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चुनावी रण से पहले कांग्रेस में हलचल, पंजाब इकाई में बड़े बदलाव की चर्चा तेज

चंडीगढ़  पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. पार्टी नेतृत्व को चिंता है कि गुटबाजी, कई पावर सेंटर और अंदरूनी खींचतान का फायदा विरोधी दल उठा सकते हैं. यही वजह है कि कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब पर फोकस बढ़ा दिया है।  कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल के साथ पंजाब के वरिष्ठ नेताओं की बैठक की है. इस बैठक का मकसद संगठन की स्थिति, चुनावी तैयारियों और नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चाओं का आकलन करना है।  इसके बाद पार्टी ने अजय माकन समेत तीन सदस्यों की एक ऑब्जर्वर कमेटी गठित कर दी है. इस कमेटी को पंजाब की स्थिति का मूल्यांकन करने और भविष्य की रणनीति पर सुझाव देने की जिम्मेदारी दी गई है. कमेटी की रिपोर्ट से पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष का नाम तय होगा।  हाईकमान ने हलचल बढ़ाई पंजाब को लेकर कांग्रेस नेतृत्व की गंभीरता लगातार बढ़ती बैठकों से साफ दिखाई दे रही है. पिछले दो सप्ताह में ही पार्टी ने पंजाब मामलों पर चार महत्वपूर्ण बैठकें की हैं. इससे ये संकेत मिलता है कि हाईकमान चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक कमियों को दूर करना चाहता है।  ऑब्जर्वर कमेटी ने करीब 70 नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया है. इनमें सांसद, विधायक, पूर्व मंत्री, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं. चर्चाओं का केंद्र संगठनात्मक पुनर्गठन, लंबित चुनावी समितियां और नेतृत्व में संभावित बदलाव है।  सूत्रों के मुताबिक, ऑब्जर्वर कमेटी ने नेताओं से मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष पर भी राय मांगी है. उनसे पूछा गया कि क्या वर्तमान नेतृत्व को जारी रखा जाना चाहिए या बदलाव की जरूरत है. कमेटी अगले दो सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सौंप सकती है. इसके बाद संगठनात्मक बदलाव हो सकते हैं।  PCC में बदलाव की बहस तेज स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने पंजाब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की बहस को तेज कर दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजा अमरिंदर सिंह वारिंग को अपने राजनीतिक गढ़ गिद्दड़बाहा में बड़ा झटका लगा. यहां आम आदमी पार्टी ने 19 में से 17 नगर निकाय वार्डों में जीत दर्ज की थी।  इस प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर कई नेताओं ने नेतृत्व में बदलाव पर जोर देना शुरू कर दिया है. उनका मानना है कि यदि कांग्रेस को 2027 में मजबूत चुनौती पेश करनी है, तो संगठन को नए सिरे से खड़ा करना होगा. दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का पलड़ा भारी हुआ है।  चन्नी स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के बाद अधिक मजबूत होकर उभरे हैं. चमकौर साहिब में कांग्रेस के अच्छे नतीजों ने उनके राजनीतिक कद को बढ़ाया है. पार्टी सूत्रों का कहना है कि चन्नी संगठन में बड़ी जिम्मेदारी की संभावनाओं को लेकर सक्रिय हैं. उनके साथ कई नाम चर्चा में हैं।  चन्नी की महत्वाकांक्षा और चुनौती इसमें सुखजिंदर सिंह रंधावा और विजेंदर सिंगला के नाम भी संभावित PCC चीफ के तौर पर चर्चा में हैं. इससे साफ है कि नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर कई दावेदार मौजूद हैं. चन्नी की बढ़ती सक्रियता ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. वो अभी भी पंजाब में बड़े चेहरे हैं।  उनकी गिनती कांग्रेस के सबसे बड़े दलित चेहरे के रूप में होती है. लेकिन पार्टी नेतृत्व 2022 विधानसभा चुनाव के अनुभव को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता. कांग्रेस ने तब उनको पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था. इसके बावजूद पार्टी सत्ता बरकरार नहीं रख सकी।  यही कारण है कि संगठन के भीतर इस बात पर अलग-अलग राय है कि क्या चन्नी को फिर से पार्टी का प्रमुख चेहरा बनाया जाना चाहिए. चन्नी समर्थकों का तर्क है कि उनके पास दलित समाज में मजबूत जनाधार है. इतना ही नहीं वो पार्टी को सामाजिक संतुलन देने की क्षमता रखते हैं।  जट्ट और दलित सिख समीकरण वहीं विरोधी खेमे का मानना है कि कांग्रेस को किसी एक चेहरे पर निर्भर होने की बजाय संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. पंजाब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती जट्ट और दलित सिख के बीच संतुलन बनाए रखने की है. दोनों बेहद प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं।  फिलहाल पार्टी के दो सबसे अहम पद जट्ट सिख नेताओं के पास हैं. राजा अमरिंदर सिंह वारिंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं, जबकि प्रताप सिंह बाजवा कांग्रेस विधायक दल का नेतृत्व कर रहे हैं. ऐसे में चन्नी समर्थक दलित नेताओं का एक वर्ग संगठन में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहा है।  यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पंजाब देश का वह राज्य है, जहां अनुसूचित जाति की आबादी सबसे अधिक है. हालांकि, इसके साथ ही कांग्रेस के सामने एक और चुनौती है. पिछले कुछ वर्षों में चुनाव के दौरान दलित वोट बैंक का बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट हुआ है।  कमेटी की रिपोर्ट पर टिकीं निगाहें ऐसे में नेतृत्व से जुड़ा कोई भी फैसला केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं होगा, बल्कि उसका सीधा असर पार्टी के सामाजिक और चुनावी समीकरणों पर भी पड़ेगा. फिलहाल पंजाब कांग्रेस की राजनीति का केंद्र अजय माकन की अगुवाई वाली ऑब्जर्वर कमेटी की रिपोर्ट बन गई है।  ये रिपोर्ट तय कर सकती है कि कांग्रेस पार्टी नेतृत्व में बड़ा बदलाव होगा या मौजूदा टीम को ही 2027 चुनाव तक मौका दिया जाएगा. राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और भूपेश बघेल की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि कांग्रेस पंजाब को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। 

