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ममता की सुरक्षा में सेंध का आरोप, डोला सेन ने दर्ज कराई शिकायत

कोलकाता   ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास के बाहर एक महिला पर चाकू लेकर हमला करने की कोशिश का आरोप लगा है। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। सांसद डोला सेन ने महिला के नशे में होने का दावा किया है। घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। महिला वहां क्यों पहुंची थी? क्या पुलिस जांच में हमले की कोशिश और उसके इरादे की पुष्टि होगी?   पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी गुट ने आरोप लगाया है कि कोलकाता के कालीघाट स्थित उनके आवास के बाहर एक महिला ने उन पर चाकू से हमला करने की कोशिश की। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक हमला करने वाली महिला ने खुद को ममता बनर्जी की भतीजी होने का दावा किया।  बताया गया कि ममता बनर्जी दुर्गा पूजा पंडाल का उद्घाटन करने के लिए घर से निकल रही थीं, तभी महिला उनकी ओर दौड़ी। पार्टी कार्यकर्ताओं ने महिला को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। घटना के बाद ममता बनर्जी के सहयोगियों ने उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। महिला ने ममता बनर्जी के पास पहुंचने के लिए क्या किया? तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी गुट के आरोपों के मुताबिक, महिला कालीघाट स्थित आवास के बाहर पहुंची थी। आरोप है कि उसने ममता बनर्जी की साड़ी खींची और उसके पास से चाकू भी मिला। स्थानीय मीडिया की खबरों के अनुसार, घटना शाम करीब छह बजे हुई। महिला ने ममता बनर्जी को ‘पिशी’ यानी बुआ कहकर संबोधित किया और उनकी ओर दौड़ पड़ी। आरोप है कि उसने ममता बनर्जी की तरफ झपटने की कोशिश की। इसके बाद वह सड़क पर लेट गई और गाली-गलौज करने लगी। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि महिला ने वास्तव में चाकू से हमला किया या किसी को चोट पहुंची। कार्यकर्ताओं ने महिला को कैसे पकड़ा? आरोप है कि ममता बनर्जी के साथ मौजूद पार्टी कार्यकर्ताओं ने महिला को पकड़ लिया। उसे जमीन पर दबाकर रोका गया और पूछताछ के बाद कालीघाट पुलिस को सौंप दिया गया। बताया गया कि पकड़े जाने के दौरान भी महिला विरोध कर रही थी। पार्टी के लोगों का दावा है कि महिला ने खुद को ममता बनर्जी की भतीजी बताकर भीड़ में घुसने की कोशिश की थी। हालांकि, उसकी पहचान और ममता बनर्जी से उसके किसी संबंध की पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं हुई है। पुलिस की ओर से इस मामले में आगे की कार्रवाई का विवरण भी नहीं दिया गया है। डोला सेन ने महिला को लेकर क्या दावा किया? तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद डोला सेन ने कथित तौर पर दावा किया कि महिला नशे के प्रभाव में थी और उसके हाथ में चाकू था। उनके मुताबिक, महिला ने ममता बनर्जी की भतीजी होने का दावा करके लोगों के बीच पहुंचने की कोशिश की। घटना के बाद ममता बनर्जी के सहयोगियों ने सवाल उठाया कि पूर्व मुख्यमंत्री के आवास के बाहर सुरक्षा व्यवस्था में ऐसी स्थिति कैसे बनी। हालांकि, महिला के नशे में होने और उसके इरादे को लेकर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। क्या घटना के बाद पुलिस कार्रवाई करेगी? महिला को कालीघाट पुलिस के हवाले किए जाने की जानकारी सामने आई है। तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी गुट ने घटना को उनकी सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। पार्टी की ओर से शिकायत दर्ज कराए जाने और पुलिस से कार्रवाई की उम्मीद जताई गई है। वहीं, अमित शाह की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक सवाल उठाए गए हैं, लेकिन उपलब्ध जानकारी में उनके या भाजपा के इस घटना से जुड़े होने का कोई प्रमाण नहीं दिया गया है। फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि पुलिस जांच में महिला की पहचान, उसके पास चाकू होने और घटना के पीछे की वजह को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं।

संसदीय समितियों में बड़ा फेरबदल: टीएमसी से छिनी दो अध्यक्षता, सुधांशु त्रिवेदी को मिली कमान

नई दिल्ली संसद की विभाग-संबंधी स्थायी समितियों का शनिवार को पुनर्गठन किया गया। राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विभिन्न समितियों के अध्यक्षों में बदलाव किया। इस फेरबदल में तृणमूल कांग्रेस से दो अहम संसदीय समितियों की अध्यक्षता चली गई। वाणिज्य संबंधी समिति की जिम्मेदारी बीजेपी के सुधांशु त्रिवेदी को दी गई है, जबकि केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स समिति की अध्यक्ष काकोली घोष दस्तीदार बनी हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर को एक बार फिर से अहम जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें विदेश मामलों की समिति का फिर अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। गृह मामलों की समिति का अध्यक्ष एक बार फिर डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल को बनाया गया है। टीएमसी की बागी सांसद ने छीनी अध्यक्षता पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद अनुराग ठाकुर कोयला, खान और इस्पात से जुड़ी समिति के अध्यक्ष पद पर बरकरार रहेंगे। जेडीयू से राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा को एक बार फिर से परिवहन संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया है। वहीं, इस प्रक्रिया के दौरान ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से लोकसभा सांसद कीर्ति आजाद को बड़ा झटका लगा है। आजाद रसायन और उर्वरक संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष थे, लेकिन इस साल उनके स्थान पर टीएमसी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार को समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वाणिज्य संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष के रूप में टीएमसी की राज्यसभा सांसद डोला सेन की जगह इस साल भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी को नियुक्त किया गया है। इनको फिर मिली कमान भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति का प्रमुख फिर से नियुक्त किया गया। कांग्रेस सांसद चरणजीत चन्नी कृषि संबंधी समिति के प्रमुख बने रहेंगे। सपा सांसद राम गोपाल यादव स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी समिति के अध्यक्ष पद पर बरकरार रहेंगे और कांग्रेस के मुकुल वासनिक को एक बार फिर से शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया है। डीएमके सांसद तिरुचि शिवा उद्योग संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं और भाजपा के सुजीत कुमार कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष चुने गए हैं।

