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ममता बनर्जी गुट को राहत नहीं, 4 बैंक खातों पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल से किया इनकार

कलकत्ता तृणमूल कांग्रेस के चार बैंक खातों को फ्रीज किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट से पार्टी को तत्काल राहत नहीं मिली है. शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया. हालांकि कोर्ट ने मामले की मेरिट पर कोई फैसला नहीं दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह फिलहाल मामले के गुण-दोष में नहीं जाएगा. साथ ही कलकत्ता हाईकोर्ट से मुख्य मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने का अनुरोध किया है. यह मामला TMC विधायक विश्वनाथ दास की शिकायत के बाद शुरू हुई पुलिस जांच से जुड़ा है. पुलिस ने इसी जांच के दौरान पार्टी के इंडियन बैंक में मौजूद चार खातों को डेबिट-फ्रीज किया था. पार्टी ने खातों को चलाने की अनुमति मांगी थी. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने उस अंतरिम राहत से जुड़े मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।  इस सुनवाई के दौरान TMC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए. उन्होंने कहा कि चारों खातों के फ्रीज होने से पार्टी का रोजमर्रा का काम प्रभावित हो रहा है. उन्होंने अदालत को बताया कि पार्टी के लेखा रिकॉर्ड के मुताबिक सामान्य कामकाज के लिए हर महीने कम से कम 12.15 करोड़ रुपए की जरूरत होती है. उनका तर्क था कि खातों पर रोक से राजनीतिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है. दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया. उन्होंने मामले में अलग FIR और कई आरोपों से जुड़ी जांच का हवाला दिया. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की मेरिट में जाने से इनकार किया और मुख्य सुनवाई हाईकोर्ट में जल्द करने को कहा।  सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस बी. वराले की पीठ ने TMC की याचिका पर तत्काल राहत देने से इनकार किया. अदालत ने कहा कि मुख्य मामला पहले से कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है. ऐसे में वह संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत इस स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहती. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से मामले की सुनवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया. यानी चारों खातों को लेकर अंतिम कानूनी फैसला अभी बाकी है।  विधायक की शिकायत के बाद शुरू हुई थी जांच मामला 18 जून 2026 को शुरू हुआ था. TMC विधायक विश्वनाथ दास ने बिधाननगर साइबर अपराध पुलिस के सामने शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में पार्टी के बैंक खातों के जरिए कथित अवैध गतिविधियों और वित्तीय लेनदेन से जुड़े आरोप लगाए गए थे. इसी शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज हुई. इसके बाद TMC ने कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया और बैंक खातों को फ्रीज करने की कार्रवाई को चुनौती दी।  ये चार खाते HDFC वाले खातों से अलग हैं     इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चार खाते पहले फ्रीज किए गए तीन HDFC बैंक खातों से अलग हैं. HDFC खातों से जुड़े पुराने मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को पार्टी को रोजमर्रा और मासिक खर्च चलाने की अनुमति दी थी. इसके लिए अदालत ने विशेष अधिकारी की निगरानी की व्यवस्था की थी. 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उस अंतरिम व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था।      मौजूदा मामला इंडियन बैंक की हरीश मुखर्जी रोड शाखा में मौजूद चार खातों से जुड़ा है. 27 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट ने इन खातों को चलाने के लिए अतिरिक्त अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया है. हालांकि हाईकोर्ट को जल्द सुनवाई करने को कहा गया है।  दोनों पक्षों ने अदालत में क्या दलील दी? TMC की ओर से सिंघवी ने कहा कि खातों पर रोक से पार्टी का कामकाज प्रभावित हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि पुराने एचडीएफसी खातों और मौजूदा इंडियन बैंक खातों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए. वहीं राज्य की ओर से तुषार मेहता ने जांच में सामने आए अलग-अलग आरोपों और एक अलग प्राथमिकी का उल्लेख किया. शिकायतकर्ता की ओर से भी खातों के इस्तेमाल को लेकर दलीलें रखी गईं. अदालत ने इन आरोपों पर इस चरण में कोई अंतिम राय नहीं दी. उसने केवल यह तय किया कि मौजूदा स्थिति में वह मामले की मेरिट में नहीं जाएगी. अब मुख्य मामला कलकत्ता हाईकोर्ट में आगे बढ़ेगा। 

ममता बनर्जी की जीत के बाद BJP कार्यकर्ता की मौत का राज खुलेगा? 5 साल बाद कब्र से निकला शव

