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योगी का दावा- यूपी में 1.27 करोड़ हिंदू वोट गायब, अखिलेश का तंज- अब रामलीला मैदान आएं

लखनऊ उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गहमागहमी बढ़ गई है। इस बीच शुक्रवार को सीएम योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए वोटर लिस्ट से 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के गायब होने की बात की तो इसे लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर सीएम के पास यह जानकारी आई कहां से? अखिलेश यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री यह बात तब कह रहे हैं जब एमएलसी चुनाव हार गए। यदि ऐसा है तो फिर उन्हें भी रामलीला मैदान में आ जाना चाहिए। बता दें कि शुक्रवार को लखनऊ में भाजपा कार्यसमिति की बैठक थी। बैठक को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश में वोटरों को जुड़वाने को लेकर व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है। एसआईआर से पहले की मतदाता सूची के विश्लेषण में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम सामने आए हैं, जो विधानसभा की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं। मतदाता सूची से 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम गायब होना चिंताजनक है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे चलते 28 नगरीय और 66 अन्य सीट भी खतरे के करीब हैं। याद रखना सावधानी हटी दुर्घटना घटी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से प्रदेश में 16 करोड़ से अधिक मतदाता होने चाहिए जबकि वर्तमान में 13 करोड़ हैं। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को कमल साथी ऐप पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर छूटे हुए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाने के लिए अभियान चलाना चाहिए। अखिलेश यादव ने क्या कहा? दिल्ली में इंडिया ब्लॉक की रैली में पहुंचे अखिलेश यादव ने कहा कि अन्याय की सारी हदें पार हो गई हैं। अब तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद मान लिया है कि 1.27 करोड़ वोट कम कर दिए गए हैं। उन्हें यह बात कब याद आई? एमएलसी चुनाव हारने के बाद ही। जो लोग 'डबल इंजन सरकार' की बात करते थे, वे अब 'डबल जीरो' बन गए हैं। वे न सिर्फ डबल जीरो बने हैं, बल्कि उन्होंने हार को एक बार भी स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने चुनाव आयोग से संपर्क किया और मतगणना दोबारा करवाई। ज़रा सोचिए, एक ही चुनाव में दोहरी हार, डबल इंजन वाली सरकार, डबल जीरो और डबल हार। और इन सब के बाद वे क्या दावा कर रहे हैं? कि हिंदुओं के 1.27 करोड़ वोट गायब हैं। उन्हें यह जानकारी कहां से मिली? यह डेटा उन्हें किसने दिया? सपा प्रमुख ने कहा कि यह कोई ऐसा डेटा नहीं है जिसे यूं ही सड़कों से उठा लिया जाए या कोई भी उन्हें सौंप दे। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने आगे कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री ऐसा बयान दे रहा है, और वो भी उत्तर प्रदेश में, जहां से प्रधानमंत्री आते हैं तो वो ये बयान कब दे रहा है? किसी के वहां जाकर लौटने के बाद। उन्होंने कहा कि तो फिर यहां किस पर आरोप लगाया जा रहा है? यदि 1.27 करोड़ वोट लिस्ट से गायब हैं, तो सरकार दूसरों पर किस बात का आरोप लगा रही है? सरकार ये भी दावा कर रही है कि लाखों लाभार्थियों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं। इसका मतलब है कि उन लोगों को भी रामलीला मैदान में आना चाहिए, क्योंकि ये अन्याय और झूठे वादों के खिलाफ आंदोलन है।

