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YouTube में जल्द आने वाला नया फीचर: डायरेक्ट चैट और वीडियो शेयर करना हुआ आसान

नई दिल्ली YouTube फिर से प्राइवेट इन-ऐप मैसेजिंग की वापसी की ओर बढ़ रहा है। छह साल पहले बंद किया गया यह फीचर अब दोबारा टेस्टिंग में है। प्लेटफॉर्म ने आयरलैंड और पोलैंड में 18+ यूजर्स के लिए एक नया वीडियो-शेयरिंग और चैट सिस्टम रोल आउट करना शुरू कर दिया है, जो ऐप के भीतर ही कंटेंट शेयरिंग को आसान और इंटरऐक्टिव बनाने का प्रयास है। कैसे काम करेगा नया फीचर? YouTube के अनुसार, टेस्ट में शामिल यूजर्स ऐप में मौजूद शेयर बटन पर टैप करके एक फुल-स्क्रीन चैट विंडो खोल सकेंगे। यहां से वे: लंबे वीडियो, शॉर्ट्स और लाइवस्ट्रीम सीधे शेयर कर सकेंगे वन-ऑन-वन और ग्रुप चैट शुरू कर पाएंगे टेक्स्ट, इमोजी और दूसरे वीडियो के साथ रिप्लाई कर पाएंगे कंपनी का कहना है कि यह फीचर यूजर्स की सबसे लोकप्रिय मांगों में से एक रहा है, इसलिए इसे दोबारा आजमाया जा रहा है। इससे यूजर्स को अब वीडियो शेयर करने के लिए WhatsApp या Instagram जैसे अन्य ऐप पर स्विच नहीं करना पड़ेगा। नया चैट फीचर केवल वयस्क यूजर्स के लिए उपलब्ध है। YouTube मैसेजेस पर कम्युनिटी गाइडलाइंस लागू करेगा और किसी भी संदिग्ध कंटेंट को रिव्यू कर सकेगा। चैट शुरू होने से पहले इनवाइट एक्सेप्ट करना जरूरी होगा और यूजर्स: चैनलों को ब्लॉक कर सकेंगे चैट्स रिपोर्ट कर सकेंगे भेजा गया मैसेज अनसेंड कर सकेंगे मैसेज अलर्ट्स सामान्य YouTube नोटिफिकेशन्स के साथ दिखेंगे। पुराना सिस्टम क्यों बंद हुआ था? YouTube ने 2019 में अपना निजी मैसेजिंग सिस्टम बंद कर दिया था। हालांकि कंपनी ने आधिकारिक कारण नहीं बताया था, लेकिन माना जाता है कि चाइल्ड सेफ्टी चिंताओं के चलते यह कदम उठाया गया था। इसीलिए नए टेस्ट को केवल एडल्ट यूजर्स तक सीमित रखा गया है। देशों में लॉन्च हो सता है ये फीचर टेस्ट के नतीजों के आधार पर YouTube इस फीचर को अन्य देशों में भी लॉन्च कर सकता है। चुनिंदा क्षेत्रों में टेस्ट करने से कंपनी को डिजिटल सेफ्टी नियमों के बीच फीचर को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। इससे पहले Spotify भी इसी साल अपने ऐप में प्राइवेट मैसेजिंग फीचर जोड़ चुका है। बड़े प्लेटफॉर्म अब यूजर्स को ऐप के अंदर ही कंटेंट शेयर करने और बातचीत करने की सुविधा देकर उन्हें अपने इकोसिस्टम में बनाए रखने की रणनीति अपनाते दिख रहे हैं।

ठंड का मौसम और प्रेग्नेंसी: मां-बच्चे की सेहत पर भारी पड़ सकती हैं ये 5 लापरवाहियां