जिस लेफ्ट से दशकों तक लड़ीं ममता, अब उसी से बातचीत; SIR मुद्दे पर साथ आने की तैयारी

नई दिल्ली ममता बनर्जी की राजनीति एक ही सूत्र पर चलती दिखती है। जरूरत पड़ी तो भाजपा के साथ खड़ी हो गईं, जरूरत पड़ी तो कांग्रेस के साथ चली गईं। अब जरूरत पड़ने पर लेफ्ट की ओर हाथ बढ़ा रही हैं। बंगाल में दशकों तक लेफ्ट को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताने वाली नेता आज उसी लेफ्ट से बात कर रही हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। सीपीआई(एम) महासचिव एमए बेबी ने चुनाव आयोग और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के मुद्दे पर विपक्षी नेताओं को पत्र लिखा। पत्र में संयुक्त रणनीति बनाने की बात कही गई। इसके बाद ममता बनर्जी ने उनसे संपर्क किया। दोनों ने फोन पर बात की। चर्चा विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की संभावना पर हुई। सेरामपुर की जनसभा में ममता बनर्जी ने कहा कि अब यह देखने की जरूरत नहीं कि कौन लाल है, कौन नीला है या कौन पीला है। अब हम सब एक हैं। उन्होंने 30 सितंबर की प्रस्तावित इंडिया ब्लॉक बैठक का भी जिक्र किया और विपक्षी पार्टियों से एकजुट होने को कहा। बयान साफ है। रंग अब मायने नहीं रखते। लेकिन बंगाल की राजनीति में यह बात नई है। तृणमूल कांग्रेस बनी ही लेफ्ट को हराने के वादे पर थी। ममता बनर्जी सालों तक सीपीआई(एम) की सबसे बड़ी विरोधी रहीं। अब वही नेता लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं। लेफ्ट विरोध से बनी पहचान बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक पहचान लेफ्ट फ्रंट के विरोध से बनी। 1998 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और तृणमूल कांग्रेस बनाई। इसके बाद पार्टी लेफ्ट की मुख्य चुनौती बन गई। 2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल-कांग्रेस गठबंधन ने 34 साल पुरानी लेफ्ट सरकार को हराया। ममता मुख्यमंत्री बनीं। लेफ्ट को भारी हार मिली। उसके बाद लंबे समय तक ममता बनर्जी लेफ्ट को बंगाल की तरक्की में सबसे बड़ी रुकावट बताती रहीं। सीपीआई(एम) तृणमूल पर हिंसा, मौकापरस्ती और असहिष्णुता के आरोप लगाती रही। दोनों पक्ष सड़क से विधानसभा तक एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे। अब उन्हीं दो ताकतों को साथ आने के लिए कहा जा रहा है। पुराने आरोपों का कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं हुआ। दशकों की दुश्मनी कैसे खत्म हुई, इसका कोई साफ जवाब भी नहीं दिया गया। जब बंगाल में लेफ्ट पर हमला करना होता है, पुराने आरोप काम आते हैं। जब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत होती है, तो लाल, नीला और पीला रंग एक हो जाते हैं भाजपा के साथ भी गईं, कांग्रेस के साथ भी राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी का सफर बार-बार रुख बदलने का रहा है। 1999 में तृणमूल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल हुई। ममता रेल मंत्री बनीं। 2001 में एनडीए छोड़ दिया। 2003 में वाजपेयी सरकार में वापस आईं। 2004 में कोयला और खान मंत्री रहीं। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार में शामिल हुईं और फिर रेल मंत्री बनीं। 2012 में मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई, डीजल की कीमतें बढ़ाने और एलपीजी सब्सिडी सीमित करने जैसे मुद्दों पर समर्थन वापस ले लिया। यानी भाजपा कभी गठबंधन साथी रही, कभी दुश्मन। कांग्रेस कभी सहयोगी रही, कभी निशाना। लेफ्ट कभी मुख्य दुश्मन था, अब विपक्षी एकता के नाम पर उससे संपर्क हो रहा है। लेफ्ट के सामने उलझन सीपीआई(एम) ने साफ कहा है कि यह तृणमूल के साथ चुनावी गठबंधन नहीं है। पार्टी इसे चुनाव आयोग और एसआईआर जैसे मुद्दों पर विपक्ष को जोड़ने की कोशिश बता रही है। लेकिन बंगाल में लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के लिए यह आसान नहीं। दशकों से वे तृणमूल के खिलाफ लड़ते रहे हैं। ऐसे में किसी भी सहयोग से उनके समर्थकों में भ्रम फैल सकता है। पार्टी के वैकल्पिक राजनीति के दावे पर भी असर पड़ सकता है। सीपीआई(एम) नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा है कि लेफ्ट का भाजपा विरोध नया नहीं है। पार्टी अकेले भी भाजपा से लड़ती रही है। उनके बयान से साफ है कि बंगाल लेफ्ट तृणमूल के साथ किसी समझ को लेकर सतर्क है। यह सतर्कता स्वाभाविक है। तृणमूल की पहचान लेफ्ट को हराकर बनी थी, उसके साथ हाथ मिलाकर नहीं। जो पार्टी खुद को लेफ्ट शासन का विकल्प बताती थी, अब लेफ्ट का सहयोग मांग रही है क्योंकि उसे बड़े राजनीतिक कवर की जरूरत है। शुभेंदु अधिकारी का हमला बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस नए समीकरण पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जो पार्टी कभी सीपीएम के खिलाफ लड़ती थी, अब उसी की दोस्त बन रही है। तृणमूल कांग्रेस का जन्म सीपीएम के लंबे शासन के खिलाफ हुआ था। आज वही सीपीएम उसकी राजनीतिक साझेदार बन गई है। इस दौरान उन्होंने विधानसभा की एक घटना का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, वोटिंग के दौरान तृणमूल के एक हिस्से और सीपीआई(एम) के अकेले विधायक का रुख एक जैसा रहा। उन्होंने इसे दोनों पक्षों के बीच बनती समझ का संकेत बताया। सिद्धांत या मौजूदा जरूरत? अभी तृणमूल और सीपीआई(एम) के बीच कोई पक्का चुनावी गठबंधन घोषित नहीं हुआ है। बातचीत हो रही है। चुनिंदा मुद्दों पर साथ काम करने की अपील की जा रही है। लेकिन बड़ा संदेश पहले से साफ है। ममता बनर्जी की राजनीति में कल के सिद्धांत आज की जरूरत के हिसाब से बदल सकते हैं। जब भाजपा चाहिए थी, एनडीए में गईं। जब कांग्रेस चाहिए थी, यूपीए में गईं। जब लेफ्ट को हराना था, एंटी-लेफ्ट राजनीति को आंदोलन का आधार बनाया। अब बड़े विपक्षी मंच की जरूरत है, तो लेफ्ट के साथ बैठने को तैयार हैं। यह ममता बनर्जी की सुविधा की राजनीति का एक और अध्याय है। इसमें वफादारी बदलती है, दुश्मन साथी बन जाते हैं और सत्ता की जरूरत के हिसाब से विचारधारा को ढाल लिया जाता है।