‘भारत कोई बनाना रिपब्लिक नहीं’, राहुल गांधी पर बरसे जेपी नड्डा

नई दिल्ली दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडी गठबंधन की रैली और विरोध प्रदर्शन को लेकर सत्ताधारी बीजेपी और विपक्षी दलों के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि विपक्ष लोकतंत्र की आड़ में देश में अराजकता फैलाने, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और चुनी हुई सरकार को गिराने की साजिश रच रहा है। जेपी नड्डा के तीखे सवाल और आरोप अपने बयान में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के राजनीतिक मॉडल पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी की राजनीति चार चरणों पर टिकी है, झूठ फैलाना, सड़कों पर अराजकता भड़काना, देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना और विदेशी ताकतों के इशारे पर चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करना। 'भारत कोई बनाना रिपब्लिक नहीं' राहुल गांधी को सीधे चेतावनी देते हुए नड्डा ने कहा कि राहुल गांधी, कान खोलकर सुन लीजिए, यह भारत है, कोई 'बनाना रिपब्लिक' नहीं है जहां आप जब चाहें आगजनी, दंगे या सत्ता परिवर्तन का एजेंडा चला सकें। सपने देखना बंद कीजिए। भारत दुनिया का सबसे पुराना और मजबूत लोकतंत्र है। 1 नवंबर के दिन पर भी उठाए सवाल बता दें कि बीजेपी ने इस रैली की तारीख 1 नवंबर को लेकर भी तीखा विरोध जताया है। नड्डा ने आरोप लगाया कि 1 नवंबर का दिन देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला धब्बा है, क्योंकि इसी दिन कांग्रेस समर्थित भीड़ ने सिख समुदाय के लोगों पर अत्याचार किए थे। उन्होंने कहा कि आज के दिन जब देश पीड़ितों को याद कर रहा है, तब राहुल गांधी अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं। बड़ी बात यह भी है कि इस विरोध में बीजेपी ने दिल्ली में एक अलग मार्च भी निकाला, जिसमें केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और अन्य नेता शामिल हुए। इसके अलावा मुंबई में भी बीजेपी और उसके सहयोगियों ने 'लोकशाही बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा निकाली। अब समझिए विपक्ष का क्या है कहना? दूसरी ओर, इंडी गठबंधन का कहना है कि यह रैली देश के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और मतदाता सूची से नाम काटे जाने के विरोध में है। हिमाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि रैली में आ रहे उनके समर्थकों की बसों को अलग-अलग जगहों पर रोका जा रहा है। हिमाचल के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई और कहा कि आने वाले दिनों में देश में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। विपक्षी गठबंधन की मुख्य मांग है कि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें और ईवीएम (EVM) की जगह फिर से बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात गौरतलब है कि रैली और विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। मध्य और नई दिल्ली में दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ और रैपिड एक्शन फोर्स के करीब 10000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। अकेले रामलीला मैदान और उसके आसपास 4000 से ज्यादा जवान मुस्तैद हैं। संवेदनशील इलाकों में धारा 163 लागू कर दी गई है और ड्रोन तथा AI कैमरों से चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है।

दिल्ली में कब बनी पहली सरकार और क्यों खत्म हुई विधानसभा? जानिए 70 साल का पूरा सियासी इतिहास

