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महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल, उद्धव ठाकरे गुट से 6 सांसदों के टूटने की तैयारी

महाराष्ट्र महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है. शिवसेना यूबीटी खेमे में आज फूट का औपचारिक ऐलान होने के संकेत मिल रहे हैं. जानकारी के मुताबिक, 6 बागी सांसदों के अलग होने की तैयारी पूरी हो चुकी है. कई दिनों की ज़बरदस्त अटकलों, आरोपों और तीखी टिप्पणियों के बाद, आज शिवसेना (उद्धव ठाकरे) खेमे में फूट की औपचारिक घोषणा होने की संभावना है. सूत्रों के मुताबिक, बागी सांसद रविवार को संयुक्त रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, जिसमें वे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ अपनी बैठक की तस्वीरें और वीडियो फुटेज जारी करेंगे. इसके साथ ही, स्पीकर को सौंपे गए पत्र की एक कॉपी भी पेश करेंगे. उम्मीद की जा रही है कि बागी सांसद उद्धव ठाकरे खेमे से अलग होने के पीछे की वजहों का भी जिक्र करेंगे. कब क्या हुआ? पूरी टाइमलाइन…. उद्धव ठाकरे खेमे में पाला बदलने की चर्चा तेज होने के बाद महाराष्ट्र के सियासी हलकों में नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिला है. संजय जाधव, संजय देशमुख, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल अष्टिकर और संजय दीना पाटिल सहित 6 बागी सांसद पहले देश के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली पहुंचे, नोएडा के एक होटल में रुके और दिल्ली में एकनाथ शिंदे तथा उनके बेटे श्रीकांत के साथ मीटिंग में शामिल हुए. अगली सुबह, श्रीकांत और निंबालकर दोनों ने सुबह करीब 7 बजे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात की. सुबह करीब 10.20 बजे, बाकी पांच सांसदों ने स्पीकर से मुलाकात की और एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय कर रहे हैं और सदन में उनके बैठने की जगह बदलने की गुजारिश की. मीटिंग के बाद, सांसद चेन्नई, वाराणसी, पुणे और मुंबई सहित अलग-अलग जगहों के लिए रवाना हो गए. आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो सांसद चेन्नई से और दो कोलकाता से मुंबई पहुंचेंगे, जबकि एक सांसद पहले से ही मुंबई में है और दूसरा पुणे में है.

नीतीश कुमार का पुराना बयान वायरल, एनकाउंटर विवाद में सम्राट सरकार पर विपक्ष का तीखा हमला

पटना  बिहार के भोजपुर में हुए भरत तिवारी कथित एनकाउंटर मामले ने राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। इस मुठभेड़ के बाद उठ रहे गंभीर सवालों के बीच वर्तमान सम्राट सरकार विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों के निशाने पर है। विवाद इतना बढ़ चुका है कि सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं। इसी सियासी हलचल के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का करीब तीन साल पुराना एक बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा में है। लोग इस पुराने बयान के जरिए मौजूदा कानून-व्यवस्था और पुलिसिया कार्रवाई की तुलना कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने एनकाउंटर पर क्या कहा था? 17 अप्रैल 2023 को नीतीश कुमार ने मीडिया से कहा था, 'अपराधियों का सफा माने मार दीजिए, यह कोई तरीका है? इसका मतलब जो जेल में जाएगा तो उसको मार दीजिए। ऐसा कोई नियम है? आप बताइए तो अरे तो कोर्ट ना फैसला करता है ? अगर, किसी को यह भी सजा होती है कि उसको फांसी होगी। फांसी हो जाती है। लेकिन, बाकी को साल तक (सजा) का होता है कितने तक का होता है? सजा या कोई जेल में हो तो इलाज के लिए ले जा रहा है या किसी काम के लिए ले जा रहा है और रास्ते में हो गया (एनकाउंटर) ये बहुत दुखद है।' नीतीश कुमार यहीं नहीं रूके। उन्होंने कहा, 'इसपर तो निश्चित रूप से लोगों को एक्शन करना चाहिए। क्या ठीक है? किसी को सजा होती है या किसी पर केस होता है, कोई जेल में है उस पर हमको नहीं कुछ करना है। हमारा यह है कि कोई भी जेल में रहेगा और कोई भी किस तरह से बाहर जाए और उसको ऐसे ही मार दें? ये तो बड़ा दुखद बात है ना?' अपराधियों का सफा माने मार दीजिए, यह कोई तरीका है? इसका मतलब जो जेल में जाएगा तो उसको मार दीजिए। भरत तिवारी कथित मुठभेड़ से मुश्किल में सम्राट सरकार भोजपुर में पुलिस कार्रवाई के दौरान मारे गए भरत तिवारी के मामले ने तूल पकड़ लिया है। घटना के सामने आए कुछ वीडियो साक्ष्यों के बाद पुलिस की थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसके चलते राज्य की सम्राट चौधरी सरकार बैकफुट पर है। सरकार ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल इंक्वायरी) के आदेश जारी कर दिए हैं, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके। नीतीश कुमार के पुराने बयानों की दुहाई देकर अब विपक्ष सम्राट सरकार पर चौतरफा हमले कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस एनकाउंटर ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि जेडीयू और बीजेपी के बीच नीतिगत मतभेदों को भी हवा दे दी है। अब सभी की नजरें इस मामले में आने वाली न्यायिक जांच की रिपोर्ट पर टिकी हैं। भरत तिवारी कथित मुठभेड़ मामला क्या है?     बिहार के भोजपुर में पुलिस ने कथित एनकाउंटर किया।     पुलिस मुठभेड़ में आरोपी भरत तिवारी की मौत हो गई।     वायरल वीडियो में सरेंडर के बाद गोली मारते देखा गया।     मानवाधिकार उल्लंघन और फर्जी एनकाउंटर के गंभीर आरोप लगे।     चौतरफा सियासी दबाव के बाद न्यायिक जांच के आदेश दिए।  