NDA में दरार के संकेत? उम्मीद से ज्यादा वोट मिलने पर कांग्रेस उत्साहित, BJP की बढ़ी चिंता

बेंगलुरु  भारत की राजनीति में इन दिनों विपक्षी खेमे में टूट की खबरें लगातार आती रही हैं। वर्षों के बाद यह पहला मामला सामने आया है जिसमें केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को तगड़ा झटका लगा है। कर्नाटक में गुरुवार को घोषित हुए विधान परिषद चुनाव के नतीजों में कांग्रेस ने पांच सीटों पर आरामदायक जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ ही विपक्षी भाजपा-जेडीएस गठबंधन के खेमे में हड़कंप मच गया है। चुनाव के आंकड़ों से यह साफ हो गया है कि विपक्ष के कई विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की है। इस भीतरघात के बाद अब कर्नाटक में NDA के नेता अपनी ही पार्टियों में छिपे गद्दारों की तलाश में जुट गए हैं। चुनाव में गद्दारी के पुख्ता सबूत तो मिल चुके हैं, लेकिन गुप्त मतदान होने के कारण दोषियों का कोई स्पष्ट सुराग हाथ नहीं लग रहा है। कांग्रेस को मिले उम्मीद से ज्यादा वोट कांग्रेस उम्मीदवार विनय कार्तिक सबसे ज्यादा 32 वोट पाकर विजयी घोषित हुए। यह संख्या जीत के लिए जरूरी कोटे से कहीं अधिक थी और कांग्रेस विधायकों की अपनी ताकत से भी काफी ज्यादा थी। वोटों के इस गणित से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उन्हें भाजपा और जेडीएस के कम से कम एक दर्जन 12 विधायकों का साथ मिला है। भाजपा के नेताओं का कहना है कि उनके खेमे से केवल तीन विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की है। भाजपा ने आरोप लगाया कि जेडीएस के कम से कम 8 विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन किया है। जेडीएस नेताओं ने भाजपा के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क है कि उनके खेमे से केवल 4 वोट ही कांग्रेस को जा सकते थे, बाकी की पूरी मदद भाजपा विधायकों की तरफ से मिली है। शक के घेरे में आए बड़े नाम इस उलटफेर के बाद जेडीएस के जीटी देवगौड़ा और एमआर मंजूनाथ तथा भाजपा के दिग्गज नेता रमेश जारकीहोली, बीपी हरीश, एम चंद्रप्पा और एचके सुरेश तुरंत जांच के दायरे में आ गए हैं। हालांकि, इन सभी नेताओं ने क्रॉस-वोटिंग के आरोपों से साफ इनकार किया है। गठबंधन की सिरदर्दी इस चुनाव में गुप्त मतदान प्रणाली होने की वजह से जिम्मेदारी तय करना बेहद मुश्किल हो गया है। राज्यसभा या अन्य ओपन वोटिंग के उलट जहां पार्टी व्हिप के जरिए यह जांचा जा सकता है कि किसने किसे वोट दिया, विधान परिषद की इस प्रक्रिया ने संदेह के लिए तो बहुत जगह छोड़ दी है, लेकिन सबूत जुटाने का कोई मौका नहीं दिया है। इस अनिश्चितता ने गठबंधन के भीतर अविश्वास को और गहरा कर दिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पार्टी इन गद्दारों की पहचान करेगी और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने इस मामले पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इसे अपनी पहली चुनावी जीत बताते हुए डीके शिवकुमार काफी उत्साहित दिखे। हालांकि, उन्होंने इस कयासबाजी को हवा न देते हुए हल्के अंदाज में कहा, "मुझे कोई अंदाजा नहीं है कि किसने क्रॉस-वोटिंग की है।" NDA के लिए बड़ा झटका यह चुनावी नतीजा भाजपा और जेडीएस दोनों के लिए ही आने वाले दिनों में बड़ी मुसीबतें खड़ी कर सकता है। पहले से ही अस्तित्व के संकट से जूझ रही जेडीएस के लिए यह हार एक बड़ा झटका है। अब पार्टी आलाकमान को अपने दूसरे स्तर के नेताओं और पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष पर गंभीरता से ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। भाजपा में विजयेंद्र पर बढ़ेगा दबाव भाजपा के लिए भी यह परिणाम बेहद चिंताजनक है। इस बगावत से पार्टी के भीतर मौजूद असंतुष्ट गुट को बल मिलेगा, जो लगातार यह दावा कर रहा है कि राज्य में नेतृत्व की कमी के कारण पार्टी भटक रही है। विरोधी नेता अब प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को पद से हटाने के लिए दबाव और तेज कर सकते हैं।

