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ताराचंडी धाम तक पहुंच रही फूलों की खुशबू, सरकारी मदद की उठी मांग

 गढ़वा

जहां भीषण गर्मी और 43 डिग्री के टॉर्चर से आम जनजीवन बेहाल है और खेतों में फसलें दम तोड़ रही हैं, वहीं झारखंड के गढ़वा जिले के एक किसान ने अपनी मेहनत से गुल खिला दिए हैं. मझिआंव नगर पंचायत के पृथ्वी चक्र गढ़ौटा गांव के रहने वाले रमाशंकर माली फूलों की खेती के जरिए न केवल अपनी किस्मत बदल रहे हैं, बल्कि आज पूरे इलाके के लिए मिसाल बन गए हैं.

ताराचंडी धाम तक पहुंच रही खुशबू
रमाशंकर के खेतों की खुशबू सात समंदर पार तो नहीं, लेकिन पड़ोसी राज्य बिहार के प्रसिद्ध मां ताराचंडी धाम (सासाराम) तक जरूर पहुंच रही है. रमाशंकर ने बताया कि हर दूसरे दिन करीब 400 से 500 गेंदे के फूलों की मालाएं बिहार के सासाराम भेजी जाती हैं. साधन न होने पर रमाशंकर खुद बाइक से सासाराम तक फूल पहुंचाने जाते हैं जिससे कि भक्तों को ताजे फूल मिल सकें.

पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई नई राह
पारंपरिक खेती छोड़ फूलों की राह चुनने वाले रमाशंकर ने बताते हैं  कि यह मुनाफे का सौदा है. एक बीघा खेत में बीज, खाद और सिंचाई मिलाकर करीब 25,000 रुपये खर्च होते हैं. सीजन के अंत तक करीब 2 लाख रुपये की आमदनी हो जाती है.

गर्मी में फूलों को बचाना बड़ी चुनौती
रमाशंकर कहते हैं कि 43 डिग्री तापमान में फूलों को बचाना आसान नहीं है. पौधों को हर दो दिन में सींचना पड़ता है जिससे कि वे मुरझाएं नहीं.

सरकारी सहायता की कमी
रमाशंकर अपने तीन बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च इसी खेती से चला रहे हैं. हालांकि, उन्हें मलाल है कि इतनी मेहनत के बाद भी अब तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली. इधर क्षेत्र के अन्य किसान और करुआ कला के फूल उत्पादक बृजेश तिवारी भी लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि गढ़वा को ‘बागवानी मिशन’ से जोड़ा जाए. किसानों का कहना है कि गढ़वा की भौगोलिक स्थिति (बिहार, यूपी और छत्तीसगढ़ की सीमा) इसे फूलों के व्यापार का बड़ा केंद्र बना सकती है, बस जरूरत है तो सरकार के थोड़े से सहयोग की. रामाशंकर का कहना है कि अगर सरकार आर्थिक या तकनीकी मदद दे, तो हम इस काम को और बड़े स्तर पर ले जा सकते हैं. पारंपरिक खेती के मुकाबले फूलों की खेती ने मुझे पहचान और बेहतर आजीविका दी है. 

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