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कृषि उपज मंडियों में सोयाबीन की जोरदार खरीदी, भावांतर योजना ने किसानों को दिलाई राहत

भावांतर योजनांतर्गत कृषि उपज मंडियों में हो रही है सोयाबीन की खरीदी 27 हजार 63 किसानों से 47 हजार 493 टन सोयाबीन की खरीदी भोपाल  प्रदेश में सोयाबीन फसल के लिए लागू की गई भावांतर योजना में 9 लाख 36 हजार 352 किसानों ने पंजीयन कराया है। सोयाबीन का विक्रय 24 अक्टूबर से प्रारंभ हुआ है जो 15 जनवरी 2026 तक जारी रहेगा। अभी तक 27 हजार 63 किसानों से 47 हजार 493 टन सोयाबीन खरीदी गई है। मंगलवार 28 अक्टूबर को 10 हजार 851 किसानों से 19 हजार 191 टन सोयाबीन की खरीदी हुई। कृषि उपज मंडी देवास में सर्वाधिक 1699, इंदौर में 1579, उज्जैन में 1538, गंजबासौदा में 1283, बैरसिया में 1154, आगर में 1085, आष्टा में 1061, शाजापुर में 1053, तराना में 1040 एवं सागर मंडी में 962 टन सोयाबीन की खरीदी हुई। इसी प्रकार सर्वाधिक किसानों के पहुँचने की टॉप मंडियों में गंजबासौदा मंडी में 1254, देवास में 1182, उज्जैन में 1106, आष्टा में 1075, बैरसिया में 900, आगर में 891, इंदौर में 795, शाजापुर में 787, सीहोर में 741 एवं नरसिंहगढ़ मंडी में 701 किसान सोयाबीन की विक्री के लिए पहुँचे। मंडी बड़नगर जिला उज्जैन में अधिकतम भाव 5725 रूपये प्रति क्विंटल रहा। प्रदेश में सोयाबीन की बुवाई का रकवा गत वित्तीय वर्ष 2024-25 में 58.72 लाख हेक्टेयर था जो वर्तमान में 53.20 लाख हेक्टेयर है। इस वर्ष 2025-26 में 55.54 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ है। भावांतर योजनांतर्गत 3 अक्टूबर से 17 अक्टूबर तक पंजीयन हुए थे। सोयाबीन खरीदी के प्रथम मॉडल भाव की घोषणा 7 नवंबर 2025 को की जाएगी।  

सोयाबीन की फसल से अब जिले के किसानों का मोह भंग, किसान अब मक्का की फसल करने में अधिक रूचि ले रहे

शिवपुरी  सोयाबीन की फसल से अब जिले के किसानों का मोह भंग हो गया है. किसान अब मोटे अनाज यानी मक्का की फसल करने में अधिक रूचि ले रहे हैं. इसकी वजह पिछले कुछ समय में इसकी बढ़ती मांग के साथ ही सोयाबीन की तुलना में इसकी देखरेख आसान होना है. इसी कारण सोयाबीन का रकबा पिछले दो साल में घटकर आधा रह गया है. जिले का किसान वैसे तो बाजरा, मक्का, सोयाबीन, उड़द फसलों की खेती करते हैं, लेकिन अच्छे दाम के मोह में पहले किसान सोयाबीन की खेती सबसे अधिक करते थे. सोयाबीन का कुल रकबा एक लाख 65 हजार हेक्टेयर था. सोयाबीन बाजार में 4 हजार से 4200 रुपये क्विंटल के हिसाब से बिकती है. हालांकि सोयाबीन की फसल में कीड़े लगने का खतरा अधिक होता है, जिससे देखरेख अधिक करना पड़ता है. फसलों को बचाने में भी काफी खर्च करना पड़ता है. एक बीघा में महज दो से ढाई क्विंटल सोयाबीन होता है. कृषि विकास केंद्र शिवपुरी के वरिष्ठ वैज्ञानिक, डॉ. एमके भार्गव ने बताया, "बीते दो साल में जिले में किसानों की रुचि में बदलाव आया है. किसान अब सोयाबीन की जगह मक्का की फसल अधिक उगा रहे हैं. जिसका परिणाम है कि सोयाबीन का रकबा अब महज 80 हजार हेक्टेयर रह गया है. इसकी वजह ये है कि मक्का की मांग तेजी से बढ़ी है. किसानों को सोयाबीन की फसल के भाव तो अधिक मिलते हैं, लेकिन इसका उत्पादन कम होता है. इसके मुकाबले मक्का के दाम कम मिलते हैं, लेकिन उत्पादन अधिक होता है." उदाहरण के लिए सोयाबीन की एक क्विटंल फसल 4 हजार में बिकती है, जबकि मक्का की दो हजार क्विंटल में बिकती है. लेकिन एक बीघा खेत में केवल ढाई क्विंटल सोयाबीन होता है, वहीं मक्का 8 से 12 क्विंटल तक होती है. ऐसे में उत्पादन अधिक होने से किसान को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता है, साथ ही मक्का में कीड़े लगने की टेंशन भी नहीं होती है. 2025 के लक्ष्य से समझें किसका रकबा कितना बढ़ा या घटा फसल रकबा धान 45 हजार हेक्टेयर ज्वार 400 हेक्टेयर बाजरा 7 हजार हेक्टेयर मक्का 85 हजार हेक्टेयर तुअर 1 हजार हेक्टेयर उड़द 25 हजार हेक्टेयर मूंग 3500 हेक्टेयर मूंगफली 1 लाख 90 हजार हेक्टेयर तिल 3200 हेक्टेयर सोयाबीन 80 हजार हेक्टेयर कुल 440100 हेक्टेयर जिले में सोयाबीन का रकबा पहले एक लाख 65 हजार हेक्टेयर था, लेकिन बीते कुछ सालों में रकबा घटकर 80 हजार हेक्टेयर रह गया है. इसकी जगह मक्का का रकबा बढ़कर अब 85 हजार हेक्टेयर हो चुका है. किसानों को मक्का का उत्पादन अधिक मिलता है, साथ ही कीड़ों की चिंता भी नहीं होती है. ये बदलाव केवल शिवपुरी ही नहीं बल्कि अशोक नगर और गुना में भी आया है.