उद्धव से ममता तक, क्यों बिखर रहे विपक्षी दल? भाजपा नेताओं ने बताई बड़ी वजह

नई दिल्ली भारतीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों से लगातार बगावत का दौर जारी है। विपक्ष में कांग्रेस के बाद नंबर दो आने का दावा करने वाली तीन पार्टियों में एक के बाद एक टूट हुई है। पहले आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद टूटकर भाजपा में शामिल हो गए। उसके बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई नजर आई। अब 2022 की टूट के बाद बाकी बची उद्धव ठाकरे की पार्टी में एक बार फिर से बागवत हुई है। पार्टी के 9 में से 6 सांसद शिंदे की तरफ जाने की कतार में हैं। विपक्षी पार्टियों ने इस बगावत का आरोप भारतीय जनता पार्टी के ऊपर लगाया है, तो भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए इसके लिए नेताओं के असंतोष को वजह बताया। हिन्दुस्तान से बात करते हुए भाजपा के वरिष्ठ सांसद ने इन पार्टियों में हुई टूट की वजह का भी जिक्र किया। नाम न देने की शर्त पर सांसद ने कहा कि इन पार्टियों के भीतर नेतृत्व की कमी साफ तौर पर नजर आ रही है। इसलिए सांसद और नेता भी साथ छोड़ते हुए नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, "विधायक या सांसद दल बदलने का फैसला कुछ कारणों से करते हैं। पहला यह कि उन्हें उस पार्टी में अपना राजनीतिक भविष्य नजर ना आ रहा हो। दूसरा, नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच में संबंध सही नहीं हों। तीसरा होता है कोई अन्य लाभ, जिसमें पैसे और अन्य चीजें शामिल होती हैं।" भाजपा नेता ने कहा कि उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी की पार्टी के नेता नेतृत्व को लेकर असंतुष्ट थे। इसलिए वह उनसे अलग हुए हैं। उन्होंने कहा, "शिवसेना में एक समय था कि बालासाहब ठाकरे यह सुनिश्चित करते थे कि पार्टी में नेताओं और कार्यकर्ताओं की पर्याप्त देखभाल हो। लेकिन अब उद्धव गुट में ऐसी कोई बात नहीं है। वहां नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच में अब कोई जुड़ाव नहीं रह गया। अभी भी जो लोग वफादारी की वजह से उद्धव के साथ जुड़े हुए हैं। उनमें कई लोगों को यह लगता है कि पार्टी ने कांग्रेस के साथ समझौता करके हिंदुत्व की रक्षा वाली अपनी छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है।" बंगाल में नेताओं ने ममता बनर्जी की पार्टी नहीं छोड़ी, यह तख्तापलट: भाजपा नेता भाजपा के एक दूसरे नेता ने पश्चिम बंगाल की स्थिति पर बात करते हुए कहा कि यहां पर विधायकों ने ममता बनर्जी की पार्टी छोड़ा नहीं है बल्कि तख्ता पलट किया है। उन्होंने कहा, "यह सिर्फ एक या दो नेताओं का नाराज होकर पार्टी छोड़ना नहीं है। लगभग सभी विधायकों ने मिलकर तख्ता पलट जैसी स्थिति बनाकर रितब्रत बनर्जी को विधानसभा नेता प्रतिपक्ष बना दिया है। दूसरी तरफ 20 सांसद एनसीपीआई में शामिल हो गए हैं। इतने बड़े परिवर्तन के पीछे केवल एक ही वजह है कि इन लोगों को पार्टी नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा। ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस को एक जागीर की तरह चला रही थीं। इसमें चुनकर आए नेताओं की कोई आवाज नहीं थी। इसलिए जैसे ही सत्ता गई, लोग भी साथ छोड़ते गए।" विपक्षी पार्टियों की टूट से सत्ता पक्ष को फायदा बता दें, भारतीय जनता पार्टी की तरफ से भले ही इन पार्टियों को तोड़ने की बात से इनकार किया जा रहा हो। लेकिन विपक्ष इसके लिए केंद्रीय सत्ताधारी पार्टी को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया है कि सरकार संसद में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उनके सांसदों को तोड़ रही है, ताकि दो-तिहाई बहुमत हासिल करके महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक जैसे मुद्दों को निपटाया जा सके। आंकड़ों की बात करें, तो विपक्षी पार्टियों में होने वाली इस टूट का फायदा भारतीय जनता पार्टी और केंद्र के सत्ताधारी गठबंधन एनडीए को मिलना तय है। क्योंकि अभी तक जिस भी पार्टी के नेता बगावत पर उतरे हैं उन्होंने केंद्र सरकार को समर्थन देने की बात कही है। इस समय पर एनडीए के पास लोकसभा के 293 सांसद हैं। अब इन बाकी सांसदों का साथ मलने के बाद यह संख्या 319 तक पहुंच जाएगी। इससे भाजपा कई मुद्दों को एक साथ निपटाने में भी कामयाब होगी।

