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Haryana Education: सरकारी स्कूलों में शुरू होगी रोबोटिक्स और AI शिक्षा, 391 लैब बनकर तैयार

 यमुनानगर  सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के लिए विज्ञान की पढ़ाई किताबों तक सीमित नहीं रहेगी। वे रोबोट बनाएंगे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) पर काम करेंगे, 3-डी प्रिंटर से माडल तैयार करेंगे और अपने आइडिया को तकनीक के जरिए हकीकत में बदलना सीखेंगे। क्योंकि प्रदेश के 391 राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में इसी माह अटल टिंकरिंग लैब (एटीएल) शुरू हो रही है। इसके लिए स्कूलों में सामान पहुंच चुका है, वहीं मई में शिक्षकों को प्रशिक्षण भी दिया जा चुका है। ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद स्कूल खुलते ही यह लैब क्रियान्वित की जा रही हैं। इससे सरकारी स्कूलों के हजारों विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा और नवाचार का मंच मिल सकेगा। अटल टिंकरिंग लैब की शुरुआत वर्ष 2018 में नीति आयोग ने अटल इनोवेशन मिशन के तहत की थी। उस समय निर्धारित मानकों के आधार पर प्रदेश के ज्यादातर निजी स्कूलों मं ही यह सुविधा मिल सकी थी, जबकि अधिकांश सरकारी स्कूल इससे वंचित रह गए थे। नीति आयोग की तर्ज पर हरियाणा सरकार ने अपने संसाधनों से 391 सरकारी स्कूलों में 2026-27 के शैक्षणिक सत्र में अटल टिंकरिंग लैब स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके लिए फरवरी से स्कूलों में लैब का सामान भेजना शुरू कर दिया गया था, जो अब लगभग सभी स्कूलों में पहुंच चुका है। साथ ही मई में शिक्षकों को लैब से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया गया। हिसार में सबसे ज्यादा 29 लैब, रोहतक में सबसे कम पांच सबसे ज्यादा हिसार के 29 स्कूलों में लैब स्थापित हो रही हैं। इसके बाद जींद व सिरसा में 26-26, यमुनानगर में 23, अंबाला, भिवानी व फतेहाबाद में 22-22, करनाल में 21, कैथल में 20, पानीपत व सोनीपत में 19-19, कुरुक्षेत्र, नूंह व पलवल में 17-17, महेंद्रगढ़ में 16 और गुरुग्राम में 15 लैब स्थापित होंगी। चरखी दादरी, पंचकूला व रेवाड़ी में 11-11, फरीदाबाद में 10 व झज्जर में नौ लैब हैं। सबसे कम पांच लैब रोहतक में हैं। नवाचार, वैज्ञानिक सोच व तकनीकी कौशल का होगा विकास जिला विज्ञान विशेषज्ञ विशाल सिंघल ने बताया कि जुलाई में लैब शुरू कराने का प्रयास है। इनमें छात्र-छात्राएं रोबोटिक्स, एआइ, 3-डी प्रिंटिंग, इलेक्ट्रानिक्स, सेंसर, माइक्रोकंट्रोलर व कोडिंग का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। यात्री छात्र केवल सिद्धांत नहीं पढ़ेंगे, बल्कि मॉडल तैयार करेंगे, प्रोटोटाइप बनाएंगे व दैनिक जीवन की समस्याओं के तकनीकी समाधान विकसित करने का अभ्यास भी करेंगे। इससे विद्यार्थियों में नवाचार, वैज्ञानिक सोच व तकनीकी कौशल का विकास होगा।

Employment Report: रोजगार के मामले में लुधियाना सबसे आगे, 63 फीसदी कर्मचारी नियमित वेतनभोगी

लुधियाना पंजाब में रोजगार के मामले में लुधियाना सबसे आगे है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों पर आधारित नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार लुधियाना का श्रमिक जनसंख्या अनुपात 57 प्रतिशत है, जो दिल्ली (41.2 प्रतिशत) और फरीदाबाद (44 प्रतिशत) से बेहतर है। नियमित वेतनभोगियों की हिस्सेदारी भी 63 प्रतिशत है, जो कई बड़े शहरों के बराबर या उनसे बेहतर है। रिपोर्ट के अनुसार लुधियाना में औद्योगिक गतिविधियां तेज होने से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। विनिर्माण, ऑटोमोबाइल और कपड़ा उद्योगों में कुशल श्रमिकों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी जरूरत को देखते हुए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में नए पाठ्यक्रम भी शुरू किए जा रहे हैं। लुधियाना में स्वरोजगार करने वालों का प्रतिशत 34.7 है जबकि आकस्मिक श्रमिक (कैजुअल लेबर) 2.3 प्रतिशत हैं। शहर की बेरोजगारी दर 3.5 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो फरीदाबाद (4.9 प्रतिशत) और दिल्ली (5.3 प्रतिशत) से कम है। हालांकि महिलाओं की श्रम भागीदारी अब भी चिंता का विषय है। महिलाओं का श्रमिक जनसंख्या अनुपात केवल 22.8 प्रतिशत है। महिलाओं में बेरोजगारी दर 3.8 प्रतिशत जबकि पुरुषों में 3.4 प्रतिशत है। दिल्ली में महिलाओं की बेरोजगारी 8.4 प्रतिशत और पुरुषों की 4.7 प्रतिशत दर्ज की गई है। अमृतसर में रोजगार की तस्वीर कमजोर रिपोर्ट के अनुसार अमृतसर में रोजगार की स्थिति लुधियाना के मुकाबले कमजोर है। यहां श्रमिक जनसंख्या अनुपात 45.8 प्रतिशत है जबकि पुरुषों में यह 69 प्रतिशत और महिलाओं में केवल 21.2 प्रतिशत है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण सरकार रोजगार बढ़ाने के प्रयास कर रही है, लेकिन अपेक्षित परिणाम अभी नहीं मिल पाए हैं। महिलाओं की श्रम भागीदारी यहां भी काफी कम बनी हुई है।  बेरोजगारी दर 8.7%, महिलाओं पर ज्यादा असर अमृतसर की कुल बेरोजगारी दर 8.7 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो लुधियाना से काफी अधिक है। पुरुषों में यह 7.6 प्रतिशत और महिलाओं में 12.3 प्रतिशत है। शहर में स्वरोजगार का प्रतिशत 43.9 है। स्वरोजगार में 49.2 प्रतिशत पुरुष और 25.9 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। वहीं आकस्मिक श्रमिकों की हिस्सेदारी 11.3 प्रतिशत है। रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ी है, लेकिन यह अब भी संतोषजनक स्तर से काफी नीचे है।

