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‘भ्रष्टाचार की फेहरिस्त बताऊंगा तो जमीन खिसक जाएगी’, CM भजनलाल पर गहलोत का पलटवार

जयपुर राजस्थान की राजनीति में त्योहारी सीजन के बीच बड़ा भूचाल आ गया है। जोधपुर में आयोजित एक पदयात्रा के दौरान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर लगाए गए गंभीर व्यक्तिगत और प्रशासनिक आरोपों के बाद प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच तीखा जुबानी जंग शुरू हो गई है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री ने गहलोत पर पेपर लीक गिरोह, आरपीएससी सदस्य नियुक्तियों में लेन-देन और पुराने व्यापार को लेकर तल्ख हमले बोले, वहीं पलटवार करते हुए पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने आरोपों को कपोल-कल्पित और झूठा करार देते हुए मुख्यमंत्री को 24 घंटे के भीतर तथ्य सार्वजनिक करने या माफी मांगने का अल्टीमेटम दे दिया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का बड़ा हमला, 'जो हाथ भ्रष्टाचार करेगा, काट दिया जाएगा' दिया कुमारी से बहस करते शिखर अग्रवाल की पुरानी तस्वीर जोधपुर में पदयात्रा के दौरान मीडिया और जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा, 'अरे गहलोत साहब, पूरी तरह से सुन लीजिए। अगर बायां हाथ गलती करेगा, भ्रष्टाचार करेगा तो बाएं हाथ को काट दिया जाएगा। अगर दायां हाथ भ्रष्टाचार करेगा तो दायां हाथ काट दिया जाएगा। यह ब्रजवासी है, किसान का बेटा है… भ्रष्टाचार की पूरी फेहरिस्त बताऊंगा तो आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। मैं किसी को छोड़ता नहीं, ब्याज सहित चुकाता हूं।" सीएम भजनलाल द्वारा लगाए गए मुख्य आरोप पेपर लीक और सीएमओ के तार: सीएम ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान हुए पेपर लीक गिरोह के तार पूर्व सीएमओ के ओएसडी शशिकांत और पीएसओ राजकुमार यादव से जुड़े हुए थे। आरपीएससी नियुक्तियां: पैसों के लेन-देन के आधार पर राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के सदस्यों की नियुक्तियां की गईं। व्यापारिक आरोप: पुराने खाद-बीज कारोबार में नकली माल बेचकर किसानों को लूटने का काम किया गया। 24 घंटे में सबूत दें या माफी मांगें: पूर्व सीएम अशोक गहलोत मुख्यमंत्री के तीखे बयानों पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कड़ी प्रतिक्रिया दी। गहलोत ने कहा कि मुख्यमंत्री अपराधबोध और बौखलाहट में आकर भाषा की मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ रहे हैं और जनता को भ्रमित करने का असफल प्रयास कर रहे हैं। "मुख्यमंत्री जी अपने आरोपों का विस्तृत विवरण, तथ्य और दस्तावेज मुझे भी दें और प्रदेश की जनता के सामने भी रखें, अन्यथा 24 घंटे के भीतर अपने दिए गए बयान के लिए माफी मांगें।"- अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री IAS शिखर अग्रवाल प्रकरण व अनंता रिसॉर्ट पर घेरा आइएएस शिखर अग्रवाल और अनंता रिसॉर्ट्स विवाद का जिक्र करते हुए गहलोत ने सवाल दागा, 'अनंता रिसॉर्ट को विशेष छूट देने वाले बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट के अध्यक्ष खुद मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में उस कंपनी को विशेष पैकेज दिए जाने में उनकी क्या भूमिका रही, इसका जवाब दें? 'सरकार यदि पारदर्शी है तो इस पूरे हाई-प्रोफाइल मामले की जांच एसीबी (ACB) के बजाय केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) को क्यों नहीं सौंप रही है?' बेढ़म बनाम टीकाराम जूली: खान आवंटन पर घमासान इस सियासी आतिशबाजी के बीच दोनों पक्षों के वरिष्ठ नेता भी खुलकर मैदान में आ गए हैं: गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढ़म का आरोप: उन्होंने जोधपुर के बड़ा कांटेचा गांव में 37 खनन लीज में से 16 लीज गहलोत के रिश्तेदारों को आवंटित किए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि विवाद बढ़ने पर उस वक्त सरकार को इन्हें निरस्त करना पड़ा था, जिसका जवाब गहलोत को देना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली का बचाव: टीकाराम जूली ने मुख्यमंत्री के बयानों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि अशोक गहलोत का सार्वजनिक जीवन दशकों से बेदाग और अनुकरणीय रहा है। मुख्यमंत्री के इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयान राजस्थान की स्वस्थ राजनीतिक परंपरा और स्तर को गिराने वाले हैं, जिसके लिए उन्हें तत्काल माफी मांगनी चाहिए।