नई दिल्‍ली  दिल्ली की सुबह में एक अजीब-सा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ संसद भवन है, जहां देश के कानून बनते हैं। राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय मंत्रालय हैं, तो दूसरी तरफ दिल्ली सचिवालय भी है, जहां शहर की चुनी हुई सरकार फैसले लेती है। इनके बीच उपराज्यपाल का कार्यालय भी है। यानी एक ही शहर में सत्ता के कई केंद्र हैं। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री और विधानसभा होने के बावजूद दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है। पुलिस, जमीन और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे अहम विषय आज भी केंद्र के अधीन हैं। आखिर देश की राजधानी में सत्ता का यह अनोखा बंटवारा क्यों है? आखिर दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश क्यों बनाया गया? 1956 में विधानसभा क्यों खत्म हुई और फिर चार दशक बाद लोकतंत्र की वापसी कैसे हुई? आज, यानी 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 साल पूरे हो गए। इस मौके पर जानिए राजधानी की सत्ता और सियासत के बदलते 70 साल की  कहानी इंद्रप्रस्थ से नई दिल्ली तक: कैसे बदली पहचान? यूं तो दिल्ली का इतिहास महाभारत में वर्णित इंद्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है। हालांकि, इसके ऐतिहासिक साक्ष्य और सटीक कालखंड को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।  अलग-अलग दौर में इस क्षेत्र में अनेक नगर बसे, उजड़े और सत्ता के केंद्र बने। सल्तनत काल, मुगल शासन और शाहजहानाबाद ने दिल्ली की पहचान को नए रूप दिए, लेकिन आधुनिक दिल्ली की कहानी 1911 से एक नया मोड़ लेती है। उस साल 12 दिसंबर को दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का एलान किया। नई राजधानी के निर्माण के लिए रायसीना हिल और आसपास का इलाका चुना गया। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकारों ने चौड़ी सड़कों, विशाल सरकारी इमारतों और व्यवस्थित शहरी ढांचे वाली नई राजधानी की परिकल्पना को आकार दिया। 31 दिसंबर 1926 को नई राजधानी का नाम 'नई दिल्ली' रखने की आधिकारिक घोषणा हुई। इसके बाद 15 फरवरी 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई राजधानी का औपचारिक उद्घाटन किया। इस तरह दिल्ली को आधुनिक राजधानी की पहचान तो मिल गई, लेकिन एक सवाल अब भी बाकी था- जब यह शहर पूरे देश की सत्ता का केंद्र है, तो इसके अपने प्रशासन की कमान किसके हाथ में होनी चाहिए; स्थानीय प्रतिनिधियों के या केंद्र सरकार के? आजादी के बाद यही सवाल दिल्ली की राजनीतिक और संवैधानिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बहस बन गया। दिल्ली में कब बनी पहली निर्वाचित सरकार? 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। इसके करीब ढाई साल बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। इसी के साथ दिल्ली को पार्ट-C राज्य का दर्जा मिला। इस व्यवस्था के तहत यहां विधानसभा और मुख्यमंत्री का प्रावधान किया गया। हालांकि, इसे पूर्ण राज्यों जैसी स्वायत्तता हासिल नहीं थी। आजादी के बाद पहली बार  1952 में हुए चुनावों ने दिल्ली की राजनीति को नया अध्याय दिया। 7 मार्च 1952 को दिल्ली की पहली विधानसभा गठित हुई। इसमें कुल 48 सदस्य थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पसंदीदा नेताओं में शामिल चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। 17 मार्च 1952 को पुराने सचिवालय के लॉन में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित हुआ। दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त शंकर प्रसाद ने ब्रह्म प्रकाश को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। इस तरह आजादी के बाद पहली बार दिल्ली को अपनी निर्वाचित सरकार मिली, लेकिन यह व्यवस्था बहुत लंबे समय तक सुचारु रूप से नहीं चल सकी। मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश और मुख्य आयुक्त के बीच अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आने लगे। मुख्यमंत्री के पास विधानसभा और मंत्रिपरिषद थी, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य आयुक्त की भी अहम भूमिका थी। अधिकारों की यह खींचतान धीरे-धीरे बढ़ती गई। आखिरकार 12 फरवरी 1955 को ब्रह्म प्रकाश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद दरियागंज के विधायक गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री बने। बता दें कि उस समय दिल्ली में आज की तरह उपराज्यपाल (LG) का पद नहीं था। मुख्य आयुक्त केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर दिल्ली का प्रशासन संभालते थे। 1956 में दिल्ली विधानसभा क्यों खत्म की थी? मुख्यमंत्री और मुख्य आयुक्त के बीच बढ़ते मतभेदों ने केंद्र सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था- क्या देश की राजधानी को भी दूसरे राज्यों की तरह चलाया जाना चाहिए या यहां केंद्र का नियंत्रण ज्यादा होना चाहिए? इसी बीच देश में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी। भाषाई और प्रशासनिक आधार पर राज्यों की सीमाएं नए सिरे से तय की जा रही थीं। इस काम के लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया था। आयोग ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था की भी समीक्षा की। आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि पूरे देश की राजधानी भी है। यहां संसद, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालय मौजूद हैं। ऐसे में राजधानी के प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार की विशेष भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग का मानना था कि देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली का प्रशासन सामान्य राज्यों से अलग होना चाहिए। यहां अलग राज्य सरकार होने से केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच अधिकारों का टकराव बढ़ सकता है। आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली का पार्ट-C राज्य का दर्जा खत्म कर इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। इसके साथ ही विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था भी समाप्त हो गई। इस तरह दिल्ली में निर्वाचित सरकार का पहला अध्याय समाप्त हो गया। शासन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति के अधीन आ गई। यानी कि जिस दिल्ली में कुछ साल पहले जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजे थे, वहां अब विधानसभा ही नहीं थी। दिल्‍ली में फिर कब लौटी लोकतांत्रिक व्यवस्था? विधानसभा खत्म होने के बाद भी दिल्ली में चुनी हुई सरकार की मांग बनी रही। इसी को देखते हुए 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम के तहत महानगर परिषद बनाई गई। इसमें निर्वाचित सदस्य तो थे, लेकिन उसके पास कानून बनाने के अधिकार नहीं थे। यानी प्रतिनिधित्व लौटा, लेकिन सत्ता और अधिकार अब भी दूर थे। बढ़ती आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के बीच … Read more

उमर अब्दुल्ला और निधि राजदान की शादी पर गरमाई सियासत, मेहराज मलिक ने धर्म के ठेकेदारों को घेरा

नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में एक निजी समारोह में वरिष्ठ टीवी पत्रकार निधि राजदान के साथ शादी रचा ली। दोनों ने शनिवार को सोशल मीडिया के जरिए इस बात की जानकारी दुनिया को दी। सीएम के इस तरह हिंदू महिला से शादी करने के बाद जम्मू-कश्मीर की डोडा सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष मेहराज मलिक ने राज्य के मुख्यमंत्री को बधाई दी, साथ ही ऐसा करते हुए उन्होंने धर्म के तथाकथित ठेकेदारों और दिन-रात हिंदू-मुस्लिम करने वाले न्यूज चैनलों को लेकर अपना गुस्सा भी जाहिर किया। AAP विधायक ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी और इस दौरान 'लव जिहाद' को लेकर अपने-अपने चैनलों पर शो करने वाले न्यूज चैनलों को 'गोदी मीडिया' (सरकार के चहेते) बताते हुए, उन पर जानबूझकर ऐसे मुद्दों को को उठाते हुए भाजपा को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया। अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'शादी के लिए उमर अब्दुल्ला साहब को बधाई। लेकिन अब 'गोदी मीडिया' कहां है? जो 'लव जिहाद' पर प्राइम-टाइम डिबेट चलाता है? क्या वे इसका इस्तेमाल सिर्फ BJP को फायदा पहुंचाने और गरीब लोगों को निशाना बनाने के लिए करते हैं? क्या अब हिंदू धर्म खतरे में नहीं है?' इसके बाद अपनी पोस्ट में उन्होंने मुस्लिम धर्म के विद्वानों के रवैये को लेकर भी सवाल उठाए और उन पर अमीर-गरीब लोगों के लिए अलग-अलग रवैया अपनाने का आरोप लगाया। अपनी पोस्ट में आगे उन्होंने सवाल उठाते हुए पूछा कि 'क्या मुस्लिम विद्वान बता सकते हैं कि मुसलमानों के लिए ऐसी शादी जायज है? यानी किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करना, वह भी इस्लाम कबूल किए बिना? अमीरों और गरीबों के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं? इसी शादी को लेकर शेयर की अपनी पोस्ट में मलिक ने लिखा था कि 'धर्म के ठेकेदार अब चुप क्यों, सब फतवे और धर्म के रक्षक बस गरीब लोगों के लिए होते हैं।' जम्मू-कश्मीर की डोडा सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष मेहराज मलिक। बता दें कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को एक निजी समारोह में कश्मीरी पंडित परिवार से आने वाली निधि राजदान के साथ शादी की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' के जरिए शनिवार को अपनी शादी की जानकारी दी और अपनी पोस्ट में लिखा, 'कल एक नए सफर की शुरुआत हुई।' इस दौरान अपनी पोस्ट के साथ उन्होंने अपनी नई नवेली पत्नी के साथ चार तस्वीरें भी शेयर कीं। प्राप्त जानकारी के अनुसार यह विवाह समारोह शुक्रवार (30 अक्टूबर) को दोनों परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में आयोजित हुआ। जिसमें उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला और माता मौली, उनकी तीन बहनें तथा अन्य करीबी रिश्तेदार शामिल हुए। जबकि निधि के पिता और वरिष्ठ पत्रकार एमके राजदान और उनकी मां सरला राजदान भी समारोह में मौजूद थीं। सूत्रों ने बताया कि दोनों की शादी विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुई। उमर अब्दुल्ला और निधि दोनों की ही यह दूसरी शादी है। उमर अब्दुल्ला (उम्र 56 वर्ष) की पहली शादी पायल नाथ के साथ 1994 में हुई थी और उनके दो बेटे जाहिर और जमीर हैं। हालांकि यह कपल साल 2011 से ही अलग-अलग रह रहा था। इन दोनों का तलाक इस साल 31 जुलाई को भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति के बाद हुआ। कई सालों तक अदालत में लंबित रहे तलाक के इस मामले को इस साल सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर समाप्त कर दिया था। निधि (उम्र- 49 वर्ष) की भी यह दूसरी शादी है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की तैयारी रुकी, विपक्ष ने लिया फैसला वापस