कोलकाता पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक कार्यकर्ता का शव करीब 5 साल बाद कब्र से निकाला गया है। जानकारी के मुताबिक कोर्ट के आदेश के बाद 2021 में संदेशखाली में चुनाव बाद हुई हिंसा में मारे गए कार्यकर्ता के कंकाल के अवशेष पांच साल बाद कब्र से निकाले गए हैं। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को इसकी पुष्टि की है। अब अवशेष का पोस्टमार्टम कराया जाएगा। नाजाट थाने के एक अधिकारी ने बताया कि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई है और मौत के कारण का पता लगाने के लिए अवशेषों को पोस्टमार्टम और फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। परिवार ने जरूरत पड़ने पर CBI से जांच कराने और मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। 2021 में क्या हुआ था? अधिकारी के मुताबिक 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के दिन झनझनिया गांव के निवासी आस्तिक चंद्र दास पर कथित तौर पर विजय जुलूस निकाल रहे तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला किया था। उनके बेटे सुब्रत दास ने आरोप लगाया कि हमले में उनके पिता गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाने की इजाजत भी नहीं दी गई। इसके बाद उनकी घर पर ही मौत हो गई। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके घर के बाहर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था और उन्हें शव को दफनाने के लिए मजबूर किया गया। परिवार के मुताबिक शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य में ममता बनर्जी की सरकार के हटने और भाजपा की सरकार बनने के बाद परिवार ने एक नई शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद अदालत ने शव को कब्र से निकालने का आदेश दिया। रविवार को मजिस्ट्रेट और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में कंकाल के अवशेष कब्र से निकाले गए। जबरन शव दफनाने का आरोप परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके घर के बाहर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था और उन्हें शव को दफनाने के लिए मजबूर किया गया। परिवार के मुताबिक, शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था। पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद परिवार ने एक नई शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद अदालत ने शव को कब्र से निकालने का आदेश दिया। फरेंसिक जांच को भेजे गए अवशेष अधिकारियों ने कहा कि रविवार को मजिस्ट्रेट और परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में कंकाल के अवशेष कब्र से निकाले गए। नाजाट थाने के एक अन्य अधिकारी ने बताया कि पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई और मौत के कारण का पता लगाने के लिए अवशेषों को पोस्टमार्टम तथा फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। परिवार ने जरूरत पड़ने पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से विस्तृत जांच कराने और मौत के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा कि यह घटना 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर झेलनी पड़ी ज्यादतियों का प्रमाण है। उस चुनाव में टीएमसी ने बड़ी जीत दर्ज की थी। उन्होंने कहा, कि टीएमसी के शासन में आतंक का माहौल था और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हमें पता है कि न्याय होगा और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा मिलेगी। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का एक गांव संदेशखाली 2024 में उस समय राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था, जब बड़ी संख्या में महिलाओं ने स्थानीय टीएमसी नेता शाहजहां शेख पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किए थे। भाजपा हुई हमलावर इस बीच भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने कहा है कि यह घटना 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को झेलनी पड़ी ज्यादतियों का प्रमाण है। उन्होंने कहा, ''टीएमसी के शासन में आतंक का माहौल था और पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हमें पता है कि न्याय होगा और इसके लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी सजा मिलेगी।''

प्रति प्रसव 600 रुपये की दर से बढ़ा भुगतान, 25 हजार ममता कार्यकर्ताओं को फायदा

 पटना चालू वित्तीय वर्ष में ममता कार्यकर्ताओं को बतौर प्रोत्साहन राशि 6.60 करोड़ रुपये मिलेंगे। आवश्यकता पड़ने पर अंतिम पूरक अनुदान में भी प्रोत्साहन राशि की व्यवस्था हो सकती है। उल्लेखनीय है कि बिहार की ममता कार्यकर्ता को अभी प्रति प्रसव 600 रुपये दिए जा रहे हैं। उसे ही प्रोत्साहन राशि कहा जाता है। राज्य के मेडिकल कालेज, सदर अस्पताल, अनुमंडल अस्पताल और रेफरल अस्पतालों के साथ ममता कार्यकर्ता प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सेवा दे रही हैं। राज्‍य में 25 हजार ममता कार्यकर्ता संस्थागत प्रसव, सुरक्षित मातृत्व, और प्रसवोत्तर देखभाल में वे सहायता कर रहीं। अभी उनकी संख्या लगभग 25000 है। उनके सहयोग से स्वास्थ्य मानकों में सुधार हुआ है और संस्थागत प्रसव के प्रति रुझान बढ़ा है। प्रतिदान यह कि इस योजना से हजारों ग्रामीण महिलाओं को नियमित रोजगार मिला है। यह योजना वर्ष 2008 में शुरू हुई थी। तब ममता कार्यकर्ता को प्रति प्रसव 100 रुपये मिलते थे। 2016-17 से 2024-25 के मध्य तक यह राशि 300 रुपये रही। विधानसभा चुनाव से पहले वर्ष 2025 में छह अगस्त को स्वास्थ्य विभाग ने संकल्प जारी कर प्रोत्साहन राशि 600 रुपये कर दी गई। प्रोत्साहन राशि का इतिहास यह योजना वर्ष 2008 में शुरू हुई थी। उस समय ममता कार्यकर्ताओं को प्रति प्रसव 100 रुपये मिलते थे। वर्ष 2016-17 से 2024-25 तक यह राशि 300 रुपये रही। विधानसभा चुनाव से पहले 6 अगस्त 2025 को स्वास्थ्य विभाग ने संकल्प जारी कर इसे बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया। ममता कार्यकर्ता की तीन प्रमुख भूमिकाएं     प्रसव में सहयोग : गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के लिए प्रेरित करना और प्रसव के दौरान सहायता करना।     जच्चा-बच्चा देखभाल : प्रसव के बाद 48 घंटे तक मां और नवजात की देखभाल, पोषण और स्वच्छता की जानकारी देना।     जागरूकता फैलाना : ग्रामीण महिलाओं को सुरक्षित प्रसव, स्तनपान और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति जागरूक करना। 2026-27 में जिला/संस्था वार प्रोत्साहन राशि (रुपये में) सिविल सर्जन कार्यालय-राश‍ि गया (1): 14,57,000 गया (2): 23,91,000 पूर्वी चंपारण: 16,93,000 सारण: 25,04,000 समस्तीपुर: 25,04,000 मधुबनी: 23,56,000 दरभंगा: 20,07,000 पश्चिम चंपारण: 21,82,000 कटिहार: 28,08,000 सीतामढ़ी: 23,56,000 भागलपुर: 25,04,000 बक्सर: 15,84,000 जमुई: 14,11,000 बांका: 16,23,000 औरंगाबाद: 10,02,000 सहरसा: 20,07,000 पूर्णिया: 25,31,000 नवादा: 13,65,000 अरवल: 5,66,000 शिवहर: 12,29,000 खगड़िया: 14,83,000 किशनगंज: 15,85,000 लखीसराय: 13,20,000 नालंदा: 15,40,000 बेगूसराय: 18,89,000 सिवान: 13,65,000 रोहतास: 13,65,000 वैशाली: 20,64,000 मुजफ्फरपुर: 22,38,000 कैमूर: 18,89,000 सुपौल: 11,91,000 मधेपुरा: 11,91,000 गोपालगंज: 12,96,000 भोजपुर: 13,20,000 शेखपुरा: 7,40,000 जहानाबाद: 6,70,000 मुंगेर: 11,91,000 अररिया: 11,45,000 मेडिकल कॉलेज व अस्पताल मेडिकल कॉलेज, बेतिया: 8,14,000 भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान, पावापुरी: 99,000 जेएलएनएमसीएच, भागलपुर: 3,49,000 एएनएमएमसीएच, गया: 6,98,000 राजकीय मेडिकल कॉलेज व अस्पताल, पूर्णिया: 2,93,000 प्रभावती अस्पताल, गया: 1,05,000 गुरु गोविंद सिंह सदर अस्पताल, पटना सिटी: 80,000  