दिल्ली की वोट चोरी रैली से गैरहाजिर रहे 9 जिलाध्यक्ष समेत 60 पदाधिकारियों पर कार्रवाई

भोपाल मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक नवंबर को आयोजित कांग्रेस की 'वोट चोरी' रैली में शामिल न होने वाले 60 पदाधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया है। संगठन ने निलंबन आदेश जारी करके इन सभी पदाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से आगामी आदेश तक पद से हटा दिया है। भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से मिले निर्देशों के अनुपालन में मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस ने यह कदम उठाया है। अनुशासनहीनता पर सख्त कार्रवाई आदेश में कहा गया है कि दिल्ली में आयोजित 'वोट चोरी' रैली से अनुपस्थित रहने के कारण संगठनात्मक अनुशासनहीनता सामने आई है। इसी वजह से राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देश पर यह कार्रवाई की गई है। निलंबित 60 पदाधिकारियों में नौ जिलाध्यक्ष, पांच उपाध्यक्ष, 14 महासचिव और 32 सचिव शामिल हैं। संगठन ने अनुशासनहीनता के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सभी को तत्काल प्रभाव से जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है। उपाध्यक्ष और महासचिव भी निलंबित सस्पेंड किए गए नेताओं में पांच उपाध्यक्ष और 14 महासचिव भी शामिल हैं। उपाध्यक्ष पद से निलंबित होने वालों में शिवराज यादव, राजवीर सिंह कुड़िया, योगिता सिंह परिहार, प्रमोद सिंह खरे और नीरज पटेल शामिल हैं। इसके अलावा महासचिव पद पर तैनात रोहित राजोरिया, अब्दुल करीम कुरैशी, विनय पांडे और राहुल हितेश ठाकुर सहित कुल 14 महासचिवों पर यह कार्रवाई हुई है। साथ ही संगठन ने 32 सचिवों को भी रैली में अनुपस्थित रहने के कारण पद से हटा दिया है। नौ जिलाध्यक्षों पर गिरी गाज मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस ने रैली में शामिल न होने वाले नौ जिलाध्यक्षों को भी निलंबित कर दिया है। इनमें मैहर के जिलाध्यक्ष सौरभ शर्मा, आगर के जिलाध्यक्ष पृथ्वीराज चौहान, नीमच के जिलाध्यक्ष मनमोहन शक्तावत, बुरहानपुर के जिलाध्यक्ष अर्जुन जंगले, अनूपपुर के जिलाध्यक्ष मनवेंद्र मिश्रा, गुना के जिलाध्यक्ष पंचम भील, बड़वानी के जिलाध्यक्ष आदित्य गोयल, छतरपुर के जिलाध्यक्ष मनवेंद्र सिंह परमार और भिंड के जिलाध्यक्ष मनीष पुरोहित शामिल हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देश पर लिया गया फैसला युवा कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर जारी आदेश में कहा कि यह कार्रवाई संगठनात्मक अनुशासन बनाए रखने और राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए की गई है. आदेश 3 नवंबर 2026 को जारी किया गया।  फिलहाल जारी आदेश में निलंबित पदाधिकारियों के नामों और उनके जवाब का विवरण नहीं दिया गया है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि निलंबन कितने समय तक जारी रहेगा. आदेश में उन्हें आगामी निर्देश तक निलंबित रखने की बात कही गई है।     

जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस को झटका, आगा सैयद ने दिया इस्तीफा