पंजाब की सियासत में बढ़ी हलचल, जल्द चुनाव की संभावना पर कांग्रेस ने कसी कमर

चंडीगढ़ पंजाब विधानसभा चुनाव भले ही आधिकारिक तौर पर फरवरी 2027 में प्रस्तावित हों, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ती जा रही है कि राज्य में चुनाव तय समय से पहले, यानी नवंबर 2026 में भी कराए जा सकते हैं। इस संभावित राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए राज्य की प्रमुख पार्टियों ने अपनी-अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) जहां सरकार की उपलब्धियों के सहारे चुनावी अभियान की शुरुआत कर चुकी है, वहीं कांग्रेस भी संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय होती दिखाई दे रही है। पार्टी आलाकमान लगातार पंजाब इकाई के नेताओं के साथ बैठकें कर रणनीति बनाने में जुटा है। पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ सप्ताह से असामान्य गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में लगातार बैठकें, राज्य के नेताओं से फीडबैक लेना, संगठन की स्थिति की समीक्षा और चुनावी तैयारियों पर जोर इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी किसी भी संभावित राजनीतिक परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है। कांग्रेस ने शुरू की चुनावी तैयारी सूत्रों के अनुसार, पिछले लगभग एक महीने के दौरान कांग्रेस आलाकमान की ओर से पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ चार से पांच महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। इन बैठकों में संगठन की स्थिति, पार्टी की मजबूती और कमजोरियों, संभावित उम्मीदवारों, विभिन्न जिलों की राजनीतिक परिस्थितियों और चुनावी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई। इन बैठकों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधायक दल के नेता, पूर्व मंत्रियों और विभिन्न जिलों से जुड़े वरिष्ठ नेताओं की राय भी ली गई। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि पंजाब में कांग्रेस अभी भी एक मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में मौजूद है और यदि संगठन को एकजुट रखते हुए समय रहते तैयारी कर ली जाए तो आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया जा सकता है। तीन सदस्यीय ऑब्जर्वर कमेटी का गठन कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब की राजनीतिक स्थिति पर नजर रखने और संगठनात्मक तैयारियों का आकलन करने के लिए तीन सदस्यीय ऑब्जर्वर कमेटी का गठन भी किया है। इस समिति में पार्टी के वरिष्ठ नेता अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजनलाल जाधव को शामिल किया गया है। कमेटी की जिम्मेदारी राज्य के नेताओं से संवाद स्थापित करना, संगठन की गतिविधियों की निगरानी करना, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता का मूल्यांकन करना और आगामी चुनाव के लिए पार्टी को आवश्यक सुझाव देना है। माना जा रहा है कि यह समिति नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष और केंद्रीय नेतृत्व को सौंपेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पंजाब में कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। ऐसे में ऑब्जर्वर कमेटी का गठन संगठन को एकजुट रखने और संभावित मतभेदों को समय रहते दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जमीनी स्तर पर सक्रिय हुई पंजाब कांग्रेस पंजाब कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियों को लेकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। जिला और ब्लॉक स्तर पर बैठकों का दौर चल रहा है। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की रणनीति बनाई जा रही है ताकि चुनावी समय में पार्टी के पास प्रभावी नेटवर्क मौजूद रहे। सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में विभिन्न जनसंपर्क अभियानों की शुरुआत की जाएगी। गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों से संवाद स्थापित करने, मौजूदा सरकार के खिलाफ मुद्दों को उठाने और कांग्रेस की नीतियों को जनता तक पहुंचाने की योजना तैयार की जा रही है। इसके अलावा युवाओं, महिलाओं, किसानों और व्यापारियों जैसे विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जाने की भी तैयारी है। कांग्रेस का मानना है कि यदि जनता के बीच लगातार उपस्थिति बनाए रखी जाए तो पार्टी के पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है।  