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह! कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं

कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता का 15 साल तक सिरमौर रहीं ममता बनर्जी और उनकी अगुवाई वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस मुश्किल में हैं. एक के बाद एक नेता टीएमसी से किनारा कर रहे हैं. 60 से ज्यादा विधायक बागी हो गए हैं. दिल्ली में लोकसभा सदस्यों ने भी पार्टी में बगावत का बिगुल फूंक दिया है. वहीं, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका अब कल्याण बनर्जी का ताजा रुख है।  ममता बनर्जी ने जिन कल्याण बनर्जी को चीफ व्हिप बनाने के लिए 40 साल पुरानी सहयोगी काकोली घोष को पद से हटा दिया, अब वही कल्याण बनर्जी भी बगावत का झंडा बुलंद करते दिख रहे हैं. कल्याण बनर्जी ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को यह अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो वह अभिषेक को चुन लें, या फिर मेरे जैसे वफादारों को।  कल्याण बनर्जी ने कहा है कि ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी को हटाएं. नहीं तो हम पार्टी में नहीं रह सकते. उन्होंने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ फर्जी हस्ताक्षर केस से भी खुद को अलग करने का ऐलान किया और कहा कि अभिषेक बनर्जी ने कभी भी मुझपर भरोसा नहीं किया और आगे भी नहीं करेंगे. कल्याण बनर्जी ने कहा कि हम कल अभिषेक के केस के लिए तैयारी कर रहे थे और आधी रात मुझे बताया गया कि वकील बदल दिया गया है।  उन्होंने कहा कि यह बहुत ही अपमानजनक है. अभिषेक बनर्जी को वरिष्ठों का सम्मान करना नहीं आता. कल्याण बनर्जी ने अभिषेक को घमंडी व्यक्ति बताया और तल्ख लहजे में कहा कि वह हैं कौन? अभिषेक बनर्जी की वजह से पार्टी को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि मैं ममता बनर्जी के साथ हूं. लेकिन दीदी को अब फैसला करना होगा कि उनको पार्टी और वफादार नेता चाहिए या बच्चा और परिवार।  कल्याण का बागी रुख ताबूत में आखिरी कील? कल्याण बनर्जी की गिनती ममता बनर्जी के विश्वस्त नेताओं में होती है. पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद कल्याण बनर्जी कई अहम मामलों में कोर्ट के भीतर भी टीएमसी से जुड़े मामलों की पैरवी करते नजर आए हैं. फर्जी हस्ताक्षर से संबंधित जिस केस में अभिषेक बनर्जी भी आरोपी हैं, उस मामले में भी कल्याण बनर्जी ही वकील थे. कल्याण बनर्जी के बागी रुख को टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील की तरह देखा जा रहा है।  बिछड़ रहे सब बारी-बारी ममता बनर्जी और उनकी पार्टी से सांसद-विधायक और नेता बारी-बारी बिछड़ रहे हैं. कल्याण बनर्जी के बागी रुख अख्तियार करने से कुछ घंटे पहले ही ममता बनर्जी को दो बड़े झटके लगे. पहले प्रकाश चिक बराइक ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. वहीं, कल तक ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए प्रसून बनर्जी भी बागी काकोली गुट के साथ हो लिए. काकोली गुट को लोकसभा में अलग गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग वाले पत्र पर प्रसून बनर्जी ने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं।   

