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छत्तीसगढ़ में वन संरक्षण हेतु वन विभाग ले रहा प्रबंधन समितियों की बैठकें

रायपुर. राज्य में वन संरक्षण और वन्यजीव सुरक्षा के लिए वन विभाग लगातार कार्य कर रहा है। इसके बावजूद कहीं-कहीं वन एवं वन्यजीव अपराध, वनाग्नि तथा वन अतिक्रमण की घटनाएँ सामने आती हैं। इन पर प्रभावी नियंत्रण और वन एवं वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वन मंत्री श्री केदार कश्यप द्वारा वन विभाग के अधिकारियों के साथ नियमित बैठकें की जा रही हैं तथा आवश्यक निर्देश दिए जा रहे हैं। वन एवं वन्यजीव अपराधों में कमी लाने जनजागृति अभियान वन मंत्री श्री केदार कश्यप के नेतृत्व में तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) श्री अरुण कुमार पाण्डेय के निर्देशानुसार 02 जनवरी को सरगुजा वनमण्डल अंतर्गत लगभग 300 वन प्रबंधन समितियों (जॉइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटी) की बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य वन संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना रहा। बैठकों में वन एवं वन्यजीव अपराधों में कमी लाने, वनाग्नि की रोकथाम, वन अतिक्रमण पर नियंत्रण तथा स्थानीय स्तर पर सतत आजीविका के अवसर सृजित करने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। 7 हजार से अधिक वन प्रबंधन समितियाँ कार्यरत इसी क्रम में कटघोरा वनमण्डल अंतर्गत कोनकोना, बरपाली एवं मड़ई वन प्रबंधन समितियों के साथ भी बैठक आयोजित की गई। बैठक में समिति अध्यक्ष, सदस्य, ग्राम सरपंच एवं ग्रामीणजन उपस्थित रहे। सभी ने वनों में अवैध कटाई, अवैध खनन, अतिक्रमण एवं अवैध शिकार की रोकथाम तथा वनाग्नि से सुरक्षा के लिए सहयोग करने का संकल्प लिया। समिति सदस्यों को वनों की सुरक्षा, संरक्षण एवं संवर्धन में उनकी भूमिका और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक किया गया। उल्लेखनीय है कि राज्य में 7,000 से अधिक वन प्रबंधन समितियाँ कार्यरत हैं, जिनके माध्यम से सहभागी वन प्रबंधन को मजबूती मिलती है। ये समितियाँ वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय स्थापित करती हैं तथा वनों के संरक्षण, संसाधनों के सतत उपयोग और ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इससे वन प्रबंधन प्रणाली अधिक प्रभावी, पारदर्शी और दीर्घकालिक बन रही है।

छत्तीसगढ़ में अपराधियों पर सख्त कार्रवाई करने वन विभाग दे रहा विधिक साक्षरता प्रशिक्षण

रायपुर. राज्य के वन क्षेत्रों में अवैध शिकार की घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग लगातार कार्रवाई कर रहा है। कई मामलों में अपराधी पकड़े भी जाते हैं, लेकिन कभी-कभी वनकर्मियों को कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी न होने के कारण अपराधियों के विरुद्ध मजबूत प्रकरण तैयार नहीं हो पाता, जिससे वे आसानी से छूट जाते हैं।  विधिक साक्षरता कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम ऐसी स्थिति से बचने और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वन मंत्री श्री केदार कश्यप के नेतृत्व में तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) श्री अरुण कुमार पाण्डेय के निर्देशानुसार वन विभाग के कर्मचारियों के लिए विधिक साक्षरता प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में दिसंबर माह में वनमण्डल कार्यालय दुर्ग के सभागार में “प्रोटेक्ट टुडे एंड सिक्योर टुमारो” परियोजना के अंतर्गत एक दिवसीय विधिक साक्षरता कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें जिला न्यायालय दुर्ग के काउंसलर श्री चंद्राकर ने मुख्य वक्ता के रूप में वन एवं वन्यजीव संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी जानकारी दी। वन एवं वन्यजीव अपराधियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके इस प्रशिक्षण का उद्देश्य वनकर्मियों को वन कानूनों, नियमों और धाराओं की स्पष्ट जानकारी देना है, ताकि प्रकरणों को मजबूत बनाया जा सके और अपराधियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके। इसके लिए समय-समय पर संशोधित नियमों और कानूनी प्रावधानों की जानकारी कार्यशालाओं के माध्यम से दी जा रही है। आरक्षित और संरक्षित वनों से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं की दी गई जानकारी कार्यक्रम के दौरान भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रमुख प्रावधानों पर विशेष रूप से चर्चा की गई। विशेषज्ञों द्वारा आरक्षित और संरक्षित वनों से संबंधित कानूनी धाराओं तथा विभागीय कार्रवाई की प्रक्रियाओं को सरल भाषा में समझाया गया। साथ ही राजस्व क्षेत्रों में होने वाले वन अपराधों की रोकथाम और नियंत्रण के उपायों पर भी जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के एक विशेष सत्र में नालसा के विशेषज्ञों ने अदालती मामलों के प्रबंधन से संबंधित “क्या करें और क्या न करें” पर व्यावहारिक सुझाव दिए, जिससे वनकर्मी विधिक प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन कर सकें। इस अवसर पर वन परिक्षेत्र अधिकारी दुर्ग एवं धमधा सहित वनमण्डल के समस्त कार्यपालिक और क्षेत्रीय अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे, जिन्हें वन्यजीव और वन संपदा की सुरक्षा हेतु विधिक रूप से सजग रहने के लिए प्रशिक्षित किया गया।