क्या बदलने वाला है पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष? राहुल गांधी और खरगे से मुलाकात के बाद बढ़ी सियासी हलचल

अमृतसर  नई दिल्ली में राहुल गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में वीरवार को हुई कांग्रेस हाईकमान की बैठक में पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंगला की मौजूदगी ने सूबे में सियासी हलचल पैदा कर दी है।  दरअसल, इस बैठक में सभी प्रदेशों के प्रभारियों और अध्यक्षों को ही बुलाया गया था। इसी की चलते पंजाब के प्रभारी भूपेश बघेल और पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग भी दिल्ली पहुंचे हुए थे। पंजाब से सांसद एवं पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा राजस्थान के प्रभारी की हैसियत से बैठक में मौजूद थे मगर विजय इंदर सिंगला बैठक में क्यों और किस हैसियत से बुलाए गए थे, यह बैठक के दौरान पंजाब के कांग्रेसी नेताओं के लिए बड़ा सवाल बना रहा।   प्रदेश अध्यक्ष बदलने की अटकलें फिर तेज हाईकमान की बैठक में सिंगला की मौजूदगी से पंजाब के अध्यक्ष को बदलने की अटकलों को फिर से बल मिल गया है क्योंकि नए अध्यक्ष सिंगला का नाम ही सबसे ज्यादा चर्चा में है।  हालांकि पंजाब के प्रभारी बघेल हाईकमान के समक्ष चुनाव तक मौजूदा अध्यक्ष को बनाए रखने की बात पर अड़े हुए हैं मगर बैठक सिंगला की मौजूदगी कुछ और ही इशारा कर रही है। बैठक के दौरान राहुल गांधी और खरगे ने बघेल और वड़िंग से सूबे के मौजूदा राजनीतिक हालात पर चर्चा करते हुए विधानसभा तैयारियों के संदर्भ में फीडबैक लिया। पंजाब में खड़गे और राहुल के नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी कांग्रेस  पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने कहा है कि पंजाब में होने वाले आगामी चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़े जाएंगे।  अपनी भूमिका के बारे में वड़िंग ने कहा कि वह हमेशा से पार्टी के एक कार्यकर्ता रहे हैं और आगे भी कार्यकर्ता के रूप में ही पार्टी की सेवा करते रहेंगे। उन्होंने कहा, पंजाब में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है और अगली सरकार कांग्रेस की बनने जा रही है। यह पंजाब के हर कांग्रेसी का लक्ष्य है और हर कोई इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।  

कांग्रेस ने पंजाब चुनाव की तैयारियां तेज कीं, तीन पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से संगठन को मिलेगी मजबूती

चंडीगढ़  ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने पंजाब में वर्तमान राजनीतिक हालातों का जायजा लेने के लिए तीन ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं। कांग्रेस हाईकमान ने यह जिम्मेदारी अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजन लाल जाटव को सौंपीं है। जल्दी ही तीनों पंजाब का दौरा करेंगे। दरअसल, पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसके मद्देनजर कांग्रेस हाईकमान का फोकस पंजाब पर है।  कांग्रेस दो बार कर चुकी है चुनावी सर्वेक्षण हाईकमान दो बार पंजाब में अपना चुनावी सर्वेक्षण भी करवा चुका है मगर दोनों सर्वे में अंतर सामने आया। सर्वे में पंजाब के अध्यक्ष को बदलने के लिए भी अलग-अलग राय सामने आई। हाईकमान अब यह देखना चाहता है कि पंजाब में राजनीति के वर्तमान हालात क्या हैं और इन परिस्थितियों में कांग्रेस की स्थिति कितनी मजबूत है, पार्टी कहां कमजोर है और मतदाताओं का रुख कैसा है। ऑब्जर्वर तैयार करेंगे रिपोर्ट तीनों ऑब्जर्वर प्रदेश का दौरा कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेंगे, जिसे अलग-अलग टिप्पणियों के साथ हाईकमान को सौंपी जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद हाईकमान प्रदेश में अपनी चुनावी रणनीति को धार देगी।