ममता को चुनाव हराने की कथित योजना का दावा, ऋतब्रत बोले- कैमक स्ट्रीट से बनी थी रणनीति

कोलकाता  विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस के 14 उम्मीदवारों को हराने की योजना पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के निर्देश पर उनके कार्यालय कैमक स्ट्रीट से बनाई गई थी। एक समाचार पत्र को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया कि उनके पास इस संबंध में पर्याप्त साक्ष्य हैं और जरूरत पड़ने पर इसे अदालत में पेश किया जा सकता है। यह दावा हालिया मीडिया रिपोर्ट में भी प्रकाशित हुआ है। 'ममता को हराकर संगठन पर कंट्रोल चाहते थे अभिषेक' ऋतब्रत का दावा है कि इसके तहत संबंधित क्षेत्रों में पार्टी एजेंटों को रोकने और महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं को निष्क्रिय करने जैसे कदम उठाए गए। ऋतब्रत के मुताबिक, उद्देश्य ममता बनर्जी को चुनाव में हराकर संगठन और सरकार पर नियंत्रण हासिल करना था। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास कथित योजना में शामिल सभी 14 नामों की सूची है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में उन्होंने पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है। अभिषेक बनर्जी की ओर से इस विशेष दावे पर तत्काल प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं है। भवानीपुर में ममता की हार का भी जिक्र 2026 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी भवानीपुर में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हार गई थीं। चुनाव परिणाम के बाद ममता की ओर से मतदान प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप लगाए गए थे, जिनमें पार्टी एजेंटों को मतदान केंद्रों में प्रवेश नहीं देने का आरोप भी शामिल था। ऋतब्रत के मौजूदा दावे के बाद इन आरोपों और उनके बताए कथित घटनाक्रम के बीच संबंध को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, दोनों घटनाओं के बीच सीधे संबंध की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

रेजीनगर उपचुनाव में बड़ा सियासी अपडेट, ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार ने नामांकन वापस लिया

