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नक्सलियों के कॉरिडोर वाले जंगल अब होंगे जंगली भैंसों का निवास, नई योजना शुरू

बालाघाट मध्य भारत के पूर्वी हिस्से में फैली घनी जंगल की एक विशाल पट्टी, जिसे पहले नक्सली समूह अपनी विस्तार योजना के लिए मार्ग के रूप में इस्तेमाल करते थे, अब जंगली भैंसों (Wild Buffalo) का घर बनने जा रही है, जो मध्य प्रदेश में करीब 100 साल पहले विलुप्त हो चुकी थीं। यह जंगल कान्हा टाइगर रिज़र्व के सुपखर रेंज में स्थित है, जो बालाघाट और मंडला जिलों में फैला है। योजना के तहत असम से जंगली भैंसों का पहला दल फरवरी-मार्च 2026 तक मध्य प्रदेश पहुंच जाएगा।  दोनों भाजपा शासित राज्य, असम और मध्य प्रदेश, ने हाल ही में वन्यजीव आदान-प्रदान कार्यक्रम पर सहमति जताई है। इस कार्यक्रम के तहत जंगली भैंसों के साथ-साथ गैंडा, नाग, बाघ और मगरमच्छ भी एक राज्य से दूसरे राज्य में भेजे जाएंगे। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री, हिमंता बिस्वा शर्मा और डॉ. मोहन यादव, के बीच हुई बैठक में तय हुआ कि 50 जंगली भैंसों को तीन वर्षों में असम से मध्य प्रदेश लाया जाएगा, जबकि गैंडे और तीन नाग भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में रहेंगे। असम को मध्य प्रदेश से एक बाघ जोड़ी और छह मगरमच्छ मिलेंगे। फरवरी-मार्च में 10 से 15 भैंस का पहला समूह  कान्हा टाइगर रिज़र्व में जंगली भैंसों के पुनर्वास का निर्णय इसलिए लिया गया क्योंकि यह क्षेत्र लंबे घास के मैदान, जल स्रोतों की उपलब्धता और न्यूनतम मानव हस्तक्षेप के लिहाज से सबसे उपयुक्त है। वन्यजीव संस्थान (WII) की विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन रिपोर्ट में भी सुपखर रेंज को जंगली भैंसों के लिए सबसे अनुकूल माना गया। कान्हा टाइगर रिज़र्व के अधिकारियों ने बताया कि ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र जंगली भैंसों का प्राकृतिक आवास रहा है। सुपखर रेंज के जंगलों में सुरक्षित एन्क्लोजर बनाने का काम तेजी से चल रहा है, ताकि फरवरी-मार्च में आने वाली पहली बैच (10-15 भैंस) को सुरक्षित रखा जा सके।  नक्सली समूह केबी डिवीजन के विस्तार के मार्ग था  राज्य पुलिस के एंटी-नक्सल विभाग के सूत्रों के अनुसार, “सुपखर रेंज का यह हिस्सा पहले नक्सली समूह KB डिवीजन के लिए मंडला, डिंडोरी, उमरिया और अनुपपुर जिलों तक विस्तार के लिए मार्ग था, लेकिन दिसंबर 2025 की पहली सप्ताह में एमएमसी जोन के सक्रिय नक्सलियों की मौत और आत्मसमर्पण के बाद खाली है। अब अब वन विभाग के प्रोजेक्ट्स जैसे जंगली भैंसों का पुनर्वास शुरू करने के लिए स्थिति अनुकूल है।   

असम से कान्हा पहुंचेंगे जंगली भैंसे, टाइगर के गढ़ में नया वन्यजीव संतुलन बनाने की तैयारी

मंडला   टाइगर्स के लिए विश्वप्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क में नए मेहमान आने वाले हैं. लेकिन इन मेहमानों को हल्के में न लें, ये हैं भारी भरकम आसामी जंगली भैैंसे. जल्द ही असम से मध्य प्रदेश के इस टाइगर रिजर्व में जंगली भैसों की एंट्री होने वाली है, जिसके बाद जंगल का रोमांच और बढ़ने जा रहा है. दुनिया भर के पर्यटक यहां प्रकृति की सुंदरता और बाघ सहित अन्य वन्य प्राणियों के दीदार के लिए पहुचते हैं, वहीं अब भैसों की तादाद भी यहां बढ़ाई जा रही है. कान्हा में अचानक घटी जंगली भैसों की तादाद कान्हा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रविंद्र मणि त्रिपाठी के अनुसार, '' यहां पहले जंगली भैंसों की उपस्थिति थी, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या बहुत कम हो गई. किसी भी प्रजाति की अचानक कमी जंगल पर प्रतिकूल असर डालती है. यही कारण है कि अब असम के राष्ट्रीय उद्यानों से जंगली भैंसों को कान्हा में बसाने की योजना बनाई जा रही है.'' असम से जंगली भैंसे लाने की रूपरेखा तैयार वन विभाग के मुताबिक सुपखार क्षेत्र को जंगली भैंसों के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है. असम से जंगली भैसों को 5 चरणों में कान्हा लाने की तैयारी चल रही है. उच्चाधिकारियों के साथ लगातार परामर्श जारी है और जल्द ही इस दिशा में कदम उठाए जाने की उम्मीद है. इस पहल से न सिर्फ वन्यजीवन को मजबूती मिलेगी बल्कि पर्यटकों के लिए भी कान्हा नेशनल पार्क का अनुभव और समृद्ध होगा. पांच चरणों में होगा ट्रांसलोकेशन योजना के अनुसार, जंगली भैंसों को असम से लाने का काम पांच चरणों में पूरा किया जाएगा. पार्क के सुपखार क्षेत्र को इनके लिए सबसे उपयुक्त चिन्हित किया गया हैृ. इस महत्वपूर्ण परियोजना पर उच्च स्तर पर चर्चा जारी है और जल्द ही इसे अमली जामा पहनाने की उम्मीद है. इस पहल से न सिर्फ पार्क के वन्यजीवन को मजबूती मिलेगी, बल्कि पर्यटकों को भी एक नए और दुर्लभ वन्यजीव को देखने का अवसर मिल सकेगा. कान्हा में बसेंगे आसामी भैंसे कान्हा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रविंद्र मणि त्रिपाठी ने बताया, '' कान्हा में कभी जंगली भैंसों की अपनी आबादी हुआ करती थी और कान्हा नेशनल पार्क से इन्हें बाहर भी भेजा गया था लेकिन समय के साथ ये प्रजाति लगभग विलुप्त हो गई. किसी भी प्रजाति की अनुपस्थिति पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालती है. इसी कमी को दूर करने और जैव विविधता को बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है.