एक मंच पर साथ, मैदान में आमने-सामने! कांग्रेस और ममता के रिश्तों पर उठे सवाल

 नई दिल्ली INDIA ब्लॉक की बैठक से एक तस्वीर आई है, जिसमें ममता बनर्जी और सोनिया गांधी गले मिल रही हैं. ममता बनर्जी का चेहरा सामने होने के कारण भाव का पता चल रहा है, लेकिन सोनिया गांधी के मन में क्या चल रहा है, कैमरे के सामने नहीं होने के कारण नहीं मालूम।  मीटिंग में ममता बनर्जी को सोनिया गांधी की ठीक बगल में सीट दी गई थी. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ बैठी हैं. मल्लिकार्जुन खड़गे के पास राहुल गांधी और अखिलेश यादव को सीट मिली थी. ममता बनर्जी के लिए मुस्कुराने का मौका सिर्फ उस हाल के अंदर था, जहां मीटिंग हो रही थी. बाहर तो जैसे बर्बादी की सुनामी आई हुई थी. पश्चिम बंगाल में राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे के बीच दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव से मिलने पहुंचे थे – और गौर करने वाली बात यह थी कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे।  ममता बनर्जी के चेहरे पर थोड़े सुकून के जो भाव थे, उसकी वजह कांग्रेस से मिल रहा सपोर्ट समझा जा सकता है. मुश्किल यह है कि ममता बनर्जी को कांग्रेस से सपोर्ट सिर्फ दिल्ली में ही मिल रहा है, पश्चिम बंगाल में नहीं. ऐसा क्यों? दिल्ली में दोस्ती, कोलकाता में दुश्मनी 2024 के आम चुनाव से पहले राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा पर निकले थे. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी के दाखिल होने से ठीक पहले ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के अकेले दम पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी. मतलब, कांग्रेस के साथ कोई चुनावी गठबंधन नहीं. लेकिन, इंडिया ब्लॉक छोड़ने जैसी कोई बात नहीं कही गई थी. नीतीश कुमार की तरह. तब राहुल गांधी के बिहार पहुंचने से पहले नीतीश कुमार महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे. चुनावों के दौरान ममता बनर्जी का व्यवहार भी नीतीश कुमार जैसा ही था. ममता बनर्जी का स्टैंड अघोषित था।  ममता बनर्जी ने अपने जानी सियासी दुश्मन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ गुजरात से लाकर पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान को मैदान में उतार दिया. अधीर रंजन चौधरी चुनाव हार गए, और कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी. कांग्रेस ने बंगाल में एक सीट भले खो दी, लेकिन बाकी राज्यों में 2014 और 2019 के मुकाबले बेहतरीन प्रदर्शन किया. हां, अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीत गए होते तो कांग्रेस का शतक पूरा हो गया होता. चुनावी गठबंधन की उम्मीद न होने के बावजूद कांग्रेस नेता ममता बनर्जी के मामले में हमलावर होने से परहेज करते देखे गए. ममता बनर्जी के व्यवहार में तो कोई तब्दीली नहीं आई, लेकिन राहुल गांधी को पूरा संयम बरतते देखा गया।  तृणमूल कांग्रेस ने भी 2019 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को पांच साल बाद कम ही सीटों पर समेट दिया. कांग्रेस की हार के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता भी बन गए. लेकिन, स्पीकर के चुनाव में कांग्रेस के विपक्ष की तरफ से अपना उम्मीदवार उतार देने पर ममता बनर्जी खफा हो गई।  तब ममता बनर्जी की नाराजगी दूर करने के लिए राहुल गांधी ने खुद फोन किया, और फिर वो मान भी गईं. बाद के दिनों में ममता बनर्जी अपनी जरूरत के हिसाब से इंडिया ब्लॉक से कभी बाहर तो कभी भीतर होने का एहसास दिलाती रहीं. और, पश्चिम बंगाल चुनाव आते आते कांग्रेस के लिए नो-एंट्री की फिर से घोषणा कर दी. लेकिन, उस स्थिति में भी ममता बनर्जी चाहती थीं कि कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने की पहल करे. हां, महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल के खिलाफ ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ डटकर खड़ी रहीं, और बीजेपी की केंद्र सरकार का बिल गिर गया।  ममता बनर्जी को भी अब ये तो समझ में आ गया है कि फिलहाल कांग्रेस के साथ मिलकर चलने में ही भलाई है, वरना पश्चिम बंगाल में तो जो हो रहा है, देश देख ही रहा है. कांग्रेस के साथ जो होना था, वह तो 2014 में ही हो गया था. जो कुछ बचा था, वह 2019 में हो गया. राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए. अगर वायनाड से चुनाव नहीं लड़े होते तो लोकसभा से दूर ही रहना पड़ा होता. कुछ दिनों के लिए तो संसद की सदस्यता भी गंवानी पड़ी थी।  दिल्ली में तो नहीं, लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव कैंपेन के दौरान राहुल गांधी ने कुछ दिन के लिए अपनी सदस्यता चले जाने के साथ साथ अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों का जोर देकर जिक्र किया, और पूछा – क्या ममता बनर्जी के साथ ये सब होता है? इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से पहले दिल्ली पहुंचते ही ममता बनर्जी ने आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की. ममता बनर्जी हमेशा ही अरविंद केजरीवाल को विपक्षी खेमे में साथ रखने की पक्षधर रही हैं. विपक्ष की बैठकों में भी ममता बनर्जी को अरविंद केजरीवाल की पैरवी करते देखा गया है. लेकिन, राहुल गांधी का व्यवहार ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से एक जैसा ही देखने को मिला है. 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव और हालिया पश्चिम बंगाल चुनाव मिसाल हैं – राहुल गांधी ममता बनर्जी के खिलाफ उन्हीं मुद्दों के साथ हमलावर दिखे, जिन मुद्दों के साथ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ थे।  बंगाल में कांग्रेस बनाम तृणमूल कांग्रेस जैसे दिल्ली चुनाव में राहुल गांधी ने अरविंद केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और शीशमहल के बहाने हमला बोला था, पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ही उनके निशाने पर देखी गईं. पश्चिम बंगाल में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार और बीजेपी की मददगार होने का भी इल्जाम लगाया था।  2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तो राहुल गांधी ने अधीर रंजन चौधरी को भेजा ही खास मकसद से था. तब अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस और विपक्ष के नेता हुआ करते थे. लेकिन, चुनाव से पहले उनको पश्चिम बंगाल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था. और, इस बार के चुनाव में भी बंगाल यूनिट को खुली छूट दी गई थी. अधीर रंजन को तो पश्चिम बंगाल अध्यक्ष पद से पहले ही हटा दिया … Read more