विवाद के बीच शशि थरूर का पलटवार: “भारतीय नाविकों की सुरक्षा राजनीति नहीं हो सकती”

नई दिल्ली  कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक बयान ने एक बार फिर सियासी हलचल तेज कर दी है। जी-7 समिट में पीएम नरेंद्र मोदी के रुख की सराहना करने वाले उनके बयान को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर हमला बोला है। उधर विवाद बढ़ने पर थरूर ने एक्स पर अपनी सफाई भी पेश की है। दरअसल, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने फ्रांस में जी-7 समिट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से उठाए गए मुद्दों पर अपनी बात कही है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दे को मजबूती से रखा है। थरूर के इस बयान के बाद देश में राजनीतिक बवाल मच गया। 'भारतीयों की जान राजनीति का मुद्दा नहीं' विवाद बढ़ने के बाद थरूर ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हो रही है कि भारतीय नागरिक नाविकों की सुरक्षा से जुड़े बयान को राजनीतिक विवाद बनाया जा रहा है। उन्होंने लिखा, 'तीन भारतीयों की जान चली गई। मेरी बात सिर्फ हमारे नागरिकों की सुरक्षा और इस सिद्धांत की थी कि नागरिक नाविकों को कभी भी सैन्य कार्रवाई का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर कुछ लोग इस चिंता पर ध्यान देने के बजाय राजनीतिक फायदा उठाने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं, तो यह मेरे बारे में नहीं बल्कि उनके बारे में ज्यादा बताता है।' उन्होंने यह भी कहा कि भारतीयों की जान की चिंता देश को जोड़ने वाली होनी चाहिए, बांटने वाली नहीं। बीजेपी का राहुल पर तंज बीजेपी ने शनिवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए दावा किया कि वह अपनी ही पार्टी में समर्थन खो रहे हैं। बीजेपी के प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर की पीएम मोदी की तारीफ और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने भारतीय नाविकों के मुद्दे पर मोदी के रुख को लेकर की गई टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा,' यह राहुल गांधी के रुख से बिल्कुल अलग है।' पूनावाला ने तंज कसते हुए कहा, 'यह शर्मनाक है। कल राहुल गांधी का जन्मदिन था, लेकिन उन्हें कोई तोहफा नहीं मिला।' उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के भीतर मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। मतभेदों के बीच राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई इस विवाद के बीच शशि थरूर ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के 56वें जन्मदिन पर उन्हें शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विश्वास जताया कि अब समय आ गया है जब देश में कांग्रेस के पक्ष में राजनीतिक माहौल बदलेगा और पार्टी आने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करेगी। इसे पार्टी के प्रति एकजुटता का संदेश देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। राहुल से मुलाकात, गुलदस्ता और किताब की भेंट शुक्रवार को शशि थरूर कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड पहुंचे, जहां उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए गुलदस्ता और एक किताब भेंट की। मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत में थरूर ने राहुल गांधी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की और कहा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करेगी।  

