samacharsecretary.com

₹1,200 करोड़ के सचिवालय प्रोजेक्ट पर बढ़ा विवाद, मछुआरों के विरोध के बीच सरकार ने साफ किया रुख

चेन्नई तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और उनकी सरकार एक मुश्किल में फंस गई है। सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री विजय ने चेन्नई के पट्टिनापक्कम में नए सचिवालय और विधानसभा कॉम्प्लेक्स बनाने का फैसला लिया था। लेकिन अब सत्ता में समर्थन देने वाली पार्टियों और विपक्ष के विरोध के बीच सरकार इस फैसले से पीछे हटती हुई नजर आ रही है। बढ़ते विवाद के बीच तमिलनाडु सरकार में मंत्री आधव अर्जुन ने इस मुद्दे पर सरकार का स्टैंड साफ करते हुए कहा कि अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। थलपति विजय सरकार में नंबर दो माने जाने वाले आधव अर्जुन ने राजनीतिक पार्टियों के ऊपर इस पर बिना मतलब राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। अभी तक इस मामले में केवल एक आदेश जारी किया गया था। मुख्यमंत्री विजय इस प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले प्रोजेक्ट की डीपीआर रिपोर्ट की जांच करेंगे। इसके बाद ही कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा। अभी इस पट्टिनापक्कम के बारे में कोई फैसला नहीं- आधव अर्जुन आधव अर्जुन ने कहा, "हमने पट्टिनापक्कम सचिवालय के बारे में अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है। वे इस मामले का राजनीतिकरण कर रहे हैं। हमने सिर्फ एक सरकारी आदेश जारी किया है, और DPR तैयार होने के बाद, हमारे मुख्यमंत्री तय करेंगे कि सचिवालय बनाना है या नहीं।" इस मामले से प्रभावित होने वाले मछुआरों को संबोधित करते हुए आधव अर्जुन ने भरोसा दिलाया कि किसी को भी परेशानी नहीं आने दी जाएगी और उनके हितों का भी ख्याल रखा जाएगा। आधव ने कहा, "प्यारे मछुआरों हमारे मुख्यमंत्री ने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है। अभी तो बस यह देखा जा रहा है कि लोगों को कोई आपत्ति तो नहीं है। राजनीतिक दल तुरंत इस पर राजनीति कर रहे हैं।" सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली सीपीआई एम ने किया था विरोध थलपति विजय की गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली वामपंथी पार्टी सीपीआई एम ने भी इस मामले पर सरकार को समर्थन वापस लेने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि सरकार इस जगह पर नया सचिवालय बनाने के फैसले को वापस ले लेना चाहिए। सीपीआई एम के राज्य सचिव पी. षणमुगम ने कहा कि तमिलनाडु सरकार को कोई भी फैसला लेने के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर विजय की पार्टी इस फैसले पर फिर से विचार नहीं करती है, तो वह सरकार को समर्थन देने के फैसले पर फिर से विचार करेंगे। क्या है पट्टिनापक्कम में प्रस्तावित सचिवालय बनाने में परेशानी? थलपति विजय ने सरकार में आने के बाद से नए सचिवालय और विधानसभा कॉम्प्लेक्स के लिए काम करना शुरू किया था। इसके लिए तमिलनाडु सरकार ने 25.55 एकड़ जमीन को चिह्नित किया था। बता दें, यह जमीन विजय के घर के पास ही है। हालांकि, जल्दी ही इस फैसले का विरोध होना शुरू हो गया। 1,200 करोड़ के इस मेगा प्रोजेक्ट का जल्दी ही मछुआरों और पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इस जगह पर रहने वाले मछुआरों ने चेतावनी दी कि अगर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाता है, तो वह बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। स्थानीय निवासियों का कहना है कि करीब 1500 से ज्यादा मछुआरा परिवार इस जगह का उपयोग अपने जाल सुखाने और नावों को खड़ा करने के लिए करते हैं। ऐसे में अगर यहां पर कोई निर्माण कार्य होता है, तो उन सभी की आजीविका पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा उनके लिए समुद्र में जाने का रास्ता भी बंद हो सकता है।

नंदीग्राम में अल्पसंख्यक वोटरों पर शुभेंदु की नजर, उपचुनाव से पहले ‘सरकार के साथ’ रहने की अपील