बंगाल की राजनीति में हलचल, TMC के 18 दिग्गज नाराज बताए जा रहे

कलकत्ता ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही बरकरार हैं। कहा जा रहा है कि एक दर्जन से ज्यादा विधायक खुलकर पार्टी की नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। वहीं, अटकलें ये भी हैं कि करीब 15 सांसद जल्द ही टीएमसी छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। इसके अलावा पार्टी नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव को लेकर उम्मीदवार खोजने में भी परेशानी का सामना करती नजर आ रही है। विधायक हो रहे हैं नाराज टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 18 बड़े नेता ऐसे हैं, जो खुलकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इनमें सुखेंदु शेख रॉय, सांसद काकोली घोष दस्तीदार, देव अधिकारी, कल्याण बनर्जी, रचना बनर्जी, विधायक कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी, अरुणव सेन, संदीपन साहा, नियामत शेख, पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी, मनोज तिवारी, रविंद्रनाथ घोष, पूर्व विधायक अतीन घोष, खगेश्वर रॉय, सौरव चक्रवर्ती, रत्ना चटर्जी, तपन चटर्जी का नाम शामिल है। 20 सांसद बदल सकते हैं पाला संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा है कि 12 टीएमसी सांसदों ने भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी कर ली है। इसके अलावा दल बदलने की तैयारी कर रहे सांसदों की लिस्ट में 5 से 6 नाम और हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि ये सांसद कौन होंगे और कब तक दल बदल की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 12 से ज्यादा सांसदों से चर्चा चल रही है और आंकड़ा 20 तक पहुंच सकता है। 100 से ज्यादा पार्षद दे चुके इस्तीफा खबर है कि बीते कुछ दिनों में 100 से ज्यादा पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं। खास बात है कि ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब निकाय चुनाव में कुछ ही समय बाकी है। इतना ही नहीं पार्षद अब खुलकर टीएमसी नेतृत्व और सांसद अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं। ममता बनर्जी ने पार्षदों से एकजुट रहने की अपील की है। नंदीग्राम में उम्मीदवार नहीं मिल रहा ममता बनर्जी के सामने एक और बड़ी चुनौती नंदीग्राम से खड़ी होती दिख रही है। कहा जा रहा है कि टीएमसी को इस सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। कई बड़े नेता यहां से चुनाव लड़ने से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर उन्हें साल 2021 में शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। 2026 में भी अधिकारी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन भवानीपुर सीट से विधायक रहते हुए नंदीग्राम को छोड़ने का फैसला किया था।