शरद पवार से उद्धव ठाकरे तक: गठबंधन और बगावत की कहानी

 मुंबई महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय जो कुछ भी हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। राज्य के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पार्टियों में टूट, गठबंधनों का बदलना, पार्टी के चुनाव चिह्नों पर विरोधी दावे, रातों-रात बनने वाली सरकारें और एक साझा प्रतिद्वंद्वी को सत्ता से दूर रखने के लिए विरोधियों का हाथ मिलाना आम बात रही है। शिवसेना को अपनी चपेट में लेने वाला यह नया संकट एक ऐसी कहानी का अगला अध्याय है, जिसकी शुरुआत दशकों पहले 1960 के दशक के अंत में कांग्रेस के विभाजन और एक युवा विद्रोही के रूप में शरद पवार के उदय के साथ हुई थी। जैसे-जैसे शिवसेना के दोनों गुट पार्टी की स्थापना के 60 साल पूरे कर रहे हैं, बाल ठाकरे द्वारा बनाया गया यह संगठन आज बंटा हुआ नजर आता है। फिर भी, महाराष्ट्र को इस मुकाम तक लाने वाला रास्ता बहुत पहले ही तैयार हो चुका था। कांग्रेस का विभाजन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे निर्णायक क्षणों में से एक नवंबर 1969 में आया, जब कांग्रेस पार्टी ने एक ऐतिहासिक टूट का सामना किया। राष्ट्रपति चुनाव के बाद से यह संकट महीनों से पनप रहा था। इसका चरम तब हुआ जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित करने का असाधारण कदम उठाया। इस कदम ने कांग्रेस के भीतर सत्ता के दो केंद्रों के बीच खुले टकराव को जन्म दिया। तीन घंटे की बैठक के बाद, पार्टी अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा के नेतृत्व में वर्किंग कमेटी के 21 में से 11 सदस्यों ने एक नए नेता के चुनाव के लिए कांग्रेस संसदीय दल की तत्काल बैठक बुलाई। समिति में शामिल गांधी के समर्थक 10 सदस्यों ने इस बैठक का बहिष्कार किया। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों ने वर्किंग कमेटी के फैसले को अवैध और अमान्य बताते हुए खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि जब तक उन्हें सांसदों का बहुमत प्राप्त है, तब तक वह कांग्रेस की सदस्य और संसदीय दल की नेता बनी रहेंगी। संसद में 167 कांग्रेस सांसदों का एक समूह एक प्रतिद्वंद्वी पार्टी मुख्यालय में इकट्ठा हुआ और लोकतंत्र और समाजवाद की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा करते हुए इंदिरा गांधी के नेतृत्व को अपना समर्थन दिया। शरद पवार की पहली राजनीतिक बगावत 1969 के विभाजन के बाद, महाराष्ट्र के कई नेताओं ने इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) या रिक्विजिशनिस्ट का पक्ष लिया। इनमें यशवंतराव चव्हाण और उनके राजनीतिक शिष्य शरद पवार भी शामिल थे। हालांकि, महाराष्ट्र में गहरा विभाजन 1977 के आम चुनाव में आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की हार के बाद उभरा। तब तक कांग्रेस एक बार फिर टूट चुकी थी। गांधी के गुट को कांग्रेस (आई) के नाम से जाना जाने लगा, जहां आई का अर्थ इंदिरा था, जबकि प्रतिद्वंद्वी गुट कांग्रेस यूनाइटेड के रूप में उभरा। पवार ने यशवंतराव चव्हाण के साथ कांग्रेस (यू) के साथ रहना चुना। दोनों कांग्रेस गुटों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, लेकिन बाद में जनता पार्टी को महाराष्ट्र में सत्ता से बाहर रखने के लिए हाथ मिला लिया। वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने और पवार एक मंत्री के रूप में सरकार में शामिल हुए। यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल पाई। उसी वर्ष, पवार कांग्रेस (यू) से अलग हो गए, जनता पार्टी के समर्थन से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) नामक एक गठबंधन बनाया और 38 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए। यह राज्य के इतिहास में राजनीतिक विद्रोह के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक था। उनका पहला कार्यकाल 1980 में समाप्त हुआ जब केंद्र में सत्ता में लौटीं इंदिरा गांधी ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। फिर भी पवार का कांग्रेस के साथ रिश्ता स्थायी रूप से शत्रुतापूर्ण होने के बजाय लचीला बना रहा। 1987 में वह पार्टी में लौट आए, बाद में यह स्पष्ट करते हुए कि वह शिवसेना के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते थे। शिवसेना का उदय एक ओर जहां कांग्रेस के गुट वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे, वहीं महाराष्ट्र में एक और ताकत उभर रही थी। 1966 में बाल केशव ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की, जिन्हें बालासाहेब ठाकरे के नाम से जाना जाता है। पेशे से कार्टूनिस्ट और समाज सुधारक केशव प्रबोधनकार ठाकरे के बेटे बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र की मराठी भाषी आबादी के हितों को लेकर इस पार्टी का निर्माण किया। समय के साथ, शिवसेना ने विशेष रूप से मुंबई में एक मजबूत जमीनी संगठन विकसित किया। इसके कार्यकर्ता अपने आक्रामक सड़क-स्तर के लामबंदी और पार्टी नेतृत्व के प्रति अटूट वफादारी के लिए जाने जाने लगे। पार्टी के उभार ने अंततः इसे भाजपा के साथ दीर्घकालिक गठबंधन में ला खड़ा किया। लगभग 25 वर्षों तक शिवसेना और भाजपा राजनीतिक भागीदार बने रहे। उस अवधि के अधिकांश समय में, शिवसेना को व्यापक रूप से महाराष्ट्र में सीनियर भागीदार के रूप में माना जाता था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, वह संतुलन 2014 के बाद बदलना शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी। पहली शिवसेना-भाजपा सरकार वर्ष 1995 एक और ऐतिहासिक क्षण लेकर आया। महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना-भाजपा गठबंधन सत्ता में आया। मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने, जबकि गोपीनाथ मुंडे ने उपमुख्यमंत्री का पद संभाला। यह सरकार केवल औपचारिक गठबंधन पर ही नहीं, बल्कि निर्दलीय और बागी विधायकों के समर्थन पर भी निर्भर थी। अविभाजित शिवसेना ने अंततः तीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे दिए। फिर भी, किसी ने भी पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया। पवार का कांग्रेस से दूसरी बार नाता टूटना 1999 में, महाराष्ट्र ने एक और बड़ी राजनीतिक टूट देखी। शरद पवार सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग हो गए और एक अलग राजनीतिक दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना की। विभाजन के बावजूद, राजनीति ने एक बार फिर अप्रत्याशित साझेदारियां पैदा कीं। शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सरकार बनाने से रोकने के लिए चुनाव के बाद कांग्रेस और पवार की नई पार्टी ने हाथ मिला लिया। विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने। 2004 से 2014 तक, पवार केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के भीतर एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए और केंद्रीय मंत्री के … Read more

