चंडीगढ़
पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। इस बीच इस गठबंधन को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। सूत्रों की मानें तो बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है। इस चर्चा में सीटों के बंटवारे के साथ-साथ अकाली दल से अलग हुए गुट अकाली दल (पुनर सुरजीत) को भी गठबंधन में शामिल करने के बात सामने आई है। सूत्रों की मानें तो अगर दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन होता है तो बीजेपी को आगामी विधानसभा चुनाव में लगभग 45 सीटें मिल सकती हैं। पिछले गठबंधन के दौरान बीजेपी को सिर्फ 23 सीटें मिली थी। हालांकि, गठबंधन को लेकर अंतिम फैसला और सीटों के बंटवारे पर अभी सहमति नहीं बना पाई है।
अकाली दल खुद को बनाए रखना चाहता है सीनियर पार्टनर
अकाली दल अधिक सीटें देने के बावजूद गठबंधन में अपनी भूमिका को लेकर स्पष्ट है। वह खुद को गठबंधन का 'सीनियर पार्टनर' बनाए रखना चाहता है। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे के साथ राजनीतिक नेतृत्व और गठबंधन में हिस्सेदारी का सवाल भी महत्वपूर्ण रहने वाला है। इसके साथी बीजेपी और अकाली दल के बीच बातचीत का दूसरा अहम मुद्दा SAD (पुनर सुरजीत) गुट को गठबंधन में शामिल करना है। बीजेपी के कुछ शीर्ष नेता इस गुट को प्रस्तावित गठबंधन का हिस्सा बनाने के पक्ष में बताए जा रहे हैं। हालांकि, अकाली दल इस गुट को सीटें देने के सवाल पर हिचकिचा रहा है।
अकाली दल रहेगा बड़े भाई की भूमिका में
सूत्रों के मुताबिक, संभावित गठबंधन में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहेगा. अगर गठबंधन चुनाव जीतता है, तो मुख्यमंत्री पद पर भी अकाली दल का मजबूत दावा हो सकता है. दूसरी ओर, बीजेपी उन सीटों पर ज्यादा जोर दे रही है, जहां पिछले चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहतर रहा था।
हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पंजाब में एनडीए की सरकार बनने संबंधी बयान के बाद गठबंधन की चर्चाओं को और बल मिला है. अब तक बीजेपी नेता पंजाब में अपनी पार्टी की सरकार बनाने का दावा करते रहे हैं. एनडीए सरकार का जिक्र दोनों दलों के संभावित साथ आने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी के आंतरिक आकलन में भी यह बात सामने आई है कि अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से गठबंधन की स्थिति मजबूत हो सकती है. हालांकि, 80 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा बीजेपी के आंतरिक आकलन पर आधारित है. इसे चुनावी नतीजा या स्वतंत्र अनुमान नहीं माना जा सकता।
वोटों का गणित क्यों अहम?