नई दिल्ली मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'इंडिया' गठबंधन का 'जन महाभियोग' कार्यक्रम 31 अक्टूबर तक टाल दिया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इसके पीछे बारिश को वजह बताया है। आज यही यानी शुक्रवार, 30 अक्टूबर को विपक्ष ने सीईसी के खिलाफ ‘जन महाभियोग’ चलाने का ऐलान किया था। विपक्ष की तरफ से बताया गया था कि इस सांकेतिक महाभियोग के कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार करेंगी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जन खरगे इस प्रस्ताव को पेश करने वाले थे। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समापन भाषण देने वाले थे। संभव है कि 31 अगस्त को इस सांकेतिक जन महाभियोग का आयोजन किया जाए। क्योंकि 1 नवंबर को रामलीला मैदान में विपक्ष की बड़ी रैली होने वाली है। कहां होना था यह कार्यक्रम यह पूरा कार्यक्रम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के ओपन लॉन में आयोजित किया गया था। बताया गया कि ज्यादा बारिश होने की वजह से आयोजन को एक दिन के लिए टाला जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने बुधवार को कहा था कि कई स्थानों पर आयोजन की अनुमति नहीं मिलने के कारण यह कार्यक्रम शुक्रवार अपराह्न साढ़े तीन बजे खरगे के 10, राजाजी मार्ग स्थित आवास पर आयोजित किया जाएगा। 1 नवंबर की रैली टालने की मांग कर रहे है कारोबारी संगठन दिल्ली के कारोबारी संगठन 1 रैली की विपक्ष की रैली टालने की मांग कर रहे हैं। 'चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री' ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कहा कि इस रैली को दिवाली के बाद तक टाल दिया जाए। हालांकि रामलीला मैदान में टेंट लगने लगे हैं और तैयारियों पूरी जोर से चल रही हैं। कांग्रेस ने दावा किया है कि इस रैली में देशभर से 10 लाख लोग पहुंचेंगे। वहीं दिल्ली पुलिस का अनुमान है कि 50 हजार लोग रामलीला मैदान में पहुंच सकते हैं। विपक्ष की यह रैली एक नवंबर को सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक होनी है। कांग्रेस का दावा है कि इसमें करीब 10 लाख लोग शामिल होंगे। यह रैली निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायंस) के अभियान का हिस्सा है।

जबलपुर में रवींद्र तिवारी तो सागर में जसवंत राठौर को मिली जिम्मेदारी, भोपाल-इंदौर में बदलाव नहीं