जैसे ही सर्दी का मौसम शुरू होता है शहर के अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं से जुड़ी एक नई स्वास्थ्य चुनौती बढ़ने लगती है। डॉक्टरों का दावा है कि पिछले कुछ दिनों में गर्भवती महिलाओं में सर्दी, खांसी, कमजोरी और ब्लड (खून) की कमी के मामले तेज़ी से सामने आ रहे हैं। यह स्थिति उन महिलाओं के लिए ज़्यादा चिंताजनक है जो पहली बार मां बनने जा रही हैं और जिन्हें इस मौसम में ज़रूरी सावधानियों की सही जानकारी नहीं है। डॉक्टर के अनुसार सर्दियों में गर्भवती महिलाओं का शरीर सामान्य महिलाओं से बिल्कुल अलग तरह से काम करता है। उनके शरीर को अतिरिक्त गर्माहट, ज़्यादा पोषण और संक्रमण से सुरक्षा की अधिक ज़रूरत होती है। ठंड में तापमान गिरते ही शरीर का ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होने लगता है। गर्भावस्था में शरीर पहले ही दोहरी जिम्मेदारी निभा रहा होता है। हार्मोनल बदलाव तेज़ी से होने के कारण उनका इम्यून सिस्टम सामान्य महिलाओं के मुकाबले कमजोर हो जाता है। ऐसे में हल्की सर्दी, गले में खराश या किसी भी तरह का संक्रमण मां और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों पर सीधा प्रभाव डालता है। डॉ. यादव का कहना है कि दिक्कत तब बढ़ती है जब महिलाएं समय पर जांच नहीं करवातीं या इंटरनेट पर मिलने वाली अधूरी सलाह का पालन करने लगती हैं। कौन सी 2 गलतियां बढ़ाती हैं रातों-रात परेशानी? डॉक्टरों ने दो बड़ी गलतियों की पहचान की है जो सर्दियों में गर्भवती महिलाओं की मुश्किलें रातों-रात बढ़ा सकती हैं: 1. सबसे बड़ी गलती: ठंड में कम पानी पीना सर्दियों में प्यास कम लगना आम है और यही वजह है कि अधिकतर गर्भवती महिलाएं पानी पीने को लेकर लापरवाह हो जाती हैं। डॉ. यादव बताते हैं कि यही एक गलती शरीर में कमजोरी, कब्ज (Constipation), सिरदर्द, चक्कर और यूरीन इंफेक्शन (UTI) तक का कारण बन सकती है। शरीर को हाइड्रेटेड और गर्म रखने के लिए गुनगुना पानी, हर्बल चाय, सूप और नारियल पानी बेहद फायदेमंद माने जाते हैं। 2. ठंडी चीजें खाना गर्भावस्था में यह सोचना कि आइसक्रीम या ठंडा पानी पीने से कुछ नहीं होगा बेहद खतरनाक हो सकता है। ठंडी चीजें गले में खराश, सर्दी, खांसी और फेफड़ों में संक्रमण की वजह बन सकती हैं। यदि ठंडे मौसम में मां के शरीर का तापमान गिरता है तो गर्भ में पल रहे शिशु तक ब्लड सप्लाई भी प्रभावित होती है। खून की कमी (एनीमिया) के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? डॉ. यादव के अनुसार जिले में गर्भवती महिलाओं में खून की कमी के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। इसके मुख्य कारण हैं: गलत खान-पान और नियमित चेकअप न करवाना। आयरन और कैल्शियम की दवाओं को बीच में छोड़ देना। ठंड में बाहर न निकलने और शारीरिक गतिविधि कम करने की आदत। वे कहते हैं कि जो महिलाएं पहले से कमजोर होती हैं सर्दियों में उनकी कमजोरी दोगुनी हो जाती है इसलिए उन्हें अतिरिक्त पोषण और नियमित डॉक्टरी सलाह लेना बेहद ज़रूरी है।  