EC आंकड़ों ने खोली पोल, अपने वार्ड में भी शुभेंदु से पीछे रहीं ममता

 कोलकाता पश्चिम बंगाल की भवानीपुर विधानसभा सीट के 73 नंबर वार्ड में हुए मतदान में बीजेपी ने अपना दबदबा साबित किया है. 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में इस वार्ड के अंतर्गत कुल 14,179 वोट डाले गए थे. आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी को 8,932 वोट मिले, जिनका प्रतिशत 62.99 रहा. दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस को सिर्फ 4,284 वोट यानी 30.21 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए. भवानीपुर के इसी वार्ड में ममता बनर्जी का कालीघाट स्थित आवास भी आता है, जिसके कारण यह परिणाम राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला साबित हुआ है।  चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वार्ड 73 के कुल 26 बूथों (पार्ट संख्या 200 से 225) पर मतदान हुआ था. हर बूथ पर बीजेपी की पकड़ मजबूत नजर आई।  अन्य दलों की बात करें तो कांग्रेस और सीपीआई (एम) को बहुत कम वोट हासिल हुए. जहां कांग्रेस को सिर्फ 0.99 फीसदी वोट मिले, वहीं सीपीआई (एम) 4.02 प्रतिशत पर सिमट गई. इस वार्ड में बीजेपी की 32.78 फीसदी की भारी लीड ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस बार भवानीपुर के स्थानीय निवासियों का रुझान पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में रहा।  15 हजार वोटों से हारीं थीं ममता  बंगाल विधानसभा चुनाव में कोलकाता के भवानीपुर से ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा था. शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर में ममता बनर्जी को 15,000 वोटों के अंतर से हराया. कुल 293 विधानसभा सीटों में से बीजेपी ने 200 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की।  'दिल्ली की सत्ता से बीजेपी को हटाया जाएगा…' हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि बीजेपी को जल्द ही दिल्ली की सत्ता से हटा दिया जाएगा. वहीं, उनके भतीजे और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा कि वह किसी भी तरह की धमकी या दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।  अपने आवास पर TMC विधायकों की एक बैठक को संबोधित करते हुए ममता ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में बनी बीजेपी सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों और सड़क किनारे ठेले लगाने वालों (हॉकर्स) को निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने कहा, "अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है. हॉकर्स के ठेलों पर बुलडोज़र चलाया जा रहा है।  ममता ने सूबे के तमाम हिस्सों में हाल के दिनों में चुनाव के बाद हुई कथित हिंसा की घटनाओं और अवैध अतिक्रमण के खिलाफ की गई कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए शुभेंदु सरकार पर निशाना साधा।  सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की आलोचना करते हुए ममता बनर्जी ने दावा किया, "यह सरकार हमारे संवैधानिक आदर्शों और मूल्यों के साथ छेड़छाड़ कर रही है. आने वाले दिनों में बीजेपी को दिल्ली की सत्ता से हटा दिया जाएगा।  शुभेंदु के रडार पर ममता की पार्टी के कई नेता; देखें लिस्ट  पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नेताओं के खिलाफ चौतरफा शिकंजा कस गया है। राज्यभर में जारी एक अभियान के तहत टीएमसी के कई हाई-प्रोफाइल मंत्रियों, विधायकों, उनके रिश्तेदारों और पंचायत स्तर के पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है। इन नेताओं पर वित्तीय हेराफेरी, जबरन वसूली, रंगदारी, अवैध हथियार रखने, चुनाव बाद हुई हिंसा और यौन उत्पीड़न जैसे बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों की इस कार्रवाई से राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। इस कार्रवाई में सबसे बड़ा नाम पूर्व राज्य मंत्री और टीएमसी नेता सुजीत बोस का है। उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने नगरपालिका भर्ती घोटाले से जुड़े धन शोधन के मामले में गिरफ्तार किया है। वहीं, संदेशखाली के निलंबित और विवादित टीएमसी नेता शेख शाहजहां को भी कानून के शिकंजे में ले लिया गया है। शाहजहां पर बड़े पैमाने पर जमीन हड़पने, महिलाओं के खिलाफ हिंसक अत्याचार करने और ईडी अधिकारियों पर हमला करने का मुख्य आरोप है। वर्तमान में वह पुलिस की गिरफ्त में है और उसके खिलाफ व्यापक स्तर पर मुकदमा चलाया जा रहा है। ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां यह कार्रवाई केवल शीर्ष नेताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जिला और पंचायत स्तर पर भी भारी धरपकड़ जारी है। टीएमसी के एक विधायक के बेटे के पास विदेशी हथियार मिले हैं। दक्षिण 24 परगना जिले में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने बिश्नुपुर से टीएमसी विधायक दिलीप मंडल के बेटे अर्घ्य मंडल को गिरफ्तार किया है। उसके पास से एक विदेशी पिस्तौल और अवैध कारतूस बरामद किए गए हैं। वहीं, मालदा के रतुआ ब्लॉक में टीएमसी द्वारा संचालित बिलाइमारी पंचायत की प्रधान स्मृतिकणा मंडल और उनके पति अनिल मंडल को एक स्थानीय सहकारी बैंक से लगभग 13 करोड़ की धोखाधड़ी और गबन के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। हिंसा और रंगदारी के मामले कूचबिहार ब्लॉक नंबर 1 समिति के टीएमसी अध्यक्ष अब्दुल कादर हक को राजनीतिक विरोधियों पर हमले, तोड़फोड़ और मारपीट के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा, फाल्टा पंचायत समिति के उपाध्यक्ष सैदुल खान, सरजीत विश्वास और राजदीप दे को भी रंगदारी और जानलेवा हमले के आरोपों में हिरासत में लिया गया है। लिस्ट में किनके नाम? इस सबके बीच कई प्रमुख टीएमसी नेता गिरफ्तारी के डर से फरार चल रहे हैं। बिश्नुपुर के टीएमसी विधायक दिलीप मंडल अपने बेटे के हथियार मामले और एक अन्य आपराधिक जांच में नाम आने के बाद से लापता हैं, जिनकी तलाश में पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है। दिनहाटा के पूर्व टीएमसी विधायक उदयन गुहा भी हालिया चुनाव के बाद से ही इलाके से गायब हैं और पुलिस उन्हें पूछताछ के लिए ढूंढ रही है। इस बड़े एक्शन के बाद बंगाल के कई हिस्सों में सालों से दबा जनता का आक्रोश भी देखने को मिल रहा है। कई पुलिस थानों के बाहर प्रदर्शन हो रहे हैं और जमीनी हालात इतने बदल चुके हैं कि गुस्से को देखते हुए कई स्थानीय टीएमसी नेताओं को लोगों से वसूली गई रंगदारी की रकम वापस लौटानी पड़ रही है।    

