) है। विभाग ने यह साफ कर दिया है कि 26 दिसंबर 2025 से 4 जनवरी 2026 तक चलने वाले दस्तावेज सत्यापन (DV) में एक-एक कागज़ की बारीकी से जांच की जाएगी। ​विशेष संज्ञान: विभाग के ध्यान में यह बात आई है कि कुछ अभ्यर्थियों ने अपनी मूल कैटेगरी के अलावा अन्य कैटेगरी (जैसे OBC से MBC) में फॉर्म भरे हैं। यहां पुलिस का रुख बेहद सख्त और स्पष्ट है—"मात्र सूची में नाम आने से नियुक्ति नहीं मिलेगी।" ​ यह कदम उन मेहनती अभ्यर्थियों के लिए एक सुरक्षा कवच है, जिन्हें डर था कि गलत जानकारी देकर कोई उनकी सीट छीन लेगा। राजस्थान पुलिस ने वचन दिया है कि मूल दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही श्रेणी का अंतिम निर्धारण होगा। यदि कोई अभ्यर्थी गलत पाया जाता है, तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित कर मेरिट के आधार पर अगले पात्र उम्मीदवार को अवसर दिया जाएगा। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि यहाँ "सिफारिश नहीं, केवल सर्टिफिकेट और सच्चाई" चलती है। ​ एक भावुक कहानी: पसीने की बूंद और खाकी का सम्मान ​कल्पना कीजिए शेखावाटी की तपती रेत में सुबह 4 बजे दौड़ने वाले उस युवा की, जिसके पिता मजदूरी करते हैं ताकि बेटा पुलिस में भर्ती हो सके। या उस बेटी की, जिसने गृहस्थी संभालते हुए रातों को जागकर ऑपरेटर परीक्षा की तैयारी की। इन युवाओं के लिए पुलिस विभाग केवल एक नियोक्ता नहीं, बल्कि एक 'अभिभावक' है। राजस्थान पुलिस ने इन भावनाओं को समझा है। इसीलिए प्रेस नोट में यह संवेदना झलकती है कि विभाग अभ्यर्थियों की 'कड़ी मेहनत और प्रयास' का सम्मान करता है। पुलिस विभाग जानता है कि एक भी गलत चयन हज़ारों मेहनती युवाओं का मनोबल तोड़ सकता है। इसीलिए, मेडिकल परीक्षण, चरित्र सत्यापन और शैक्षणिक योग्यता की जांच को इतना कठोर बनाया गया है कि कोई भी 'अपात्र' व्यक्ति सिस्टम में सेंध न लगा सके। ​ कानूनी और नैतिक पक्ष: क्यों निराधार हैं सवाल? ​किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सवाल उठाना आसान है, लेकिन व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण। राजस्थान पुलिस ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। कानूनी दृष्टि से देखें तो विभाग ने अपनी हर कार्रवाई को नियमों के दायरे में रखा है। ​अस्थाई सूची: यह फाइनल सिलेक्शन नहीं है, अतः किसी के अधिकारों का हनन नहीं हुआ। ​सत्यापन का अवसर: सभी को अपने दस्तावेज पेश करने का समान अवसर दिया गया है। ​पारदर्शिता: आधिकारिक वेबसाइट पर सूचनाएं साझा कर विभाग ने 'सूचना के अधिकार' और 'न्यायिक सुचिता' का पालन किया है। आमजन को संदेश: अफवाहों से बचें, खाकी पर भरोसा रखें ​इस डिजिटल युग में 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' के दावों पर यकीन करने से बेहतर है कि हम उस विभाग पर भरोसा करें जो दिन-रात हमारी सुरक्षा में तैनात है। राजस्थान पुलिस की भर्ती सेल ने आधुनिक तकनीक और निष्पक्ष जांच के तालमेल से यह सुनिश्चित किया है कि "मेहनत करने वाला कभी हारेगा नहीं, और धोखाधड़ी करने वाला कभी जीतेगा नहीं।" यह परीक्षा केवल अंकों की नहीं थी, बल्कि राजस्थान पुलिस की ईमानदारी की भी थी, जिसमें वह शत-प्रतिशत सफल रही है। विभाग का यह कहना कि "हम आपकी मेहनत और भरोसे के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे," हर अभ्यर्थी के दिल में सुरक्षा का भाव पैदा