कोलकाता पश्चिम बंगाल की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट नंदीग्राम एक बार फिर देश की सियासत के केंद्र में है। 2011 में वाममोर्चा के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकने से लेकर 2026 में बीजेपी के सत्ता में आने तक, नंदीग्राम हमेशा से राज्य के राजनीतिक बदलाव की धुरी रहा है। अब 6 अक्टूबर को होने जा रहे उपचुनाव से पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने क्षेत्र के अल्पसंख्यक समुदाय को एक बड़ा संदेश देकर बहस छेड़ दी है। भाजपा उम्मीदवार हसीरानी रथ के नामांकन से ठीक पहले एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सीधे तौर पर कहा, "जो लोग मुझे वोट नहीं देते, जो बीजेपी को वोट नहीं देते… मैं उन अल्पसंख्यकों से अपील करता हूं। आपके पास एक मौका आया है- आप सरकार के साथ रहना चाहते हैं या नहीं? अगर आप मुख्यमंत्री के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं और अपने इलाके में काम कराना चाहते हैं, तो 6 अक्टूबर को रेजीनगर और नंदीग्राम में आपका असली टेस्ट है।" इस सीधे संदेश के बाद नंदीग्राम के मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले आम लोगों और अल्पसंख्यक मतदाताओं क्या कहना आइए जानते हैं। नंदीग्राम के अल्पसंख्यकों ने क्या कहा? न्यूज18 बांग्ला की रिपोर्ट मुताबिक, शुभेंदु अधिकारी की अपील के बाद नंदीग्राम के स्थानीय मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रिया काफी दिलचस्प और सकारात्मक नजर आ रही है जाहिदा परवीन कहती हैं, "हमें सरकार के साथ खड़ा होना ही पड़ेगा। सरकार हमारी जरूरतों को देख रही है और काम कर रही है।" शेख आलम कहते हैं, "हमने 2026 के मुख्य चुनाव में भी 'दादा' (शुभेंदु अधिकारी) को वोट दिया था। अब उपचुनाव हो रहा है, तो इस बार भी हमारा वोट दादा को ही जाएगा।" शेख अब्दुल्ला ने कहा, "मैं पहले भी उनके साथ था, आज भी हूं और आगे भी रहूंगा। क्षेत्र में विकास के काम अच्छे चल रहे हैं। अगर ऐसे ही काम होता रहा तो और भी लोग उनके साथ जुड़ेंगे। नंदीग्राम में शांति है और काम हो रहा है। हम चाहते हैं कि शुभेंदु जी ही मुख्यमंत्री बने रहें।" अजमुल इस्लाम का कहना है, "सड़कों का निर्माण काम तेजी से चल रहा है। पहले सड़कों का काम अटका पड़ा था, लेकिन उनके आने के बाद काम तेजी से शुरू हुआ है। इस लिहाज से शुभेंदु जी बिल्कुल ठीक हैं।" वहीं रुकशान बीबी ने बोला, "हम देश के नागरिक हैं, वोट देना हमारा फर्ज है। अगर सरकार हमारे भले के लिए काम कर रही है, तो हमें भी सरकार का साथ देना होगा।" कैसा है नंदीग्राम का वोट गणित? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, नंदीग्राम में चुनाव का गणित बेहद संवेदनशील और दिलचस्प है। नंदीग्राम का ब्लॉक-1 अल्पसंख्यक बहुल इलाका माना जाता है। SIR के बाद हाल ही में आई वोटर लिस्ट में नंदीग्राम से करीब 2,826 वोटरों के नाम कटे थे, जिनमें से लगभग 95.5 प्रतिशत (करीब 2,700 वोटर) मुस्लिम समुदाय से हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नंदीग्राम के 75% हिंदू वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में एकजुट हो सकता है। ऐसे में करीब 25% अल्पसंख्यक मतदाता ही यह तय करेंगे कि जीत का मार्जिन कितना बड़ा होगा। ममता बनर्जी की पार्टी का प्रत्याशी मैदान से हटने और कांग्रेस उम्मीदवार की गिरफ्तारी के बीच शुभेंदु अधिकारी का यह "विकास और सरकार का साथ" देने का दांव नंदीग्राम में नया इतिहास रचता है या नहीं यह देखना होगा।

आकाश आनंद की वापसी पर मायावती ने साफ किया रुख, परिवार में अब सिर्फ ईशान आनंद को जिम्मेदारी