ममता के इस्तीफा न देने वाले स्टंट की सीमा केवल कल तक

कलकत्ता पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे चार मई को आ गए. इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने परचम लहराया और इस तरह बीते 15 सालों से टीएमसी की सत्ता का सूपड़ा साफ हो गया. चुनाव नतीजे आने के बाद से ही अब तक सीएम रहीं ममता बनर्जी आक्रामक मोड में हैं. उन्होंने पहले तो यह आरोप लगाया कि मतगणना केंद्रों पर वोटों की हेरफेर हुई है. यहां तक कि उन्होंने कहा कि कुछ गुंडों ने उन्हें भवानीपुर के मतगणना केंद्र पर पीटा भी।  ममता बनर्जी ने कहा- वह हारी नहीं, उन्हें हराया गया मंगलवार शाम को ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बीजेपी पर तमाम आरोप लगाते हुए कहा कि, उनके सीएम पद से इस्तीफा देने का सवाल नहीं. ममता बनर्जी के इस बयान से राज्य में एक तरह का संवैधानिक संकट खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है. सवाल उठ रहे हैं कि ममता ने इस्तीफा नहीं दिया तो क्या होगा? असल में बीजेपी 10 मई से पहले-पहले शपथ ग्रहण की तैयारी में जुटी है।  बुधवार को छह तारीख हो चुकी है. सात मई 2026 को पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. ऐसा होने पर सभी पद संवैधानिक रूप से खुद ही समाप्त हो जाएंगे. ऐसे में ममता बनर्जी खुद-ब-खुद सीएम नहीं रहेंगी. यानी वह इस्तीफा दें या न दें, विधानसभा भंग होने के बाद वह वैसे भी सीएम नहीं रहने वाली हैं।  सिर्फ आज तक ही है उनके इस बयान का मतलब? यानी ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने की मियाद सिर्फ एक दिन यानी आज ही के दिन तक है.  इसके बाद उनके इस बयान कि मैं 'इस्तीफा नहीं दूंगी.' इसका भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा. चुनाव आयोग (ECI) ने चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई विधानसभा के गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है और इसे राज्यपाल को भेज भी दिया है तो ममता बनर्जी के इस्तीफा देने या न देने के लिए भी सिर्फ आज ही का दिन है।  वैसे भी ममता बनर्जी बीते तीन महीने से औपचारिक तौर पर सीएम नहीं हैं. इस बात को बताया है टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने. उन्होंने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि ममता व्यावहारिक रूप से सीएम के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. उन्होंने कहा कि 'पिछले तीन महीनों से राज्य में आचार संहिता लागू थी, इसलिए ममता बनर्जी व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. ऐसे में इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।  कल्याण बनर्जी ने कहा, 'पिछले 3 महीनों से मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू है. सरकार कौन चला रहा था? मुख्य सचिव. इसलिए पिछले 3 महीनों से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. फिर इस्तीफे का सवाल कहां है?' हालांकि ममता बनर्जी के बयान ने ये एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद भी पद पर बना रह सकता है? संविधान क्या कहता है? दो बड़े कानून के जानकारों ने इस पर अपनी राय दी है।  क्या कहते हैं एक्सपर्ट? वकील और संविधान के जानकार ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि ममता का यह बयान संविधान से ज्यादा एक राजनीतिक चाल है. यानी इसका असर कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा होगा. उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के मुताबिक मुख्यमंत्री और बाकी मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक अपने पद पर रहते हैं. इसका मतलब यह है कि राज्यपाल चाहें तो ममता को हटा सकते हैं.लेकिन एक पेच है।  अगर राज्यपाल अभी ममता को हटाते हैं और नई सरकार नहीं बनती तो राज्य में एक खालीपन आ जाएगा यानी राज्य चलाने वाला कोई नहीं होगा. यह संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा. इसके अलावा उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 356 के तहत अगर ममता खुद को मुख्यमंत्री मानते हुए बड़े फैसले लेने लगें तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।  एक और अहम बात उन्होंने यह बताई कि अगर कोई मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाता तो राज्यपाल किसी नए मुख्यमंत्री को नियुक्त कर सकते हैं. भले ही हारने वाला मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से मना कर दे. एक और जरूरी बात यह है कि पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई विधानसभा के लिए चुनाव हो चुके हैं. इसलिए SR बोमई वाला फ्लोर टेस्ट का नियम यहां लागू नहीं होगा. पुरानी विधानसभा में ममता को बिना फ्लोर टेस्ट के भी हटाया जा सकता है।  ममता न दें इस्तीफा तो राज्यपाल कर सकते हैं बर्खास्त वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के जानकार आर के सिंह और भी सीधी बात करते हैं. वो कहते हैं कि अगर ममता इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल सीधे उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं. उन्होंने एक बहुत दिलचस्प बात कही. उन्होंने कहा कि जिस दिन विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाता है, उस दिन से मौजूदा मुख्यमंत्री संविधान की भाषा में 'संवैधानिक रूप से मृत' हो जाते हैं. यानी कानूनी तौर पर उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है. और हमारे संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई 'संवैधानिक रूप से मृत' नेता देश या राज्य चला सके. उन्होंने संविधान के चार अनुच्छेदों का हवाला दिया।  क्या कहते हैं संविधान के अनुच्छेद 164 और 172 अनुच्छेद 164 कहता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक पद पर रहते हैं. सरकार तभी तक चलती है जब तक उसे विधानसभा का भरोसा मिला हुआ है. जैसे ही बहुमत जाता है, मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए. अनुच्छेद 163 कहता है कि राज्यपाल आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलते हैं. लेकिन जब नई सरकार बनानी हो या बहुमत खो जाए तो राज्यपाल अपनी मर्जी से फैसला ले सकते हैं।  अनुच्छेद 172 कहता है कि विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है. जब यह खत्म होता है तो नई विधानसभा को सत्ता में आना ज़रूरी हो जाता है. अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधानसभा बुलाने, बंद करने और भंग करने का अधिकार देता है. चुनाव में जब किसी पार्टी को साफ बहुमत मिलता है तो राज्यपाल उस बहुमत वाले नेता को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।  उन्होंने SR बोमई केस … Read more