जम्मू  जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस को बड़ा झटका लगा है। श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने पार्टी छोड़ने और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का एलान किया है। उन्होंने बडगाम में पिता आगा सैयद मेहदी की पुण्यतिथि पर आयोजित जनसभा में यह घोषणा की। इस दौरान बेहिश्त-ए-ज़हरा पार्क में समर्थकों की भारी भीड़ जमा हो गई है। आगा रुहुल्ला ने जनता को इस्तीफा दिखाते हुए एलान किया कि मैं इस्तीफा दे रहा हूं। उन्होंने अपने इस्तीफे को आजादीनामा का नाम दिया। उन्होंने मोहम्मद अशरफ मट्टू के जरिए पार्टी को इस्तीफा दिया। CM उमर अब्दुल्ला पर खूब बरसे रुहुल्लाह इससे पहले आगा रुहुल्लाह मेहदी CM उमर अब्दुल्ला पर खूब बरसे। उन्होंने कहा कि जिस कुर्सी पर उमर बैठे हैं, वह सबके लिए दुख का कारण बन गई है। उन्होंने आगे कहा कि उमर अब्दुल्ला को अपनी सत्ता और पद बचाए रखने के लिए अपनी टोपी और सम्मान दूसरों के कदमों में रखने की जरूरत नहीं थी। नेकां नेतृत्व पर जनादेश से विश्वासघात का आरोप रुहुल्लाह ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व पर जनता के जनादेश के साथ विश्वासघात करने और चुनाव के दौरान किए गए वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व के साथ उनके मतभेद व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिद्धांतों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 की बहाली, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा, आरक्षण नीति और जेलों में बंद कैदियों की रिहाई जैसे अहम मुद्दों पर पार्टी ने जनता से जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने में वह नाकाम रही है। इन मुद्दों पर समझौता करना उनके लिए संभव नहीं है, क्योंकि इन्हीं आश्वासनों के आधार पर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जनता से समर्थन मांगा था। दूसरी पार्टी में जाने के बजाय नया राजनीतिक मंच बनाने की तैयारी रुहुल्लाह ने स्पष्ट किया कि उनका फैसला पार्टी में किसी पद से वंचित रहने या किसी व्यक्तिगत नाराजगी का नतीजा नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके लिए राजनीतिक पद से ज्यादा महत्वपूर्ण वे मुद्दे हैं, जिनके आधार पर लोगों ने पार्टी को समर्थन दिया था। सांसद ने यह भी कहा कि उनका मकसद केवल एक राजनीतिक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होना नहीं है। वह जम्मू-कश्मीर के ऐसे ईमानदार, प्रतिबद्ध और जागरूक युवाओं को एक मंच पर लाना चाहते हैं, जो अपने वतन और यहां के लोगों के दर्द को समझते हैं तथा समाज में बदलाव लाने की इच्छा रखते हैं। 'अब जम्मू-कश्मीर के लिए जिम्मेदारी निभाने का वक्त' उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों को समाज के हित में आगे आने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्होंने कहा कि जिन बच्चों को माता-पिता ने ईमानदारी और मेहनत के साथ पाला-पोसा है, उन्हें अब समाज और जम्मू-कश्मीर की बेहतरी के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। रुहुल्लाह ने कहा कि वह युवाओं का ऐसा मंच तैयार करना चाहते हैं, जो पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ जनकल्याण तथा जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए काम करे। हालांकि श्रीनगर लोकसभा सीट फिलहाल खाली नहीं होगी। इसके लिए लोकसभा अध्यक्ष की ओर से रुहुल्लाह का औपचारिक इस्तीफा स्वीकार किया जाना जरूरी है। इस्तीफा स्वीकार होने और सीट रिक्त घोषित किए जाने के बाद संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत उपचुनाव कराया जा सकेगा।  

राहुल गांधी, केजरीवाल या ममता बनर्जी? उमर अब्दुल्ला ने बताई अपनी पसंद

श्रीनगर  जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बता दिया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्षा का बेहतर नेता किसे मानते हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान उनके सामने तीन नामों की लिस्ट रखी गई थी, जिसमें से एक चुनने के लिए कहा गया था। इस लिस्ट में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, लोकसभा सांसद राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल थे। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस लिस्ट में से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को चुना है। साथ ही उन्होंने इसकी वजह भी बताई है और कहा है कि भारत में सिर्फ दो ऐसे दल हैं, जो पूरे देश में हैं। शुभांकर मिश्रा के पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि बाकी सभी को इस बात का भ्रम है कि वो राष्ट्रीय नेता हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। क्यों हैं राहुल गांधी बेहतर विकल्प सीएम उमर ने कहा, 'राहुल गांधी। जो भी आप कहें भारत में दो ही पार्टियां हैं, जिनकी पूरे देश में मौजूदगी है। कम ज्यादा हो सकती है, लेकिन पूरे देश में मौजूदगी है। कांग्रेस और भाजपा। बाकी सभी को बड़ा होने का भ्रम है। मैं आपको बता रहा हूं कि हम कहीं एक छोटे हिस्से को कंट्रोल करते हैं, लेकिन समझते हैं कि राष्ट्रीय पार्टी हैं। ऐसा नहीं है।' उन्होंने कहा, 'हम राष्ट्रीय पार्टी नहीं चलाते, इसलिए राष्ट्रीय नेता भी नहीं हैं। हम तब ही राष्ट्रीय नेता कहलाएंगे, जब हमारी पार्टी राष्ट्रीय होगी। मैं राष्ट्रीय नेता नहीं हूं, मैं जम्मू और कश्मीर तक सीमित हूं। मुझे भ्रम हो सकता है कि मैं राष्ट्रीय नेता हूं, लेकिन ऐसा नहीं है। राहुल गांधी राष्ट्रीय पार्टी का हिस्सा हैं। यह बात उन्हें फायदा पहुंचाती है, जो किसी के पास नहीं है।' राहुल गांधी की तारीफ इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी की जमकर तारीफ भी की। जब पूछा गया कि राहुल बेहतर नेता हैं या इंसान, तो इसपर उन्होंने कहा, 'बेहतर इंसान हैं, लेकिन तेजी से खुद को तैयार करते राजनेता भी हैं।' उन्होंने कहा, 'सिर्फ कहने के लिए ही नहीं। आप देखिए वो लोगों से किस तरह से मिलते हैं, कैसे बात करते हैं और बैठते हैं। वो लोगों के साथ गहराई से बात करते हैं, जो करने के लिए हम से कई लोगों के पास समय नहीं है। मेरे पास ऐसा करने के लिए समय नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा है कि हाल के समय में राहुल गांधी का ग्राफ बढ़ा है। उन्होंने कांग्रेस सांसद को लेकर कहा, 'मुझे तो ऐसा लग रहा है और इससे इनकार करना गलत होगा।' उन्होंने यह भी कहा कि अब राहुल को सरकार ज्यादा गंभीरता से ले रही है। हाल ही में विपक्षी गठबंधन ने दिल्ली में प्रदर्शन बुलाया था, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के काम करने के तरीकों पर सवाल उठाए गए थे। कांग्रेस के साथ चला रहे हैं सरकार 90 सीटों वाली जम्मू और कश्मीर विधानसभा में उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उसके पास पूर्ण बहुमत नहीं है। पार्टी के पास कुल 41 विधायक हैं और राज्य में एनसी कांग्रेस समेत कई छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। फिलहाल, जम्मू और कश्मीर में पूर्ण राज्य के दर्जे का मुद्दा गरमाया हुआ है। वहीं, अटकलें हैं कि एनसी भी बगावत का सामना कर रही है। जबकि, पार्टी नेता इससे इनकार कर रहे हैं।

