क्या 2026 में बदल गए किरायेदारी कानून? मकान खाली कराने के दावों का फैक्ट चेक
नई दिल्ली 'नए रेंट नियम 2026' वाला एक पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। 'भारत का नया किराया कानून 2026' के दावे के साथ शेयर किए गए ऐसे पोस्ट में किराएदारों और मकान मालिकों से संबंधित नियमों को लेकर कई बड़े सनसनीखेज बदलाव के दावे किए गए हैं। वायरल पोस्ट के अनुसार किराया कानूनों में सरकार ने बहुत ज्यादा परिवर्तन कर दिया है। इसमें किराया, एडवांस और मकान खाली कराने के लिए नई वैद्यानिक प्रक्रिया में संशोधन की बात कही गई है। नए रेंट नियम 2026 के दावे से कंफ्यूजन ऑनलाइन तेजी से फैलने की वजह से ऐसे पोस्ट ने किराएदारों और मकान मालिकों में बहुत ही ज्यादा कंफ्यूजन पैदा कर दिया है। अलबत्ता,शेयर किए जा रहे तथ्यों में तकनीकी तौर पर कुछ सही हैं, लेकिन उनके पीछे की सच्चाई पूरी तरह से अलग है। 'नए रेंट नियम 2026' वाले पोस्ट में दावा पहला तो वायरल पोस्ट के माध्यम से यह दावा किया जा रहा है कि नया किराया नियम इसी साल लागू हुआ है। इसे इस तरह से बताने की कोशिश की गई है कि ये नियम एकसाथ पूरे देश में लागू हैं। डिपॉजिट के तौर पर मकान मालिक दो महीने से ज्यादा का किराया नहीं ले सकता। बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए किराएदारों को नहीं निकाला जा सकता। रेंट एग्रीमेंट डिजिटली स्टैंप्ड होना जरूरी है और 60 दिन के अंदर रजिस्ट्रेशन आवश्यक है। 12 महीने में सिर्फ एक बार किराया बढ़ सकता है, इसके लिए 90 दिनों की पूर्व सूचना जरूरी है। मकान मालिक को प्रॉपर्टी में दाखिल होने से 24 घंटे पहले नोटिस देना होगा। अगर 30 दिनों के भीतर जरूरी मरम्मत नहीं करवाए जाते हैं तो किराएदार उसे खुद ही करवा सकता है और किराए से उसमें लगा खर्च काट सकता है। ताला बदलना, पानी/बिजली काटना या किराएदारों को धमकाना दंडनीय है। कुछ रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अगर किराया, संपत्ति को नुकसान या एग्रीमेंट को लेकर कोई विवाद होता है, तो इसका निपटारा किराया अदालत या ट्रिब्यूनल के द्वारा 60 दिन के अंदर किया जाएगा। 'रेंट नियम 2026' जैसा कोई नियम नहीं बनाया गया है। अलबत्ता इनके कुछ प्रावधान मॉडल टेनेंसी एक्ट(MTA) 2021 में शामिल हैं। केंद्रीय कैबिनेट से मंजूरी के बाद सरकार ने इसे एक गाइडलाइन नियमावली की तरह जारी किया था। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसके आधार पर अपने किराया नियम तैयार करने थे। भारत में आवासीय और किराया संबंधी कानून राज्य सरकारों के अधीन आते हैं। यानी किराया से संबंधित नियावली तैयार करने या उसमें संशोधन का अधिकार राज्य सरकारों के पास है। मॉडल टेनेंसी एक्ट पर केंद्र सरकार का स्टैंड दिसंबर, 2021 में तत्कालीन आवास और शहरी मामलों के राज्यमंत्री कौशल किशोर ने एक सवाल के जवाब में लोकसभा में कहा था कि लैंड और कोलोनाइजेशन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने केंद्र शासित प्रदेशों को लेकर भी ये बताया था कि उन्हें सलाह दी गई है कि वह या तो मॉडल टेनेंसी एक्ट के आधार पर नया कानून लागू करें या फिर अपने मौजूदा किराया नियावली में संशोधन करें। मॉडल टेनेंसी एक्ट को किन राज्यों ने अपनाया राज्यसभा में पिछले साल अगस्त तक की दी गई जानकारी के अनुसार कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मॉडल टेनेंसी एक्ट के आधार पर नियम तैयार किए हैं। असम, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्य और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव और लक्षद्वीप जैसे केंद्र शासित प्रदेश इनमें शामिल हैं। केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों से कहा गया है कि वह मॉडल टेनेंसी एक्ट के ताजा स्वरूप के अनुरूप अपने किराया कानूनों में बदलाव करें। इन राज्यों ने इसके पुराने ड्राफ्ट के आधार पर इसे नोटिफाई कर लिया था। मॉडल टेनेंसी एक्ट को लेकर विवाद रेंटल एग्रीमेंट के दौरान 'आधार' डिटेल उपलब्ध करवाने के प्रावधान पर सवाल उठाए गए हैं और इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत बताया जाता है। इस कानून के तहत रेंट एग्रीमेंट के डिजिटल रजिस्ट्रेशन का यह कहकर विरोध होता है कि इससे किराएदार और मकान मालिक दोनों के निजी डेटा एक्सपोज होने का खतरा है।