भवानीपुर सीट का सफर: कभी कांग्रेस का किला, आज ममता बनर्जी का मजबूत गढ़

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति के लगातार बदलते परिदृश्य में भवानीपुर जैसी कुछ ही सीटें हैं, जिनके साथ इतिहास और प्रतीकात्मक महत्व इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि वह राजनीतिक सफर है जो राज्य में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उभार तक के बदलाव को साफ तौर पर दर्शाता है। आज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ मानी जाने वाली भवानीपुर सीट हमेशा से तृणमूल कांग्रेस की पहचान नहीं रही। आजादी के बाद दशकों तक दक्षिण कोलकाता की यह सीट कांग्रेस का मजबूत गढ़ थी और राज्य के कई प्रभावशाली नेताओं का राजनीतिक आधार रही। जब बदल गया था नाम पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने इस सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में और बाद में निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता। कांग्रेस के अन्य दिग्गज नेताओं जैसे मीरा दत्ता गुप्ता और रथिन तालुकदार ने भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भवानीपुर कांग्रेस का प्रमुख शहरी गढ़ बन गया। कई वर्षों तक यह सीट कांग्रेस के प्रभाव में रही, जबकि वामपंथी दल उस समय केवल 1969 में थोड़े समय के लिए यहां जीत हासिल कर सके, जब इस सीट का नाम बदलकर कालीघाट विधानसभा क्षेत्र कर दिया गया था। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता साधन गुप्ता ने बांग्ला कांग्रेस और माकपा की संयुक्त मोर्चा की दूसरी सरकार के दौरान यह सीट जीती। वह 1953 में भारत के पहले दृष्टिहीन सांसद बने थे। चुनावी नक्शे से भी हुई थी गायब भवानीपुर की राजनीतिक यात्रा ने तब अप्रत्याशित मोड़ ले लिया जब यह सीट 1972 में परिसीमन के बाद चुनावी नक्शे से ही गायब हो गयी। लगभग चार दशकों तक यह सीट केवल राजनीतिक स्मृतियों में ही बनी रही। जब 2011 के परिसीमन के दौरान यह सीट दोबारा अस्तित्व में आयी, तब पश्चिम बंगाल की राजनीति भी बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही थी। उसी वर्ष वाम मोर्चा के 34 साल के शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी का दौर शुरू हुआ। नए सिरे से बनी भवानीपुर सीट जल्द ही तृणमूल के उभार से जुड़ गई। बनर्जी ने 2011 के पहले चुनाव में अपने करीबी सहयोगी सुब्रत बक्शी को इस सीट से उम्मीदवार बनाया। बक्शी ने 64 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर माकपा के नारायण जैन को करीब 50,000 वोट से हराया और भवानीपुर को तृणमूल का मजबूत गढ़ बना दिया। ममता बनर्जी का यहां से पहला चुनाव इसके बाद बक्शी ने सीट छोड़ दी ताकि तृणमूल की भारी जीत के बाद मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश कर सकें। बनर्जी ने करीब 77 प्रतिशत वोट हासिल कर माकपा की नंदिनी मुखर्जी को 54,000 से अधिक मतों से हराया और भवानीपुर में अपना मजबूत राजनीतिक आधार स्थापित किया। तब से यह सीट तृणमूल के कब्जे में बनी हुई है। कोलकाता के महापौर और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कहाकि भवानीपुर हमारे लिए सिर्फ एक सीट नहीं है। यह वह जगह है जहां लोगों ने ममता बनर्जी की विकास और समावेश की राजनीति पर बार-बार भरोसा जताया है। कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले वर्षों से भवानीपुर में कई हाई-प्रोफाइल मुकाबले हुए, लेकिन नतीजा नहीं बदला। 2016 के विधानसभा चुनाव में वाम दलों और कांग्रेस ने गठबंधन कर वरिष्ठ कांग्रेस नेता दीपा दासमुंशी को बनर्जी के खिलाफ उतारा। इस मुकाबले को ‘दीदी बनाम बौदी’ के रूप में पेश किया गया। बनर्जी ने 65,520 वोट हासिल कर दासमुंशी (40,219 वोट) को आसानी से हराया। भाजपा के चंद्र कुमार बोस तीसरे स्थान पर रहे, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। जब ममता ने छोड़ा भवानीपुर पांच साल बाद 2021 के विधानसभा चुनाव में बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी से हुआ। भवानीपुर से तृणमूल ने शोवनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने अभिनेता रुद्रनील घोष को मैदान में उतारा। घोष को 44,786 वोट मिले, जो इस सीट पर किसी विपक्षी उम्मीदवार को अब तक मिले सबसे ज्यादा वोट थे लेकिन वह 28,000 से अधिक वोटों से हार गए। उसी साल यह सीट और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। नंदीग्राम में अधिकारी से 1,956 वोटों से हारने के बाद ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उपचुनाव जीतना जरूरी था। एक बार फिर भवानीपुर केंद्र में आया। चट्टोपाध्याय ने सीट खाली की और बनर्जी ने भाजपा की प्रियंका टिबरेवाल के खिलाफ उपचुनाव लड़ा। बनर्जी ने 58,000 से अधिक वोटों के अंतर और लगभग 72 प्रतिशत मतों के साथ जीत हासिल की, जिससे भवानीपुर उनकी सबसे भरोसेमंद सीट के रूप में स्थापित हो गया। इसी इलाके में ममता का निवास भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मुख्यतः कोलकाता नगर निगम के वार्डों से बना है जो दक्षिण कोलकाता की सामाजिक विविधता को दर्शाता है। यहां बंगाली मध्यमवर्गीय इलाकों के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय भी रहते हैं। इस क्षेत्र में प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर भी स्थित है, जो कोलकाता के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और यहीं ममता बनर्जी का निवास भी है। अनुमान के अनुसार, यहां लगभग 42 फीसदी वोटर बंगाली हिंदू, 34 फीसदी गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24 फीसदी मुस्लिम हैं। दिलचस्प होगा ममता बनाम शुभेंदु का मुकाबला राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सामाजिक मिश्रण ममता बनर्जी की शहरी जनवादी राजनीति के अनुकूल रहा है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहाकि भवानीपुर दक्षिण कोलकाता की बहुसांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। ममता बनर्जी ने यहां समुदायों से परे एक व्यक्तिगत जुड़ाव बनाया है।