मूर्तिजापुर में शिवसेना का बढ़ा कुनबा, पांच निर्दलीय पार्षदों ने थामा एकनाथ शिंदे का दामन

मुंबई महाराष्ट्र के अकोला जिले की राजनीति से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ताकत बढ़ गई है। मूर्तिजापुर नगर पालिका के पांच निर्दलीय पार्षदों ने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ शिवसेना का दामन थाम लिया है। इन सभी नेताओं ने शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में रविवार को पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। मूर्तिजापुर के 5 निर्दलीय पार्षद शिवसेना में शामिल शिवसेना में शामिल होने वाले पांच पार्षदों में संदीप दौलतराव सरनाईक, सारिता काले पाटील, पूनम रवि माडक, ममता कैलास महाजन और शुभांगी संदीप सरनाईक शामिल हैं। इन सभी ने अपने समर्थकों के साथ पार्टी में प्रवेश किया। इस सामूहिक दल-बदल को मूर्तिजापुर और अकोला जिले की स्थानीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पांच निर्दलीय पार्षदों के एक साथ शिवसेना में शामिल होने से जिले में पार्टी का राजनीतिक आधार मजबूत होने की चर्चा है। एकनाथ शिंदे ने सोशल मीडिया पर पक्ष प्रवेश की तस्वीरें शेयर की और लिखा, "अकोला जिले के मूर्तिजापुर नगर पालिका के निर्दलीय पार्षद संदीप सरनाईक, सरिता काले पाटील, पूनम माडक, ममता महाजन, शुभांगी सरनाईक और राष्ट्रवादी यूथ कांग्रेस के पूर्व जिला अध्यक्ष तथा अकोला दूध महासंघ के संचालक शिवा मोहोड ने अपने समर्थकों के साथ भगवा ध्वज हाथ में लेकर शिवसेना में आधिकारिक रूप से प्रवेश किया। इस अवसर पर सभी का पार्टी में स्वागत किया और उनके भविष्य के सफल राजनीतिक सफर के लिए शुभकामनाएं दीं।" शिंदे के करीबी से मुलाकात के बाद लिया था फैसला जानकारी के मुताबिक, इन पांचों पार्षदों ने इसी महीने की शुरुआत में अकोला में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के करीबी सहयोगी एडवोकेट निलेश देशमुख से मुलाकात की थी। इस दौरान उनके बीच बैठक हुई थी। बताया जा रहा है कि इसी के बाद सभी ने शिवसेना में शामिल होने का निर्णय लिया। अब एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में हुए इस पार्टी प्रवेश से अकोला जिले खासकर मूर्तिजापुर नगर पालिका में शिवसेना को नई ताकत मिली है।

राहुल गांधी पर बीजेपी नेता का तीखा हमला, बोले- लगातार तीन चुनाव हारने के बाद अंगूर खट्टे बता रही कांग्रेस

