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नवागढ़ की गुफाओं से फोर्ट विलियम तक, जानें शहीद बख्तर साय और मुंडल सिंह के बलिदान की गौरवशाली कहानी

गुमला
आज 4 अप्रैल को बख्तर साय व मुंडल सिंह का शहादत दिवस है. देश की आजादी में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है. ऐसे तो गुमला में कई वीर पैदा हुए, जिन्होंने इस्ट इंडिया कंपनी (अंग्रेज) से लोहा लिया. इतना ही नहीं, वो अपनी साहस, शक्ति, सूझबूझ से अंग्रेजों को पराजित भी किया. इन्हीं वीर सपूतों में गुमला जिला स्थित रायडीह प्रखंड के बख्तर साय व मुंडल सिंह हैं. जिन्होंने ना इस्ट इंडिया कंपनी का विरोध किया, बल्कि उन्हें छोटानागपुर क्षेत्र में घुसने का सबक भी सिखाया. इस लड़ाई में दोनों शहीद हो गए, लेकिन आज भी गुमला जिले में इन दोनों वीर सपूतों को याद किया जाता है. इन दोनों वीरों की वीरता की कहानी आज भी रायडीह प्रखंड के वादियों में गूंजती है और लोगों के जुबान से इन सपूतों का वीरभाव सुनने को मिलता है. इन दोनों ने जिस बहादुरी से अंग्रेजों को खदेड़ा है. यह इस क्षेत्र के लिए गर्व की बात है. आज वे हमारे बीच नहीं है, लेकिन बख्तर साय व मुंडल सिंह की पूजा आज भी गुमला जिले में होती है. अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान बख्तर व मुंडल ने नवागढ़ क्षेत्र की गुफाओं को अपना घर बनाया. यह गुफा आज भी इस क्षेत्र में साक्षात है. जहां दोनों सेनानी रहते थे. जिस तालाब का पानी पीते थे. वह तालाब भी है. युद्ध के दौरान यह तालाब रक्त से भर गया था. इसलिए इसे रक्त तालाब भी कहा जाता है.  शिवलिंग जहां दोनों पूजा करते थे. वह भी नवागढ़ में है. गढ़पहाड़ जहां युद्ध हुआ था. वह पहाड़ आज भी युद्ध की कहानी कह रही है. वीर सेनानियों की यह भूमि आज भी अंग्रेजों के पराजय की कहानी बयां करती है.

बख्तर साय ने हीरा राम का सिर काट कर अंग्रेजों को भेजा था
बख्तर साय नवागढ़ परगना (वर्तमान में रायडीह प्रखंड) के जागीरदार थे. उन्होंने इस्ट इंडिया कंपनी को खुली चुनौती दी. उनसे लोहा ले उसे पराजय का मुंह दिखाया. इस्ट इंडिया कंपनी की टुकड़ी बख्तर साय के सामने टिक नहीं सकी और उन्हें हार का सामना करना पड़ा. पराजय के बाद अंग्रेज छोटानागपुर के महाराजा ह्रदयनाथ शाहदेव से संधि किये. उसके बाद अंग्रेज 12 हजार रुपये टैक्स वसूली करने लगे. उस समय अंग्रेज टैक्स वसूली के लिए कड़ा रूख अपना लिये थे. जागीरदार व रैयत पैसा दे देकर परेशान हो गये थे. अंग्रेजों से संधि के बाद महाराजा ह्रदयनाथ शाहदेव ने हीरा राम को टैक्स वसूली के लिए नवागढ़ भेजा. बख्तर साय ने हीरा राम का सिर काट कर महाराजा को भेजवा दिया. महाराजा इससे अत्यंत क्रोधित हुए. इस्ट इंडिया कंपनी को इसकी सूचना दी गयी. 11 फरवरी 1812 को रामगढ़ मजिस्ट्रेट ने लेफ्टीनेंट एचओ डोनेल के नेतृत्व में हजारीबाग के सैन्य टुकड़ी को नवागढ़ के जागीरदार को पकड़ने के लिए भेजा. इसी बीच रामगढ़ बटालियन के कमांडेंट आर गार्ट ने छोटानागपुर के बारवे (वर्तमान में रायडीह, चैनपुर व डुमरी), जशपुर व सरगुजा के राजा को पकड़ने के लिए एक पत्र लिखा. साथ ही पूरे क्षेत्र की नाकेबंदी करने की सहायता मांगी. जशपुर राजा के साथ आर गार्ट का अच्छा संबंध था. इसका फायदा उठाते हुए लेफ्टीनेंट एचओ डोनेल ने हजारों सैनिकों के साथ मिलकर नवागढ़ को घेर लिया. अंग्रेजों के मंसूबों की जानकारी पनारी परगना के जागीरदार मुंडल सिंह को हो गयी थी. वे बख्तर साय की सहायता के लिए नवागढ़ पहुंच गए. दोनों ने मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया.

अंग्रेजों की कूटनीति में दोनों वीर फंसकर शहीद हुए थे
नवागढ़ में 1812 के आसपास घना जंगल था. ऊंचे ऊंचे पहाड़ थे. अंग्रेजों को मुंडल सिंह व बख्तर साय तक पहुंचने में परेशानी होने लगी. अंग्रेजों ने एक विशेष रणनीति के तहत नवागढ़ को चारों ओर से घेर लिया. बख्तर साय व मुंडल सिंह जगह बदल कर आरागढ़ा के गुफा में रहने लगे. अंग्रेजों को जब इसकी जानकारी हुई, तो वे गुफा तक जाने वाली नदी की धारा के पानी को गंदा कर दिया. जिससे बख्तर साय व मुंडल सिंह अपने सैनिकों के साथ पानी पी न सके. अंग्रेजों की इस कूटनीति चाल के बाद बख्तर व मुंडल जशपुर (छत्तीसगढ़ राज्य) के राजा रणजीत सिंह के यहां गए. जहां से दूसरे स्थान पर निकलने के कारण दोनों 23 मार्च 1812 को पकड़े गए. 4 अप्रैल 1812 को दोनों को कलकत्ता के फोर्ट विलियम में फांसी की सजा दे दी गई थी.

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