छत्तीसगढ़ में छेरछेरा तिहार पर्व है लोक परम्परा में दान और समर्पण की जीवंत मिसाल

रायपुर. घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्पराछत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परम्पराओं में विशेष स्थान रखने वाले छेरछेरा तिहार के अवसर पर राज्य के राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने धरसींवा विकासखंड के ग्राम तरपोंगी में पारंपरिक रूप से घर-घर जाकर अन्न दान ग्रहण किया। इस अवसर पर गांव में उत्साह, अपनत्व और लोक उल्लास का वातावरण देखने को मिला। मंत्री वर्मा ने छेरछेरा की परम्परा का निर्वहन करते हुए ग्रामीणों से आत्मीय भेंट की और अन्न दान स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ की आत्मा से जुड़ा पर्व है, जो समाज में समानता, सहयोग और दान की भावना को सशक्त करता है। यह लोक पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री श्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्परा मंत्री वर्मा ने कहा कि छेरछेरा केवल अन्न संग्रह का तिहार नहीं, बल्कि यह लोक संस्कृति, भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है। छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराएं हमारी पहचान हैं और इन्हें संजोकर रखना हम सभी का दायित्व है। ऐसे पर्व समाज को जोड़ते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं। इस अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक उल्लास के साथ मंत्री का स्वागत किया। गांव में छेरछेरा तिहार की रौनक देखते ही बन रही थी। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने पूरे उत्साह के साथ इस लोक पर्व में सहभागिता निभाई। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय पारंपरिक लोक-पर्व है, जिसे धान कटाई के बाद पौष मास (दिसंबर-जनवरी) में मनाया जाता है। यह पर्व राज्य की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। फसल कटने के उपरांत किसान ईश्वर और समाज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। छेरछेरा मूल रूप से दान, सहयोग और आपसी भाईचारे का पर्व है। इस दिन गांव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोली बनाकर घर-घर जाते हैं और लोकगीत गाते हुए अन्न या दान मांगते हैं। दरवाजे पर पहुंचकर “छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरा…” का गायन किया जाता है, जिसका भाव यह होता है कि माता के भंडार में भरपूर धान है, उसमें से थोड़ा दान प्रदान करें।इकट्ठा की गई सामग्री का उपयोग सामूहिक भोज, जरूरतमंदों की सहायता एवं सामाजिक कार्यों में किया जाता है। यह पर्व अमीर-गरीब, जाति-धर्म के भेद को मिटाकर सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ाता है और नई पीढ़ी को साझा संस्कृति एवं लोक परम्पराओं से जोड़ता है।छेरछेरा तिहार के माध्यम से एक बार फिर छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराओं की जीवंत झलक देखने को मिली, जिसने सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का सशक्त संदेश दिया।

मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना से बेटियों को शिक्षा और सुरक्षा का संबल, 27 लाख बेटियों का भविष्य हुआ सशक्त

मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना से बेटियों को शिक्षा और सुरक्षा का संबल सरकार की इस पहल से 27 लाख बेटियों का भविष्य हो रहा सशक्त  आर्थिक सहायता से बदली सामाजिक सोच, लाखों परिवारों का सरकार पर बढ़ा भरोसा लखनऊ उत्तर प्रदेश में बालिकाओं के कल्याण और सशक्तिकरण को लेकर योगी आदित्यनाथ सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से गंभीरता से काम कर रही है। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के माध्यम से सरकार ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बेटियां बोझ नहीं बल्कि समाज की ताकत हैं। इस योजना के द्वारा लगभग 27 लाख बेटियों का भविष्य सशक्त हो रहा है। योजना का उद्देश्य प्रदेश में लैंगिक समानता स्थापित करना, कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाना और बालिकाओं के जन्म के प्रति समाज में सकारात्मक सोच विकसित करना है। लाखों बालिकाओं तक पहुंची योजना मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत अब तक लगभग 27 लाख पात्र बालिकाओं को लाभान्वित किया जा चुका है। इस पर राज्य सरकार द्वारा कुल 647.21 करोड़ रुपये की धनराशि व्यय की गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि योजना केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू की जा रही है। बड़ी संख्या में लाभार्थियों तक सहायता पहुंचना सरकार की प्रशासनिक प्रतिबद्धता और पारदर्शी व्यवस्था को दर्शाता है।  बालिकाओं का कल्याण सरकार की प्राथमिकता सरकार ने योजना के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित किया है। इस वर्ष 3.28 लाख लाभार्थियों को 130.03 करोड़ रुपये की धनराशि योजना के अंतर्गत दी गई है। यह दर्शाता है कि योगी सरकार बालिकाओं के कल्याण को दीर्घकालिक नीति के रूप में आगे बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना आज प्रदेश में बेटियों के सम्मान, सुरक्षा और शैक्षिक सशक्तिकरण की पहचान बन चुकी है और सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लैंगिक समानता की दिशा में सरकार का ठोस कदम वर्ष 2019 में शुरू की गई मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के अंतर्गत ऐसे परिवारों की बालिकाओं को लाभ दिया जा रहा है, जिनके परिवार उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। पात्रता की शर्तों के अनुसार परिवार की वार्षिक आय 3.00 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए और परिवार में अधिकतम 2 बच्चे होने चाहिए। योजना का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक कारणों से किसी भी बालिका की शिक्षा या विकास बाधित न हो और परिवारों को बेटियों के पालन पोषण में सहयोग मिल सके। सहायता राशि में बढ़ोतरी से मजबूत हुआ भरोसा वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश सरकार ने योजना के अंतर्गत दी जाने वाली कुल सहायता राशि को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दिया। यह सहायता 6 चरणों में प्रदान की जाती है। जन्म के समय 5,000 रुपये, 2 वर्ष की आयु पर टीकाकरण पूर्ण होने पर 2,000 रुपये, कक्षा 1 में प्रवेश पर 3,000 रुपये, कक्षा 6 में प्रवेश पर 3,000 रुपये, कक्षा 9 में प्रवेश पर 5,000 रुपये तथा कक्षा 10 या 12 की परीक्षा उत्तीर्ण कर डिप्लोमा या स्नातक अथवा उससे अधिक अवधि के डिग्री कोर्स में प्रवेश लेने पर 7,000 रुपये की सहायता दी जाती है। यह व्यवस्था बालिकाओं को हर शैक्षिक पड़ाव पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।

ड्रोन-आधारित भू-स्थानिक इंटेलिजेंस से डिजिटल गवर्नेंस होगा पारदर्शी, सक्षम और फ्यूचर-रेडी