UIDAI का नया नियम: होटल में आधार की फोटोकॉपी मांगना होगा बंद

नई दिल्ली UIDAI जल्द ही नया आधार ऐप लॉन्च करने वाला है, जो डिजिटल पहचान और आईडी वेरिफिकेशन को और सरल बनाने वाला है। UIDAI के सीईओ भुवनेश कुमार ने हाल ही में एक वेबिनार में बताया कि नया ऐप खासकर ऑफलाइन वेरिफिकेशन के लिए तैयार किया गया है, जिससे लोगों को सुरक्षित और भरोसेमंद डिजिटल पहचान मिलेगी। उनका कहना है कि यह सिस्टम सिक्योरिटी और प्राइवेसी दोनों को मजबूत करेगा।  पेपरलेस पहचान, धोखाधड़ी पर रोक नए ऐप की सबसे बड़ी खासियत ऑफलाइन वेरिफिकेशन है। इसका मतलब यह है कि अब होटल चेक-इन, सोसाइटी में प्रवेश या किसी इवेंट/फंक्शन में जाने के लिए फिजिकल आधार कार्ड की कॉपी देने की जरूरत नहीं होगी। UIDAI के अनुसार फोटोकॉपी शेयर करने से डेटा के गलत इस्तेमाल या फ्रॉड का खतरा बढ़ जाता है। नया ऐप इस जोखिम को खत्म करता है, क्योंकि यूजर डिजिटल रूप में पूरा या चुनिंदा आधार डेटा साझा कर सकेंगे। ऑफलाइन वेरिफिकेशन कहां-कहां काम आएगा नए ऐप से रोजमर्रा की कई स्थितियां आसान हो जाएंगी, जैसे: -होटल में चेक-इन -रेजिडेंशियल सोसाइटी में प्रवेश -इवेंट/फंक्शन में एंट्री इसके लिए ऐप में QR-बेस्ड वेरिफिकेशन और अन्य ऑफलाइन मोड होंगे, जिन्हें छोटे व्यवसाय से लेकर बड़ी संस्थाएं भी इस्तेमाल कर सकेंगी।  नए ऐप की खास सुविधाएं UIDAI ने बताया कि नया आधार ऐप सुरक्षा, कंट्रोल और सुविधा के लिहाज से पहले से बेहतर है। कुछ प्रमुख फीचर्स: मल्टी प्रोफाइल: एक यूजर अपने परिवार के 5 तक आधार प्रोफाइल एक ही ऐप में रख सकेगा। बायोमेट्रिक लॉक/अनलॉक: बायोमेट्रिक्स लॉक करने पर कोई भी फिंगरप्रिंट या आईरिस का दुरुपयोग नहीं कर सकेगा। प्रोफाइल अपडेट: मोबाइल नंबर या पता बदलते ही ऐप अपने आप नई जानकारी दिखाएगा। QR कोड और वेरिफाएबल क्रेडेंशियल शेयरिंग: ऐप से सीधे एक टैप में डिजिटल पहचान साझा की जा सकेगी। ऐप डाउनलोड और सेटअप ऐप UIDAI के ऑफिशियल सोर्स से डाउनलोड करें (गूगल प्ले स्टोर/एप स्टोर)। रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से SMS वेरिफिकेशन करें। फेस ऑथेंटिकेशन पूरा करें और 6-डिजिट पासवर्ड सेट करें। एक समय में केवल एक डिवाइस पर एक ही प्रोफाइल एक्टिव होगी। दूसरे डिवाइस पर लॉगिन करने पर पुरानी प्रोफाइल डिलीट हो जाएगी।  

कॉकरोच क्यों नहीं होते नष्ट? एटम बम से भी बचने वाले इस जीव के बिना धरती पर क्या खतरे?