नई दिल्ली बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने आकाश आनंद और ईशान आनंद को लेकर बड़ा फैसला लिया है. उन्होंने कहा है कि उनके भाई आनंद कुमार के परिवार से आकाश आनंद और उनकी बहन को पार्टी में कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी. मायावती ने कहा कि अब आनंद कुमार के परिवार से केवल ईशान आनंद को पार्टी में सम्मानजनक जिम्मेदारी देकर आगे किया जाएगा.  अपने एक्स पोस्ट में मायावती ने कहा कि यदि किसी को राजनीति में सफल होना है और समाज के लिए काम करना है तो उसे अपने भाई-बहनों और नजदीकी रिश्तेदारों के मोह से ऊपर उठकर पूरी ईमानदारी और निष्ठा से काम करना चाहिए. उन्होंने कहा कि बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने भी राजनीति में आने के बाद अपने नजदीकी रिश्तेदारों को राजनीतिक लाभ देने से दूरी बनाए रखी थी और उन्हें केवल निःस्वार्थ भावना से पार्टी संगठन में काम करने की अनुमति दी थी. उन्होंने कहा कि कांशीराम से प्रेरित होकर उन्होंने भी अपनी पूरी जिंदगी बहुजन समाज के लिए समर्पित करने का फैसला लिया. मायावती ने कहा कि लड़की होने की वजह से मजबूरी में उन्हें अपने किसी न किसी भाई-बहन को हमेशा अपने साथ रखना पड़ा, जिसके तहत उनके छोटे भाई आनंद कुमार पिछले काफी वर्षों से उनकी सेवा में कार्यरत हैं. आकाश आनंद को लेकर क्या कहा मायावती ने कहा कि आनंद कुमार के विशेष आग्रह पर उनके बड़े बेटे आकाश आनंद को राजनीति में आगे किया गया था. लेकिन शादी के बाद आकाश आनंद के रवैये और गतिविधियों की वजह से कुछ दिन पहले उन्हें पार्टी से अलग करना पड़ा. मायावती ने कहा कि आकाश आनंद अब अपने ससुर अशोक सिद्धार्थ के जंजाल में पूरी तरह फंस चुके हैं और उन्हें पार्टी में वापस लेना पार्टी के लिए बहुत बड़ा विश्वासघात होगा. उन्होंने कहा कि आनंद कुमार के परिवार से किसे पार्टी में आगे किया जाए, इसे लेकर वह पिछले कुछ समय से दुविधा में थीं. अब सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करने के बाद उन्होंने फैसला लिया है कि परिवार से ऐसे सदस्य को आगे किया जाए, जो आकाश आनंद के नक्शेकदम पर बिल्कुल न चले. मायावती ने कहा कि आगे चलकर आनंद कुमार की बेटी की मदद लेने का सवाल भी है. उन्होंने कहा कि शादी के बाद यदि उनका मामला भी आकाश आनंद की तरह निकल गया तो यह पार्टी हित में सही नहीं होगा. इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए आकाश आनंद और उनकी बहन को पार्टी की कोई भी जिम्मेदारी देने से दूर रखा जाएगा और इस फैसले में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. आगे कुछ कहा नहीं जा सकता मायावती ने कहा कि अब इन दोनों के स्थान पर आनंद कुमार के परिवार से केवल ईशान आनंद को ही पार्टी में सम्मानजनक जिम्मेदारी देकर आगे किया जाएगा. उन्होंने कहा कि अभी तक ऐसा ही लग रहा है कि ईशान आनंद का आकाश आनंद की तरह कोई चक्कर नहीं रहेगा, लेकिन आगे कुछ भी नहीं कहा जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईशान आनंद ने पार्टी विरोधी कोई गंभीर कृत्य किया तो उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में आनंद कुमार के परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी पार्टी में कोई छोटी-बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी. इसके बजाय पार्टी में काम कर रहे दलित वर्ग के किसी मिशनरी और वफादार कार्यकर्ता को आगे किया जाएगा. मायावती ने कहा कि देश और जनहित के जरूरी मुद्दों के साथ इस मुद्दे को लेकर 23 सितंबर को बीएसपी की बेहद जरूरी ऑल इंडिया बैठक बुलाई गई है, ताकि पार्टी के लोग अपने काम में पूरी तरह जुट सकें. पत्र से प्रभावित होकर लिया फैसला मायावती ने कहा कि परिवार को लेकर पार्टी और मूवमेंट के हित में उन्होंने यह फैसला कांशीराम से प्रेरित होकर और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिखे एक पत्र से प्रभावित होकर लिया है. उन्होंने बताया कि 23 फरवरी 1956 को 26 अलीपुर रोड, सिविल लाइन्स, नई दिल्ली से बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बंबई में अपने बेटे यशवंत बी. आंबेडकर को पत्र लिखा था. मायावती के मुताबिक, उस पत्र में बाबा साहेब ने लिखा था कि उन्हें श्री उपशम के कई पत्र मिले हैं, जिनमें कहा गया था कि यशवंत उन्हें बौद्ध भूषण प्रिंटिंग प्रेस में अकाउंटेंट और कैशियर के तौर पर अपनी ड्यूटी नहीं करने दे रहे हैं. उन्होंने कहा था कि प्रेस सार्वजनिक संपत्ति है, न कि यशवंत की और न ही उनकी, इसलिए सार्वजनिक खाते में किसी भी तरह की अनियमितता की अनुमति नहीं दी जा सकती. उन्होंने यह भी कहा था कि यदि उनके अंतिम निर्देश की परवाह नहीं की गई तो वह उन्हें प्रेस से निकाल देंगे और चेतावनी नहीं मानने पर उनके खिलाफ मुकदमा भी चलाएंगे.

राहुल गांधी की टिप्पणी पर बीजेपी का पलटवार, सीआर केसवन और केंद्रीय मंत्रियों ने बोला हमला