3 साल तक गर्भधारण की चिंता खत्म! पश्चिमी सिंहभूम में महिलाओं को मुफ्त मिलेगा गर्भनिरोधक इम्प्लांट

 चाईबासा  पश्चिमी सिंहभूम जिले के सदर अस्पताल ने महिला स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के क्षेत्र में एक नई शुरुआत करते हुए पहली बार आधुनिक गर्भनिरोधक इम्प्लांट का सफल प्रत्यारोपण किया है। इसके साथ ही अब जिले की महिलाओं को यह अत्याधुनिक सुविधा अपने ही जिले में निःशुल्क उपलब्ध होगी। अस्पताल की चिकित्सक डॉ. पौलीना मुंडू और उनकी मेडिकल टीम ने इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह एक आधुनिक, सुरक्षित और लंबे समय तक प्रभावी रहने वाली गर्भनिरोधक विधि मानी जाती है। इस प्रक्रिया में महिला की ऊपरी बांह की त्वचा के नीचे माचिस की तीली के आकार का एक छोटा और लचीला इम्प्लांट लगाया जाता है। यह लगातार नियंत्रित मात्रा में हार्मोन छोड़ता है, जिससे करीब तीन वर्षों तक गर्भधारण से सुरक्षा मिलती है। यदि महिला इस अवधि से पहले संतान की योजना बनाना चाहती है, तो प्रशिक्षित चिकित्सक इसे आसानी से निकाल सकते हैं। इम्प्लांट हटाने के बाद महिला सामान्य रूप से गर्भधारण कर सकती है। डॉ. पौलीना मुंडू ने बताया कि यह सुविधा ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की महिलाओं को सुरक्षित, सुविधाजनक और प्रभावी परिवार नियोजन का विकल्प उपलब्ध कराएगी। उन्होंने कहा कि यह एक मामूली प्रक्रिया है, जिसे प्रशिक्षित चिकित्सकों की निगरानी में कम समय में सुरक्षित रूप से किया जाता है। इस सुविधा के शुरू होने से अब पश्चिमी सिंहभूम की महिलाओं को इस आधुनिक गर्भनिरोधक सेवा के लिए बड़े शहरों या निजी अस्पतालों का रुख नहीं करना पड़ेगा। सदर अस्पताल में यह सेवा पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। अस्पताल प्रशासन ने इसे जिले के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि आगे भी लोगों को आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए जाएंगे।  

POCSO Case: जबलपुर हाईकोर्ट ने जिला कोर्ट का फैसला पलटा, उम्र पर सवाल उठाते हुए 20 साल की सजा रद्द

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो कानून और पीड़िता की उम्र निर्धारण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि को संतोषजनक और पुख्ता ढंग से साबित नहीं कर पाता है, तो केवल 'पॉजिटिव डीएनए रिपोर्ट' के आधार पर आरोपी को दोषी मानकर सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट का सवाल, 9 साल में कैसे पास कर ली 10वीं कक्षा? हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्कूल रिकॉर्ड और मार्कशीट में दर्ज पीड़िता की उम्र पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने तार्किक विसंगति को रेखांकित करते हुए कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता ने जुलाई 2014 में एलकेजी में दाखिला लिया था। ऐसे में कोई भी बच्ची महज 9 साल के भीतर (2023 के आसपास) कक्षा 10वीं कैसे उत्तीर्ण कर सकती है? युगलपीठ ने इस विसंगति के चलते 10वीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि जो 27 फरवरी 2007 थी को सही मानने से इनकार कर दिया। क्या है पूरा मामला? दरअसल, सिंगरौली के रहने वाले मुन्ना राम को जिला अदालत ने पीड़िता को नाबालिग मानते हुए पॉक्सो एक्ट सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत अधिकतम 20 साल की जेल की सजा सुनाई थी। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।     जन्मतिथि साबित न हो तो केवल डीएनए रिपोर्ट से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।     जबलपुर हाईकोर्ट ने POCSO मामले में 20 साल की सजा रद्द की।     दसवीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि पर कोर्ट ने जताया संदेह।     मेडिकल रिपोर्ट में जबरन संबंध के स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिले।     अभियोजन उम्र साबित नहीं कर पाया, आरोपी को दोषमुक्त किया। पीड़िता के परिजन के बयानों में विरोधाभास अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के माता-पिता के बयानों में उनकी शादी के साल और पीड़िता के जन्म को लेकर गहरा विरोधाभास था। पिता के अनुसार उनकी शादी 19 साल पहले हुई थी और उसके 1 साल बाद पीड़िता का जन्म हुआ, जबकि मां के अनुसार शादी 20 साल पहले हुई थी और जन्म 2 साल बाद हुआ था। आपसी सहमति से संबंध और मेडिकल रिपोर्ट बनी आधार हाईकोर्ट ने अपने आदेश में नोट किया कि पीड़िता ने खुद अपने बयानों में स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से अपीलकर्ता के साथ बनारस गई थी, जहां दोनों ने शादी की और पति-पत्नी की तरह रहने लगे। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या अंदरूनी चोट के निशान नहीं मिले। प्राइवेसी के उल्लंघन को लेकर भी डॉक्टरों की कोई निश्चित राय नहीं थी। हाईकोर्ट का अंतिम आदेश युगलपीठ ने कहा कि, चूंकि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, इसलिए पीड़िता को घटना के समय बालिग माना जाएगा। चूंकि संबंध आपसी सहमति से बने थे, इसलिए केवल डीएनए रिपोर्ट पॉजिटिव आने से आरोपी अपराधी सिद्ध नहीं होता। हाईकोर्ट ने जिला न्यायालय के आदेश को पूरी तरह निरस्त करते हुए अपीलकर्ता मुन्ना राम को तत्काल दोषमुक्त करने के आदेश जारी किए हैं।  

राम मंदिर और चंद्रशेखर सरकार का अनसुना किस्सा, क्यों कहा जाता है कि राजीव गांधी ने गिरा दी थी सरकार?