शिवसेना विवाद: उद्धव गुट के 6 सांसदों के बगावत की अटकलें, ‘ऑपरेशन टाइगर’ चर्चा में

मुंबई  महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) और एकनाथ शिंदे गुट के बीच एक बार फिर राजनीतिक तनाव और जुबानी जंग चरम पर पहुंच गया है। पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 के शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलों और 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चाओं के बीच, संजय राउत ने सोशल मीडिया पर बेहद तल्ख पोस्ट साझा किया है। एक्स पर एक पोस्ट में संजय राउत ने एक इन्फोग्राफिक साझा किया, जिसमें लिखा है, "कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं लेकिन वफादार नहीं होते।" उन्होंने पोस्ट को कैप्शन दिया "जय महाराष्ट्र!" दरअसल, संजय राउत की यह टिप्पणी एकनाथ शिंदे के उस बयान के बाद आई है जिसमें उन्होंने उद्धव खेमे पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, शेर अकेला आता है। शिंदे ने अपने गुट को बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली उत्तराधिकारी बताने की कोशिश की। शिंदे ने दिया था कुत्ते वाला बयान शिंदे ने उद्धव गुट पर कटाक्ष करते हुए कहा, "कुछ कुत्ते भौंकते रहते हैं। कल और परसों भी वे भौंकते रहेंगे। मैं आपको एक बात बताता हूं कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला आता है। जब शेर शिकार करता है तो कुत्ते भौंकते रहते हैं। जब शेर दहाड़ता है तो कुत्ते भौंकते रहते हैं। यही शिवसेना है। यही शिवसेना है। और आज यह शिवसेना महाराष्ट्र में मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही है।" छह सासंद नहीं हुए थे बैठक में शामिल बताते चलें कि यह दोनों गुटों में यह राजनीतिक बयानबाजी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के भीतर एक नए विभाजन की बढ़ती अटकलों की पृष्ठभूमि में हुआ है, जब पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण संसदीय दल की बैठक में भाग नहीं लिया, जिससे यह अफवाहें तेज हो गईं कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। यह ताजा संजय विवाद राउत द्वारा गुरुवार को की गई उस घोषणा के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि पार्टी ने अनुपस्थित छह सांसदों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। उन्होंने कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए गए हैं। संजय राउत ने पत्रकारों से कहा, "कार्रवाई करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हम उन्हें अयोग्य घोषित कराने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। यदि लोकसभा अध्यक्ष नियमों, कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं, तो ये लोग अयोग्य घोषित हो जाएंगे।" शिंदे गुट में 6 सांसद जाने के लिए तैयार 'ऑपरेशन टाइगर' को लेकर अटकलों को तब और बल मिला जब शिवसेना एमएलसी चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों ने शिंदे के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है और उनके गुट में शामिल होने के लिए तैयार हैं। इस संकट ने उद्धव ठाकरे खेमे को एक और बड़े विभाजन की संभावना का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है, लगभग चार साल बाद जब शिंदे के 2022 के विद्रोह के कारण महा विकास अघाड़ी सरकार का पतन हुआ और अंततः शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता मिली।