 फरीदाबाद हरियाणा के फरीदाबाद में बीजेपी नेता धर्मेंद्र प्रधान ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लगातार तीन चुनावों में हार का जिक्र करते हुए राहुल गांधी पर तंज कसा और कहा कि प्रधानमंत्री बनने के लिए उन्होंने महंगे कपड़े डिजाइन करवाए थे, लेकिन अब उनकी असलियत सामने आ गई है। धर्मेंद्र प्रधान ने कांग्रेस पर देश में अराजकता फैलाने और भीड़तंत्र में विश्वास करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने चुनाव आयोग को लेकर कांग्रेस के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी चुनाव जीतने पर आयोग को सही बताती है, लेकिन हारने पर उसी पर सवाल उठाने लगती है। 'अंगूर नहीं मिले तो खट्टे बता दिए', राहुल गांधी पर तंज फरीदाबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान धर्मेंद्र प्रधान ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति की तुलना गांवों में प्रचलित एक कहावत से की। उन्होंने कहा कि जब अंगूर नहीं मिलते तो उन्हें खट्टा बता दिया जाता है। साथ ही यह भी कहा कि कांग्रेस चुनाव में हार मिलने के बाद इसी तरह का रवैया अपना रही है। बीजेपी नेता ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि लगातार तीन चुनाव हारने के बाद अब उनकी राजनीतिक स्थिति सामने आ गई है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी ने देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए कथित तौर पर महंगे कपड़े तक डिजाइन करवाए थे, लेकिन अब कांग्रेस के पास कोई राजनीतिक विचार और मुद्दा नहीं बचा है। कांग्रेस पर अराजकता फैलाने का आरोप धर्मेंद्र प्रधान ने आरोप लगाया कि कांग्रेस जनता का समर्थन खो चुकी है और इसी वजह से देश में अराजकता फैलाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के बजाय भीड़तंत्र में विश्वास करने लगी है। उन्होंने संसद के मानसून सत्र का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौरान भी कांग्रेस का यही रवैया देखने को मिला था। धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार, कांग्रेस के पास जनता से जुड़े मुद्दे नहीं हैं और वह संसद में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने से पीछे हटती रही है। चुनाव आयोग पर कांग्रेस के दोहरे रवैये का आरोप बीजेपी नेता ने चुनाव आयोग को लेकर कांग्रेस के रुख पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब कांग्रेस केरल में चुनाव जीतती है तो उसे चुनाव आयोग की व्यवस्था में कोई परेशानी नहीं होती। कर्नाटक में जीत मिलने पर भी आयोग पर सवाल नहीं उठाए जाते। लेकिन जब पार्टी को बंगाल या हरियाणा में हार का सामना करना पड़ता है तो, इसके लिए चुनाव आयोग को दोषी ठहराते हैं।

योगी का दावा- यूपी में 1.27 करोड़ हिंदू वोट गायब, अखिलेश का तंज- अब रामलीला मैदान आएं

लखनऊ उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गहमागहमी बढ़ गई है। इस बीच शुक्रवार को सीएम योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए वोटर लिस्ट से 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के गायब होने की बात की तो इसे लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर सीएम के पास यह जानकारी आई कहां से? अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री यह बात तब कह रहे हैं जब एमएलसी चुनाव हार गए। यदि ऐसा है तो फिर उन्हें भी रामलीला मैदान में आ जाना चाहिए। बता दें कि शुक्रवार को लखनऊ में भाजपा कार्यसमिति की बैठक थी। बैठक को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश में वोटरों को जुड़वाने को लेकर व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है। एसआईआर से पहले की मतदाता सूची के विश्लेषण में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम सामने आए हैं, जो विधानसभा की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं। मतदाता सूची से 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम गायब होना चिंताजनक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे चलते 28 नगरीय और 66 अन्य सीट भी खतरे के करीब हैं। याद रखना सावधानी हटी दुर्घटना घटी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 16 करोड़ से अधिक मतदाता होने चाहिए जबकि वर्तमान में 13 करोड़ हैं। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को कमल साथी ऐप पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर छूटे हुए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने के लिए अभियान चलाना चाहिए। अखिलेश यादव ने क्या कहा? दिल्ली में इंडिया ब्लॉक की रैली में पहुंचे अखिलेश यादव ने कहा कि अन्याय की सारी हदें पार हो गई हैं। अब तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद मान लिया है कि 1.27 करोड़ वोट कम कर दिए गए हैं। उन्हें यह बात कब याद आई? एमएलसी चुनाव हारने के बाद ही। जो लोग 'डबल इंजन सरकार' की बात करते थे, वे अब 'डबल जीरो' बन गए हैं। वे न सिर्फ डबल जीरो बने हैं, बल्कि उन्होंने हार को एक बार भी स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने चुनाव आयोग से संपर्क किया और मतगणना दोबारा करवाई। ज़रा सोचिए, एक ही चुनाव में दोहरी हार, डबल इंजन वाली सरकार, डबल जीरो और डबल हार। और इन सब के बाद वे क्या दावा कर रहे हैं? कि हिंदुओं के 1.27 करोड़ वोट गायब हैं। उन्हें यह जानकारी कहां से मिली? यह डेटा उन्हें किसने दिया? सपा प्रमुख ने कहा कि यह कोई ऐसा डेटा नहीं है जिसे यूं ही सड़कों से उठा लिया जाए या कोई भी उन्हें सौंप दे। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने आगे कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री ऐसा बयान दे रहा है, और वो भी उत्तर प्रदेश में, जहां से प्रधानमंत्री आते हैं तो वो ये बयान कब दे रहा है? किसी के वहां जाकर लौटने के बाद। उन्होंने कहा कि तो फिर यहां किस पर आरोप लगाया जा रहा है? यदि 1.27 करोड़ वोट लिस्ट से गायब हैं, तो सरकार दूसरों पर किस बात का आरोप लगा रही है? सरकार ये भी दावा कर रही है कि लाखों लाभार्थियों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं। इसका मतलब है कि उन लोगों को भी रामलीला मैदान में आना चाहिए, क्योंकि ये अन्याय और झूठे वादों के खिलाफ आंदोलन है।