 अयोध्या   उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की हलचल है. केंद्र की राजनीति में इंडिया गठबंधन के नाम पर विपक्षी पार्टियां भारी मन से ही सही, लेकिन एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं. ऐसे समय में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की नीतियां और उनकी कही बातें एक बार फिर से मौजूं नजर आने लगी हैं. साल 2026 चंद्रशेखर की 100वीं जयंती है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इस अवसर पर कोई बड़ा आयोजन करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है।  मौजूदा समय में देश की राजनीति में दो घटनाक्रम सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है. पहला मामला क्षेत्रीय पार्टियों का टूटना और दूसरा राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला. दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों मुद्दों में चंद्रशेखर की भूमिका रही है. 17 अप्रैल, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में चंद्रशेखर देश के वो इकलौते नेता हैं जिन्होंने जीवन में कभी भी कोई पद नहीं संभाला, सीधे देश के प्रधानमंत्री बने।  जब इंदिरा गांधी से चंद्रशेखर ने कहा वो कांग्रेस को तोड़ेंगे पहले बात करते हैं छोटी पार्टियों के टूटने की घटना पर. हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में टूट हुई है. याद करा दूं चंद्रशेखर ने भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी जनता दल के 63 सांसदों को तोड़कर नई पार्टी बनाई थी और कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने थे. उस समय राजीव गांधी की अगुवाई में चल रही कांग्रेस ने ही चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री के पद पर बिठाया और बाद में गिरा भी दिया।  राज्य सभा में डिप्टी स्पीकर और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने चंद्रशेखर के जीवन पर किताब लिखी है उसमें, जिक्र है कि 1965 में चंद्रशेखर कांग्रेस में शामिल हुए थे. उनकी भेंट इंदिरा गांधी से हुई. उस समय लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में चल रही सरकार में इंदिरा गांधी सूचना और प्रसारण मंत्री थीं. राजीव गांधी ने चंद्रशेख से पूछा कि वह कांग्रेस में क्यों आए हैं. इस पर, उन्होंने जवाब दिया कि वह कांग्रेस को समाजवादी टर्न देना चाहते हैं. इसपर इंदिरा ने पूछा कि अगर वह सफल नहीं हुए तो क्या करेंगे. तभी चंद्रशेखर ने तपाक से जवाब दिया था- ‘उस मामले में, मैं कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश करूंगा.’ चंद्रशेखर का जवाब सुनकर हैरान होकर इंदिरा गांधी ने पूछा, ‘क्यों?’. इस पर युवा चंद्रशेखर ने कहा, ‘कांग्रेस एक बरगद का पेड़ बन गया है, जिसके नीचे कुछ भी नया नहीं उग सकता।  साल 1969 में जब इंदिरा गांधी ने पुराने कांग्रेसियों से पार्टी को अलग कर नई कांग्रेस बनाने की कोशिश की तो चंद्रशेखर ने सबसे ज्यादा उनकी मदद की थी. आगे चलकर इंदिरा भारतीय राजनीति में दुर्गा कहलाईं और चंद्रशेखर ‘यंग तुर्क’ कहलाए।  राम मंदिर का मुद्दा सुलझाने के कगार पर थे चंद्रशेखर, राजीव गांधी ने रोक दिया! दूसरा राम मंदिर में दान की चोरी का मुद्दा गरमाया हुआ है. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ उनकी बातचीत उन्होंने उनसे पूछा था कि अगर वे 6 दिसंबर 1992 को प्रधानमंत्री होते जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई थी, तो वे क्या करते. इसपर पूर्व पीएम ने कहा कि वे ऐसा कभी नहीं होने देते. लेकिन जब उनसे कहा गया कि अगर कारसेवकों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया होता, तो उस दिन हजारों लोग मारे जाते, तो उन्होंने वही बात दोहराई जो उन्होंने कही थी. वरिष्ठ पत्रकार बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ काम करने वाले अधिकारियों जैसे कैबिनेट सेक्रेटरी नरेश चंद्रा और श्याम सरन, जो बाद में विदेश सचिव बने का भी यही कहना था कि वे इस मुद्दें पर सख्त रुख ही अपनाते।  वो कहती हैं कि कई लोगों का मानना ​​है कि कांग्रेस ने चंद्रशेखर की सरकार इसलिए गिरा दी क्योंकि वे बातचीत के जरिए अयोध्या विवाद को सुलझाने के करीब पहुंच गए थे. चंद्रशेखर विवादित जगह पर मंदिर बनाने के इर्द-गिर्द समझौता कराने में सफल होने वाले थे, लेकिन इस भरोसे के साथ कि विश्व हिंदू परिषद (VHP) भविष्य में काशी और मथुरा जैसे मुद्दे नहीं उठाएगी. 36 साल बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम मंदिर में दान के रुपये की चोरी के मुद्दे को उठाया तो यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने मथुरा में कृष्णजन्मभूमि का मुद्दा उठा दिया है।  वरिष्ठ पत्रकार लिखती हैं कि चंद्रशेखर ने यह महसूस करते हुए कि उनकी अल्पमत सरकार के पास ज्यादा समय नहीं होगा, उन्होंने नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बनने के पहले दिन ही वीएचपी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी दोनों से संपर्क किया था. उस समय, राजीव गांधी को उनके सलाहकारों ने बताया था कि अगर चंद्रशेखर सफल होते हैं, तो वे न केवल देश भर में लोकप्रिय हो जाएंगे, बल्कि कांग्रेस में भी अपनी जगह बना लेंगे, जहां उनकी अच्छी छवि थी, क्योंकि वे कभी इसका हिस्सा थे. इसके तुरंत बाद, हरियाणा के दो सब-इंस्पेक्टर 10 जनपथ के आसपास जासूसी करते हुए पाए गए, और कांग्रेस ने यह काम रोक दिया।  भारत में 14 प्रधानमंत्री हुए हैं. लगभग उतने ही लोग सत्ता के शिखर के करीब पहुंचे, लेकिन टॉप पर नहीं पहुंच पाए. चंद्रशेखर जैसी एक और कैटेगरी थी, जो सबसे ऊंचे पद पर तो पहुंचे लेकिन, ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए, उनका कार्यकाल 223 दिन चला। 