करता है। सुशासन और पारदर्शिता का नया अध्याय ​अंत में, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि राजस्थान पुलिस ने इस भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से सुशासन (Good Governance) का एक नया मानक स्थापित किया है। चयन प्रक्रिया के हर पड़ाव पर पारदर्शिता का पहरा है। यह उन सभी के लिए करारा जवाब है जो पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह करते थे। ​राजस्थान के युवाओं को अब निश्चिंत होकर अपने अगले पड़ाव की तैयारी करनी चाहिए, क्योंकि उनकी खाकी, उनकी मेहनत और उनकी ईमानदारी का रक्षक स्वयं राजस्थान पुलिस मुख्यालय है।  

राजस्थान पुलिस का बड़ा अलर्ट: साइबर अटैक से बचने के ये कदम अपनाएं

जयपुर साइबर अपराधियों ने राजस्थान में अब अपने ठगी के तरीके और ज्यादा घातक और खतरनाक बना लिए हैं। हू-ब-हू असली बैंक या शॉपिंग वेबसाइटों की तरह दिखने वाली वेबसाइट बनाकर ये लोगों के खाते साफ कर रहे हैं। राजस्थान पुलिस ने इन खतरों से लोगों को सावधान करने के लिए अलर्ट जारी किया है। अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम विजय कुमार सिंह ने बताया कि ठग अब हूबहू असली जैसी दिखने वाली नकली (क्लोन) वेबसाइटों का उपयोग कर रहे हैं। इन नकली लिंक्स को सोशल मीडिया, एसएमएस या ईमेल के माध्यम से भेजकर लोगों को असुरक्षित वेबपेज पर ले जाया जाता है, जहाँ उनकी निजी जानकारी और बैंक विवरण चोरी कर लिए जाते हैं, जिससे बैंक खातों या यूपीआई लिंक से धनराशि निकाल ली जाती है। वेबसाइट सुरक्षा की जांच: चार ज़रूरी कदम एडीजी सिंह ने आमजन को संभावित साइबर अपराध से सचेत रहने के लिए निम्नलिखित चार प्रमुख सुरक्षा सुझाव दिए हैं: 1. स्पेलिंग की बारीकी से जांच अनिवार्य: किसी भी लिंक पर क्लिक करने से पहले डोमेन नेम की स्पेलिंग को बहुत ध्यान से देखें। साइबर अपराधी अक्सर एक या दो अक्षरों का हेरफेर कर असली जैसी दिखने वाली नकली वेबसाइट बनाते हैं। 2. HTTPS और लॉक आइकन अवश्य देखें: सुरक्षित वेबसाइटों की पहचान उनके URL की शुरुआत में दिखने वाले HTTPS और एड्रेस बार में मौजूद ताले (लॉक) के आइकन से होती है। यदि ये सुरक्षा संकेत मौजूद नहीं हैं, तो उस पर अपना कोई भी वित्तीय या निजी विवरण दर्ज न करें। 3. गूगल सेफ ब्राउज़िंग (Google Safe Browsing) का करें उपयोग: किसी भी संदिग्ध लिंक की सुरक्षा जांचने के लिए https://transparencyreport.google.com/safe-browsing/search पर जा सकते हैं। इस पोर्टल पर लिंक पेस्ट करें और सुनिश्चित करें कि यह 'असुरक्षित', 'मालवेयर' या 'फिशिंग' तो नहीं दिखा रहा है। 4. गोपनीय जानकारी साझा करने से बचें: अपनी निजी जानकारी जैसे ओटीपी, आधार, पैन या बैंक विवरण किसी भी व्यक्ति या अज्ञात वेबसाइट से साझा न करें। रिपोर्टिंग और शिकायत के लिए हेल्पलाइन एडीजी सिंह ने बताया कि यदि फिर भी कोई घटना होती है तो संचार साथी के चक्षु पोर्टल https://sancharsaathi.gov.in/sfc/ पर तुरंत रिपोर्ट करें। यदि कोई व्यक्ति साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है तो इसकी सूचना निकटतम पुलिस स्टेशन/साइबर पुलिस स्टेशन या साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल https://cybercrime.gov.in पर दे। इसके अतिरिक्त सहायता के लिए साइबर हेल्प लाईन नम्बर 1930 या साइबर हेल्पडेस्क नंबर 9256001930/9257510100 पर संपर्क किया जा सकता है।