नई दिल्‍ली. दुनिया की अधिकांश आबादी कॉकरोच को सिर्फ गंदगी और डर से जोड़कर देखती है. रसोई में अचानक भागते हुए दिखाई देना, खाने में घुस जाना या अलमारी में छिपे मिल जाना. ऐसे में अगर कोई कह दे कि धरती से कॉकरोच का नामोनिशान मिट जाए तो जीवन और भी आसान हो जाएगा. ज्यादातर लोग इस विचार से सहमत भी दिखेंगे लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है. वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि कॉकरोच का गायब होना सिर्फ घरों की सफाई का सवाल नहीं बल्कि पूरी धरती के इको-सिस्‍टम के लिए एक गंभीर चेतावनी होगी. जंगलों की उपज, मिट्टी की गुणवत्ता, खाद्य सीरीज का संतुलन, छोटे जीव-जंतुओं का अस्तित्व. सभी पर गहरी चोट पहुंचेगी. PNAS यानी प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि कॉकरोच के अदर मौजूद ब्लाटाबैक्टीरियम नामक बैक्टीरिया नाइट्रोजन को री-साइकिल कर आवश्यक पोषक तत्वों में बदलता है. यही वजह है कि कॉकरोच बेहद कठिन वातावरण में भी जीवित रहते हैं और उन्हीं जगहों पर इको-सिस्‍टम में संतुलन बनाए रखते हैं, जहां अन्य कीट जीवित नहीं रह सकते. अगर यह प्रजाति खत्म हो जाए तो अनेक प्राकृतिक प्रक्रियाएं रुक जाएंगी, जिनका असर इंसानी जीवन तक पहुंचेगा. एटम बम गिरा तो कुछ नहीं बचा, सिवाय एक जीव के जंगलों की क्लीनिंग मशीन कॉकरोच का एक बड़ा हिस्सा घरों में नहीं बल्कि घने जंगलों में बसता है. वे गिरे हुए पेड़ों, पत्तों, सड़े हुए पौधों और लकड़ी को चबाकर छोटे-छोटे कणों में बदलते हैं. यही प्रक्रिया जंगल की मिट्टी में नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व वापस भेजती है. अगर कॉकरोच गायब हो जाएं तो जंगल की जमीन पर जैविक कचरे की परतें जमा हो जाएंगी. डिसोल्यूशन यानी विघटन की गति धीमी पड़ जाएगी और मिट्टी की उर्वरता घटने लगेगी. धीरे-धीरे पेड़ों की वृद्धि कमजोर होगी और पूरी वन-व्यवस्था थकान महसूस करने लगेगी. असंख्य जीवों के आहार का आधार एक छोटा सा कीट गायब हो जाए, तो लगता है फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र इन्हीं छोटे-छोटे हिस्सों से टिके होते हैं. छिपकलियां, मेंढक, पक्षी, छोटे स्तनधारी और कई कीट कॉकरोच पर निर्भर रहते हैं. वे एक भरोसेमंद और एक निरंतर उपलब्ध भोजन है. यदि वे अचानक गायब हो जाएं तो— • शिकारियों को वैकल्पिक भोजन ढूंढना पड़ेगा, • प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, • कई छोटे जीव भूख से मरने लगेंगे, • और खाद्य सीरीज में ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हो जाएगा. नाइट्रोजन फैक्ट्री यदि यह प्रजाति खत्म हो जाए, तो कई पारिस्थितिक निच खाली रह जाएंगे और विविधता में भारी गिरावट आएगी. कॉकरोच के शरीर में मौजूद Blattabacterium बैक्टीरिया अपशिष्टों को अमीनो एसिड और विटामिन में बदल देता है. यह प्रकृति का अनोखा सहयोगी तंत्र है. यही वजह है कि वे— • कड़े, न्‍यूट्रीशन की कमी में भी जीवित रहते हैं, • उन जगहों को संतुलन में रखते हैं जहां दूसरे कीट नहीं पहुंच पाते. कृषि पर बड़ा असर कॉकरोच खेतों के आसपास भी सड़ी-गली चीजों को तोड़कर मिट्टी में वापस मिलाते हैं. उनके गायब होने पर— • जैविक कचरा धीमी गति से