नई दिल्ली  इंदौर में विपक्षी पार्टी के छात्रों की गूंज कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई टिप्पणियों को लेकर बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की कड़ी आलोचना की है। राहुल गांधी ने स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि के साथ मंच पर कुछ बातें कहीं और इशारे किए, जिनसे साफ पता चलता था कि वे प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ा रहे थे। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सीआर केसवन ने आज सुबह एक वीडियो बयान में कहा कि राहुल गांधी ने एक मां का मजाक उड़ाकर महिलाओं का अपमान किया है। 'असभ्य संस्कृति को बढ़ावा दे रहे राहुल गांधी' केशवन ने कहा, "कोई भी सभ्य और सही सोच वाला व्यक्ति ऐसी अभद्र और घटिया हरकतों को मजेदार नहीं मानेगा लेकिन राहुल गांधी को उस मंच पर जोर-जोर से हंसते हुए देखा गया जिसे वे उनके साथ साझा कर रहे थे। राहुल गांधी द्वारा ऐसी असभ्य संस्कृति को बढ़ावा देने की वजह से ही वे और कांग्रेस युवाओं से जुड़ने में नाकाम रहे हैं।" 'दिल्ली यूनिवर्सिटी से भी खदेड़ दिया गया' उन्होंने कहा कि कांग्रेस के अपने नेता शशि थरूर ने भी इस मोर्चे पर पार्टी की नाकामी को माना है। दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "राहुल गांधी की कड़वी नफरत वाली राजनीति ही वह वजह है जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी और उसके छात्र संगठन एनएसयूआई को दिल्ली यूनिवर्सिटी से खदेड़ दिया गया।" 'बुजुर्गों का बेशर्मी से अपमान किया गया' बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, "एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बुज़ुर्ग व्यक्ति के लिए कुर्सी का इंतजाम करके संवेदनशीलता दिखाई, वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी को कल तब मजा करते हुए देखा गया जब ऐसे ही बुज़ुर्गों का बेशर्मी से अपमान किया जा रहा था। राहुल गांधी, जो मसखरों और ऐसे भद्दे सर्कस शो का समर्थन करते हैं, उन्हें एक राजनीतिक नेता के तौर पर गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।" केंद्रीय मंत्रियों ने क्या कहा? केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी नैतिक दिवालियापन के सबसे निचले स्तर पर गिर गए हैं। छात्रों के साथ बातचीत का इस्तेमाल करके पीएम मोदी जी की दिवंगत मां का मजाक उड़ाना और उनका अपमान करना, बुनियादी मानवीय संवेदना और राजनीतिक संस्कृति की चौंकाने वाली कमी को दर्शाता है।" केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी पर हमला करते हुए कहा, "कांग्रेस अब कॉमेडियन्स और जोकरों की पार्टी बनकर रह गई है। वे हमेशा के लिए बाहर हो गए हैं

बिहार के बाद यूपी-पंजाब में ताकत दिखाएगी चिराग की पार्टी, NDA से सीटों की उम्मीद

पटना बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बना चुके केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी 'लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)' अब उत्तर प्रदेश और पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों में ताल ठोकने की तैयारी कर रही है। LJP(R) को उम्मीद है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के तहत उन्हें इन दोनों राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए सम्मानजनक सीटें मिलेंगी। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान बीते कुछ समय से लगातार यूपी और पंजाब के दौरों पर हैं। हाल ही में 17 सितंबर को चिराग पासवान ने केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के साथ वाराणसी में एक भव्य बाइक रैली को हरी झंडी दिखाकर गुजरात के वडनगर के लिए रवाना किया था। 'गैर-जाटव' और पंजाब के दलित वोट बैंक पर निशाना उत्तर प्रदेश और पंजाब, दोनों ही राज्यों में दलित आबादी चुनावी नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाती है। उत्तर प्रदेश का गणित: LJP(R) की नजर यूपी के गैर-जाटव दलित मतदाताओं पर है, जो पारंपरिक रूप से बीएसपी (BSP) के खिसकते जनाधार के बाद नए विकल्प की तलाश में हैं। पंजाब का समीकरण: पंजाब में करीब 32 प्रतिशत दलित आबादी है। चिराग पासवान की युवा और दलित नेता के रूप में बनी छवि को एनडीए वहां भुनाना चाहता है। एलजेपी(आर) के राष्ट्रीय महासचिव धीरेन्द्र कुमार मुन्ना ने कहा, "गठबंधन पर अंतिम फैसला हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ही लेंगे। लेकिन अगर एनडीए में सीटों का बंटवारा होता है, तो हम अपने उम्मीदवारों के साथ-साथ पूरे गठबंधन की जीत के लिए पूरी ताकत झोंकेंगे। यूपी और पंजाब के दलित समाज को चिराग पासवान के रूप में एक विश्वसनीय चेहरे से काफी उम्मीदें हैं।" 24 सितंबर से पटना से शुरू होगा 'युवा बोले तो' अभियान यूपी और पंजाब में जमीन मजबूत करने से पहले चिराग पासवान अपने गृह राज्य बिहार से युवाओं को जोड़ने के लिए एक नया जनसंपर्क अभियान- 'युवा बोले तो' शुरू करने जा रहे हैं। 24 सितंबर से पटना में इस विशेष युवा संवाद कार्यक्रम का आगाज होगा इसके जरिए चिराग पासवान सीधे युवाओं से संवाद करेंगे, उनकी समस्याओं को सुनेंगे और उनके रोजगार और करियर से जुड़े मुद्दों के हल तलाशने की कोशिश करेंगे। 28 साल बाद तृणमूल कांग्रेस का सिंबल फ्रीज होने और क्षेत्रीय राजनीति के बदलते दौर के बीच, चिराग पासवान का हिंदी भाषी राज्यों में अपनी पार्टी का विस्तार करने का यह दांव एनडीए के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है, यह देखने वाली बात होगी।

नंदीग्राम पर टिकी नजरें, शुभेंदु अधिकारी के लिए क्यों अहम है यह सीट?