भोपाल  भारतीय जनता युवा मोर्चा ने मध्यप्रदेश के 19 जिलों में जिला अध्यक्षों और जिला महामंत्रियों की नियुक्ति की है। प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सहमति से नियुक्तियों की घोषणा की।जबलपुर नगर में रवींद्र तिवारी, मऊगंज में अभिषेक मिश्रा और श्योपुर में ईश्वर जाट को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। सागर, निवाड़ी, मैहर, उमरिया, डिंडौरी और मंडला समेत अन्य जिलों में भी नए अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं।बालाघाट, इंदौर ग्रामीण, धार नगर, नीमच, सिवनी, छिंदवाड़ा, नर्मदापुरम, रायसेन, अनूपपुर और मंदसौर में भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। सूची में जिला अध्यक्षों के साथ जिला महामंत्रियों के नाम भी घोषित किए गए हैं। सागर से मंडला तक इन नेताओं को जिम्मेदारी सागर में जसवंत राठौर, निवाड़ी में संदेश नायक, मैहर में दिलीप पटेल, उमरिया में आशुतोष तिवारी, डिंडौरी में सत्यम मानिकपुरी और मंडला में उत्कर्ष यादव को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। निवाड़ी में निरेन्द्र दागी और मैहर में प्रिंस शर्मा को भाजपा युवा मोर्चा का जिला महामंत्री नियुक्त किया गया है। बालाघाट, इंदौर ग्रामीण और धार नगर में नियुक्तियां बालाघाट में अमन गांधी को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। इंदौर ग्रामीण में प्रबल जायसवाल जिला अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं, जबकि अजय पंवार और विजेन्द्र जाट को जिला महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। धार नगर में तरुण सिसौदिया को जिला अध्यक्ष और रोहित रघुवंशी को जिला महामंत्री बनाया गया है। नीमच, सिवनी और छिंदवाड़ा में नई टीम नीमच में रवि पाटीदार और सिवनी में योगेश शिवहरे को जिला अध्यक्ष बनाया गया है। सिवनी में अंकित ठाकुर जिला महामंत्री नियुक्त हुए हैं। छिंदवाड़ा में कुबेर सूर्यवंशी को जिला अध्यक्ष और बिट्टू विवेक मंडरा को जिला महामंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई है। नर्मदापुरम, रायसेन, अनूपपुर और मंदसौर के नाम नर्मदापुरम जिले में कुलदीप रघुवंशी जिला अध्यक्ष और रूपेन्द्र साहू जिला महामंत्री बनाए गए हैं। रायसेन में प्रतीक द्विवेदी को जिला अध्यक्ष तथा राजेन्द्र मीणा को जिला महामंत्री नियुक्त किया गया है। अनूपपुर में अटल ब्यौहार जिला अध्यक्ष और आशुतोष तिवारी जिला महामंत्री बने हैं। मंदसौर में मनोहर चौहान को जिला अध्यक्ष और अनिल पाटीदार को जिला महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर ने जारी की सूची भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सहमति से युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्याम टेलर द्वारा नई नियुक्तियों की सूची जारी की गई है। इन नियुक्तियों के जरिए संगठन ने प्रदेश के अलग-अलग जिलों में युवा मोर्चा की जिला इकाइयों के लिए नई जिम्मेदारियां तय की हैं। यहां देखें पूरी लिस्ट जबलपुर नगर जिला अध्यक्ष – रविन्द्र तिवारी जिला महामंत्री – श्रीकांत वर्मा भिण्ड जिला अध्यक्ष – अभिषेक मिश्रा जिला महामंत्री – शिवांकर भदौरिया श्योपुर जिला अध्यक्ष – ईश्वर जाट जिला महामंत्री – अभिषेक जांगिड़ सागर जिला अध्यक्ष-जसवंत राठौर निवाड़ी जिला अध्यक्ष- संदेश नायक जिला महामंत्री- नरेन्द्र दांगी मैहर जिला अध्यक्ष – दिलीप पटेल जिला महामंत्री – प्रिंस शर्मा उमरिया जिला अध्यक्ष – आयुष्तोष तिवारी डिण्डोरी जिला अध्यक्ष- सत्यम मानिकपुरी मंडला जिला अध्यक्ष – उत्कर्ष यादव बालाघाट जिला अध्यक्ष – अमन गांधी जिला महामंत्री – प्रबल जायसवाल इंदौर ग्रामीण जिला अध्यक्ष – अजय पंवार जिला महामंत्री – विजेन्द्र जाट धार नगर जिला अध्यक्ष – तरुण सिसोदिया जिला महामंत्री – रोहित रघुवंशी नीमच जिला अध्यक्ष – रवि पाटीदार सिवनी जिला अध्यक्ष – योगेश शिवहरे जिला महामंत्री – अंकित ठाकुर छिंदवाड़ा जिला अध्यक्ष – कुबेर सूर्यवंशी जिला महामंत्री – विदत्त विवेक मंडरा नर्मदापुरम जिला अध्यक्ष – कुलदीप रघुवंशी जिला महामंत्री – रूपेंद्र साहू अनूपपुर जिला अध्यक्ष – अटल ब्यौहार जिला महामंत्री – आशुतोष तिवारी रायसेन जिला अध्यक्ष – प्रतिक द्विवेदी जिला महामंत्री – राजेंद्र मीणा मंदसौर जिला अध्यक्ष – मनोहर चौहान जिला महामंत्री – अनिल पाटीदार  

Supreme Court: महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज, निवेश फंडों के वास्तविक मालिकों का ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग नहीं मानी

  नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर राहत देने से इनकार कर दिया. इस याचिका में भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने वाले अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF), फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) और उनसे जुड़े बिचौलियों के असली निवेशकों की पहचान और उनके निवेश की जानकारी पूरी तरह सार्वजनिक करने की मांग की गई थी. महुआ मोइत्रा ने इसके लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को निर्देश देने की मांग की थी।  जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस डीके उपाध्याय की बेंच ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि जिन मुद्दों को उठाया गया है, उन पर मौजूदा कानूनी या नियामक ढांचे के अभाव में अदालत याचिका में मांगी गई राहत नहीं दे सकती. हालांकि, बेंच ने केंद्र सरकार और सेबी से महुआ मोइत्रा की ओर से उठाई गई चिंताओं पर विचार करने को कहा।  शेयर बाजार में हेरफेर की आशंका का मुद्दा याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि AIF और FPI के जरिए निवेश करने वाले वास्तविक लोगों की पहचान सार्वजनिक नहीं होने से शेयर बाजार में पारदर्शिता की कमी बनी हुई है. उन्होंने कहा कि विदेशी संस्थाओं के माध्यम से भारतीय कंपनियों में बड़ी रकम लगाई जा रही है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि पर्दे के पीछे असली निवेशक कौन हैं।  प्रशांत भूषण ने आशंका जताई कि इस अस्पष्टता का इस्तेमाल शेयर बाजार में संभावित हेरफेर के लिए किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि निवेशकों को यह जानकारी नहीं मिल पाती कि किसी कंपनी के शेयर की कीमत तेजी से बढ़ने के पीछे असली वजह क्या है और क्या कंपनी के प्रमोटर ही किसी फंड के जरिए उसके शेयर खरीद रहे हैं।  अडानी-हिंडनबर्ग मामले का दिया हवाला प्रशांत भूषण ने दलील दी कि पहले अंतिम लाभार्थी यानी असली निवेशक की पहचान बताने की जरूरत थी, लेकिन 2018 में इस व्यवस्था को छोड़ दिया गया. इसके बाद संबंधित संस्थाओं को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) के प्रावधानों का पालन करना था. भूषण ने अडानी-हिंडनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित विशेषज्ञ समिति की टिप्पणियों का भी हवाला दिया और कहा कि खुलासे की जरूरत खत्म होने से नियामक व्यवस्था कमजोर हुई है।  हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा कानूनी ढांचे को देखते हुए याचिका में मांगे गए निर्देश जारी नहीं किए. कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और सेबी को शिकायतों पर विचार करने को कहा है। 

भ्रष्टाचारियों पर सख्त कार्रवाई के पक्ष में उतरे रामेश्वर शर्मा, बोले- सरकार के निर्देश पर किसी को नहीं मिलेगी छूट

भोपाल  मध्यप्रदेश सरकार नगर निकायों में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी है। प्रदेश के एसीएस आइएएस संजय दुबे के इस संबंध में वायरल हुए वीडियो के बाद विपक्ष हमलावर बना हुआ है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार इसमें बीजेपी नेताओं और राज्य सरकार के मंत्रियों की संलिप्तता की बात कह रहे हैं। ऐसे में बीजेपी सरकार के बचाव में आगे आई है। भोपाल के वरिष्ठ नेता व विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस संबंध में बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में भ्रष्टाचार पर स्पष्ट नीति है। विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा " किसी का समर्थक हो या किसी का पाला हुआ हो, कोई नहीं बचेगा"। बीजेपी ने मंगलवार को उनका यह बयान सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। नगर निकायों में भ्रष्टाचार के संबंध में एसीएस संजय दुबे के वीडियो से प्रदेश में हलचल मची है। कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने कहा है कि भाजपा शासन में सरकारी खरीदारी में खुलेआम भ्रष्टाचार हो रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री खुद इस पर रोक नहीं लगाना चाहते! उन्होंने एसीएस का वीडियो जारी करते हुए पूछा था कि सरकार को अब और क्या सबूत चाहिए? भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी में लिप्त अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? मंगलवार को बीजेपी ने विधायक रामेश्वर शर्मा के माध्यम से इस मुद्दे पर सरकार का बचाव किया। पार्टी ने उनका एक वीडियो जारी किया जिसमें कहा गया है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का वादा निभा रही है। बीजेपी नेता व विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि सरकार ने स्वयं संज्ञान लेकर दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ बर्खास्तगी सहित सख्त कार्रवाई की है। उन्होंने यह भी कहा है कि विभागीय जांच जारी है और लोकायुक्त ने भी स्वतः संज्ञान लेकर प्रकरण दर्ज किया है। भोपाल के हुजूर सीट के बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने वीडियो में कहा: मोहन यादव सरकार स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई कर रही है, कांग्रेस ने कोई शिकायत की थी क्या! सरकार ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, उनको बर्खास्त करने तक की बात कही है। लोकायुक्त भी अपनी कार्रवाई शुरु कर रहा है। इसका मतलब यह है माननीय जीतू पटवारीजी की भाजपा सरकार में चोर बचेगा नहीं चाहे वह किसी का समर्थक हो या किसी के द्वारा पाला हुआ हो…।

हेमंत खंडेलवाल का खरगे पर निशाना, पीएम मोदी के दिवंगत पिता को लेकर टिप्पणी पर जताई नाराजगी

