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बठिंडा में ई-रिक्शा चालकों की बढ़ी परेशानी, ऐप के जरिए बीच रास्ते रुक रहे वाहन

बठिंडा.

शहर में ई-रिक्शा चालकों की परेशानी का एक नया और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। अब तक चोरी, बैटरी और दुर्घटनाओं जैसी समस्याओं से जूझ रहे ई-रिक्शा चालकों के सामने एक नया खतरा खड़ा हो गया है। सोमवार देर रात बठिंडा के रेलवे रोड नजदीक अस्पताल बाजार के पास एक ई-रिक्शा को अज्ञात व्यक्ति ने मोबाइल एप के माध्यम से बंद कर दिया।

ई-रिक्शा संचालक रेलवे स्टेशन के बाहर से सवारी लेकर जा रहा था। रेलवे स्टेशन से 500 मीटर की दूरी पर पहुंचने पर ई-रिक्शा अचानक बंद हो गया। जिसके बाद सवारी उतरकर दूसरे आटो पर चली गई, जबकि ई-रिक्शा चालक करीब दो घंटे तक परेशान होता रहा। इतना ही परेशान ई-रिक्शा संचालक ने बताया कुछ ही देर पहले हनुमान चौंक के पास भी एक अन्य ई-रिक्शा भी इसी तरह अचानक बंद हो गया। दोनों मामलों में चालक करीब दो घंटे तक परेशान रहे और उन्हें समझ नहीं आया कि आखिर रिक्शा अचानक क्यों बंद हो गया।

एप डाउनलोड कर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की
घटना के दौरान वहां से गुजर रहे नौजवान वेलफेयर सोसायटी के सदस्यों ने भीड़ देखकर कारण जानने का प्रयास किया। संस्था के सदस्यों ने मोबाइल पर संबंधित एप डाउनलोड कर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की, जिसके बाद ई-रिक्शा दोबारा चालू हो गया। बताया जा रहा है कि बठिंडा में इस तरह की यह पहली घटना है, जिसने ई-रिक्शा चालकों के साथ-साथ आम लोगों की भी चिंता बढ़ा दी है। नौजवान वेलफेयर सोसायटी के प्रधान सोनू माहेश्वरी ने कहा कि कुछ शरारती लोग तकनीक का गलत इस्तेमाल कर गरीब ई-रिक्शा चालकों को परेशान कर रहे हैं। उन्होंने प्रशासन से ऐसे लोगों की पहचान कर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।

कैसे मोबाइल एप से बंद हो जाता है ई-रिक्शा?
विशेषज्ञों के अनुसार आजकल बाजार में आने वाले कई आधुनिक ई-रिक्शा स्मार्ट कंट्रोल सिस्टम से लैस होते हैं। इनमें वाहन के कंट्रोलर या जीपीएस माड्यूल को मोबाइल एप से जोड़ा जाता है। अलग-अलग कंपनियां अपनी-अपनी आधिकारिक एप उपलब्ध कराती हैं, जिनके जरिए वाहन की लोकेशन देखी जा सकती है, बैटरी की स्थिति जानी जा सकती है और जरूरत पड़ने पर वाहन को लाक या अनलाक भी किया जा सकता है। यदि किसी ई-रिक्शा का कंट्रोल सिस्टम असुरक्षित तरीके से कान्फ़िगर किया गया हो, डिफाल्ट पासवर्ड बदला न गया हो या किसी अनधिकृत व्यक्ति को उस वाहन तक डिजिटल पहुंच मिल जाए, तो वह एप के माध्यम से वाहन को लाक कर सकता है। हालांकि यह सुविधा मूल रूप से सुरक्षा के लिए बनाई गई है, ताकि चोरी होने पर वाहन को रोका जा सके, लेकिन इसका दुरुपयोग होने की आशंका भी रहती है।

कौन-सी एप होती है?
ई-रिक्शा को बंद करने के लिए कोई एक सार्वभौमिक मोबाइल एप नहीं होती। प्रत्येक निर्माता या कंट्रोलर कंपनी अपनी अलग आधिकारिक एप उपलब्ध कराती है। कुछ वाहनों में जीपीएस ट्रैकिंग कंपनियों की एप, जबकि कुछ में ब्लूटूथ आधारित कंट्रोल एप काम करती हैं। इसलिए किसी भी घटना में यह जानना जरूरी होता है कि संबंधित ई-रिक्शा में किस कंपनी का कंट्रोलर या स्मार्ट लाक सिस्टम लगा है। उसी की आधिकारिक एप से अधिकृत उपयोगकर्ता वाहन को अनलाक कर सकता है।

यदि अचानक बंद हो जाए ई-रिक्शा तो क्या करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है। सबसे पहले वाहन की बैटरी, मुख्य स्विच और फ्यूज की जांच करें। यदि सब कुछ सामान्य है और वाहन फिर भी चालू नहीं हो रहा, तो यह संभव है कि वह डिजिटल लाक मोड में चला गया हो। ऐसी स्थिति में वाहन के निर्माता, डीलर या अधिकृत सर्विस सेंटर से संपर्क करें। यदि आपके वाहन में स्मार्ट कंट्रोल एप का उपयोग होता है, तो उसी आधिकारिक एप में लाग-इन कर अधिकृत खाते से वाहन को अनलाक किया जा सकता है। यदि स्वयं प्रक्रिया की जानकारी न हो, तो किसी प्रशिक्षित तकनीशियन की मदद लें। किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा बताई गई एप डाउनलोड करने या अपना ओटीपी और पासवर्ड साझा करने से बचें।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान –

  • ई-रिक्शा खरीदने के बाद डिफाल्ट पासवर्ड तुरंत बदलें।
  • वाहन से जुड़ी मोबाइल एप केवल मालिक के मोबाइल में ही रखें।
  • ओटीपी, यूजर आईडी या पासवर्ड किसी से साझा न करें।
  • समय-समय पर एप और वाहन का साफ्टवेयर अपडेट कराते रहें।
  • अनजान व्यक्ति की वजह से वाहन बंद होने का संदेह हो, तो तुरंत पुलिस और डीलर को सूचना दें।
  • सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी अजनबी को वाहन का क्यूआर कोड, कंट्रोलर नंबर या डिजिटल जानकारी न दिखाएं।

प्रशासन और कंपनियों की भी बढ़ी जिम्मेदारी
तकनीकी जानकारों का मानना है कि यदि ऐसे मामले बढ़ते हैं, तो निर्माता कंपनियों को अपने डिजिटल सुरक्षा तंत्र को और मजबूत बनाना होगा। दो-स्तरीय सुरक्षा (टू-फैक्टर आथेंटिकेशन), मजबूत पासवर्ड प्रणाली और मालिक की पहचान के बिना वाहन लाक या अनलाक न होने जैसी सुविधाएं अनिवार्य की जानी चाहिए।
वहीं पुलिस और साइबर सेल को भी ऐसे मामलों की जांच कर यह पता लगाना होगा कि कहीं कोई व्यक्ति तकनीकी खामी का फायदा उठाकर गरीब चालकों को निशाना तो नहीं बना रहा।

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