महाराष्ट्र राजनीति: उद्धव गुट में बगावत, 6 सांसद मीटिंग से गायब, नोटिस जारी

महाराष्ट्र महाराष्ट्र की राजनीति में उथल-पुथल का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना में बगावत के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को एक बड़ा बयान दिया। कोल्हापुर में आयोजित एक धन्यवाद रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने स्पष्ट किया कि अब कोई 'गुट' नहीं बचा है; बल्कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी ही असली और इकलौती शिवसेना है। अमित शाह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब 'ऑपरेशन टाइगर' के तहत उद्धव खेमे के कई सांसदों के बागी होने की खबरें हैं और पार्टी पूरी तरह टूटने की कगार पर खड़ी नजर आ रही है। 'पहले कहना पड़ता था शिंदे गुट…' कोल्हापुर की रैली में शाह ने कहा, "पहले हमें एकनाथ शिंदे के नाम पर 'शिवसेना शिंदे गुट' कहना पड़ता था। लेकिन अब कोई गुट नहीं बचा है। अब केवल एक ही शिवसेना है इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कोल्हापुर के प्रसिद्ध माता अंबाबाई मंदिर में पूजा-अर्चना भी की। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की ओर से कराए जा रहे माता अंबाबाई मंदिर परिसर और कॉरिडोर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण कार्य की आधारशिला रखी। शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन 'विकास भी, विरासत भी' का जिक्र करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है और राज्य के सभी ज्योतिर्लिंगों तथा शक्तिपीठों का पुनर्विकास किया जा रहा है, जो हम सभी के लिए गर्व की बात है। 'ऑपरेशन टाइगर' से उद्धव खेमे में खलबली शाह का यह बयान महज एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उद्धव खेमे में मचे मौजूदा घमासान से जुड़ा है। दरअसल, 'ऑपरेशन टाइगर' के बीच उद्धव गुट के कई सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की खबरें हैं। सांसदों के गायब होने और खुलेआम बगावती तेवर दिखाने के कारण पार्टी भारी संकट से गुजर रही है। मीटिंग से 6 सांसद गायब, दल-बदल कानून के तहत चेतावनी उद्धव गुट की यह कलह गुरुवार को नई दिल्ली में तब खुलकर सामने आ गई, जब पार्टी नेतृत्व की ओर से बुलाई गई अनिवार्य संसदीय दल की बैठक से ज्यादातर सांसद नदारद रहे। लोकसभा में शिवसेना (UBT) के कुल 9 सांसद हैं, लेकिन पार्टी व्हिप द्वारा बुलाई गई बैठक में केवल 3 सांसद- अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ही पहुंचे। बाकी के 6 सांसद- नागेश आष्टीकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे बैठक से पूरी तरह नदारद रहे। इस खुली बगावत के बाद शिवसेना (UBT) ने सख्त एक्शन लिया है। लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप अनिल देसाई ने गायब रहे सभी सांसदों को 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया है। 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम पार्टी की तरफ से बागी सांसदों को लिखित स्पष्टीकरण देने के लिए 24 घंटे का सख्त अल्टीमेटम दिया गया है। नोटिस में साफ चेतावनी दी गई है कि अगर तय समय के भीतर उनका जवाब नहीं आता है, तो पार्टी यह मान लेगी कि उन्होंने स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ दी है। इसके बाद इन सांसदों के खिलाफ भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी 'दल-बदल विरोधी कानून' के तहत कार्रवाई की जाएगी।