मध्य प्रदेश में मानसून का कहर, शुक्रवार-शनिवार को भारी बारिश का रेड अलर्ट; जानें प्रभावित जिले

भोपाल  कुछ दिनों की देरी से आने के बाद दक्षिण-पश्चिम मॉनसून गुरुवार को मध्य प्रदेश में और भी आगे बढ़ गया और इसके असर से प्रदेश के कई हिस्सों में जोरदार बारिश हो रही है। मौसम विभाग का कहना है कि अगले दो से तीन दिन राज्य के अन्य हिस्सों में भी मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां बेहद अनुकूल हैं। ऐसे में IMD ने प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में जबरदस्त बारिश होने की संभावना जताई है। विभाग ने गुरुवार को प्रदेश के छह जिलों शाजापुर, राजगढ़, पांढुर्णा, छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए इन जिलों में बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी । इस दौरान इन जिलों में 40-50 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से हवा भी चलने की संभावना है। इन जिलों में भारी वर्षा की संभावना इसके अलावा विभाग ने रायसेन, नर्मदापुरम, बैतूल, खरगोन, बड़वानी, धार, रतलाम, देवास, मंदसौर, डिंडोरी, जबलपुर, नरसिंहपुर और मंडला जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी करते हुए इन जिलों में 40 से 50 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से हवा चलने के साथ ही गरज-चमक के साथ भारी वर्षा होने की संभावना जताई है। जबकि प्रदेश के अन्य जिलों में झंझावत और बिजली गिरने के साथ ही 40 से 50 की स्पीड से हवा चलने का अनुमान लगाया है। 3 जुलाई (शुक्रवार) के लिए मौसम विभाग ने प्रदेश के हरदा और खंडवा जिलों के लिए भारी से भी भारी बारिश (204.5 MM से ज्यादा) का रेड अलर्ट जारी किया है। वहीं धार, बड़वानी, खरगोन, देवास, बुरहानपुर और बैतूल जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। इस दौरान इन पांचों जिलों में बहुत भारी बारिश (115.6 MM से 204.4 MM) होने की संभावना जताई है। इसके अलावा प्रदेश के अन्य जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी करते हुए यहां बिजली गिरने का अनुमान लगाया है। इसके साथ ही विभाग ने पूरे प्रदेश में 40 से 50 की स्पीड से हवा चलने का अनुमान लगाया है। 4 जुलाई (शनिवार) के लिए मौसम विभाग ने तीन जिलों धार, बड़वानी और खरगोन के लिए रेड अलर्ट जारी करते हुए यहां भारी से बहुत भारी वर्षा (204.5 MM से ज्यादा) का अनुमान लगाया है, वहीं झाबुआ, अलीराजपुर और बुरहानपुर जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए भारी बारिश (115.6 MM से 204.4 MM) की चेतावनी जारी की है। इसके अलावा प्रदेश के अन्य जिलों के लिए विभाग ने येलो अलर्ट जारी किया है और इस दौरान रतलाम, उज्जैन, इंदौर, देवास, खंडवा, सीहोर, हरदा, नर्मदापुरम, बैतूल, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। साथ ही पूरे प्रदेश में 40 से 50 की गति से तेज हवा चलने का अनुमान लगाया है। बीते दिन केवलारी में हुई 166 मिमी बारिश बीते दिन के मौसम की बात करें तो प्रदेश में सबसे ज्यादा अधिकतम तापमान 37.6 डिग्री सेल्सियस रतलाम में दर्ज किया गया, जबकि सबसे कम न्यूनतम तापमान 20.2 डिग्री सेल्सियस पचमढ़ी में रिकॉर्ड किया गया। इस दौरान सबसे ज्यादा बारिश सिवनी जिले के केवलारी 166 मिली मीटर और चांद 140 मिमी दर्ज की गई। वहीं मुलताई में 112.0, सिंगरौली में 104.0, जैसीनगर में 102.1, उज्जैन में 101.0, बिछुआ में 100.0, नैनपुर में 96.6, पीथमपुर में 87.0, बेनीबारी में 83.6, पांढुर्णा में 78.3, सांवेर में 72.5, चौराई में 68.0, मंडला में 65.8, बदनावर में 65.1, कसरावद में 65 मिली मीटर वर्षा दर्ज की गई। मौसम की विशेष परिस्थितियां दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2 जुलाई को गुजरात के कुछ और भागों, उत्तर प्रदेश के शेष भागों, संपूर्ण दिल्ली तथा मध्य प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब के अधिकांश भागों तथा राजस्थान के कुछ भागों में आगे बढ़ गया है। फिलहाल मॉनसून की उत्तरी सीमा पोरबंदर, वल्लभ विद्यानगर, नीमच, टोंक, भिवानी और भटिंडा से होकर गुजर रही है।

Modi Cabinet Reshuffle: किन मंत्रियों की होगी छुट्टी, किसे मिलेगा मौका? 4 बड़े समीकरणों से तय होगा फैसला

 नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार बहुत जल्द होने जा रहा है. पीएम मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में पहली बार कैबिनेट विस्तार के साथ कई मंत्रियों के विभाग में फेरबदल कर सकते हैं, जिसकी स्क्रिप्ट लिख जा रही है. केंद्रीय सचिवों संग प्रधानमंत्री की बैठक को मंत्रिमंडल विस्तार के साथ छोड़कर देखा जा रहा है।  पीएम मोदी की केंद्रीय सचिवों के साथ हुई बैठक में उनके विभागों का रिपोर्ट कार्ड लिए हैं ताकि पता चल सके कि किसने कितने कदम उठाए? केंद्रीय सचिवों को आगे के रोडमैप के लिए प्रधानमंत्री तैयार कर रहे हैं, जिन्हें अमलीजामा पहनाने के नई कैबिनेट बनने जा रही हैं। मोदी कैबिनेट विस्तार की फेहरबदल होने का कारण है यह कि 9 मंत्री पद पहले खाली हैं. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी यूपी और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं. जार्ज कुरियन मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं और रवनीत सिंह बिट्टू बहुत जल्द ही कुर्सी छोड़ सकते हैं. इसके अलावा कई दलों के बागी सांसद का सियासी मिजाज बदलता है, जिसके चलते कैबिनेट विस्तार के कयास लगाए जा रहे?  मोदी कैबिनेट का कब होगा विस्तार मानसून सत्र से पहले पांच जुलाई या फिर पीएम मोदी के 3 देशों की यात्रा से 11 जुलाई को लौटने के बाद कभी भी मंत्रिमंडल का विस्तार किया जा सकता है.केंद्रीय सचिवों की बैठक करते प्रधानमंत्री ने क्या यह भी तय कर लिया है कि जो जिम्मेदारी वो मंत्रिमंडल में फेरबदल करके देने वाले हैं, उससे पहले सचिवों की टीम का खाका तैयार हो जाए।  मोदी सरकार का मंत्रिमंडल अभी देखें तो प्रधानमंत्री 30 कैबिनेट मंत्री 5 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) 36 राज्यमंत्री हैं. इस तरह कुल 72  मंत्री हैं, लेकिन लोकसभा सांसदों के लिहाज से केंद्र सरकार में अधिकतम 81 मंत्री हो सकते हैं. इस तरह से 9 मंत्री पद अभी खाली हैं और जॉर्ज कुरियन इस्तीफा दे चुके हैं. इस लिहाज से दस मंत्री पद तो साफ साफ खाली हैं।   केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो सदस्य पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं, जिनकी कैबिनेट से छुट्टी हो सकती हैं. इसके अलावा दो मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जार्ज कुरियन का राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होना है. इनमें कुरियन ने इस्तीफा दे दिया और जल्द ही रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री पद छोड़ सकते हैं. इसके अलावा कुछ मंत्री की छुट्टी उनकी खराब परफॉर्मेंस की वजह से हो सकती है।  कैबिनेट विस्तार में क्या बागी फैक्टर का रोल?  मोदी कैबिनेट विस्तार में में पुराने दोस्तों का कोटा बढ़ेंगे या नए समर्थक सांसदों को मिलेगी एंट्री? आम आदमी पार्टी से लेकर टीएमसी से और शिवसेना (यूबीटी) के जिन बागी सांसदों ने मोदी सरकार का समर्थन कर चुके हैं, उनमें से किसे-किसे मंत्री पद मिलेगा?  ममता बनर्जी की पार्टी के बीस बागी लोकसभा सांसद स्पीकर से मिलकर बताते हैं कि वो एनसीपीआई नाम की पार्टी में शामिल हो चुके हैं और देश के विकास में योगदान के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को समर्थन करते हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों का बीजेपी में शामिल होना और शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सदस्यों का एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना में शामिल होकर सत्तापक्ष की संख्याबल में इजाफा किया है।  सहयोगी दलों को सियासी अहमियत मिलेगी बागी सांसदों के समर्थन में आने से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की संख्याबल बढ़ गई.  टीएमसी के 20 बागी सांसद के साथ आने से एनडीए के समर्थन करने वाली सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन चुकी है. टीएमसी के बागी सांसद अब नीतीश, नायडू की पार्टी से भी ज्यादा हैं, जिसमें से मोदी सरकार किसे मंत्री बनाएगी. इसके अलावा राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के साथ टूटकर आए नेताओं में से किसी को मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है।  उद्धव ठाकरे की पार्टी छोड़कर शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं, जिनकी पार्टी की संसद में राजनीतिक ताकत बढ़ने पर मुहर खुद गृह मंत्री अमित शाह तक लगा चुके हैं. ऐसे में मोदी मंत्रिमंडल में क्या शिंदे के खाते में नए मंत्री पद वाली ताकत बढ़ेगी? शिवसेना शिंदे के सांसदों की संख्या अब 13 हो चुकी है, जो जेडीयू से ज्यादा सांसद हो चुके हैं. जेडीयू को अभी दो सीट एक कैबिनेट, एक राज्य मंत्री की मिली है. इसी तरह टीडीपी से दो मंत्री हैं,जिसके चलते शिंदे की पार्टी का कोटा क्या बढ़ेगा।  चुनावी राज्यों का फैक्टर का रखा जाएगा ख्याल? मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार-फेरबदल का दूसरा कारण अगले वर्ष सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. यूपी, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव है. पंजाब और हिमाचल को छोड़कर सभी राज्य में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में चुनावी राज्यों के सियासी समीकरण को साधे रखने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है।  केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि मंत्रियों के लगभग दो साल के कामकाज की समीक्षा संभावित थी. इस समीक्षा के तहत मंत्री पदोन्नत या पदावनत हो सकते हैं. यूपी से अभी 10 मंत्री हैं तो हिमाचल और उत्तराखंड से एक-एक मंत्री हैं. इसके अलावा पंजाब कोटे से रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री हैं, जिनकी जगह पर किसी नए चेहरो को लाया जा सकता है।   सामाजिक समीकरण के फैक्टर का ख्याल सियासत में कोई भी पार्टी हो या सरकार, उसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को साधना होता है. माना जा रहा है कि मोदी सरकार भी कैबिनेट विस्तार में अपने मंत्रियों का चयन करते समय सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के फैक्टर का खास ख्याल रखेगी. हालांकि, ऐसा करते समय योग्यता को प्रथम वरीयता दी जा सकती है,क्योंकि कोई सरकार अपने मंत्रियों के कामकाज के आधार पर ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में समर्थ हो सकती है।  सियासत और सरकार में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो केवल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों में संतुलन बैठाने का काम करते हैं, जिसे मोदी सरकार के लिए अपने मंत्री कसौटी पर खरे साबित करने की है. दलित और ओबीसी की सियासत जिस तरह से विपक्ष उठा रहा, उसके लिहाज से कैबिनेट का गठन किया जा सकता है। 