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम सीट का उपचुनाव मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली परीक्षा भी है। इस सीट पर उपचुनाव से पहले नाटकीय घटनाक्रम देखा जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संचिता प्रधान डे को अपना उम्मीदवार बनाकर उतारा था। वहीं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद संचिता प्रधान ने बिना कोई वजह बताए ही अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस के उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन का ऐलान कर दिया। इसके कुछ देर बाद ही एक पुराने मामले में प्रधान की गिरफ्तारी हो गई। राहुल गांधी ने अपने उम्मीदवार की गिरफ्तारी को लेकर शुभेंदु सरकार पर निशाना साधा और इसे लोकतंत्र पर प्रहार बताया है। अधिकारी ने खेला इमोशनल दांव शुभेंदु अधिकारी ने भी नंदीग्राम सीट पर इमोशनल दांव खेलते हुए अपने पीए रहे चंद्रनाथ रथ की मां हसीरानी रथ को अपना उम्मीदवार बनाया है। 6 मई को रथ की मध्यमग्राम में हत्या कर दी गई थी। सीबीआई इस हत्याकांड की जांच कर रही है। शुभेंदु अधिकारी के लिए क्यों अहम है नंदीग्राम नंदीग्राम की सीट शुभेंदु अधिकारी की प्रतिष्ठा से इसलिए जुड़ी है क्योंकि उन्होंने अपनी असल राजनीति की शुरूआत यहीं से की थी। उन्होंने नंदीग्राम में ही ममता बनर्जी के साथ किसानों के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा खोला था। इसी वजह से बंगाल से लेफ्ट की सरकार चली गई और ममता बनर्जी की अगुआई में टीएमसी की सरकार बन गई। ममता बनर्जी बंगाल में 15 साल मुख्यमंत्री रहीं लेकिन शुभेंदु अधिकारी के रास्ते ममता बनर्जी से अलग हो गए। शुभेंदु अधिकारी 2016 में नंदीग्राम से विधायक चुने गए। वहीं 2021 में उन्होंने अपनी राजनीतिक गुरु ममता बनर्जी को ही नंदीग्राम से हरा दिया। यहीं से नंदीग्राम के समीकरण बदलने लगे। 2026 में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दो जगहों से चुनाव लड़ा और नंदीग्राम सीट पर फिर से जीत हासिल की। हालांकि उन्होंने भवानीपुर सीट को चुना और इसलिए नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं। हालांकि शुभेंदु अधिकारी इस सीट को किसी कीमत पर हाथ से निकलने नहीं देना चाहते हैं। 6 अक्टूबर पर नंदीग्राम के साथ ही रेजीनगर सीट पर भी उपचुनाव होने हैं। ये उपचुनाव बंगाल में शुभेंदु अधिकारी की छवि पर बड़ा असर डालने वाले हैं। अधिकारी ने मुख्यमंत्री बनते ही कई बड़े फैसले लिए हैं और बड़े परिवर्तन का प्रयास किया है। अब इन दोनों सीटों की जनता इस बात पर भी मुहर लगाएगी कि उसे उनके फैसले पंसद आए हैं या नहीं। वहीं अधिकारी पर यह भी दवाब है कि बिहार की बांकीपुर सीट जैसा हाल यहां ना हो