ड्रोन एवं जियोस्पेशियल इकोसिस्टम में मध्यप्रदेश बना अग्रणी राज्य : मुख्यमंत्री डॉ. यादव ड्रोन-आधारित भू-स्थानिक इंटेलिजेंस से डिजिटल गवर्नेंस होगा पारदर्शी, सक्षम और फ्यूचर-रेडी प्रदेश में हुआ देश की राज्य स्तरीय ड्रोन डेटा रिपोज़िटरी का शुभारंभ भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देते हुए प्रदेश में देश की पहली राज्य-स्तरीय ड्रोन डेटा रिपोज़िटरी (डीडीआर) शुरू की गई है। इससे मध्यप्रदेश भारत के ड्रोन एवं भू-स्थानिक इकोसिस्टम में अग्रणी राज्य बन गया है। यह पहल प्रदेश में गवर्नेंस को पूर्णतः डिजिटल बनाने की राज्य सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह तकनीक शासन की प्रक्रियाओं को सुगम, सुदृढ़ और पारदर्शी बनाती है। विभागों के बीच ड्रोन-आधारित इंटेलिजेंस को संस्थागत रूप देकर प्रदेश एक अधिक कनेक्टेड, पारदर्शी और भविष्य के लिए तैयार प्रशासनिक ढांचे की ओर तेजी से अग्रसर है। डीडीआर का शुभारंभ ‘एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0’ के अवसर पर किया गया था। इसे राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 तथा डीजीसीए के यूएएस नियम 2021 के अनुरूप विकसित किया गया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमपीएसईडीसी) द्वारा विकसित यह रिपोज़िटरी फ्यूचर-रेडी डिजिटल गवर्नेस की एक सुदृढ़ आधारशिला सिद्ध होगी। मध्यप्रदेश में ड्रोन तकनीक का प्रभावी एवं व्यापक उपयोग किया जा रहा है। प्रदेश में भूमि सर्वेक्षण, कृषि प्रबंधन, सिंचाई परियोजनाओं, खनन पट्टों की निगरानी, आधारभूत संरचना निर्माण, पर्यावरणीय मूल्यांकन, नगरीय नियोजन तथा आपदा प्रबंधन जैसे विविध क्षेत्रों में उच्च-रिज़ॉल्यूशन ड्रोन सर्वेक्षण किए जा रहे हैं।अब तक ड्रोन सर्वेक्षणों से प्राप्त डेटा विभिन्न विभागों में अलग-अलग संकलित होता रहा, जिससे कई स्थानों पर सर्वेक्षणों की पुनरावृत्ति,अपूर्ण डेटा एकत्र होने और कई महत्वपूर्ण इमेजरी व भू-स्थानिक जानकारियों को सुरक्षित रखने की चुनौती सामने आई। ड्रोन डेटा रिपोज़िटरीः एकीकृत, सुरक्षित और पारस्परिक रूप से सक्षम भू-स्थानिक प्लेटफॉर्म डीडीआर एक केंद्रीकृत, क्लाउड-आधारित, सुरक्षित और इंटर-ऑपरेबल डिजिटल अवसंरचना है। इससे भू-स्थानिक प्रशासन के भविष्य का आधार तैयार होता है। इसमें उच्च गुणवत्ता वाले ड्रोन डेटा संग्रहित किए जा रहे हैं। इस डेटाबेस में उच्च-रिज़ॉल्यूशन ऑर्थोमोज़ाइक, 3D टेरेन मॉडल, लिडार स्कैन, वीडियो इमेजरी, लिगेसी बेसलाइन डेटा और बहु-विभागीय सर्वेक्षण रिकॉर्ड शामिल किये जाते हैं। हर डेटा फ़ाइल को सटीक लैटिट्यूड-लाँगीट्यूड मेटाडाटा, सर्चेबल की-वर्ड, मानकीकृत तकनीकी फॉर्मेट और स्वचालित वर्गीकरण के साथ रिपोज़िटरी में संरक्षित किया जाता है। इस डेटा से सभी अधिकारी खोज, तुलना और विश्लेषण कर सकते हैं। डेटा दोहराव में कमी और दक्षता में वृद्धि प्रदेश में पहली बार सभी विभागों के ड्रोन सर्वे डेटा को एक ही प्लेटफॉर्म पर समेकित किया है। इसके परिणामस्वरूप ड्रोन सर्वेक्षणों के दोहराव में 30-50% तक कमी आई है। डेटा पारदर्शिता में वृद्धि, विभागीय सहयोग में सुधार,फील्ड-वेरिफिकेशन में सटीकता और निर्णय लेने की गति में अत्यधिक बढ़ोतरी संभव हुई है। अब विभाग स्थान, परियोजना, मेटाडाटा, विषय या उद्देश्य के आधार पर आसानी से आवश्यक भू- स्थानिक डेटा खोज सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित भू-स्थानिक विश्लेषण डीडीआर की तकनीकी संरचना अत्याधुनिक है। इससे रियल-टाइम मॉनिटरिंग, लिगेसी डेटा की तुलनात्मक समीक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित भू-स्थानिक विश्लेषण, स्वचालित कैटलॉगिंग, टाइम-लैप्स परियोजना निगरानी, भविष्य-अनुमान मॉडलिंग और मल्टी-डिपार्टमेंट डेटा इंटीग्रेशन सुगम हुआ है। परिणामस्वरूप डेटा अधिग्रहण का समय सप्ताह से घटकर दिनों में आ गया है। योजनाओं का मूल्यांकन अधिक विश्वसनीय और नीति-निर्माण अधिक तथ्य परक, त्वरित और प्रभावी हुआ है। डीडीआर से व्यापक लाभ भू-अभिलेख एवं राजस्व विभाग में भूखंड सीमांकन में उच्च सटीकता, किरायेदारी एवं कब्जा सत्यापन, अतिक्रमण की पहचान और भूमि विवादों का त्वरित निराकरण संभव हुआ है। आधारभूत संरचना एवं निर्माण परियोजनाओं-सड़कों, पुलों, नहरों, सोलर पार्कस एवं सार्वजनिक निर्माण कार्यों की टाइम-लैप्स निगरानी होने लगी है और परियोजनाओं की प्रगति का वैज्ञानिक मूल्यांकन आसान हुआ है। नगरीय प्रशासन एवं शहरी नियोजन के क्षेत्र में उच्च-रिज़ॉल्यूशन 3D मॉडल आधारित ज़ोनिंग, जल, सीवर, परिवहन और उपयोगिता सेवाओं की कुशल योजना बनाने में डीडीआर का उपयोग प्रभावी सिद्ध हुआ है। आपदा प्रबंधन जैसे बाढ़, आग, भू-स्खलन के बाद त्वरित नुकसान आकलन और लिगेसी बेसलाइन डेटा के आधार पर राहत और पुनर्वास की रणनीति बनाना आसान हुआ है। कृषि, सिंचाई, वन एवं पर्यावरण विभाग डीडीआर का उपयोग फसल स्थिति विश्लेषण, कीट-प्रभाव पहचान, माइक्रो- सिंचाई आवश्यकताओं का निर्धारण, वन संरक्षण एवं अवैध कटाई की निगरानी और पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन में डीडीआर का उपयोग किया जा रहा है। डीडीआर को राष्ट्रीय मॉडल बनाने की दिशा में कदम प्रदेश सरकार आगामी समय में इस ड्रोन डेटा रिपोज़िटरी को एक राष्ट्रीय रूप से सुलभ भू-स्थानिक ढांचे में विकसित करेगी।इसके लिए केंद्रीय मंत्रालयों, राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय अनुसंधान संस्थानों, GIS विशेषज्ञों, स्टार्ट-अप्स और निजी उ‌द्योग सहयोगियों के साथ समन्वय बढ़ाने की योजना है। राज्य का लक्ष्य है कि डीडीआर अनावश्यक ड्रोन सर्वेक्षण को कम करे, अंतर्राज्यीय आपदा प्रबंधन सहयोग को मजबूत बनाए और उच्च-गुणवत्ता वाले भू-स्थानिक डेटा आधारित नीति-निर्माण को सक्षम करे। ड्रोन डेटा रिपोज़िटरी मध्यप्रदेश की डेटा-आधारित गवर्नेस यात्रा में एक परिवर्तनकारी कदम है, इसमें नवाचार, पारदर्शिता और भू-स्थानिक इंटेलिजेंस शासन का अभिन्न हिस्सा बन रहे हैं। एकीकृत और इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्म के माध्यम से डेटा डुप्लिकेशन समाप्त होगा। इससे स्मार्ट गवर्नेंस की मजबूत नींव स्थापित होगी।  