AMCA के जरिए भारत मजबूत करेगा एयर पावर, 100 कंपनियों की होगी भागीदारी; नतीजों में लगेगा समय

बेंगलुरु  भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) सिर्फ एक नया लड़ाकू विमान नहीं है. इसे भारत के रक्षा उद्योग के लिए उस बुनियादी बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, जो आने वाले एक-दो दशकों में देश को पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट बनाने में आत्मनिर्भर बना सकता है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक आगे बढ़ता है तो भविष्य में भारत अपेक्षाकृत कम लागत पर अमेरिका के F-35 जैसी श्रेणी के आधुनिक लड़ाकू विमान विकसित और निर्मित करने की भी क्षमता हासिल कर सकता है।  हालांकि, यह लक्ष्य रातोंरात हासिल नहीं होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि AMCA का असली परिणाम अगले कुछ वर्षों में नहीं, बल्कि अगले 10 से 20 वर्षों में दिखाई देगा. लेकिन जिस औद्योगिक ढांचे की नींव आज रखी जा रही है, वही भारत के भविष्य के सैन्य विमानन उद्योग की सबसे बड़ी ताकत बनेगी।  सिर्फ फाइटर जेट नहीं, पूरा इकोसिस्टम तैयार हो रहा अब तक भारत के अधिकांश लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में सरकारी कंपनियों की भूमिका सबसे प्रमुख रही है. लेकिन AMCA इस मॉडल को बदल रहा है. रक्षा मंत्रालय ने पहली बार निजी क्षेत्र के कंसोर्टियम को फ्रंटलाइन फाइटर जेट के प्रोटोटाइप निर्माण के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है. यानी सरकार अब सिर्फ विमान नहीं बनाना चाहती, बल्कि उसके पीछे ऐसा औद्योगिक नेटवर्क खड़ा करना चाहती है जिसमें 100 से अधिक भारतीय कंपनियां अलग-अलग तकनीकों पर काम करें. यही मॉडल अमेरिका और यूरोप के रक्षा उद्योगों की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।  क्यों महत्वपूर्ण हैं 100 कंपनियां? किसी 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान का निर्माण केवल एयरफ्रेम बनाने तक सीमित नहीं होता. इसमें हजारों अलग-अलग पुर्जे, सॉफ्टवेयर, सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, इंजन, कंपोजिट मटेरियल और मिशन कंप्यूटर शामिल होते हैं. AMCA परियोजना में बड़ी कंपनियों के साथ-साथ टियर-1, टियर-2 और टियर-3 सप्लायरों का विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।  एयरफ्रेम और कंपोजिट स्ट्रक्चर के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी, डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज, काइनेको एयरोस्पेस और टाटा एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसी कंपनियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. रडार, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के क्षेत्र में एलआरडीई, एस्ट्रा माइक्रोवेव, डेटा पैटर्न्स और अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज जैसी संस्थाएं योगदान देंगी. वहीं इंजन सपोर्ट इकोसिस्टम विकसित करने में गोदरेज एयरोस्पेस, एमटीएआर टेक्नोलॉजीज और वालचंदनगर इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।  F-35 जैसी क्षमता का रास्ता दुनिया में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाना बेहद जटिल और महंगा काम माना जाता है. अमेरिका का F-35 कार्यक्रम इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. इस परियोजना में हजारों कंपनियां और दशकों का अनुसंधान शामिल रहा है. भारत फिलहाल उसी स्तर पर नहीं है, लेकिन AMCA के जरिए वह उसी दिशा में बुनियादी क्षमता विकसित कर रहा है।  स्टील्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, सेंसर फ्यूजन, एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और एआई आधारित प्रणालियां- ये सभी तकनीकें AMCA का हिस्सा होंगी. एक बार भारतीय उद्योग इन तकनीकों में दक्ष हो गया तो भविष्य के और अधिक उन्नत विमानों का विकास अपेक्षाकृत कम लागत और कम विदेशी निर्भरता के साथ किया जा सकेगा. यही वजह है कि कई रक्षा विशेषज्ञ AMCA को केवल एक विमान नहीं, बल्कि भारत का फ्यूचर एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म मान रहे हैं।  इंजन अभी विदेशी, लेकिन लक्ष्य आत्मनिर्भरता AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिका के GE-F414 इंजन लगाए जाएंगे. इस संबंध में सह-उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर बातचीत भी आगे बढ़ चुकी है. हालांकि, भारत का अंतिम लक्ष्य केवल विदेशी इंजन पर निर्भर रहना नहीं है. समानांतर रूप से स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित करने और इंजन निर्माण की घरेलू क्षमता बढ़ाने पर भी काम जारी है. यानी शुरुआत विदेशी तकनीक से होगी, लेकिन मंजिल पूरी तरह स्वदेशी क्षमता हासिल करना है।  परिणाम आने में क्यों लगेगा समय? रक्षा परियोजनाओं में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का विकास और परीक्षण होता है. सरकार की योजना के अनुसार निजी भागीदार के चयन के बाद पांच उड़ान योग्य प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे. लक्ष्य है कि पहला प्रोटोटाइप 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक तैयार हो और पहली उड़ान 2028 में हो. इसके बाद व्यापक परीक्षण, हथियारों का एकीकरण, स्टील्थ सत्यापन और विभिन्न परिस्थितियों में उड़ान परीक्षण होंगे. यही वजह है कि वास्तविक परिचालन क्षमता हासिल करने में कई वर्ष लग सकते हैं. लेकिन, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में सबसे बड़ी उपलब्धि अंतिम विमान नहीं, बल्कि उसके निर्माण के दौरान विकसित होने वाला औद्योगिक और तकनीकी आधार होता है।  आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की सबसे बड़ी परीक्षा AMCA देश की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ रणनीति की सबसे कठिन परीक्षा भी होगी. यदि यह कार्यक्रम सफल रहता है तो भारत केवल अपनी वायुसेना की जरूरतें पूरी नहीं करेगा, बल्कि भविष्य में वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है. इससे देश में उच्च तकनीक विनिर्माण, अनुसंधान, रोजगार और निर्यात के नए अवसर पैदा होंगे.आज जिन 100 से अधिक कंपनियों को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, वही आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता की रीढ़ बन सकती हैं. इसलिए AMCA को केवल एक विमान परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि उस नींव के रूप में देखा जाना चाहिए। 