कोलकाता  विधानसभा उपचुनाव में नंदीग्राम के बाद अब रेजीनगर में भी ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ने नामांकन वापस लेने का फैसला किया है। रेजीनगर से ममता तृणमूल के प्रत्याशी रबिउल आलम चौधरी ने शनिवार को नामांकन वापस लेने की घोषणा की। इसके साथ ही नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों विधानसभा सीटों के उपचुनाव में ममता तृणमूल का कोई प्रत्याशी नहीं रहेगा। रबिउल ने नामांकन वापस लेने की वजह नया चुनाव चिह्न लोगों के बीच पहचान बनाने में कठिनाई और कार्यकर्ताओं पर दबाव को बताया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता चुनाव मैदान में उतरने को तैयार नहीं हैं। रबिउल के अनुसार, उन्होंने ममता बनर्जी से भी इस संबंध में बात की है। नंदीग्राम के बाद रेजीनगर में भी वापसी नंदीग्राम में ममता तृणमूल की प्रत्याशी संचिता प्रधान दे ने शुक्रवार को नामांकन वापस लिया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने वहां कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही थी। रेजीनगर को लेकर उन्होंने कहा था कि इस पर बाद में फैसला किया जाएगा। इसके बाद से ही रबिउल के नामांकन वापस लेने की अटकलें लग रही थीं। शनिवार को नामांकन वापसी की अंतिम तारीख पर उन्होंने यह फैसला कर लिया। आयोग ने बदला नाम और चिह्न निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और ‘घासफूल’ चिह्न को फिलहाल स्थगित किया है। इसके बाद ममता तृणमूल को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉलर’ चिह्न दिया गया है। नए चिह्न के साथ चुनाव लड़ने में आ रही दिक्कत का हवाला देते हुए दोनों सीटों पर ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों ने नामांकन वापस ले लिया है। अब दोनों उपचुनाव में ममता तृणमूल का कोई उम्मीदवार नहीं होगा। प्रतीक को लेकर हुमायूं के बेटे की बढ़ी मुश्किल वहीं, रेजीनगर में आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर के बेटे गोलाम नबी आजाद रबिन के सामने भी प्रतीक को लेकर पेच फंस गया है। वह अपने पिता के पुराने ‘बांसुरी’ प्रतीक पर चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन आयोग ने स्पष्ट किया है कि उपचुनाव के लिए किसी प्रतीक को पहले से आरक्षित नहीं किया जाता।  

Mamata Banerjee का बागियों पर बड़ा हमला, बोलीं- पार्टी से विश्वासघात कभी माफ नहीं होगा

कलकत्ता तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी ने शुक्रवार को पार्टी छोड़ने वाले नेताओं को खरी-खरी सुनाई है. उत्तर कोलकाता जिला तृणमूल कांग्रेस की वर्चुअल मीटिंग में ममता ने पार्टी छोड़कर जाने वालों और दल बदलने वाले विधायकों-सांसदों और पार्षदों को 'गद्दार' करार दिया है. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी ने किसी नेता को पहचान और सम्मान दिया, मुश्किल समय में उसे छोड़ देना वैसा ही है जैसे कोई अपनी बीमार मां का साथ छोड़ दे।  ममता बनर्जी ने कहा, 'जिस मां ने आपको पूरी जिंदगी पाला-पोसा, जब वही मां बीमार पड़ जाए तो उसकी सेवा करने से इनकार कर देना सबसे बड़ा विश्वासघात है. गद्दारों के लिए कोई माफी नहीं है. आज वे खुद को बचा सकते हैं, लेकिन आने वाले समय में जनता भी उनसे हिसाब मांगेगी और पार्टी के कार्यकर्ता भी।  मौजूद राजनीतिक माहौल डर और आर्थिक संकट से भरा बैठक की शुरुआत में कार्यकर्ताओं का अभिवादन करते हुए ममता ने मौजूदा राजनीतिक माहौल को डर और आर्थिक संकट से भरा बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार लगातार विपक्ष को निशाना बना रही है. उन्होंने कहा, 'हर तरफ दमन का माहौल है. एक के बाद एक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं. लोग डर के कारण आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं. फुटपाथ दुकानदारों की दुकानें तोड़ी जा रही हैं. कई लोगों की नौकरियां चली गई हैं और उनके सपने टूट रहे हैं।  ममता ने दावा किया कि इस संकट का सामना केवल एकजुट तृणमूल कांग्रेस ही कर सकती है. उन्होंने कहा कि भाजपा द्वारा पैदा किए गए इस माहौल में पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं, बीएलओ और जमीनी कैडर ने अपनी जान जोखिम में डालकर संघर्ष किया है. 'आज जो लोग सत्ता में हैं, उनकी सफलता के पीछे हमारे कार्यकर्ताओं का खून-पसीना और बलिदान है।  पार्टी के साथ विश्वासघात करना अक्षम्य टीएमसी प्रमुख ने दल-बदलने वाले नेताओं पर आरोप लगाया कि वे अपने खिलाफ चल रहे मामलों और परिवार की संपत्ति बचाने के लिए भाजपा का दामन थाम रहे हैं. उन्होंने कहा, 'कुछ लोग सिर्फ खुद और अपने परिवार को बचाने के लिए पार्टी छोड़ रहे हैं. उनमें धैर्य नहीं है. जिनके खिलाफ हम लड़ते रहे, उन्हीं के साथ जाकर खड़े हो गए. अगर वे सीधे भाजपा में चले जाते तो हमें इतनी आपत्ति नहीं होती, लेकिन पार्टी के साथ विश्वासघात करना अक्षम्य है।  उन्होंने उन नेताओं पर भी निशाना साधा जो दावा करते हैं कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए पार्टी छोड़ी. ममता ने कहा, 'वे कहते हैं कि कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए गए हैं, लेकिन अपने ही इलाके में एंट्री नहीं कर पा रहे. वे कार्यकर्ताओं को नहीं, बल्कि अपनी दौलत बचाने गए हैं. क्या वे आपका पैसा वापस लाएंगे? नहीं. उन्होंने धर्म, सांप्रदायिक सौहार्द और मूल्यों तक का सौदा कर दिया है और अब अहंकार के साथ घूम रहे हैं।  ममता बनर्जी ने बागियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अभी भी जिन लोगों में समझ बाकी है, वे वापस लौट आएं. उन्होंने कहा, 'जो लोग सोच रहे हैं कि वे इस रास्ते पर चलकर बच जाएंगे, वे अंत में कहीं के नहीं रहेंगे. न इधर के रहेंगे, न उधर के।  जमीनी कार्यकर्ताओं को बताया महत्वपूर्ण अपने भाषण में ममता ने बार-बार पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा, 'कार्यकर्ता नेता बनाते हैं और नेता कार्यकर्ताओं को तैयार करते हैं. मैं हर दिन अपने कार्यकर्ताओं से मिलती हूं और वे मजबूती से हमारे साथ खड़े हैं.' उन्होंने आरोप लगाया कि जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी, वे कार्यकर्ताओं के संघर्ष और बलिदान से लाभ उठाकर आज व्यक्तिगत हितों के लिए दल बदल रहे हैं. उन्होंने कहा, "हमने खून बहाया, संघर्ष किया. जो कठिन समय में हमारे साथ नहीं रहे, अगर वे पार्टी नहीं छोड़ते तो भाजपा हमारे कार्यकर्ताओं पर इतना अत्याचार करने की हिम्मत नहीं करती।  ममता ने पुलिस और मीडिया पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में पुलिस का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा.'क्या पुलिस का काम लोगों से कहना है कि गाड़ी लेकर आए हैं, बैठो और उस शैतान के पास चले जाओ? पुलिस का कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन जो कुछ हो रहा है, वह पूरी तरह गैरकानूनी है।  उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को सभाओं और रैलियों की अनुमति नहीं दी जा रही है और सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है. उन्होंने कहा, "यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रखने वाले लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है. क्या भाजपा का मतलब 'वन पार्टी, वन नेशन' है? हम इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।  ममता बनर्जी ने अपने परिवार का जिक्र करते हुए कहा कि विश्वासघात की वजह से उन्होंने अपने दो भाइयों से संबंध तोड़ लिए थे, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा. उन्होंने कहा कि अभिषेक को लगातार सीआईडी, ईडी और सीबीआई के समन मिलते रहते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है. "मैं एयरपोर्ट जाती हूं तो भी उन्हें पहले से पता चल जाता है कि मैं कहां जा रही हूं।  भाषण के अंत में ममता बनर्जी ने 21 जुलाई को होने वाली टीएमसी की शहीद दिवस रैली को सफल बनाने की अपील की. उन्होंने कहा, 'इस रैली का आयोजन आसान नहीं होता, इसमें बहुत मेहनत और संघर्ष लगता है. लेकिन अगर सिर्फ पांच कार्यकर्ता भी आएंगे, तब भी हम यह सभा करेंगे. हमने कभी किसी से एक पैसा नहीं लिया. 21 जुलाई के बाद सभी लोग एकजुट होकर आगे बढ़ें।  उन्होंने भाजपा द्वारा मनाए जा रहे 'संविधान हत्या दिवस' का भी जिक्र किया और सवाल उठाया कि 'आज संविधान और कानून का राज कहां है? लोग पुलिस के जरिए डराए और धमकाए जा रहे हैं. ऐसे समय में केवल जनता और हमारे कार्यकर्ता ही एकजुट होकर इसका मुकाबला कर सकते हैं।  ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में टीएमसी के कई नेता भाजपा में शामिल हुए हैं और पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई जारी है. … Read more

