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होलिका दहन की अनोखी परंपरा: क्यों महाकाल के आंगन से होती है शुरुआत?

हर साल चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन पूरे देश में होली का त्योहार मनाया जाता है. इससे एक दिन पहले फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन होलिका दहन किया जाता है. होलिका दहन का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. इस साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा 03 मार्च को है. ऐसे में इस साल 03 मार्च को होलिका दहन किया जाएगा.

इसके अगले दिन 04 मार्च को रंगों से होली खेली जाएगी. होलिका दहन को छोटी होली भी कहा जाता है. मान्यता है कि होलिका की पवित्र अग्नि में सभी तरह की नकरात्मक शक्तियों और कष्टों को समाप्त करने की शक्ति है, इसलिए होलिका दहन की पूजा अवश्य करें, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में सबसे पहले महाकाल के दरबार में होलिका दहन किया जाता है. आइए जानते हैं कि सबसे पहले यहां होलिका दहन क्यों होता है?

महाकाल के दरबार होलिका क्यों जलती है सबसे पहले?

महाकाल उज्जैन के राजा माने जाते हैं. पुरानी परंपरा के अनुसार प्रजा पहले अपने राजा के घर ही उत्सव मनाती है. उसके बाद वो अपने घरों में उत्सव मनाती है. यही कारण है कि मदिर में सबसे पहले होलिका दहन के दिन पूजा और संध्या आरती की जाती है. इसके बाद पुजारियों के मंत्रोच्चार के साथ मंदिर प्रांगण में होलिका दहन किया जाता है. मान्यता है कि महाकाल दरबार में होलिका दहन करने से नगर की नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं.

भस्म आरती में राख की जाती है उपयोग

दूर-दूर से श्रद्धालु इस पावन अग्नि के दर्शन करने के लिए महाकाल के दरबार में आते हैं. महाकाल मंदिर का होलिका दहन सिर्फ लकड़ियों और उपलों का जलना भर नहीं है, बल्कि यह शिव और शक्ति के प्रति अटूट विश्वास का त्योहार माना जाता है. मंदिर में होने वाले इस आयोजन से पहले महाकाल बाबा को गुलाल अर्पित किया जाता है. फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को मंदिर परिसर में होलिका दहन के बाद, उस पवित्र अग्नि की राख यानी विभूति को अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली विशेष भस्म आरती में उपयोग किया जाता है. इसी ताजी राख से भगवान महाकाल का दिव्य शृंगार किया जाता है.

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