‘भारत कोई बनाना रिपब्लिक नहीं’, राहुल गांधी पर बरसे जेपी नड्डा

नई दिल्ली दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की रैली और विरोध प्रदर्शन को लेकर सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि विपक्ष लोकतंत्र की आड़ में देश में अराजकता फैलाने, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश रच रहा है। जेपी नड्डा के तीखे सवाल और आरोप अपने बयान में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के राजनीतिक मॉडल पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की राजनीति चार चरणों पर टिकी है, झूठ फैलाना, सड़कों पर अराजकता भड़काना, देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना और विदेशी ताकतों के इशारे पर चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करना। 'भारत कोई बनाना रिपब्लिक नहीं' राहुल गांधी को सीधे चेतावनी देते हुए नड्डा ने कहा कि राहुल गांधी, कान खोलकर सुन लीजिए, यह भारत है, कोई 'बनाना रिपब्लिक' नहीं है जहां आप जब चाहें आगजनी, दंगे या सत्ता परिवर्तन का एजेंडा चला सकें। सपने देखना बंद कीजिए। भारत दुनिया का सबसे पुराना और मजबूत लोकतंत्र है। 1 नवंबर के दिन पर भी उठाए सवाल बता दें कि बीजेपी ने इस रैली की तारीख 1 नवंबर को लेकर भी तीखा विरोध जताया है। नड्डा ने आरोप लगाया कि 1 नवंबर का दिन देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला धब्बा है, क्योंकि इसी दिन कांग्रेस समर्थित भीड़ ने सिख समुदाय के लोगों पर अत्याचार किए थे। उन्होंने कहा कि आज के दिन जब देश पीड़ितों को याद कर रहा है, तब राहुल गांधी अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं। बड़ी बात यह भी है कि इस विरोध में बीजेपी ने दिल्ली में एक अलग मार्च भी निकाला, जिसमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य नेता शामिल हुए। इसके अलावा मुंबई में भी बीजेपी और उसके सहयोगियों ने 'लोकशाही बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा निकाली। अब समझिए विपक्ष का क्या है कहना? दूसरी ओर, इंडी गठबंधन का कहना है कि यह रैली देश के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और मतदाता सूची से नाम काटे जाने के विरोध में है। हिमाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि रैली में आ रहे उनके समर्थकों की बसों को अलग-अलग जगहों पर रोका जा रहा है। हिमाचल के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई और कहा कि आने वाले दिनों में देश में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। विपक्षी गठबंधन की मुख्य मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें और ईवीएम (EVM) की जगह फिर से बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात गौरतलब है कि रैली और विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। मध्य और नई दिल्ली में दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और रैपिड एक्शन फोर्स के करीब 10000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। अकेले रामलीला मैदान और उसके आसपास 4000 से ज्यादा जवान मुस्तैद हैं। संवेदनशील इलाकों में धारा 163 लागू कर दी गई है और ड्रोन तथा AI कैमरों से चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है।

दिल्ली में कब बनी पहली सरकार और क्यों खत्म हुई विधानसभा? जानिए 70 साल का पूरा सियासी इतिहास