Congress Crisis: ‘पार्टी BJP से नहीं, अंदरूनी कलह से हारती है’, वरिष्ठ नेता का बड़ा बयान

भोपाल  मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने हरदा में कार्यकर्ताओं के बीच संगठन को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि 2028 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए आखिरी मौका साबित हो सकता है, इसलिए पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर संगठन के लिए त्याग और समर्पण दिखाना होगा।कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अजय सिंह ने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भी खुलकर गिनाई। उन्होंने कहा कि चुनाव आते ही पार्टी में हर कोई दावेदार बन जाता है या फिर किसी गुट का समर्थक बनकर खड़ा हो जाता है। यही वजह है कि कांग्रेस कई बार भाजपा से नहीं, बल्कि अपनी ही अंदरूनी खींचतान से चुनाव हार जाती है। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि कांग्रेस 2028 में सत्ता में वापसी नहीं कर पाई, तो पार्टी के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए अभी से संगठन को मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर की गई टिप्पणी को लेकर भी अजय सिंह ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुरूप भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए और राजनीतिक विरोध के बावजूद मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। इस दौरान अजय सिंह ने केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं, जबकि कांग्रेस की राजनीति हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति के हितों को केंद्र में रखकर चलती रही है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से राहुल गांधी के संघर्ष और जनसरोकारों से प्रेरणा लेने की अपील की। कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं के बीच हल्की-फुल्की राजनीतिक नोकझोंक भी देखने को मिली। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पूर्व नपाध्यक्ष सुरेंद्र जैन ने कहा कि भाजपा में रहते हुए वे कांग्रेस की एकजुटता तोड़कर चुनावी लाभ दिलाते थे। इस पर कांग्रेस नेता हेमंत टाले ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि अब वही रणनीति भाजपा के खिलाफ अपनाने का समय आ गया है। कुल मिलाकर हरदा का यह संवाद कार्यक्रम कांग्रेस के भीतर एकजुटता, संगठनात्मक मजबूती और 2028 की चुनावी तैयारी को लेकर गंभीर संदेश देने वाला साबित हुआ, जहां अजय सिंह ने साफ कर दिया कि सत्ता में वापसी का रास्ता पहले पार्टी के अंदर से होकर गुजरता है।

बेरोजगारी और नशे के मुद्दे पर युवाओं को साधने में जुटी कांग्रेस, 2027 चुनाव की तैयारी तेज