हरियाणा में फसल खरीद में लापरवाही पर सैनी सरकार करेगी सख्त कार्रवाई

चंडीगढ़. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने फसल खरीद व्यवस्था में आई अनियमितताओं पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि प्रदेश सरकार प्रत्येक किसान की फसल का एक एक दाना न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, वहीं गलत खरीद को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री नायब सैनी फसल खरीद प्रणाली को और अधिक पारदर्शी व प्रभावी बनाने के उद्देश्य से आयोजित उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। बैठक में शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल तथा खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले राज्य मंत्री राजेश नागर भी उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री ने संबंधित खरीद एजेंसियों के अधिकारियों को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि आगामी खरीद सीजन के दौरान फील्ड में नियमित और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जाए ताकि किसान की सही उपज बिना किसी बाधा के एम.एस.पी. पर खरीदी जा सके। उन्होंने कहा कि फसल खरीद में पूर्व में उजागर हुई अनियमितताओं एजेंसियों और सिस्टम के साथ बड़ा धोखा है। दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। करनाल धान घोटाला न सिर्फ जिले बल्कि पूरे प्रदेश की खरीद को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि आगामी खरीद सीजन में इस प्रकार की कोई भी समस्या दोबारा नहीं आनी चाहिए। साथ ही, उन्होंन स्पष्ट किया कि फसल खरीद में संलिप्त पाए किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई तुरंत अमल में लाई जाए। इससे फील्ड स्तर पर यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि गलत कार्य करने वालों को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाएगा। शैलरों की जांच के लिए संबंधित विभाग की समिति ही जाए: मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिए कि यदि किसी शेलर या आड़ती द्वारा मिलीभगत कर भारी अनियमितताएं पाई जाती हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई के साथ-साथ भारी पैनल्टी भी लगाई जाए। उन्होंने कहा कि शेलरों की जांच के लिए संबंधित विभाग की समिति ही जाए, कोई भी अधिकारी या कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से जांच पर न जाए। यदि ऐसा पाया गया तो उसके खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। प्रणाली पर सवाल खड़े करता है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जांच के अगले चरण में और कौन-कौन से बड़े चेहरे बेनकाब होते हैं।