टूटेगा, • मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी बढ़ेगी, • किसानों को अधिक केमिकल फर्टिलाइजर डालने पड़ेंगे, • और इससे पानी प्रदूषण सहित पर्यावरणीय खतरे बढ़ जाएंगे. इस तरह, रसोई का ‘अनवांटेड कीड़ा’ खेतों की उपज बढ़ाने में चुपचाप मदद करता है. मिट्टी की सेहत बिगड़ेगी, जैव विविधता घटेगी मिट्टी केवल रेत या कंकड़ का मिश्रण नहीं बल्कि जीवित तंत्र है. कॉकरोच— • मृत पौधों को तोड़ते हैं, • मिट्टी में पोषक तत्व घोलते हैं, • और कई छोटे जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराते हैं. उनके गायब होने से कई क्षेत्रों में मिट्टी मृत होने लगेगी, पौधों की वृद्धि रुकेगी और पूरे खाद्य जाल पर असर पड़ेगा. पर्यावरण का अलार्म सिस्टम कई जंगल-निवासी कॉकरोच पर्यावरण में बदलाव का पहला संकेत देते हैं. उनकी संख्या घटे या बढ़े तो वैज्ञानिक अनुमान लगा लेते हैं कि किसी क्षेत्र में क्या गड़बड़ चल रही है. यदि कॉकरोच न रहें, तो वैज्ञानिकों के पास यह जैविक संकेतक ही नहीं बचेगा. कॉकरोच के बिना बीमार पड़ जाएगी पृथ्‍वी सच्‍चाई यह है कि कॉकरोच का गायब होना दुनिया को खत्म नहीं करेगा, लेकिन इसे कमजोर जरूर कर देगा. हम भले ही किचन में कॉकरोच को देखकर उससे नफरत करने लगते हों या फिर उसे मारने के लिए हिट का इस्‍तेमाल करते हों लेकिन सच्‍चाई में यही हमारे जीवन का आधार भी है. यानी जिसे हम एक परेशान करने वाला कीड़ा समझते हैं, वही प्राकृतिक दुनिया की कई अदृश्य मशीनों को चलाए रखता है. धरती पर कई जीव हैं जिनका महत्व हम देखते नहीं, कॉकरोच उनमें सबसे कम आंका जाने वाला नायक है. • जंगलों में विघटन धीमा होगा, • मिट्टी पोषक तत्व खो देगी, • खाद्य सीरीज टूटेंगी, • कृषि पर दबाव बढ़ेगा, • इको-सिस्‍ट का लचीलापन घटेगा. रेडिएशन का असर क्यों नहीं पड़ता? तिलचट्टे रेडिएशन के प्रति इतने सहनशील क्यों हैं, इसका जवाब उनके शरीर की जैविक संरचना में छिपा है. उनका कोशिका विभाजन बहुत धीमा होता है. रेडिएशन का सबसे घातक असर तेजी से विभाजित होने वाली कोशिकाओं पर पड़ता है, जैसे कैंसर सेल्स, आंत की कोशिकाएं, अस्थि मज्जा और बालों की जड़ें. मनुष्य में ये कोशिकाएं हर कुछ घंटे या दिन में विभाजित होती रहती हैं, इसलिए रेडिएशन उन्हें तुरंत नष्ट कर देता है. तिलचट्टे की कोशिकाएं हफ्तों या महीनों में एक बार ही विभाजित होती हैं. वे सिर्फ मोल्टिंग (खाल उतारने) के समय ही तेजी से बढ़ते हैं, जो उनके जीवन में सिर्फ 6-7 बार होता है. जब रेडिएशन आता है, तब उनकी ज्यादातर कोशिकाएं “आराम” की अवस्था में होती हैं. रेडिएशन उन्हें छू भी नहीं पाता. क्यों विकिरण उनके लिए गर्म चाय जैसा LD50 एटम बम विस्फोट की स्थिति में रेडिएशन की वो मात्रा है, जिसमें 50% जीव मर जाते हैं. मनुष्य के लिए 400 -1000 रेड रेडिएशन खतरनाक कुत्ता के लिए 350 रेड रेडिएशन खतरनाक चूहा के लिए 900 रेड में खतरा फल मक्खियों के लिए 64,000 रेड रेडिएशन खतरनाक तिलचट्टा के लिए 90,000 से 1,05,000 रेड खतरनाक हालांकि तिलचट्टे की कुछ प्रजातियां 1,50,000 तक रेडिएशन भी सह लेती हैं. यानी तिलचट्टा इंसान से 100-150 गुना ज्यादा रेडिएशन सह सकता है. हिरोशिमा के केंद्र में लगभग 10,000–20,000 रेड रेडिएशन था. ये इंसान … Read more