बंगाल की राजनीति में हलचल: TMC सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे से मचा सियासी भूचाल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी में भगदड़ मची हुई है. पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने आज राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।   प्रकाश चिक बराइक से पहले टीएमसी के दो और कद्दावर राज्यसभा सांसद- सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव भी संसद के उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं. एक के बाद एक हुए इन तीन बड़े इस्तीफों के बाद राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत काफी कम हो गई है. आज बराइक के इस्तीफे के बाद अब उच्च सदन में टीएमसी के सांसदों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है।  आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं मुश्किलें सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी के भीतर यह असंतोष यहीं थमने वाला नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के तीन और राज्यसभा सांसद अपने पदों से इस्तीफा दे सकते हैं।  अगर ये अटकलें सच साबित होती हैं, तो संसद में ममता बनर्जी की पार्टी का ग्राफ और नीचे गिर जाएगा.फिलहाल इन इस्तीफों के पीछे के स्पष्ट कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन विपक्षी दल इसे टीएमसी के भीतर बढ़ती कलह और असंतोष के रूप में देख रहे हैं।  आ गई TMC के बागी सांसदों की लिस्ट! कुछ नाम तो चौंका देंगे अब तक कयास लगाए जा रहे थे क‍ि ममता का साथ क‍ितने सांसद छोड़ने वाले हैं. कोई 10 कह रहा था तो कोई 20… लेकिन अब 19 सांसदों की ल‍िस्‍ट सामने आ गई है. इसमें काकोली घोष दस्‍तीदार के साथ यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई चौंकाने वाले नाम हैं. गौर करने वाली बात है क‍ि इसमें सयानी घोष जैसे कई नाम भी हैं, ज‍िनकी अटकलें लगाई जा रही थीं।  1. यूसुफ पठान (बहरामपुर) क्रिकेटर से नेता बने यूसुफ पठान ने कांग्रेस के गढ़ बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था. लेकिन राजनीति की पिच पर यूसुफ को दीदी के लोकल नेताओं से वैसी मदद नहीं मिल रही थी, जैसी उम्मीद थी. बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब खुलकर सामने आ रही है।  2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार) कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की राजनीति का केंद्र रही है. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया यहां टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरा माने जाते हैं. लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और स्थानीय गुटबाजी के कारण उनके सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. क्षेत्र में अपनी पकड़ के बावजूद संगठन से अनबन की खबरें हैं।  3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर) मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबारी से राजनेता बने हैं. मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आने और स्थानीय लीडरशिप से तालमेल की कमी के चलते उनके टीएमसी से दूर जाने की चर्चाएं तेज हैं।  4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद) मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता अबू ताहेर खान का इस लिस्ट में होना चौंकाता है. कांग्रेस से टीएमसी में आए अबू ताहेर का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है. पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही उपेक्षा और नए नेताओं को तरजीह दिए जाने से वह काफी नाराज बताए जा रहे हैं।  5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर) बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा प्रभावित सीट से जीतने वाले पार्थ भौमिक ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे. लेकिन अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली अंदरूनी खींचतान और पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों के बदलने से पार्थ भौमिक का मोहभंग होता दिख रहा है, जिससे बगावती सुर उठे हैं।  6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद सीनियर और तेजतर्रार नेता हैं. संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज महसूस कर रही हैं, जिससे दूरियां बढ़ी हैं।  7. बापी हलदार (मथुरापुर) मथुरापुर (SC) सीट से चुनकर आए बापी हलदार जमीनी स्तर के नेता हैं. दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी अनबन अब बगावत के मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।  8. सायोनी घोष (जादवपुर) टीएमसी की युवा विंग की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की फेवरेट रही हैं. जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं. बताया जा रहा है कि संगठनात्मक फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह खुश नहीं हैं।  9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं. माला रॉय का नाम इस लिस्ट में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका है. कोलकाता नगर निगम और सांसद फंड के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं।  10. मिताली बाग (आरामबाग) आरामबाग की बेहद करीबी मुकाबले वाली सीट से जीत दर्ज करने वाली मिताली बाग एक साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने क्षत्रपों ने उन्हें काम नहीं करने दिया. इसी आंतरिक कलह और उपेक्षा के कारण मिताली ने अपने रास्ते अलग करने का मन बनाया है।  11. देव अधिकारी (घाटाल) बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर नए नहीं हैं. वह पहले भी राजनीति छोड़ने की इच्छा जता चुके थे. ममता के मनाने पर वह माने तो थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं।  12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और प्रतिष्ठित चेहरा हैं. टीएमसी ने इन्हें आदिवासी कार्ड के तौर पर उतारा था. लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैए और वादों से मुकरने के कारण कालीपद सोरेन ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।  13. जून मालिया (मेदिनीपुर) मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा … Read more