ममता बनर्जी का नया गठबंधन प्लान? कांग्रेस से दूरी और अलग मोर्चे की अटकलें तेज

नई दिल्ली 2029 लोकसभा चुनाव से पहले भारत की राजनीति में बड़ी हलचल होने के आसार हैं। इसके संकेत हाल ही में हुईं कुछ बैठकों से मिल रहे हैं। DMK यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम सांसद कनिमोई ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की है। खबरें हैं कि बगैर कांग्रेस के और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक क्षेत्रीय दलों का गठबंधन तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, इसे लेकर औपचारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। कनिमोई और बनर्जी ने गुरुवार को कोलकाता में मुलाकात की। हालांकि, कालीघाट स्थित पूर्व सीएम के आवास पर हुई बैठक में किन मुद्दों पर बात की गई, इसे लेकर स्थिति साफ नहीं हो पाई है। इससे पहले डीएमके नेता शिवसेना यूबीटी चीफ उद्धव ठाकरे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एसपी से लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले से मिली थीं। कहा जा रहा है कि वह जल्द ही आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल से मिल सकती हैं। तीसरे मोर्चे की तैयारी  डीएमके के एक नेता ने कहा, 'हम बगैर कांग्रेस के एक तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाश रहे हैं।' इधर, अखबार से बातचीत में एक टीएमसी सांसद ने कहा, 'ममता बनर्जी के DMK प्रमुख एमके स्टालिन के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। वह गैर NDA पार्टियों के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखती हैं और INDIA ब्लॉक के उन सदस्यों के करीब हैं जो कांग्रेस समर्थक नहीं हैं। आज की बातचीत सिर्फ उनके और कनिमोई के बीच हुई। इसके अलावा कुछ भी कहना सिर्फ अटकलें लगाना होगा।' DMK तो है क्या ममता बनर्जी भी कांग्रेस से नाराज? तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक कांग्रेस और डीएमके एक साथ रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन 2026 चुनाव के बाद स्थिति बदल गई। कांग्रेस राज्य के सबसे बड़े दल तमिलागा वेत्री कझगम से जा मिली और पुराने साथी डीएमके के छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि डीएमके ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा और INDIA गठबंधन से भी दूरी बना ली। वहीं, ममता बनर्जी की नाराजगी की एक वजह सीट शेयरिंग हो सकती है। खबरें थीं कि पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर ममता ने कांग्रेस से मदद मांगी थी, जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। हालांकि, टीएमसी नेता इससे इनकार कर रहे हैं। जबकि, कांग्रेस खुलकर इसे स्वीकार कर रही है। खबरें थीं कि पूर्व सीएम ने कांग्रेस से रेजिनगर सीट पर समर्थन मांगा था और नंदीग्राम सीट छोड़ने की पेशकश की थी। कांग्रेस के पूर्व में प्रदेश अध्यक्ष रहे प्रदीप भट्टाचार्य ने पीटीआई को बताया था, 'प्रस्ताव यह था कि तृणमूल कांग्रेस रेजीनगर से चुनाव लड़ेगी और नंदीग्राम सीट कांग्रेस के लिए छोड़ देगी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस पर समय मांगा और बाद में प्रदेश के नेताओं से इस प्रस्ताव पर चर्चा की।' उन्होंने कहा, 'प्रदेश नेतृत्व का मानना था कि गठबंधन के लिए यह सही समय नहीं है। उचित समय आने पर इस पर विचार किया जा सकता है, लेकिन अभी नहीं। यह सही फैसला है।' कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता सुमन रॉय चौधरी ने कहा, 'जब तृणमूल सत्ता में थी, तब उसने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया था, जब भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना थी। अब जब वह अकेली और पराजित है, तो ऐसा लगता है कि उसे कांग्रेस के महत्व का एहसास हुआ है।' गठबंधन की पहले भी हुईं हैं कोशिशें साल 2013 में ममता बनर्जी ने कोशिशें की थीं कि बगैर कांग्रेस और भाजपा के गठबंधन तैयार किया जा सके। इसके बाद 2018 में तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी अलग-अलग राज्यों का दौरा करते नजर आए। 2024 से पहले केजरीवाल भी गठबंधन को कोशिश कर रहे थे।

रेजीनगर उपचुनाव में बड़ा सियासी अपडेट, ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार ने नामांकन वापस लिया

कोलकाता  विधानसभा उपचुनाव में नंदीग्राम के बाद अब रेजीनगर में भी ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ने नामांकन वापस लेने का फैसला किया है। रेजीनगर से ममता तृणमूल के प्रत्याशी रबिउल आलम चौधरी ने शनिवार को नामांकन वापस लेने की घोषणा की। इसके साथ ही नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों विधानसभा सीटों के उपचुनाव में ममता तृणमूल का कोई प्रत्याशी नहीं रहेगा। रबिउल ने नामांकन वापस लेने की वजह नया चुनाव चिह्न लोगों के बीच पहचान बनाने में कठिनाई और कार्यकर्ताओं पर दबाव को बताया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता चुनाव मैदान में उतरने को तैयार नहीं हैं। रबिउल के अनुसार, उन्होंने ममता बनर्जी से भी इस संबंध में बात की है। नंदीग्राम के बाद रेजीनगर में भी वापसी नंदीग्राम में ममता तृणमूल की प्रत्याशी संचिता प्रधान दे ने शुक्रवार को नामांकन वापस लिया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने वहां कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही थी। रेजीनगर को लेकर उन्होंने कहा था कि इस पर बाद में फैसला किया जाएगा। इसके बाद से ही रबिउल के नामांकन वापस लेने की अटकलें लग रही थीं। शनिवार को नामांकन वापसी की अंतिम तारीख पर उन्होंने यह फैसला कर लिया। आयोग ने बदला नाम और चिह्न निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और ‘घासफूल’ चिह्न को फिलहाल स्थगित किया है। इसके बाद ममता तृणमूल को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉलर’ चिह्न दिया गया है। नए चिह्न के साथ चुनाव लड़ने में आ रही दिक्कत का हवाला देते हुए दोनों सीटों पर ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों ने नामांकन वापस ले लिया है। अब दोनों उपचुनाव में ममता तृणमूल का कोई उम्मीदवार नहीं होगा। प्रतीक को लेकर हुमायूं के बेटे की बढ़ी मुश्किल वहीं, रेजीनगर में आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर के बेटे गोलाम नबी आजाद रबिन के सामने भी प्रतीक को लेकर पेच फंस गया है। वह अपने पिता के पुराने ‘बांसुरी’ प्रतीक पर चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपचुनाव के लिए किसी प्रतीक को पहले से आरक्षित नहीं किया जाता।  