शशि थरूर की तारीफ से सियासी घमासान: भाजपा ने कांग्रेस नेतृत्व पर साधा निशाना

नई दिल्ली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा से जुड़े कांग्रेस सांसद शशि थरूर के कथित बयान का हवाला दिया है। पार्टी ने शनिवार को दावा किया कि राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के भीतर समर्थन खो रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने नाविकों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपनाए गए रुख की शशि थरूर की सराहना, राहुल गांधी के रुख के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी असली नेता नहीं हैं, वह अब केवल रील नेता बनकर रह गए हैं। जन्मदिन पर राहुल गांधी को कोई उपहार नहीं मिलाः पूनावाला पूनावाला ने वीडियो जारी कर एक बयान में कहा, 'यह शर्मनाक है। कल (शुक्रवार को) राहुल गांधी का जन्मदिन था, लेकिन उन्हें कोई उपहार नहीं मिला। डॉ. शशि थरूर ने इसी मुद्दे पर राहुल गांधी के रुख का खंडन करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने नाविकों के मुद्दे पर भारत का पक्ष बेहद मजबूती से रखा और देश की स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।' भाजपा का दावा- थरूर ने पीएम मोदी का सराहा भाजपा नेता ने दावा किया कि थरूर ने मोदी के नेतृत्व गुणों की भी प्रशंसा की है। उन्होंने कहा, 'इतना ही नहीं, थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी के दृ्ष्टिकोण, अपनी बात रखने की क्षमता, ऊर्जा व वक्तृत्व शैली की भी भरपूर प्रशंसा की है। थरूर ने कहा है कि मोदी ने भारतीयों के जीवन पर अपनी छाप छोड़ी है।' राहुल की पीएम की दावेदारी पर कांग्रेस को घेरा पूनावाला ने राहुल गांधी को भविष्य के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करने को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना साधा और दावा किया कि पार्टी के कुछ नेता इस विचार से सहमत नहीं हैं। एक तरफ कांग्रेस कहती है कूल पीएम राहुल और दावा करती है कि राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन उनकी अपनी पार्टी के सांसद भी शायद इस बात पर विश्वास नहीं करते। राहुल गांधी ने जनता का समर्थन खो दियाः पूनावाला भाजपा प्रवक्ता ने दावा किया कि राहुल गांधी ने जनता का समर्थन खो दिया है और उन लोगों का साथ भी खो दिया है, जो कभी उनके करीबी माने जाते थे। पूनावाला ने कहा, ' इससे साबित होता है कि राहुल गांधी ने जनमत खो दिया है, क्योंकि वह 99 चुनाव हार चुके हैं। उन्होंने उन लोगों का समर्थन भी खो दिया है, जो कभी उनके करीब थे, चाहे वह रामचंद्र गुहा हों या शशि थरूर।' राहुल गांधी असली नेता नहीं हैंः भाजपा पूनावाला ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस के कुछ सहयोगी राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। पूनावाला ने कहा, 'अब उन्हें अपने गठबंधन के सहयोगियों का समर्थन भी हासिल नहीं है। चाहे वामपंथी दल हों या द्रमुक, वे राहुल के नेतृत्व को स्वीकार नहीं करते। राहुल गांधी एक 'रील नेता' बनकर रह गए हैं। वह एक वास्तविक नेता नहीं हैं।'  

शिवसेना विवाद गहराया, शिंदे के बयान के बाद राउत की रहस्यमयी पोस्ट से बढ़ा तनाव

मुंबई  शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के मौके गोरेगांव में आयोजित कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला बोला था। शिंदे ने यूबीटी सांसदों की टूट का जिक्र करते हुए कहा था कि यह तो सिर्फ ट्रेलर, पिक्चर अभी बाकी है। उन्होंने यह भी कहा था कि ऑपरेशन के लिए शेर का दिल चाहिए। इस मौके पर शिंदे ने विरोधी खेमे पर निशाना साधते हुए कहा था कि कुत्ते झुंड में आते हैं, टाइगर अकेला आता है। अब शिंदे के इस बयान पर उद्धव ठाकरे के करीबी नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने रहस्यमयी पोस्ट की है। राउत ने एक्स पर जय महाराष्ट्र के साथ लिखा है कि कुछ लोग कुत्ते होते हैं लेकिन वफादार नहीं। आप एकनाथ शिंदे को इतना गंभीरता से क्यों लेते हैं? उन्हें गंभीरता से लेना बंद करें। वे कोई महान व्यक्ति नहीं हैं। वे एक बेईमान नेता हैं और आप उन्हें गंभीरता से लेते हैं? आप शुभेंदु अधिकारी को भी गंभीरता से लेते हैं। ये बेईमान लोग हैं। इन्होंने अपने ही लोगों को धोखा दिया है। जब तक वे सत्ता में हैं, जब तक उनके हाथ में पैसा है, वे ऐसी बातें कहते रहेंगे। उद्धव ठाकरे के सांसदों में बगावत महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच राजनीतिक तनाव और बयानबाजी सांसदों के बागी होने को लेकर बढ़ी है। दावा किया गया है कि शिवसेना यूबीटी के सिंबल मशाल पर जीते छह सांसदों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया है। उद्धव ठाकरे के पास अब सिर्फ तीन सांसद ही बचे हैं। शिंदे ने ऑपरेशन टाइगर के जरिए छह सांसदों को शिवसेना में शामिल कर लिया है। इसका औपचारिक ऐलान 21 जून को होने की संभावना जताई जा रही है। यह भी दावा किया गया है कि इस सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी दे दिया है। शिंदे के ऊपर संजय राउत का पलटवार शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक रहस्यमयी पोस्ट शेयर की। उनकी यह पोस्ट 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चा और इस बढ़ती अटकलबाजी के बीच आई है कि पार्टी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं। X पर एक पोस्ट में राउत ने एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जिसमें लिखा है कि कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं लेकिन वफादार नहीं होते। उन्होंने पोस्ट के साथ कैप्शन लिखा है जय महाराष्ट्र!, राउत की यह टिप्पणी महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के उस बयान के एक दिन बाद आई है, जिसमें उन्होंने पार्टी के 60वें स्थापना दिवस पर शिवसेना कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे गुट पर निशाना साधा था और कहा था कि कुत्ते झुंड में आकर भौंकते हैं, शेर अकेला आता है।  

