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पेटेंट हटने के बाद ₹16,000 की दवा का दाम ₹1,500 होगा, साबित होगा गेम चेंजर

नई दिल्‍ली

 डेनमार्क की दिग्गज दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क (Novo Nordisk) के साल्ट ‘सेमाग्लूटाइड’ (Semaglutide) पर पेटेंट इसी सप्‍ताह समाप्‍त हो जाएगा. कंपनी द्वारा इसी सॉल्‍ट का इस्‍तेमाल कर वजन घटाने के लिए ‘ओजेम्पिक’ और डायबिटीज नियंत्रण के लिए ‘वेगोवी’ नामक दवा बनाई जाती हैं. पेटेंट की वजह से ये दोनों ही दवाएं काफी महंगी है. लेकिन, पेटेंट समाप्ति के बाद अन्‍य कंपनियां भी सेमाग्‍लूटाइड का इस्‍तेमाल कर वजन घटाने और डायबिटीज की जेनेरिक दवाएं बना सकेंगी. इससे आम आदमी को सस्‍ती दवाएं मिलने लगेंगी। 

वर्तमान में नोवो नॉर्डिस्क की वजन घटाने वाली दवा ओजेम्पिक की मासिक खुराक की कीमत करीब 8000 से 11,000 रुपये तक पड़ती है. डायबिटीज दवा वेगावी का महीने का खर्च 16400 रुपये तक होता है. कीमत ज्‍यादा होने की वजह से यह आम आदमी की पहुंच से बाहर है. दवा बाजार जानकारों का कहना है कि जेनेरिक दवा इससे करीब 60 फीसदी तक सस्‍ती होगी. शुरुआती दौर में जेनेरिक दवाओं की मासिक कीमत 3,000 से 5,000 रुपये के बीच रह सकती है, लेकिन जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी यह और गिरकर 1,500 से 2,500 रुपये तक आ सकती है। 

मोटापे और डायबिटीज के करोड़ों मरीज
चीन के बाद डायबिटीज मरीजों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या भारत में ही है. वहीं, लैंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2050 तक भारत में 44 करोड़ से अधिक लोग मोटापे का शिकार हो सकते हैं. फार्मारैक के अनुमान के मुताबिक, भारत का मोटापा-रोधी दवा बाजार 2030 तक 80 अरब रुपये तक पहुंच सकता है, जो वर्तमान में करीब 15 अरब रुपये है. सस्ती दवाओं की उपलब्धता से निम्न और मध्यम आय वर्ग के मरीज भी अब वैज्ञानिक तरीके से वजन घटाने का उपचार ले सकेंगे. यह कदम भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। 

50 से ज्यादा ब्रांड्स दवा बनाने को तैयार
नोवो नॉर्डिस्क का पेटेंट खत्‍म होने का असर है कि सन फार्मा (Sun Pharma), मैनकाइंड फार्मा (Mankind Pharma), डॉ. रेड्डीज (Dr. Reddy’s), जायडस (Zydus), ल्यूपिन (Lupin) और अल्केम (Alkem) जैसी 40 से अधिक कंपनियां अगले कुछ हफ्तों में सेमाग्लूटाइड के 50 से ज्यादा जेनेरिक संस्करण लॉन्च करने वाली हैं. कुछ कंपनियां तो इतनी तैयार हैं कि पेटेंट खत्म होने के अगले ही दिन अपने उत्पाद बाजार में उतार देंगी. इससे न केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के पास चयन के लिए कई विश्वसनीय विकल्प भी मौजूद होंगे। 

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