इंडिया गठबंधन बैठक से पहले ममता की दिल्ली में सियासी सक्रियता तेज

पश्चिम बंगाल बंगाल का चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी का किला ध्वस्त हो चुका है। ममता ने न सिर्फ सत्ता गंवाई, बल्कि उनकी पार्टी, टीएमसी में भगदड़ मची हुई है। घर को बिखरता देख अब दीदी को इंडिया गठबंधन की याद सताने लगी हैं। वह दिल्ली में होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक में हिस्सा लेने पहुंच रही हैं। बता दें कि एक वक्त था जब ममता ने इंडिया गठबंधन को दरकिनार किया था। लेकिन बदलते हालात में अपनी साख बचाने के लिए ममता बनर्जी अब फिर से इंडिया गठबंधन का सहारा लेती नजर आ सकती हैं। जानकारों के मुताबिक इस बैठक के जरिए ममता बनर्जी न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती हैं, बल्कि अपनी पार्टी के अंदर भी अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहती हैं अभिषेक पहले ही पहुंच चुके गौरतलब है कि विपक्ष की बैठक 8 जून को नई दिल्ली में होने वाली है। इस बैठक में टीएमसी चीफ ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के पहुंचने का अनुमान है। ममता बनर्जी के रविवार को दिल्ली पहुंचने और मंगलवार तक यहां रुकने का अनुमान है। वहीं, अभिषेक बनर्जी पहले ही राजधानी में पहुंच चुके हैं। ममता की दिल्ली यात्रा ऐसे वक्त में हो रही है, जब वह अपनी पार्टी के लिए रिकवरी का रास्ता तैयार कर रही हैं। बता दें कि बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने 15 साल पुरानी सत्ता गंवा दी है। भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को शिकस्त देकर बंगाल में पहली बार सत्ता हासिल की है। सोनिया से कर सकती हैं मुलाकात बताया जाता है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पकड़ को मजबूत बनाना चाहती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से यह बात कही है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली यात्रा के दौरान ममता सोनिया गांधी से मुलाकात के मौके भी तलाशेंगी। हालांकि गांधी परिवार की तरफ से इसको लेकर पुष्टि नहीं की गई है। असल में पिछले कुछ वक्त में टीएमसी और कांग्रेस के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा दरार तो इंडिया गठबंधन के नेतृत्व के फैसले को लेकर आई थी। पुराने बयान भारी न पड़ जाएं बंगाल के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहाकि जब ममता जीत रही थीं तो वह जो भी मन में आता था कांग्रेस के लिए बोल देती थीं। उन्होंने राहुल गांधी की भी आलोचना की और कांग्रेस नेतृत्व से इंडिया गठबंधन का नेतृत्व छीनने की भी कोशिश की। अब उनका खराब समय आया है तो कांग्रेस उनका साथ तो नहीं छोड़ेगी, लेकिन हम करीबी दोस्तों की तरह भी नहीं रहेंगे। गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव किए हैं। इस बदलाव में अभिषेक बनर्जी तो पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने हुए हैं। लेकिन दो अन्य संयुक्त राष्ट्रीय महासचिव के रूप में राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोना सेन को भी जोड़ा गया है। माना जा रहा है कि यह कदम डिसीजन मेकिंग का दायरा बढ़ाने और अभिषेक बनर्जी को लेकर बढ़ती आलोचना को देखते हुए उठाया गया है। आठ जून को है बैठक बता दें कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक आठ जून को होगी। इसमें नीट परीक्षा से जुड़े विवाद, शिक्षा व्यवस्था, महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि, चुनाव से जुड़े मुद्दों तथा संसद के मानसून सत्र के लिए साझा रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। कांग्रेस की पहल पर हो रही इस बैठक को विपक्षी दलों के बीच समन्वय मजबूत करने की कोशिश बताया जा रहा है। बैठक सोमवार आठ जून को यहां कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होगी। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) ने बैठक में शामिल नहीं होने की घोषणा की है। आम आदमी पार्टी पहले ही इंडिया गठबंधन से दूरी बना चुकी है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल बैठक के एजेंडे और इसकी तैयारियों को लेकर विभिन्न विपक्षी नेताओं से लगातार संपर्क में है। विपक्षी दल जनता से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने और संसद से लेकर सड़क तक संयुक्त संघर्ष की रणनीति पर सहमति बनाने का प्रयास कर सकते हैं।