ममता का चुनावी दांव, बंगाल में बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1500 रुपये की सहायता

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों (Bengal Elections) की आहट के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने युवाओं को साधने के लिए एक बड़ी घोषणा की है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री ने राज्य के बेरोजगार युवाओं के लिए 1,500 रुपये प्रति माह के भत्ते का ऐलान किया। ममता बनर्जी ने साफ किया कि इस पहल का उद्देश्य युवाओं को भविष्य में आत्मनिर्भर बनाने में मदद करना है। ममता बनर्जी ने यह घोषणा मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के खिलाफ आयोजित एक धरने के दौरान की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने पहले इस योजना को अप्रैल से लागू करने का निर्णय लिया था, लेकिन अब इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "चूंकि कल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है, इसलिए उपहार के रूप में हमने भुगतान की तारीख 1 अप्रैल से बदलकर आज (7 मार्च) कर दी है। युवाओं को अब अप्रैल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।" कौन होगा इस योजना का पात्र? योजना की पात्रता को लेकर मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। पात्र युवाओं के लिए माध्यमिक परीक्षा (कक्षा 10वीं) उत्तीर्ण होना अनिवार्य है। 21 से 40 वर्ष के बीच के युवक और युवतियां इसके पात्र होंगे। जो छात्र अभी पढ़ाई कर रहे हैं और छात्रवृत्ति के अलावा किसी अन्य सरकारी योजना का लाभ नहीं ले रहे हैं, उन्हें भी इस राशि का लाभ मिलेगा। बंगाल में 40% घटा बेरोजगारी का स्तर विपक्ष के हमलों के बीच ममता बनर्जी ने अपने शासनकाल के दौरान रोजगार के आंकड़े भी पेश किए। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में बेरोजगारी की दर में 40 प्रतिशत की कमी आई है। मुख्यमंत्री ने रोजगार सृजन के प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि राज्य में कम से कम 40 लाख लोगों को कौशल प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से लगभग 10 लाख लोगों को रोजगार मिल चुका है। उन्होंने कहा कि 'उत्कर्ष बांग्ला' के माध्यम से प्रशिक्षित युवाओं के डेटा को सीधे उद्योगपतियों की वेबसाइटों से जोड़ा गया है, जिससे प्लेसमेंट में आसानी हुई है। हाल ही में लगभग 10,000 लोगों को जूट उद्योग में प्रशिक्षित किया गया है, जिन्हें जल्द ही काम पर रखा जाएगा। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल लघु और मध्यम उद्योगों (MSME) में देश में नंबर एक है और लगभग 1.5 करोड़ लोग इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। किसानों और प्रवासियों के लिए भी राहत युवाओं के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने भूमिहीन किसानों के लिए भी 4,000 रुपये की सहायता राशि की घोषणा की। उन्होंने कहा कि पहले केवल एक कट्ठा जमीन वाले किसानों को ही लाभ मिलता था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाया गया है। साथ ही, प्रवासी श्रमिकों को भी राज्य के भीतर ही काम के अवसर प्रदान करने का आश्वासन दिया गया है।

राजनीति में ज़हरीली भाषा! भाजपा नेता का ममता बनर्जी पर आपत्तिजनक बयान, TMC ने पुलिस में की शिकायत

कोलकाता पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक पारा चरम पर पहुंच गया है। हाल ही में इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें दक्षिण 24 परगना जिले के भाजपा उपाध्यक्ष संजय दास मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते नजर आ रहे हैं। विवादित बयान और वायरल वीडियो वायरल वीडियो भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की उपस्थिति में आयोजित एक कार्यक्रम का बताया जा रहा है। वीडियो में संजय दास मुख्यमंत्री को 'चुड़ैल' कहकर संबोधित कर रहे हैं और सार्वजनिक रूप से उनका 'सिर कलम' करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इस वीडियो की सत्यता की पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसने राज्य में एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।   TMC ने दर्ज कराई शिकायत तृणमूल कांग्रेस का कड़ा रुख तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई महिला मुख्यमंत्री का घोर अपमान और उनकी हत्या का खुला आह्वान बताया है। पार्टी ने भाजपा नेता के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। टीएमसी सांसद बापी हलदर ने कहा कि भाजपा राज्य में अशांति फैलाना चाहती है और महिलाओं के प्रति उनकी मानसिकता इस बयान से उजागर हो गई है। मामले पर भाजपा ने दी सफाई भाजपा की सफाई इस विवाद पर भाजपा की ओर से शतरूपा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह तृणमूल नेताओं द्वारा पूर्व में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ की गई हिंसक टिप्पणियों की एक प्रतिक्रिया मात्र है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी संजय दास के इस तरह के अमर्यादित बयान का समर्थन नहीं करती है।