नंदीग्राम में कांग्रेस प्रत्याशी की मुश्किलें बढ़ीं, 14 दिन की न्यायिक हिरासत

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम हुआ है। नंदीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। कल ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन दिए जाने के बाद गिरफ्तारी की गई थी। अब इस मामले में अदालत ने कांग्रेस प्रत्याशी को 3 अक्तूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। बता दें, पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव के लिए 6 अक्तूबर को वोटिंग होगी। पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम विधानसभा उप चुनाव के लिए ममता गुट की तरफ से पहले संचिता प्रधान डे ने नामांकन दाखिल किया था। लेकिन शुक्रवार को सीएम शुभेंदु अधिकारी के साथ मुलाकात करने के बाद संचिता ने अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद ममता बनर्जी ने खुलकर कांग्रेस प्रत्याशी को अपना समर्थन देने का ऐलान किया। हालांकि, कुछ देर बाद ही कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को एक 2007 के मर्डर के केस में गिरफ्तार कर लिया गया। ममता बनर्जी और कांग्रेस ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाया और इसे भाजपा की बदले की राजनीति करार दिया। प्रधान की गिरफ्तारी को लेकर पीटीआई से बात करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया, "प्रधान को 2007 में दर्ज चार मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था… ये मामले दंगा, हत्या और आपराधिक धमकी से जुड़े हैं। इनमें तीन नंदीग्राम और एक खेजुरी थाने में दर्ज मामले शामिल हैं। ये मामले भारतीय दंड संहिता (IPC) और शस्त्र अधिनियम की धाराओं के तहत दर्ज किए गए थे। उन्हें आज हल्दिया के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा।'' फरार थे मिलन प्रधान- पश्चिम बंगाल पुलिस पश्चिम बंगाल पुलिस ने शनिवार को कहा कि प्रधान ''फरार'' थे और उन्हें काफी समय से लंबित चार गैर-जमानती वारंट के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। राज्य पुलिस ने एक बयान में कहा, ''गिरफ्तार व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों में हत्या, हत्या की कोशिश, हत्या के इरादे से अपहरण, सबूत मिटाना, घर में जबरन घुसना और घातक हथियारों का इस्तेमाल कर दंगा करने जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। कुछ मामलों में शस्त्र अधिनियम के प्रावधान भी लगाए गए हैं।'' पुलिस ने कहा, ''प्रधान 2007 से फरार थे और इन मामलों में उन्हें फरार घोषित करते हुए आरोप-पत्र दायर किया गया था। वारंट तामील करने के संबंध में पूर्व में बार-बार किए गए प्रयास विफल रहने और समय-समय पर अदालतों में वारंट तामील नहीं होने की रिपोर्ट दी जाती रही है।'' पुलिस ने बताया कि यह गिरफ्तारी काफी समय से लंबित गैर-जमानती वारंट को तामील कराने के लिए चलाए गए एक विशेष अभियान के दौरान की गई। नंदीग्राम उप चुनाव के दौरान ही क्यों किया गया गिरफ्तार? पुलिस के अनुसार, ''चुनाव और उपचुनाव के दौरान भारत निर्वाचन आयोग की ओर से इस तरह की कार्रवाई के लिए स्थायी निर्देश जारी होते हैं। एक विशेष अभियान के तहत इन निर्देशों का पालन करते हुए प्रधान की गिरफ्तारी होना एक कानूनी कार्रवाई है।'' प्रधान को उस समय गिरफ्तार किया गया, जब पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने छह अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस को अपनी पार्टी का समर्थन देने की घोषणा की थी, क्योंकि उनके उम्मीदवार ने चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया था। प्रधान की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष शुभांकर सरकार ने कहा कि पार्टी को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया और उन्हें कहां रखा गया है। सरकार ने शुक्रवार शाम कहा, ''हमें पता चला कि उन्हें हत्या के एक मामले में हिरासत में लिया गया है, लेकिन हमें इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। मिलन (प्रधान) उन नेताओं में शामिल थे, जो नंदीग्राम आंदोलन में सबसे आगे थे और उनपर कई मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन, आज उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया?''

पार्टी के नाम-निशान पर किसका हक? ममता-चिराग विवाद के बीच समझें एकनाथ शिंदे को कैसे मिली शिवसेना