 चंडीगढ़  पंजाब निकाय चुनाव में इस बार कांग्रेस ने आप के कड़ी टक्कर देते हुए सीटों के मामले में दूसरा स्थान हासिल किया है। इन चुनावों को सभी पार्टी विधानसभा-2027 का सेमीफाइनल के तौर पर लेते हुए तैयारी में जुटी थी। पंजाब में युवाओं का वोट जीत-हार में काफी अहम भूमिका अदा करेगा। सूबे में इस समय युवाओं के बीच बेरोजगारी, नशा, पेपर लीक और क्वालिटी एजुकेशन जैसे अहम मुद्दे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने युवाओं की नब्ज को टटोलते हुए युवा वोटर को लेकर खास मेनीफेस्ट तैयार करना शुरु कर दिया है। कांग्रेस की चुनावी टीम इस बार पहली बार वोटर और यूथ प्रोफेशनल पर खास तौर पर फोकस कर रही है। विधानसभा चुनावों में जेन-जी का वोट हार जीत का फैसला करने में अहम भूमिका निभाएगा। पंजाब में इस समय युवाओं से जुड़े मुद्दे सबसे अधिक चर्चा में हैं। विदेश भाग रहा पंजाब का यूथ पंजाब का यूथ लगातार विदेश की ओर भाग रहा है, लेकिन वहां भी अब पंजाब के युवाओं को पहले जैसे मौके नहीं मिल पा रहे हैं। कांग्रेस की ओर से जेन-जी को लेकर जल्द ही खास जागरुकता अभियान चलाया जाएगा,जिसे लेकर पार्टी की ओर से जमीनी स्तर पर तैयारियां शुरु कर दी गई हैं। युवाओं को पार्टी के साथ जोड़ने के लिए कांग्रेस का यूथ विंग खास तौर से अब कालेज और यूनिवर्सिटी स्तर के वोटर पर फोकस कर रहा है। 2022 चुनावों से ली सीख 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी ने भी यूथ वोटर के दम पर सरकार बनाई थी। पंजाब में इस समय बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। जिसे कांग्रेस आगामी चुनाव में भुनाने की कोशिश में है। मोहाली में आयोजित एक क्रिकेट टूर्नामेंट में पहुंचा पंजाब कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने कहा कि कांग्रेस की ओर से एक प्रोग्राम तैयार किया जा रहा है जिसमें युवाओं की भागदारी सुनिश्चित की जा रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से भी युवाओं की समस्याओं को उठाने के साथ ही उनके समाधान को लेकर काम करने के लिए कहा गया है ,इसी दिशा में अब पंजाब कांग्रेस युवाओं तक पहुंचकर उनके सुझाव लेगी और उन्हें सरकार आने पर लागू करेगी। वडिंग ने कहा कि अगले विधानसभा चुनाव में युवाओं की भागेदारी ही सबसे महत्वपूर्ण होगी और कांग्रेस हमेश से ही युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबध है। पंजाब में बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से दोगुणा पंजाब में बेरोजगारी का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से करीब दोगुणा है।15 से 29 वर्ष की उम्र में पंजाब में बेरोजगारी 17 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। जबिक राष्ट्रीय बेरोजगारी औसत का आंकड़ा 9.9 प्रतिशत है। प्रदेश में शिक्षित युवाओं को भे रोजगार नहीं मिल पा रहा है। जिसके कारण युवाओं को प्रदेश से बाहर ही नहीं विदेशों की तरफ बेहतर करियर के लिए जाना पड़ रहा है। लेकिन वहां भी पंजाब के युवाओं को बेहतर रोजगार नहीं मिल पा रहे हैं। दूसरी तरफ पंजाब में लोगों के खर्च देश में औसत खर्च से अधिक हैं। सेकेंडरी एजुकेशन का ग्राफ पंजाब में 49 प्रतिशत है,जबिक देश में यह ग्राफ 42.4 प्रतिशत है। ग्रेजुएट का प्रतिशत पंजाब में 8.7 प्रतिशत जबकि राष्ट्रीय औसत 10.8 प्रतिशत है। पोस्ट ग्रेजुएशन स्तर पर पंजाब में औसत 2.8 प्रतिशत जबकि राष्ट्रीय औसत 3.3 प्रतिशत है।

राज्यसभा सीट पर कांटे की टक्कर, कांग्रेस उम्मीदवार लगभग तय लेकिन BJP की रणनीति ने बढ़ाई चिंता