बिहार में तेज रफ्तार बाइक पेड़ से टकराने से 2 दोस्तों की दर्दनाक मौत

पटना. बिहार के सुपौल में नए साल में सड़क हादसे ने दो परिवारों की खुशियां छीन लीं। जिले के किशनपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत सोहागपुर में शुक्रवार रात भीषण सड़क हादासा हुआ। तेज रफ्तार बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे पेड़ से टकरा गई। इसमें बाइक सवार दोनों युवकों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। हादसे के बाद पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। बाइक को कब्जे में लेकर पुलिस छानबीन कर रही है। मृतकों का मोबाइल की भी जांच की जा रही है। मृतकों की पहचान किशनपुर थाना क्षेत्र के मौजहा वार्ड संख्या 6 निवासी रामदत्त यादव के पुत्र राजकुमार यादव(23) और इन्द्रदेव यादव का पुत्र नीतीश कुमार(24) के रूप में की गई है। बताया जा रहा है कि दोनों युवक किसी जरूरी काम से बाइक से निकले थे। रास्ते में सोहागपुर के पास बाइक का संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे पेड़ से जा टकराई। टक्कर की तेज आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और तुरंत पुलिस को सूचना दी। किशनपुर थाना पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंचकर शवों को कब्जे में लिया और पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेज दिया। हादसे की खबर मिलते ही मृतकों के घरों में कोहराम मच गया। गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है। ग्रामीणों ने बताया कि दोनों युवक मिलनसार और मेहनती थे। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा देने की मांग की है। पुलिस के अनुसार, प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार हादसे की वजह मानी जा रही है। पुलिस ने उनकी बाइक को कब्जे में ले लिया है। परिजनों को उचित मुआवजा दिलाने की कार्रवाई की जा रही है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। सुपौल पुलिस ने आम लोगों से सुरक्षित यात्रा की अपील की है। जिले में गड़ियों की स्पीड, गाड़ी चलाते मोबाइल का इस्तेमाल और हैलमेट जांच तेज कर दी गई है।

घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्परा

रायपुर : छेरछेरा तिहार : सामाजिक समरसता और लोक संस्कृति का उत्सव घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्परा छेरछेरा तिहार : लोक परम्परा में दान और समर्पण की जीवंत मिसाल रायपुर घर-घर अन्न दान लेकर मंत्री श्री टंक राम वर्मा ने निभाई छेरछेरा की परम्पराछत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परम्पराओं में विशेष स्थान रखने वाले छेरछेरा तिहार के अवसर पर राज्य के राजस्व मंत्री श्री टंक राम वर्मा ने धरसींवा विकासखंड के ग्राम तरपोंगी में पारंपरिक रूप से घर-घर जाकर अन्न दान ग्रहण किया। इस अवसर पर गांव में उत्साह, अपनत्व और लोक उल्लास का वातावरण देखने को मिला।      मंत्री श्री वर्मा ने छेरछेरा की परम्परा का निर्वहन करते हुए ग्रामीणों से आत्मीय भेंट की और अन्न दान स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि छेरछेरा तिहार छत्तीसगढ़ की आत्मा से जुड़ा पर्व है, जो समाज में समानता, सहयोग और दान की भावना को सशक्त करता है। यह लोक पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और सामाजिक समरसता का संदेश देता है।      मंत्री श्री वर्मा ने कहा कि छेरछेरा केवल अन्न संग्रह का तिहार नहीं, बल्कि यह लोक संस्कृति, भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है। छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराएं हमारी पहचान हैं और इन्हें संजोकर रखना हम सभी का दायित्व है। ऐसे पर्व समाज को जोड़ते हैं और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते हैं।       इस अवसर पर ग्रामीणों ने पारंपरिक उल्लास के साथ मंत्री का स्वागत किया। गांव में छेरछेरा तिहार की रौनक देखते ही बन रही थी। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने पूरे उत्साह के साथ इस लोक पर्व में सहभागिता निभाई। कार्यक्रम में जनप्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।       उल्लेखनीय है कि छेरछेरा छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय पारंपरिक लोक-पर्व है, जिसे धान कटाई के बाद पौष मास (दिसंबर-जनवरी) में मनाया जाता है। यह पर्व राज्य की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा है। फसल कटने के उपरांत किसान ईश्वर और समाज के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।       छेरछेरा मूल रूप से दान, सहयोग और आपसी भाईचारे का पर्व है। इस दिन गांव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोली बनाकर घर-घर जाते हैं और लोकगीत गाते हुए अन्न या दान मांगते हैं। दरवाजे पर पहुंचकर “छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरा…”     का गायन किया जाता है, जिसका भाव यह होता है कि माता के भंडार में भरपूर धान है, उसमें से थोड़ा दान प्रदान करें।इकट्ठा की गई सामग्री का उपयोग सामूहिक भोज, जरूरतमंदों की सहायता एवं सामाजिक कार्यों में किया जाता है। यह पर्व अमीर-गरीब, जाति-धर्म के भेद को मिटाकर सामाजिक संवेदनशीलता को बढ़ाता है और नई पीढ़ी को साझा संस्कृति एवं लोक परम्पराओं से जोड़ता है।छेरछेरा तिहार के माध्यम से एक बार फिर छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराओं की जीवंत झलक देखने को मिली, जिसने सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का सशक्त संदेश दिया।

झारखंड में सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना से लाखों बालिकाएं हो रहीं सशक्त

रांची. अबुआ सरकार किशोरियों और महिलाओं को शिक्षित एवं सशक्त बनाने की दिशा में लगातार ठोस कदम उठा रही हैए ताकि झारखण्ड एक स्वस्थए सशक्त और समावेशी प्रदेश के रूप में आगे बढ़ सके। इसी सोच को साकार करने के लिए माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन के मार्गदर्शन में झारखण्ड सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2022.23 से सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना की शुरुआत की गई। इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत स्कूल में अध्ययनरत पात्र किशोरियों को कक्षा आठवीं से बारहवीं तक चरणबद्ध रूप से कुल 40 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जा रही हैए जिससे उनकी पढ़ाई में निरंतरता बनी रहे और आर्थिक बाधाओं के कारण कोई भी बेटी शिक्षा से वंचित न हो। इस योजना का उद्देश्य न केवल शैक्षिक भागीदारी बढ़ाना हैए बल्कि बाल विवाहए बाल श्रम और लैंगिक असमानता जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रभावी अंकुश लगाते हुए किशोरियों को आत्मनिर्भरए आत्मविश्वासी और सम्मानपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर करना भी है। करोड़ों की सहायताए लाखों लाभार्थी समाज कल्याण निदेशालयए महिला एवं बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार- – वित्तीय वर्ष 2022.23 में 7ए28ए332 बालिकाओं को कुल 344 करोड़ 80 लाख रुपये – वित्तीय वर्ष 2023.24 में 7ए18ए272 बालिकाओं को 365 करोड़ 98 लाख रुपये तथा वित्तीय वर्ष 2024.25 में 7ए38ए687 बालिकाओं को 368 करोड़ 71 लाख रुपये की राशि सीधे उनके बैंक खातों में हस्तांतरित की गई है। ऑनलाइन पोर्टल से पारदर्शी प्रक्रिया वर्तमान वित्तीय वर्ष से आवेदन प्रक्रिया को और अधिक सरल व पारदर्शी बनाने के लिए आवेदन सीधे विद्यालयों के माध्यम से सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना के आधिकारिक पोर्टल पर कराया जा रहा है। इससे लाभार्थियों के चयनए दस्तावेजों के सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हुई है। भुगतान की पूरी जानकारीए अस्वीकृत आवेदनों के कारण एवं आवश्यक सुधार संबंधी सूचनाएं संबंधित विद्यालयों के साथ साझा की जा रही हैंए ताकि किसी भी बालिका को योजना के लाभ से वंचित न होना पड़े। वर्तमान स्थिति इस वित्तीय वर्ष में अब तक 5ए92ए308 बालिकाओं के आवेदन ऑनलाइन प्राप्त हुए हैंए जिनमें से 1ए97ए006 बालिकाओं को 71 करोड़ 76 लाख रुपये से अधिक की राशि का भुगतान किया जा चुका है। शेष लाभार्थियों के भुगतान की प्रक्रिया प्रगति पर है। इस वर्ष कुल 270 करोड़ रुपये व्यय करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अबुआ सरकार की यह योजना झारखण्ड की बेटियों के लिए न केवल आर्थिक सहयोग हैए बल्कि उनके सपनों को साकार करने का सशक्त माध्यम भी है। आठवीं से बारहवीं कक्षा में अध्ययनरत सभी पात्र बालिकाओं से अपील है कि वे अपने विद्यालय के माध्यम से शीघ्र आवेदन कर इस योजना का लाभ उठाएं और शिक्षा व सशक्तिकरण की नई उड़ान भरें। ऐसे करें संपर्क अधिक जानकारी या आवेदन संबंधी सहायता के लिए जिला शिक्षा पदाधिकारीए जिला समाज कल्याण पदाधिकारीए विद्यालय के प्रधानाध्यापकध्ठम्म्व् अथवा प्रखंड के बाल विकास परियोजना पदाधिकारी से संपर्क किया जा सकता है।