नई दिल्‍ली  दिल्ली की सुबह में एक अजीब-सा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ संसद भवन है, जहां देश के कानून बनते हैं। राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय मंत्रालय हैं, तो दूसरी तरफ दिल्ली सचिवालय भी है, जहां शहर की चुनी हुई सरकार फैसले लेती है। इनके बीच उपराज्यपाल का कार्यालय भी है। यानी एक ही शहर में सत्ता के कई केंद्र हैं। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री और विधानसभा होने के बावजूद दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। पुलिस, जमीन और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे अहम विषय आज भी केंद्र के अधीन हैं। आखिर देश की राजधानी में सत्ता का यह अनोखा बंटवारा क्यों है? आखिर दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश क्यों बनाया गया? 1956 में विधानसभा क्यों खत्म हुई और फिर चार दशक बाद लोकतंत्र की वापसी कैसे हुई? आज, यानी 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 साल पूरे हो गए। इस मौके पर जानिए राजधानी की सत्ता और सियासत के बदलते 70 साल की  कहानी इंद्रप्रस्थ से नई दिल्ली तक: कैसे बदली पहचान? यूं तो दिल्ली का इतिहास महाभारत में वर्णित इंद्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य और सटीक कालखंड को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।  अलग-अलग दौर में इस क्षेत्र में अनेक नगर बसे, उजड़े और सत्ता के केंद्र बने। सल्तनत काल, मुगल शासन और शाहजहानाबाद ने दिल्ली की पहचान को नए रूप दिए, लेकिन आधुनिक दिल्ली की कहानी 1911 से एक नया मोड़ लेती है। उस साल 12 दिसंबर को दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का एलान किया। नई राजधानी के निर्माण के लिए रायसीना हिल और आसपास का इलाका चुना गया। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकारों ने चौड़ी सड़कों, विशाल सरकारी इमारतों और व्यवस्थित शहरी ढांचे वाली नई राजधानी की परिकल्पना को आकार दिया। 31 दिसंबर 1926 को नई राजधानी का नाम 'नई दिल्ली' रखने की आधिकारिक घोषणा हुई। इसके बाद 15 फरवरी 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई राजधानी का औपचारिक उद्घाटन किया। इस तरह दिल्ली को आधुनिक राजधानी की पहचान तो मिल गई, लेकिन एक सवाल अब भी बाकी था- जब यह शहर पूरे देश की सत्ता का केंद्र है, तो इसके अपने प्रशासन की कमान किसके हाथ में होनी चाहिए; स्थानीय प्रतिनिधियों के या केंद्र सरकार के? आजादी के बाद यही सवाल दिल्ली की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बहस बन गया। दिल्ली में कब बनी पहली निर्वाचित सरकार? 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। इसके करीब ढाई साल बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। इसी के साथ दिल्ली को पार्ट-C राज्य का दर्जा मिला। इस व्यवस्था के तहत यहां विधानसभा और मुख्यमंत्री का प्रावधान किया गया। हालांकि, इसे पूर्ण राज्यों जैसी स्वायत्तता हासिल नहीं थी। आजादी के बाद पहली बार  1952 में हुए चुनावों ने दिल्ली की राजनीति को नया अध्याय दिया। 7 मार्च 1952 को दिल्ली की पहली विधानसभा गठित हुई। इसमें कुल 48 सदस्य थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पसंदीदा नेताओं में शामिल चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। 17 मार्च 1952 को पुराने सचिवालय के लॉन में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित हुआ। दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त शंकर प्रसाद ने ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इस तरह आजादी के बाद पहली बार दिल्ली को अपनी निर्वाचित सरकार मिली, लेकिन यह व्यवस्था बहुत लंबे समय तक सुचारु रूप से नहीं चल सकी। मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश और मुख्य आयुक्त के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आने लगे। मुख्यमंत्री के पास विधानसभा और मंत्रिपरिषद थी, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य आयुक्त की भी अहम भूमिका थी। अधिकारों की यह खींचतान धीरे-धीरे बढ़ती गई। आखिरकार 12 फरवरी 1955 को ब्रह्म प्रकाश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद दरियागंज के विधायक गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री बने। बता दें कि उस समय दिल्ली में आज की तरह उपराज्यपाल (LG) का पद नहीं था। मुख्य आयुक्त केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली का प्रशासन संभालते थे। 1956 में दिल्ली विधानसभा क्यों खत्म की थी? मुख्यमंत्री और मुख्य आयुक्त के बीच बढ़ते मतभेदों ने केंद्र सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था- क्या देश की राजधानी को भी दूसरे राज्यों की तरह चलाया जाना चाहिए या यहां केंद्र का नियंत्रण ज्यादा होना चाहिए? इसी बीच देश में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी। भाषाई और प्रशासनिक आधार पर राज्यों की सीमाएं नए सिरे से तय की जा रही थीं। इस काम के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया था। आयोग ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था की भी समीक्षा की। आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे देश की राजधानी भी है। यहां संसद, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालय मौजूद हैं। ऐसे में राजधानी के प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार की विशेष भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग का मानना था कि देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली का प्रशासन सामान्य राज्यों से अलग होना चाहिए। यहां अलग राज्य सरकार होने से केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच अधिकारों का टकराव बढ़ सकता है। आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली का पार्ट-C राज्य का दर्जा खत्म कर इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। इसके साथ ही विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था भी समाप्त हो गई। इस तरह दिल्ली में निर्वाचित सरकार का पहला अध्याय समाप्त हो गया। शासन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति के अधीन आ गई। यानी कि जिस दिल्ली में कुछ साल पहले जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजे थे, वहां अब विधानसभा ही नहीं थी। दिल्‍ली में फिर कब लौटी लोकतांत्रिक व्यवस्था? विधानसभा खत्म होने के बाद भी दिल्ली में चुनी हुई सरकार की मांग बनी रही। इसी को देखते हुए 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम के तहत महानगर परिषद बनाई गई। इसमें निर्वाचित सदस्य तो थे, लेकिन उसके पास कानून बनाने के अधिकार नहीं थे। यानी प्रतिनिधित्व लौटा, लेकिन सत्ता और अधिकार अब भी दूर थे। बढ़ती आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के बीच … Read more

उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी पर गरमाई सियासत, मेहराज मलिक ने धर्म के ठेकेदारों को घेरा

नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में एक निजी समारोह में वरिष्ठ टीवी पत्रकार निधि राजदान के साथ शादी रचा ली। दोनों ने शनिवार को सोशल मीडिया के जरिए इस बात की जानकारी दुनिया को दी। सीएम के इस तरह हिंदू महिला से शादी करने के बाद जम्मू-कश्मीर की डोडा सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष मेहराज मलिक ने राज्य के मुख्यमंत्री को बधाई दी, साथ ही ऐसा करते हुए उन्होंने धर्म के तथाकथित ठेकेदारों और दिन-रात हिंदू-मुस्लिम करने वाले न्यूज चैनलों को लेकर अपना गुस्सा भी जाहिर किया। AAP विधायक ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी और इस दौरान 'लव जिहाद' को लेकर अपने-अपने चैनलों पर शो करने वाले न्यूज चैनलों को 'गोदी मीडिया' (सरकार के चहेते) बताते हुए, उन पर जानबूझकर ऐसे मुद्दों को को उठाते हुए भाजपा को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया। अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'शादी के लिए उमर अब्दुल्ला साहब को बधाई। लेकिन अब 'गोदी मीडिया' कहां है? जो 'लव जिहाद' पर प्राइम-टाइम डिबेट चलाता है? क्या वे इसका इस्तेमाल सिर्फ BJP को फायदा पहुंचाने और गरीब लोगों को निशाना बनाने के लिए करते हैं? क्या अब हिंदू धर्म खतरे में नहीं है?' इसके बाद अपनी पोस्ट में उन्होंने मुस्लिम धर्म के विद्वानों के रवैये को लेकर भी सवाल उठाए और उन पर अमीर-गरीब लोगों के लिए अलग-अलग रवैया अपनाने का आरोप लगाया। अपनी पोस्ट में आगे उन्होंने सवाल उठाते हुए पूछा कि 'क्या मुस्लिम विद्वान बता सकते हैं कि मुसलमानों के लिए ऐसी शादी जायज है? यानी किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करना, वह भी इस्लाम कबूल किए बिना? अमीरों और गरीबों के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं? इसी शादी को लेकर शेयर की अपनी पोस्ट में मलिक ने लिखा था कि 'धर्म के ठेकेदार अब चुप क्यों, सब फतवे और धर्म के रक्षक बस गरीब लोगों के लिए होते हैं।' जम्मू-कश्मीर की डोडा सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष मेहराज मलिक। बता दें कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को एक निजी समारोह में कश्मीरी पंडित परिवार से आने वाली निधि राजदान के साथ शादी की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' के जरिए शनिवार को अपनी शादी की जानकारी दी और अपनी पोस्ट में लिखा, 'कल एक नए सफर की शुरुआत हुई।' इस दौरान अपनी पोस्ट के साथ उन्होंने अपनी नई नवेली पत्नी के साथ चार तस्वीरें भी शेयर कीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार यह विवाह समारोह शुक्रवार (30 अक्टूबर) को दोनों परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में आयोजित हुआ। जिसमें उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला और माता मौली, उनकी तीन बहनें तथा अन्य करीबी रिश्तेदार शामिल हुए। जबकि निधि के पिता और वरिष्ठ पत्रकार एमके राजदान और उनकी मां सरला राजदान भी समारोह में मौजूद थीं। सूत्रों ने बताया कि दोनों की शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई। उमर अब्दुल्ला और निधि दोनों की ही यह दूसरी शादी है। उमर अब्दुल्ला (उम्र 56 वर्ष) की पहली शादी पायल नाथ के साथ 1994 में हुई थी और उनके दो बेटे जाहिर और जमीर हैं। हालांकि यह कपल साल 2011 से ही अलग-अलग रह रहा था। इन दोनों का तलाक इस साल 31 जुलाई को भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति के बाद हुआ। कई सालों तक अदालत में लंबित रहे तलाक के इस मामले को इस साल सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर समाप्त कर दिया था। निधि (उम्र- 49 वर्ष) की भी यह दूसरी शादी है।