भोपाल कांग्रेस मध्यप्रदेश से राज्यसभा की अपनी एक सीट बचाने की जद्दोजहद में लगी हुई है। वर्तमान सांसद दिग्विजय सिंह के दोबारा राज्यसभा जाने से इंकार करने के बाद से उम्मीदवार पर सहमति बनाने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस में दो स्तरों पर जद्दोजहद जारी है, पहला उम्मीदवार के नाम पर आम सहमति बनाना और दूसरा क्रॉस वोटिंग को रोकना। प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने पहले प्रदेश के दिग्गज नेताओं से रायशुमारी की, इसके बाद 5 मई को दिल्ली में हुई बैठक में उम्मीदवार का फैसला हो गया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार पार्टी में राज्यसभा उम्मीदवार तय हो गया है। पार्टी, मध्यप्रदेश के ही सर्वस्वीकार्य और व्यापक जनाधार वाले नेता को आगे करेगी। राज्यसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद प्रदेश कांग्रेस में सक्रियता बढ़ी है। संभावित उम्मीदवार के लिए जल्द बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें उम्मीदवारों नामों पर चर्चा कर प्रस्ताव एआइसीसी को भेजे जाएंगे। कांग्रेस में सर्वसम्मति बनाने और क्रॉस वोटिंग रोकने पर पूरा जोर कांग्रेस खेमे में अभी भी उम्मीदवार के नामों को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। इतना ही नहीं, बीजेपी भी उनका खेल बिगाड़ने की कवायद में जुटी हुई है। चर्चा यहां तक है कि कांग्रेस की सीट हासिल करने के लिए बीजेपी डमी प्रत्याशी उतार सकती है। सिर्फ 4 विधायक ज्यादा, बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए दरअसल कांग्रेस के पास अपनी राज्यसभा सीट बचाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या बल तो है पर वरिष्ठ नेताओं को इसमें सेंधमारी का डर सता रहा है। मध्यप्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीटें हैं। एक सदस्य को राज्यसभा भेजने के लिए 58 विधायक जरूरी हैं। बीना से विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल और मुकेश मल्होत्रा के वोटिंग अधिकार निलंबन व राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस के विधायक घट गए हैं। पार्टी के पास वोट डालने वाले अब 62 विधायक ही बचे हैं जोकि एक सदस्य को जिताने की जरूरी संख्या से चार ही अधिक हैं। क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हरियाणा-उड़ीसा में क्रॉस वोटिंग और बिहार में विधायकों की अनुपस्थिति के कारण कांग्रेस को झटका लग चुका है। अब मप्र में भी पार्टी को इसका डर सता रहा है। क्रॉस वोटिंग के कारण कांग्रेस अपनी सीट गंवा सकती है, इसलिए पार्टी नेता अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं।

मध्यप्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस अलर्ट मोड पर, विधायकों की निगरानी तेज

भोपाल प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटें इसी वर्ष जून में रिक्त हो रही हैं। इन सीटों पर निर्वाचन के लिए अधिसूचना शीघ्र जारी होने की आशा है। चुनाव नजदीक आते ही क्राॅस वोटिंग को लेकर कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है। कारण, चार विधायक भी खिसक गए तो कांग्रेस के हाथ से सीट निकल जाएगी। क्रॉस वोटिंग को लेकर मंथन बता दें कि विधायकों के संख्या बल की दृष्टि से दो सीटें भाजपा को मिलनी तय हैं। बची एक सीट वर्तमान की स्थिति में कांग्रेस के खाते में जाएगी, पर कुछ राज्यों में कांग्रेस विधायकों द्वारा क्राॅस वोटिंग या अनुपस्थित रहने की वजह से मप्र में भी पार्टी को डर सता रहा है। पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों ने गुपचुप तरीके से ऐसे विधायकों पर नजर रखना शुरू कर दिया है, जो क्रास वोटिंग कर सकते हैं। विधायकों की अनुपस्थिति बनी चुनौती दतिया से विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता शून्य किए जाने के बाद अब कांग्रेस के 64 सदस्य विधानसभा में हैं। श्योपुर जिले के विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता शून्य करने संबंधी निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक तो लगा दी है, लेकिन वह चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे। दलबदलुओं पर नजर बीना से कांग्रेस के टिकट पर जीतीं निर्मला सप्रे के विरुद्ध नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दलबदल विरोधी कानून के अंतर्गत कार्रवाई के लिए हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी, जिस पर सुनवाई चल रही है।सप्रे वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद कई बार भाजपा के मंच पर नजर आ चुकी हैं, हालांकि वह कई बार कह चुकी हैं कि कांग्रेस से त्याग पत्र नहीं दिया है। वह पार्टी में ही हैं। ऐसे में कांग्रेस इस वोट को अपने पक्ष में नहीं मान रही है। हालांकि, पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाल ही में प्रदेश पदाधिकारियों ने सप्रे से बात कर पार्टी के पक्ष में मतदान करने का अनुरोध किया है। इस तरह मल्होत्रा और सप्रे को हटा दें तो कांग्रेस के पास चार अतिरिक्त वोट ही हैं। इस कारण पार्टी का डर बढ़ा हुआ है।