देश की सर्वश्रेष्ठ 100 यूनिवर्सिटियों में पंजाब के 7 विश्वविद्यालयों ने बनाई जगह

चंडीगढ़. भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की ओर से ‘इंडिया रैंक 2024’ के परिणाम घोषित कर दिए गए हैं। देश की सर्वश्रेष्ठ 100 यूनिवर्सिटियों में से पंजाब की 7 यूनिवर्सिटियों ने जगह बनाई है। पंजाब के लिहाज से सबसे अच्छी रैंकिंग मोहाली के चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी को मिली है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी की ऑल इंडिया रैकिंग 32 है। थापर इंस्टीच्यूट आफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाजी, पटियाला की 43वीं और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, फगवाड़ा की 45वीं रैंक है। आईआईटी रोपड़ 48, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ 60, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च, मोहाली 64 और पंजाब एग्रीकल्चर पीएयू, लुधियाना की 80वीं रैंक आई है। नए इनोवेशन में नहीं बनाई जगह  अलग-अलग श्रेणी में करवाए गए सर्वेक्षण में पंजाब की कोई भी यूनिवर्सिटी नए इनोवेशन में जगह नहीं बना सकी। जबकि मैनेजमेंट श्रेणी में भी चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने 36वां स्थान हासिल किया। इस सर्वेक्षण में देश की 1374 इंडस्टीच्यूट ने हिस्सा लिया। इसी प्रकार सर्वेक्षण में देश की 439 सरकारी व प्राइवेट यूनिवर्सिटियों, इंजीनियरिंग के 1373, फार्मेसी के 439 और 1596 कालेजों ने हिस्सा लिया। पंजाब यूनिवर्सिटी 7वां स्थान प्राप्त किया देश की टॉप 50 फार्मेसी श्रेणी में चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी 7वां स्थान प्राप्त किया। जबकि नेशनल इंस्टीच्यूट आफ फार्मासूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च ने 9वां, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने 20वां और पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी ने 46वां स्थान हासिल किया। आर्किटेक्चर एंड प्लानिंग श्रेणी में भी चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने 13वां स्थान हासिल किया। जबकि चंडीगढ़ कालेज आफ आर्किटेक का रैंक 30वां रहा। पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ 5वां स्थान प्राप्त किया पंजाब की कोई भी यूनिर्टिसिटी कानूनी शिक्षा में स्थान नहीं बना सकी। देश की टॉप 50 मेडिकल श्रेणी में भी लुधियाना के डीएमसी ने 40वां स्थान प्राप्त किया। जबकि पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीच्यूट आफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) दूसरे और सरकारी मेडिकल कालेज एवं अस्पताल सेक्टर 32 ने 35वां स्थान प्राप्त किया। डेंटल में पंजाब का कोई भी कालेज स्थान बनाने में नाकामयाब रहा। जबकि टॉप स्टेट यूनिवर्सिटी पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ ने 5वां स्थान प्राप्त किया।