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जहां मर्द भी गांव छोड़ते थे, अब सुरक्षा बलों की कार्रवाई से हुई बदलाव

जमुई
 बिहार के जमुई जिला का वो इलाका जिसे नक्सल समस्या के कारण लाल गलियारा की संज्ञा दी जाती थी. जिस इलाके से सटे जंगल में मुंगेर के तत्कालीन एसपी केसी सुरेंद्र बाबू विस्फोट में शहीद हो गए थे. जिस इलाके के मर्द नक्सली खौफ के कारण दूसरे जगहों पर पलायन कर जाते थे. वहां अब सूरत बदलने लगी है. सीआरपीएफ के कैम्प आने के बाद तीन नक्सलियों के सरेंडर से लाल गलियारा में चहल पहल बढ़ गई. पलायन किए लोग गांव लौट आए हैं अब इंतजार है विकास का. सुरक्षा के बाद अब यहां बात होने लगी है बिजली, सड़क, शिक्षा और संचार सुविधा की.

जमुई जिले के बरहट इलाके का चौरमारा गांव जो जंगलों और पहाड़ों से घिरा है. जहां दशकों से नक्सलियों का बोलबाला था. लाल गलियारे कहे जाने वाले इसी जंगली इलाके की सड़क पर नक्सलियों द्वारा किए गए एक विस्फोट में मुंगेर के तत्कालीन एसपी केसी सुरेंद्र बाबू शहीद हो गए थे. अब वहां नक्सल समस्या खत्म हो चली है, चौरमारा वाले इस इलाके में अब विकास की बात की जा रही है. नक्सलियों के खौफ के कारण जो लोग पलायन कर गए थे वह गांव लौट आए हैं. चौरमारा गांव के नागेश्वर कोड़ा की कहानी भी ऐसी ही है. नक्सलियों के डर और खौफ के कारण नागेश्वर गांव छोड़कर दूसरे महानगर में चले गए थे, जबकि उनकी पत्नी संगीता देवी गांव में ही रही.

लोगों को बुरी तरह पीटते थे नक्सली 
संगीता देवी का सामना कई बार नक्सलियों के दस्ते से हुआ, जो गांव में अक्सर आकर अत्याचार करते थे. नक्सली खौफ के खात्मे के बाद यह दंपति उन घटनाओं को याद कर अभी भी सहम जाते हैं. संगीता बताती हैं कि कई बार हमारे सामने ही नक्सली लोगों को मारते-पीटते थे. जबरन साथ में बंधक बनाकर ले जाते और अपना काम कराते थे. मना करने पर लोगों को पीट-पीटकर घायल कर देते थे. उनके पति नागेश्वर बताते हैं कि मारपीट और अत्याचार की घटनाओं से डरकर उन्हें गांव छोड़ना पड़ गया था.

कई लोगों ने छोड़ दिया था गांव 
सिर्फ नागेश्वर कोड़ा ही नहीं गांव के अधिकांश मर्द जान जाने के डर और नक्सलियों की पिटाई के खौफ के कारण गांव से पलायन कर गए थे, अब वापस आ चुके हैं. यह सब संभव हुआ जब गांव में सरकार ने सीआरपीएफ कैंप लगा दी. पैरा मिलिट्री फोर्सेज की तैनाती के बाद इस इलाके में नक्सलियों का खौफ तब और खत्म हो गया जब यहां के हार्डकोर तीन नक्सली कमांडर ने सरेंडर कर दिया. सुरक्षा के बाद अब यहां के लोग विकास मांग रहे हैं, गांव में अभी तक बिजली नहीं, संचार की कोई सुविधा नहीं, गांव जाने वाली सड़क कच्ची है. हालांकि कई दशक के बाद यहां के लोग पहली बार अपना वोट गांव में डालें, सरकारी अनाज अब गांव तक पहुंचने लगा, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतरी की मांग हो रही है. जंगल में बसे चोरमारा की आबादी लगभग 4 हजार है. नक्सली खौफ के खात्मे के बाद विकास की मांग पर सरकार और जिला प्रशासन की गंभीर है. जिले के डीएम का कहना है कि बिजली संचार सड़क शिक्षा जैसी चीजों पर काम हो रही है आने वाले दिनों में जल्द ही बेहतर परिणाम देखे जाएंगे.

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