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‘हिंदू अनुष्ठान रोके जाएं’ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दरगाह मैनेजमेंट को क्या मिला जवाब?

कर्नाटक
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 फरवरी) को कर्नाटक स्थित अलंद लाडले मशाइक दरगाह प्रबंधन की उस अर्जी पर सुनवाई करने से मना कर दिया जिसमें जिसमें दरगाह परिसर में हिंदू महाशिवरात्रि पूजा और दूसरे हिंदू रीति-रिवाजों पर रोक लगाने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। दरगाह मैनेजमेंट ने भारत के संविधान के आर्टिकल 32 के तहत अर्जी दी थी, जो उन पार्टियों को राहत के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की इजाज़त देता है जिनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। दरगाह प्रबंधन याचिका में दावा किया था कि दरगाह के धार्मिक स्वरूप को बदलने के लिए हर साल रणनीतिक तरीके से पूजा की अनुमति लेने की कोशिश की जा रही है। प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर दरगाह के मूल धार्मिक चरित्र को बनाए रखने की भी मांग की थी।

हालांकि, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। इससे पहले मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी टिप्पणी की थी कि हर मामला सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट लाना उचित नहीं है, क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि हाई कोर्ट प्रभावी नहीं हैं। जब कल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची के सामने यह मामला आया, तो इस बेंच ने यह भी सवाल उठाया था कि पहले हाई कोर्ट जाने के बजाय आर्टिकल 32 की पिटीशन क्यों फाइल की गई।

यह विवाद उस दरगाह से जुड़ा है जो 14वीं सदी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी (लाडले मशाइक) और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से संबंधित मानी जाती है। दरगाह परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग नाम से पहचानी जाने वाली एक संरचना भी मौजूद बताई जाती है। ऐतिहासिक रूप से इस स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजा-अर्चना करते रहे हैं, हालांकि 2022 में यहां पूजा अधिकार को लेकर तनाव की स्थिति बनी थी।

गौरतलब है कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2025 में 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पर पूजा की अनुमति दी थी, जो भारी सुरक्षा के बीच सम्पन्न हुई थी। इससे पहले भी कोर्ट के आदेश पर सीमित संख्या में पूजा कराई गई थी। दरगाह प्रबंधन का कहना था कि बार-बार अंतरिम आदेश लेकर धार्मिक स्थल के स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है, जो Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 के खिलाफ हो सकता है। इस कानून के तहत 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बनाए रखना जरूरी माना गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद इस मामले में आगे की कानूनी लड़ाई हाई कोर्ट में होने की संभावना जताई जा रही है। यह मामला धार्मिक अधिकार, ऐतिहासिक दावों और कानून के संतुलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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