Monsoon Session 2026: दो-तिहाई बहुमत की तैयारी में NDA, शरद पवार गुट के 8 सांसद बने चर्चा का केंद्र

 नई दिल्ली संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने वाला है और इससे पहले सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) दो तिहाई बहुमत जुटाने की जुगत में जुटा हुआ है. पहले तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के पाला बदल और फिर उद्धव ठाकरे की पार्टी के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की पार्टी में शामिल होने के बाद अब एनडीए की नजर शिवसेना (यूबीटी) की गठबंधन सहयोगी शरद पवार की पार्टी के सांसदों पर है।  सूत्रों की मानें तो एनसीपी (शरद पवार) के लोकसभा में आठ सांसद एनडीए के संपर्क में हैं. हालांकि, इसे लेकर अभी कुछ भी तय नहीं है कि इस सांसदों का ठिकाना कौन सी पार्टी होगी. एनडीए की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इन सांसदों को लेने के लिए तैयार नहीं है. बीजेपी नेतृत्व ने इनमें से किसी को मंत्री पद देने के कयास भी खारिज कर दिए हैं।  शरद पवार की पार्टी के सांसद भविष्य में सुनेत्रा परिवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में जा सकते हैं. एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावनाएं फिलहाल नकारी जा रही हैं. एनसीपी (शरद पवार) के सांसदों की बगावत के पीछे पार्टी के कांग्रेस में विलय के कयासों को वजह बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि कांग्रेस में विलय की अटकलों से शरद पवार की पार्टी के सांसदों में बेचैनी है।  एनसीपी शरद गुट में बेचैनी  दरअसल, कांग्रेस और एनसीपी शरद पवार के विलय की अटकलों से भी इन सांसदों में बेचैनी की बात कही जा रही है. वे 2029 के लोक सभा चुनाव में अपनी संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नहीं बताए जा रहे हैं. इनमें से कई का मानना है कि कांग्रेस में विलय से शायद उनकी संसद में वापसी की संभावना प्रबल न रहे. इनमें से एक सांसद ने बताया कि वैसे भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव तीन साल दूर हैं. ऐसे में राज्य और केंद्र दोनों सरकारों से दूरी बनाना और उनका विरोध करना उनके संसदीय क्षेत्रों में उन्हें कठिनाई पैदा कर रहा है।    परिसीमन बिल पर सरकार का देंगे साथ? सूत्रों के अनुसार महिला आरक्षण और परिसीमन के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर एनसीपी शरद पवार के इन सांसदों के समर्थन के रास्ते तलाशे जा रहे हैं. यह पता लगाया जा रहा है कि क्या वे संविधान संशोधन विधेयकों का समर्थन कर सकते हैं या फिर मतदान के दौरान अनुपस्थित रह कर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा कम करने में सरकार की मदद कर सकते हैं. एक नेता के अनुसार महाराष्ट्र में शरद पवार ने मुख्यमंत्री रहते हुए ही सबसे पहले महिला आरक्षण का कदम उठाया गया था. स्थानीय स्वशासन निकायों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था. ऐसे में सैद्धांतिक तौर पर एनसीपी शरद पवार को इस बिल का समर्थन करने में परेशानी नहीं आनी चाहिए।    शरद गुट में टूट की संभावना नहीं  यह कहा जा रहा है कि शिवसेना यूबीटी के छह सांसदों की ही तरह एनसीपी शरद पवार के सांसदों के टूट कर विलय की संभावना फिलहाल नहीं है. बीजेपी नेतृत्व भी इसके पक्ष में नहीं बताया जा रहा है. पार्टी नेतृत्व शरद पवार और सुप्रिया सुले से दूरी बना कर रखना चाहता है. ऐसे में उन अटकलों को खारिज कर दिया गया है कि एनडीए को समर्थन के बदले एनसीपी शरद पवार के नेताओं को केंद्र में मंत्री पद दिया जा सकता है।  फिलहाल अजित गुट के साथ विलय नहीं  दूसरी ओर एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की संभावना को फिलहाल नकार दिया गया है. एनसीपी अजित पवार के नेताओं के मुताबिक अजित पवार के निधन के बाद से ही इस बारे में बात आगे नहीं बढ़ी है. कांग्रेस में एनसीपी शरद पवार के विलय की अटकलों ने इन संभावनाओं पर फिलहाल पूरी तरह से रोक भी लगा दी है. हालांकि, आगे चल कर एनसीपी शरद पवार के लोक सभा सांसदों के एनसीपी अजित पवार में विलय की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।  शरद पवार की पार्टी के सांसद 2029 के लोकसभा चुनाव में अपने टिकट को लेकर सशंकित हैं. एनसीपी (एसपी) के कुछ सांसदों का यह भी कहना है कि केंद्र में एनडीए की सरकार है ही, महाराष्ट्र में भी एनडीए ही सत्ता में है. ऐसे में उनको अपने क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कराने, विकास कार्य कराने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।  इन सबके बीच चर्चा इस बात की है कि शरद पवार की अगुवाई वाली पार्टी के सांसदों का समर्थन किस तरह से एनडीए ले सकता है, इसकी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. इस पूरी कवायद के पीछे महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिशें हैं। 

Indus Water Dispute: सिंधु पर PAK की दलीलों का भारत ने दिया जवाब, अमेरिका-रूस-चीन का उदाहरण बना आधार