बहरामपुर सीट विवाद पर हंगामा, गांगुली और पठान ने खारिज किए दावे

नई दिल्ली  पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद टीएमसी चीफ ममता बनर्जी इन दिनों सुर्खियों में हैं। अब बहरामपुर लोकसभा सीट को लेकर हंगामा मचा हुआ है। बवाल ऐसा मचा कि सौरव गांगुली और यूसुफ पठान दोनों को सफाई देनी पड़ी। दरअसल, बंगाल के अखबार में छपी खबर में दावा किया गया कि विधानसभा सीट हारने के बाद अब ममता बनर्जी सांसद बनकर दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होना चाहती हैं। वह बहरामपुर सीट से लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहती हैं। ये वही सीट है जहां से यूसुफ पठान सांसद हैं। खबर पर क्यों मच गया हंगामा? खबर में दावा किया गया कि ममता बनर्जी ने सौरव गांगुली से कहा कि वह यूसुफ पठान से बात करें कि वह इस सीट को छोड़ दें, जिससे कि वहां पर उपचुनाव हों और वह सांसद बनकर दिल्ली पहुंच सकें। इतना ही नहीं यहां तक दावा किया गया कि यूसुफ पठान ने सौरव गांगुली के इस आग्रह को ठुकरा दिया। इसके बाद इस खबर को लेकर हंगामा मच गया। सौरव और यूसुफ को देनी पड़ी सफाई इस हंगामे के बाद दोनों पूर्व क्रिकेटरों को सफाई देनी पड़ी। सौरव गांगुल ने यूसुफ पठान को सीट छोड़ने का मैसेज भेजने की खबर को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि मीडिया में प्रकाशित ये दावे तथ्यों की जांच के बिना और लापरवाही से प्रकाशित किए गए हैं। ममता बनर्जी की ओर से उन्हें कभी कोई संदेश यूसुफ पठान तक पहुंचाने के लिए नहीं कहा गया। गांगुली ने यह भी कहा कि उनका राजनीति से किसी भी स्तर पर कोई संबंध नहीं रहा है। वहीं, यूसुफ पठान ने कहा, "कुछ समय से यह खबर वायरल हो रही है कि ममता बनर्जी ने मुझसे बहरामपुर लोकसभा सीट से सांसद पद से इस्तीफा देने को कहा है, ताकि वह वहां से लोकसभा चुनाव लड़ सकें। ममता बनर्जी ने मुझसे कभी ऐसा नहीं कहा। यहां तक कि हमारी पिछली मुलाकात में भी उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया। न ही उन्होंने पार्टी के किसी आधिकारिक नेता के जरिए ऐसा कोई संदेश भेजा है। यह दावा पूरी तरह से झूठा है और मुझे दुख है कि बिना किसी आधिकारिक खबर के भी सोशल मीडिया और सभी मीडिया हाउस में इस पर चर्चा और बहस हो रही है। इसलिए, न तो ममता बनर्जी और न ही पार्टी के किसी नेता ने मुझसे मेरी सांसद सीट से इस्तीफा देने के लिए कहा है।"