दोनों दलों के साथ आने के पीछे उनके वोट बैंक और क्षेत्रीय पकड़ को अहम माना जा रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पंजाब में करीब 25 लाख वोट यानी 18.56 फीसदी वोट मिले थे. वहीं, अकाली दल को लगभग 18 लाख वोट यानी 13.42 फीसदी वोट मिले. दोनों के वोट जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 43 लाख और कुल वोट प्रतिशत लगभग 32 फीसदी बैठता है।
2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को करीब 28.61 लाख वोट यानी 18.38 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को लगभग 12 लाख वोट यानी 8 फीसदी वोट मिले थे. दोनों का संयुक्त आंकड़ा करीब 40 से 41 लाख वोट तक पहुंचता है।
दूसरी तरफ, 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) ने 42 फीसदी वोट हासिल कर 92 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को 22.98 फीसदी वोट मिले थे. वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में AAP का वोट प्रतिशत घटकर 26.30 फीसदी रह गया, जबकि कांग्रेस को 26.02 फीसदी वोट मिले।
बीजेपी नेताओं का मानना है कि वोटों के बदलते समीकरण में अकाली दल के साथ गठबंधन AAP और कांग्रेस को चुनौती दे सकता है. हालांकि, अलग-अलग चुनावों में मिले वोटों को सीधे जोड़कर विधानसभा सीटों का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
45 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी आगे रही
2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों को बीजेपी अपने पक्ष में बता रही है. पार्टी को 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी, जबकि छह सीटों पर वह दूसरे और 16 सीटों पर तीसरे स्थान पर रही थी. कुल 45 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी अकाली दल से आगे रही।
वहीं, अकाली दल नौ विधानसभा क्षेत्रों में पहले, पांच में दूसरे और पांच में तीसरे स्थान पर रहा था. बीजेपी का तर्क है कि अगर दोनों दल साथ चुनाव लड़ते, तो कई सीटों पर मुकाबले की तस्वीर अलग हो सकती थी।
पुराने गठबंधन के दौरान बीजेपी आमतौर पर 117 में से 23 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती थी. इस बार पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन के आधार पर ज्यादा सीटें मांग रही है. इसी वजह से सीटों का बंटवारा गठबंधन की बातचीत का अहम मुद्दा बना हुआ है।
सीटों के बंटवारे में क्या है चुनौती?
गठबंधन की राह में सबसे बड़ी चुनौती सीटों का बंटवारा हो सकता है. पारंपरिक तौर पर बीजेपी शहरी इलाकों में और अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत माना जाता रहा है. लेकिन इस बार अकाली दल सेमी-अर्बन यानी अर्ध-शहरी सीटों पर भी चुनाव लड़ना चाहता है. इनमें कुछ ऐसी सीटें हो सकती हैं, जहां बीजेपी अपनी स्थिति मजबूत मानती है।
ऐसे में दोनों दलों को उम्मीदवारों के चयन और सीटों की अदला-बदली पर सहमति बनानी होगी. इसके अलावा अकाली दल अपने से अलग हुए नेताओं और बिखरे हुए धड़ों को भी साथ लाने की कोशिश कर रहा है. पार्टी उन पुराने नेताओं की वापसी पर चर्चा कर रही है, जिन्होंने आपसी मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ दी थी।
1996 से 2020 तक साथ रहे दोनों दल
बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन पंजाब की राजनीति में पुराना रहा है. दोनों दल 1996 से 2020 तक साथ रहे और इस दौरान कई बार सरकार बनाई. 1997 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने 75 और बीजेपी ने 18 सीटें जीती थीं. 2007 में अकाली दल को 49 और बीजेपी को 19 सीटें मिलीं. वहीं, 2012 के चुनाव में अकाली दल ने 56 और बीजेपी ने 12 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की।
2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के बीच गठबंधन टूट गया था. इसके बाद दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़े, लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली. अब एक बार फिर दोनों दलों के साथ आने की चर्चा से पंजाब की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि, गठबंधन का औपचारिक ऐलान, सीटों का बंटवारा और मुख्यमंत्री पद को लेकर सहमति बनने के बाद ही तस्वीर साफ होगी।
दूसरे गुट को अपने हिस्से की सीटें नहीं देना चाहता अकाली दल
अकाली दल (पुनर सुरजीत) का नेतृत्व अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह कर रहे हैं। इस गुट में पंथिक पृष्ठभूमि वाले कई नेता शामिल हैं। अकाली दल चाहता है कि यदि अकाली दल (पुनर सुरजीत) गुट को सीटें दी जाती हैं तो उनको सीटें बीजेपी के हिस्से से दी जाए। इससे अकाली दल के अपने सीटों के कोटे पर असर नहीं पड़ेगा। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक संभावित फॉर्मूले पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत बीजेपी अपने हिस्से की कुछ सीटें SAD (पुनर सुरजीत) गुट को दे सकती है। इससे इस गुट को गठबंधन में जगह मिल सकती है और अकाली दल के कोटे में कटौती की जरूरत भी कम हो सकती है।