नई दिल्ली सिंधु जल समझौते पर पाकिस्तान बिलबिला रहा है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस समझौते को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है. अब पाकिस्तान गीदड भभकियां दे रहा है, और सीधे तौर पर हिंसा का सहारा लेने की बात कर रहा है. लेकिन बड़बोले पाकिस्तान को ये पता नहीं है कि भारत के पास अमेरिका, रूस और चीन द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक तर्क है. इसी तर्क का सहारा लेकर ये तीनों बड़े देश अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गए और अपनी राष्ट्रीय चिंताओं और हित को ज्यादा तवज्जो दी।  अभी हाल ही में पाकिस्तान के मंत्री ने अताउल्लाह तरार ने एक सेमिनार में कहा है कि भारत इंडस वॉटर ट्रीटी (IWT) यानी सिंधु जल समझौते को संशोधित, रद्द या निलंबित नहीं कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान ने भारत की चिंता आतंकवाद पर मुंह सिल लिया है।  हालांकि भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े देशों द्वारा किए गए समझौतों के उल्लंघन के उदाहरण देकर भारत के वैध अधिकार पर जोर दिया है और कहा है कि भारत को आतंकवाद को लेकर अपनी चिंता दूर करने के लिए हर कदम उठाने का अधिकार है।  पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रिटायर्ड) ने एक्स पर ट्वीट कर कहा कि अगर अमेरिका JCPOA से हट सकता है, रूस INF ट्रीटी से दूर जा सकता है और चीन दक्षिण चीन सागर पर हेग के फैसले को खारिज कर सकता है, तो भारत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में IWT को अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है।  कहने का अर्थ है कि दुनिया की बड़ी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों को तब नज़रअंदाज़ किया या उनसे बाहर निकल गए, जब वे उनके राष्ट्रीय हितों के काम के नहीं रहे. रक्षा विशेषज्ञ पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रि) का कहना है कि ताकतवर देश संधियों का सख्ती से पालन करने के बजाय रणनीतिक/राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों को ज़्यादा अहमियत देते हैं, इसलिए भारत भी IWT के मामले में ऐसा कर सकता है।  सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और Pakistan के बीच हुआ एक ऐतिहासिक जल-बंटवारा समझौता है, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी. इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया. रावी, ब्यास और सतलुज का अधिकांश जल भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चेनाब का मुख्य उपयोग पाकिस्तान को दिया गया।  पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भारत लंबे समय से इस समझौते की समीक्षा की मांग कर रहा है।  आइए समझते हैं कि दुनिया की बड़ी ताकतें कब अपने राष्ट्रीय हित में अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गईं।  ईरान डील (JCPOA) से 2018 में अलग हुआ अमेरिका  क्या हुआ: राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका 2015 के 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन' (JCPOA) से 2018 में एकतरफ़ा तौर पर खुद को अलग कर लिया और दूसरे हस्ताक्षरकर्ताओं (UK, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन, EU) के विरोध के बावजूद फिर से ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए।  अमेरिका क्या तर्क दिए: अमेरिका का तर्क था कि यह डील बुनियादी तौर पर खराब थी. ट्रंप ने इसे अबतक का सबसे खराब डील कहा. अमेरिका का कहना है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी गतिविधियों और "सनसेट क्लॉज़" (समय-सीमा वाली शर्तें) जैसे मुद्दों को ठीक से नहीं सुलझाया गया था, जिनकी वजह से ईरान को आगे चलकर एडवांस्ड न्यूक्लियर काम फिर से शुरू करने की इजाज़त मिल जाती. ट्रंप इसे एक बुरा सौदा मानते थे जिससे ईरान तो मजबूत हुआ, लेकिन उसके न्यूक्लियर इरादों या अमेरिका के सहयोगियों पर कोई खास रोक नहीं लगी. इसे एक राजनीतिक प्रतिबद्धता माना गया जिसका लागू होना अमेरिका की इच्छाशक्ति पर निर्भर था. मौका देखकर अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया. 2025-2026 में इसी मुद्दे को लेकर भयंकर युद्ध हुआ है।  INF (Intermediate-Range Nuclear Forces) से बाहर निकला रूस  क्या हुआ: अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देश भी अंतरराष्ट्रीय संधियों का अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते रहे हैं. 1987 में अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच एक समझौता हुआ. यह एक परमाणु नियंत्रण समझौता था, इसमें 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था. यह शीत युद्ध को कम करने वाला ऐतिहासिक समझौता था।  इसके बावजूद दोनों देश अपने मिशन पर गुप्त रूप से लगे रहे. अमेरिका ने 2019 में अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछ हट गया. फिर रूस ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद'इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस ट्रीटी' खत्म हो गई।  दोनों देशों ने क्या तर्क दिए: अमेरिका ने रूस पर संधि का गंभीर उल्लंघन करने का आरोप लगाया और कहा कि रूस प्रतिबंधित 9M729/SSC-8 मिसाइल बना रहा है।  रूस ने तर्क दिया कि अमेरिका/नाटो की गतिविधियों (जैसे यूरोप में मिसाइल डिफेंस सिस्टम) और सुरक्षा के बदलते माहौल के कारण यह संधि अब पुरानी हो चुकी है. चीन द्वारा बिना किसी रोक-टोक के इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलें बनाई जा रही हैं. इसलिए अब इस संधि का कोई मतलब नहीं है. यानी कि इस संधि को लेकर किसी देश की प्रतिबद्धता नहीं थी।  दोनों पक्षों ने संधि का पालन करना बंद कर दिया, जिससे यह संधि खत्म हो गई।  UN संधि के फैसले को चीन ने ठुकराया क्या हुआ दुनिया की एक और महाशक्ति चीन भी अपनी सुविधा के अनुसार ही संधियों का पालन किया. फ़िलीपींस की ओर से लाए गए एक मामले में  UNCLOS ने चीन के खिलाफ फैसला सुनाया और दक्षिण चीन सागर में चीन की ओर से कृत्रिम द्वीप बनाने को गलत करार दिया. चीन ने इस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया. UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) संयुक्त राष्ट्र का समुद्री कानून पर अंतरराष्ट्रीय संधि है।  चीन ने क्या तर्क दिया: चीन ने कभी भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया. उसका तर्क था कि इस विवाद में संप्रभुता का मामला शामिल है, जिस पर ट्रिब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता है. और द्विपक्षीय बातचीत ही सही रास्ता है. उसने इस फैसले को गैर-कानूनी और राजनीतिक मकसद से प्रेरित माना और कहा कि यह उसकी "निर्विवाद" क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं है. इसके बावजूद चीन ने अपनी गतिविधियां जारी रखीं।  ये उदाहरण दिखाते … Read more