ममता बनर्जी की बढ़ीं मुश्किलें, विवादित बयान को लेकर सिलीगुड़ी में मामला दर्ज

सिलीगुड़ी  पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ गई हैं। कोलकाता में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान बांग्लादेश के एक हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में केंद्रीय गृह मंत्रालय और गृह मंत्री अमित शाह का नाम घसीटने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। यह शिकायत सिलीगुड़ी साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में एक वकील द्वारा दर्ज कराई गई है। क्या है पूरा मामला और ममता बनर्जी का दावा? यह विवाद 2 जून 2026 को कोलकाता के धर्मतला (Y-चैनल) में टीएमसी के एक धरना प्रदर्शन के दौरान शुरू हुआ। अपने भाषण में ममता बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें बांग्लादेश में हुई एक 'बड़ी हत्या' के पीछे की पूरी साजिश और लोगों के नामों की जानकारी है, लेकिन वह उनका खुलासा नहीं करेंगी क्योंकि इससे पड़ोसी देश में उथल-पुथल मच सकती है। क्या बोलीं थी ममता बनर्जी सभा में ममता बनर्जी ने बांग्लादेश में हुए विवादित ओसमान हादी हत्याकांड का जिक्र किया. नाम लिये बिना ममता बनर्जी बोलीं “बांग्लादेश से एक बड़ा खूनी एसटीएफ ने गिरफ्तार किया था, जिसे लेकर बांग्लादेश में बड़ा बवाल हुआ. मैं दूसरे देश की बात नहीं कर रही. मैं जो पॉइंट बता रही हूं, वो मेघालय से बंगाल आते हैं. यहां आने पर हमारी एसटीएफ पकड़ती है. होम मिनिस्टर खुद कह रहे हैं… इतने दिन नहीं बोली, आज अत्याचार की सीमा पार कर गया इसलिए बोल रही हूं. उन्होंने कहा… आप बंगाल पुलिस को कह दीजिए ये बात बाहर न जाये. ये देश के लिए है. किससे मर्डर करवाया था, किन-किन के नाम आये थे… मैं सब जानती हूं।  विवाद की वजह दरअसल, दिसंबर में बांग्लादेश में ओसमान हादी की हत्या हुई थी. जनवरी में हत्यारे मेघालय बॉर्डर से बंगाल आये तो एसटीएफ ने दो को पकड़ा. ममता ने सभा में इसी केस को लेकर गृह मंत्रालय पर इशारों में टिप्पणी की. गत जनवरी में मेघालय की सीमा पार कर इस राज्य में आते सम ही बंगाल एसटीएफ ने दो लोगों को गिरफ्तार किया।  एफआईआर में क्या आरोप है शिकायत में कहा गया कि ममता ने देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामले पर सार्वजनिक मंच से बयान दिया. गृहमंत्री का हवाला देकर उकसाने वाली बात कही. इसे ‘देशविरोधी’ बताते हुए सिलीगुड़ी साइबर क्राइम थाने में केस दर्ज हुआ है. तृणमूल का कहना है कि ममता ने सच बोला है, वहीं भाजपा इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़’ बता रही है।  कौन थे ओसमान हादी ओसमान हादी (शरीफ़ उस्मान हादी) बांग्लादेश के एक युवा नेता और लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता थे. जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ हुए छात्र आंदोलन और ‘इंकलाब मंच’ से जुड़े थे. 12 दिसंबर 2025 को ढाका में चुनावी प्रचार के दौरान नकाबपोश हमलावरों ने उनके सिर में गोली मार दी थी. इसके बाद 18 दिसंबर 2025 को सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी थी। उनका इशारा स्पष्ट रूप से बांग्लादेशी छात्र नेता शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या की ओर था। ममता बनर्जी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब मार्च 2026 में पश्चिम बंगाल पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने इस हत्याकांड के संदिग्धों को राज्य से गिरफ्तार किया था, तब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से फोन किया था। ममता का दावा है कि अमित शाह ने "राष्ट्रीय हित" का हवाला देते हुए उनसे इस गिरफ्तारी की खबर को दबाने और बाहर न आने देने के लिए कहा था। रिंकी सेन चटर्जी ने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए ममता बनर्जी चाहतीं तो इस मामले को सीधे गृह मंत्रालय के समक्ष उठा सकती थीं। उनका आरोप है कि अब वह यह दावा कर रही हैं कि बांग्लादेश में हुई हत्या गृह मंत्रालय के निर्देश पर कराई गई थी। ममता के बयान कट्टरपंथी तत्वों को प्रोत्साहित करने वाले हैं शिकायतकर्ता के अनुसार, इस तरह के आरोप भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव बढ़ा सकते हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि ऐसे बयान बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। शिकायत में यह भी कहा गया है कि संवैधानिक पद पर रहते हुए ममता बनर्जी ने देश की गोपनीयता और हितों की रक्षा की शपथ ली थी, लेकिन पद छोड़ने के बाद उनके बयान कट्टरपंथी तत्वों को प्रोत्साहित करने वाले हैं। FIR में क्या आरोप लगाए गए हैं? ममता बनर्जी के इस सनसनीखेज दावे के बाद, सिलीगुड़ी की वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने उनके खिलाफ सिलीगुड़ी साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में आपराधिक मामला दर्ज कराया है। शिकायत के अनुसार, एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा बिना सबूत के केंद्रीय गृह मंत्रालय पर ऐसे गंभीर आरोप लगाना जनता में भ्रम और सामाजिक अशांति पैदा करने का प्रयास है। इस तरह की बयानबाजी भारत और बांग्लादेश के संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती है। बयान को असंवैधानिक और भड़काऊ बताते हुए कहा गया है कि यह राजनीतिक फायदे के लिए गढ़ा गया नैरेटिव है।