भोपाल   प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत पिता को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की टिप्पणी पर मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक विचारधारा से असहमति हो सकती है, लेकिन व्यक्तिगत और पारिवारिक विषयों को राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनाना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। हेमंत खंडेलवाल ने सोशल मीडिया पर जारी पोस्ट में खरगे की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रसेवा, जनकल्याण और देश के गौरव को प्राथमिकता दी है। उनका जीवन संघर्ष, परिश्रम और कर्तव्यनिष्ठा के साथ राष्ट्र के प्रति समर्पण का परिचायक है। खंडेलवाल ने आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोध के चलते प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत कटाक्ष करना कांग्रेस नेताओं की मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि लगातार जनादेश खो रही कांग्रेस को आत्ममंथन करने की जरूरत है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में विचारों का जवाब तर्क और काम से दिया जाना चाहिए, व्यक्तिगत टिप्पणियों से नहीं। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से अपनी राजनीति की दिशा पर विचार करने की बात कही और कहा कि जनता को विकास, जनकल्याण और भविष्य को लेकर स्पष्ट दृष्टि चाहिए।  विश्वास सारंग बोले- खरगे ने मर्यादा की हद पार की कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयान पर मंत्री विश्वास सारंग ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उसके नेता लोकतंत्र की मर्यादा तोड़ रहे हैं। सारंग ने कहा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी करना कांग्रेस की आदत बन गई है। कभी प्रधानमंत्री की दिवंगत मां और अब उनके दिवंगत पिता के बारे में इस तरह की बातें करना शोभा नहीं देता। उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में इतना नीचे उतरना भारतीय संस्कार नहीं हैं। लोकतंत्र में इस तरह की शब्दावली के लिए कोई जगह नहीं है। खरगे ने जो कहा है, वह अक्षम्य है। कांग्रेस लगातार मर्यादाएं तोड़ रही है।  

ममता बनर्जी के करीबी फिरहाद हकीम का खुलासा, ‘शुभेंदु अधिकारी आज TMC के मुख्यमंत्री होते’, जानें वजह

नई दिल्ली ममता गुट वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ नेता और कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम ने घोषणा की है कि वे अब नगर निगम चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने पार्टी के भीतर अपनी उपेक्षा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ अपने संबंधों और तृणमूल कांग्रेस के भविष्य को लेकर कई बड़े खुलासे किए। ममता बनर्जी के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करते हुए भी फिरहाद हकीम ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला। मीडिया  में उन्होंने कहा, "हमने कभी ममता बनर्जी का साथ नहीं छोड़ा। समस्या तब शुरू हुई जब उन्होंने अपने पुराने समर्थकों से ज्यादा अपने 'खून' यानी कि रिश्तेदारों और परिवार पर भरोसा करना शुरू कर दिया। हम सब उनके साथ खड़े थे, लेकिन उन्होंने हेलीकॉप्टर से एक नेता को लाकर बैठाना बेहतर समझा।" शुभेंदु अधिकारी होते आज TMC के मुख्यमंत्री राजनीतिक वफादारी पर बात करते हुए हकीम ने एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, "अगर पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सही महत्व दिया गया होता, तो शायद आज शुभेंदु अधिकारी TMC के मुख्यमंत्री होते।" पार्टी से अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए हकीम ने कहा कि बीते कुछ वर्षों से उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गई। उन्होंने कहा, "पिछले पांच सालों से पार्टी ने मेरा कोई इस्तेमाल नहीं किया है।" उन्होंने यह भी कहा कि वे दुर्गा पूजा के दौरान ममता बनर्जी को मिस कर रहे थे और जब भी उनसे मुलाकात होगी वे खुलकर अपनी बात रखेंगे। फिरहाद हकीम ने बताया कि कोलकाता में पीने के पानी की किल्लत को दूर करना और उत्तर कोलकाता में जलभराव की समस्या को सुलझाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। अपने कार्यकाल के दौरान हुई इमारत ढहने की घटना को उन्होंने अपना सबसे बड़ा मलाल बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह घटना सीधे तौर पर उनके नियंत्रण में नहीं थी। नई पीढ़ी को सलाह हकीम ने कहा कि अब नई पीढ़ी को चुनावी राजनीति में आगे आना चाहिए। हालांकि उन्होंने सचेत किया कि युवाओं को ईंट, बालू और सीमेंट के कारोबार के लिए राजनीति में नहीं आना चाहिए, बल्कि जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहने वाला पार्षद बनना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अपने परिवार पर नहीं थोपेंगे और न ही किसी पारिवारिक सदस्य पर राजनीति में आने का दबाव बनाएंगे।