NDA में दरार के संकेत? उम्मीद से ज्यादा वोट मिलने पर कांग्रेस उत्साहित, BJP की बढ़ी चिंता

बेंगलुरु  भारत की राजनीति में इन दिनों विपक्षी खेमे में टूट की खबरें लगातार आती रही हैं। वर्षों के बाद यह पहला मामला सामने आया है जिसमें केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को तगड़ा झटका लगा है। कर्नाटक में गुरुवार को घोषित हुए विधान परिषद चुनाव के नतीजों में कांग्रेस ने पांच सीटों पर आरामदायक जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ ही विपक्षी भाजपा-जेडीएस गठबंधन के खेमे में हड़कंप मच गया है। चुनाव के आंकड़ों से यह साफ हो गया है कि विपक्ष के कई विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की है। इस भीतरघात के बाद अब कर्नाटक में NDA के नेता अपनी ही पार्टियों में छिपे गद्दारों की तलाश में जुट गए हैं। चुनाव में गद्दारी के पुख्ता सबूत तो मिल चुके हैं, लेकिन गुप्त मतदान होने के कारण दोषियों का कोई स्पष्ट सुराग हाथ नहीं लग रहा है। कांग्रेस को मिले उम्मीद से ज्यादा वोट कांग्रेस उम्मीदवार विनय कार्तिक सबसे ज्यादा 32 वोट पाकर विजयी घोषित हुए। यह संख्या जीत के लिए जरूरी कोटे से कहीं अधिक थी और कांग्रेस विधायकों की अपनी ताकत से भी काफी ज्यादा थी। वोटों के इस गणित से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उन्हें भाजपा और जेडीएस के कम से कम एक दर्जन 12 विधायकों का साथ मिला है। भाजपा के नेताओं का कहना है कि उनके खेमे से केवल तीन विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की है। भाजपा ने आरोप लगाया कि जेडीएस के कम से कम 8 विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन किया है। जेडीएस नेताओं ने भाजपा के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क है कि उनके खेमे से केवल 4 वोट ही कांग्रेस को जा सकते थे, बाकी की पूरी मदद भाजपा विधायकों की तरफ से मिली है। शक के घेरे में आए बड़े नाम इस उलटफेर के बाद जेडीएस के जीटी देवगौड़ा और एमआर मंजूनाथ तथा भाजपा के दिग्गज नेता रमेश जारकीहोली, बीपी हरीश, एम चंद्रप्पा और एचके सुरेश तुरंत जांच के दायरे में आ गए हैं। हालांकि, इन सभी नेताओं ने क्रॉस-वोटिंग के आरोपों से साफ इनकार किया है। गठबंधन की सिरदर्दी इस चुनाव में गुप्त मतदान प्रणाली होने की वजह से जिम्मेदारी तय करना बेहद मुश्किल हो गया है। राज्यसभा या अन्य ओपन वोटिंग के उलट जहां पार्टी व्हिप के जरिए यह जांचा जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया, विधान परिषद की इस प्रक्रिया ने संदेह के लिए तो बहुत जगह छोड़ दी है, लेकिन सबूत जुटाने का कोई मौका नहीं दिया है। इस अनिश्चितता ने गठबंधन के भीतर अविश्वास को और गहरा कर दिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पार्टी इन गद्दारों की पहचान करेगी और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने इस मामले पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इसे अपनी पहली चुनावी जीत बताते हुए डीके शिवकुमार काफी उत्साहित दिखे। हालांकि, उन्होंने इस कयासबाजी को हवा न देते हुए हल्के अंदाज में कहा, "मुझे कोई अंदाजा नहीं है कि किसने क्रॉस-वोटिंग की है।" NDA के लिए बड़ा झटका यह चुनावी नतीजा भाजपा और जेडीएस दोनों के लिए ही आने वाले दिनों में बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकता है। पहले से ही अस्तित्व के संकट से जूझ रही जेडीएस के लिए यह हार एक बड़ा झटका है। अब पार्टी आलाकमान को अपने दूसरे स्तर के नेताओं और पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष पर गंभीरता से ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। भाजपा में विजयेंद्र पर बढ़ेगा दबाव भाजपा के लिए भी यह परिणाम बेहद चिंताजनक है। इस बगावत से पार्टी के भीतर मौजूद असंतुष्ट गुट को बल मिलेगा, जो लगातार यह दावा कर रहा है कि राज्य में नेतृत्व की कमी के कारण पार्टी भटक रही है। विरोधी नेता अब प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को पद से हटाने के लिए दबाव और तेज कर सकते हैं।