नई दिल्ली ममता बनर्जी ने मई में पश्चिम बंगाल गंवाया और सितंबर में तृणमूल कांग्रेस नाम और दो फूल जोड़ा चुनाव चिह्न भी छोड़ना पड़ा। हालांकि, इनका इस्तेमाल अरूप रॉय गुट भी नहीं कर सकेगा। अंतरिम आदेश के जरिए मुख्य नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया है। आगे जाकर स्थिति बदल भी सकती है। सवाल है कि जब साल 2022 में शिवसेना टूटने के मामले में महाराष्ट्र के मौजूदा उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले गुट को चुनाव आयोग ने नाम और निशान कैसे दे दिया था। पहले समझते हैं कि अगर एक ही पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों ही मुख्य दल होने का दावा करते हैं, तो चुनाव आयोग फैसला किस तरह से लेता है। चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968, यह वही आदेश है जिसका इस्तेमाल करके चुनाव आयोग एक पूरी प्रक्रिया से गुजरता और पता लगाता है कि किसे पार्टी का चुनाव चिह्न, झंडा और नाम मिलेगा। इसमें भी धारा 15 बेहद अहम है। कानून समझ लेते हैं इस कानून की धारा 15 के अनुसार, 'जब आयोग को अपने पास मौजूद जानकारी से यह पता चलता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विरोधी गुट या समूह हैं और हर कोई खुद को ही वह असली दल बताता है। ऐसे में आयोग मामले से जुड़े सभी उपलब्ध तथ्यों और हालात पर विचार करने और उन गुटों या समूहों के नेताओं और अन्य लोगों की बात सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि उन विरोधी गुटों या समूहों में से कोई एक ही वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या उनमें से कोई भी नहीं है। आयोग का यह फैसला उन सभी विरोधी गुटों या समूहों पर लागू होगा।' आसान भाषा में एक जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग इस बात पर फोकस करेगा कि दोनों गुटों में संगठन स्तर पर कितने सदस्य हैं। साथ ही विधायकों और सांसदों की गिनती भी अहम भूमिका निभाएगी। दोनों पक्ष इसकी जानकारी एक हलफनामे के जरिए देंगे। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी बताते हैं कि आयोग 'रूल ऑफ मेजॉरिटी' के आधार पर फैसला करता है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जांच करेगा कि किस गुट के पास सांसद, विधायक और संगठन पर ज्यादा समर्थन है। पार्टी किसके साथ, यह पता करने का भी एक तरीका है पूर्व चुनाव आयुक्त बताते हैं कि संगठन में ज्यादा समर्थन किसके साथ है, यह पता करने के लिए सभी पार्टी पदाधिकारी और उन लोगों को गिना जाता है, जो पार्टी के अध्यक्ष चुनने का अधिकार रखते हैं। पार्टी को इस संबंध में अपना हलफनामा दाखिल करना होता है। इसके बाद आयोग हस्ताक्षरों को मिलाता है। पूरी प्रक्रिया के बाद तय किया जाता है कि किस पार्टी को चिह्न मिलेगा। एकनाथ शिंदे को क्यों मिल गया चुनाव चिह्न हालांकि, शिवसेना में टूट मामले में भी चुनाव आयोग ने पहली ही बार में शिंदे गुट को मुख्य दल नहीं माना था। पहले शिवसेना नाम और तीर कमान चिह्न को फ्रीज कर दिया गया और दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चिह्न चुनने के लिए कहा गया था। 2023 में इसका अधिकार शिंदे समूह को मिला। आयोग ने कहा था कि उनका बहुमत के परीक्षण पर आधारित है, क्योंकि शिंदे गुट का समर्थन कर रहे विधायकों को 2019 विधानसभा चुनाव में करीब 76 फीसदी वोट मिले। जबकि, उद्धव ठाकरे गुट के मामले में यह आंकड़ा 23.5 प्रतिशत पर था। उस चुनाव में अविभाजित शिवसेना के कुल 55 उम्मीदवार जीते थे। 78 पेज लंबे आदेश में आयोग ने कहा था, 'शिव सेना पार्टी का नाम और पार्टी का चुनाव चिह्न तीर कमान याचिकाकर्ता गुट के पास ही रहेगा।' याचिकाकर्ता शिंदे गुट था। चुनाव आयोग के सामने शिंदे गुट ने साबित किया था कि उसके पास 40 विधायकों और 18 में से 13 सांसदों का समर्थन है। साथ ही गुटों ने संगठन स्तर पर भी हस्ताक्षरों से जुड़ा एक हलफनामा आयोग में दाखिल किया था। TMC के मामले में क्या बोला चुनाव आयोग खास बात है कि टीएमसी के मामले में अभी अंतरिम आदेश ही जारी हुआ है। संभावनाएं हैं कि आगे चलकर किसी गुट को मुख्य नाम और चिह्न मिल भी सकता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है। अंतरिम आदेश में कहा गया है, 'रिकॉर्ड पर मौजूद सभी जानकारियों पर ठीक से विचार करने के बाद… आयोग का मानना ​​है कि तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं, जिनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे की कमान अरूप रॉय संभाल रहे हैं।' अंतरिम आदेश के अनुसार, 'अब हर गुट खुद के असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहा है, इसलिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैराग्राम 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेना होगा।' आयोग ने साफ कर दिया है कि मौजूदा उपचुनाव की स्थिति को देखते हुए ऐसा किया गया है और मौजूदा अंतरिम आदेश मामला खत्म होने तक जारी रहेगा। खास बात है कि 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होने हैं। दोनों ही गुटों ने सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। चिराग पासवान मामले में किसी को नहीं मिले यह टूट साल 2021 की है। तब रामविलास पासवान के निधन के कुछ समय बाद झोपड़ी के चिह्न वाले लोक जनशक्ति पार्टी में खटपट की खबरें तेज हो गईं थीं। दरअसल, यहां पसवान के बेटे और मौजूदा सांसद चिराग और भाई पशुपति कुमार पारस में दल को लेकर विवाद था। दोनों ही असली दल की अगुवाई का दावा कर रहे थे। 2 अक्टूबर 2021 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसके बाद नाम और चिह्न को फ्रीज कर दिया गया था और किसी को भी इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी। दो दिन बाद यानी 5 अक्टूबर को नए नाम और चिह्न आवंटित किए गए। खास बात है कि इसके 28 दिन बाद ही 30 अक्टूबर 2021 में बिहार में दो सीटों पर उपचुनाव होने थे। ठीक वैसा ही जैसा बंगाल में दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं। चुनाव आयोग ने चिराग और पशुपति गुट को अपने नाम में लोक जनशक्ति पार्टी नाम का जुड़ाव रखने की अनुमति दे दी थी और … Read more