घर की हवा होगी और भी साफ, AC-कूलर के लिए आया खास प्रोडक्ट; बजट कीमत ₹1399

नई दिल्ली सर्दी के आते ही दिल्ली-NCR और देश के कई दूसरे इलाकों में हवा का स्तर काफी खराब हो गया है. लोगों को इसकी वजह से स्वास्थ्य से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. घर के बाहर ही नहीं अंदर भी एयर पॉल्यूशन का लेवल काफी ज्यादा है. ऐसे में साफ हवा के लिए आपको एक एयर फ्यूरीफायर खरीदना होगा. क्या हो अगर आपका AC एक एयर प्यूरीफायर की तरह काम करने लगे. एक प्रोडक्ट की मदद से आपका AC एयर प्यूरीफायर में कन्वर्ट हो सकता है.        मार्केट में आपको एक खास कैटेगरी का एयर फिल्टर मिलता है, जो आपके एसी को एयर प्यूरीफायर में बदल सकता है. Airth नाम की कंपनी ऐसे प्रोडक्ट्स बनाती है. इन प्रोडक्ट्स को आप स्प्लिट AC, विंडो AC और यहां तक की कूलर के साथ भी इस्तेमाल कर सकते हैं.         इसके लिए आपको उस कैटेगरी का फिल्टर खरीदना होगा. इन फिल्टर्स को इंस्टॉल करना भी बहुत आसान है. कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर आपको गर्मियों के लिए, सर्दियों के लिए अलग-अलग एयर प्यूरीफायर का विकल्प मिलता है.         मान लीजिए आपके पास एक स्प्लिट एयर कंडीशनर है. ऐसे में आपको Airth का एयर प्यूरीफायर वर्जन खरीदना होगा. आपको इसे एसी के इंडोर यूनिट के ऊपर फिट करना होगा. कंपनी की मानें, तो ये प्रोडक्ट HEPA फिल्टर के साथ आता है, जो 99 परसेंट तक PM2.5 को रोकता है. इसे यूज करने के लिए आपको अपना एयर कंडीशनर फैन मोड में चलाना होगा. स्प्लिट AC के लिए Air Purifier की कीमत 3,199 रुपये है. ये डिवाइस एक इंडीकेटर के साथ आता है, जो बताता है कि आपको अपना फिल्टर कब बदलना चाहिए.         ये कम बजट में आपकी एयर प्यूरीफायर जरूरत को पूरा सकता है. विंडो AC के लिए एयर प्यूरीफायर सिर्फ 1399 रुपये में मिल जाएगा, जबकि कूलर के लिए आपको एयर प्यूरीफायर 2099 रुपये में मिल जाएगा. अगर आप एयर प्यूरीफायर नहीं खरीदना चाहते हैं, तो इसे खरीद सकते हैं.

25 साल का गौरव: झारखंड विधानसभा की रजत जयंती पर सम्मान समारोह का आयोजन

रांची झारखंड विधानसभा आज अपनी स्थापना का रजत जयंती समारोह (25 वर्ष) मना रही है। राज्य गठन के बाद से विधानसभा ने 25 वर्षों की एक बड़ी यात्रा पूरी की है। इस विशेष अवसर पर रांची स्थित विधानसभा परिसर में एक भव्य समारोह का आयोजन किया जा रहा है। शहीदों के परिजन और खिलाड़ी होंगे सम्मानित राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार, स्पीकर रबीन्द्र नाथ महतो, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी सहित तमाम मंत्रियों और विधायकों की उपस्थिति में आयोजित कार्यक्रम में नक्सल अभियान में शहीद पुलिस कर्मियों और सैनिकों की पत्नी या अन्य आश्रितों तथा सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया जाएगा। शाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होगा। प्रसिद्ध गायक रूप कुमार राठौर अपनी प्रस्तुति देंगे। हास्य कवि डॉ. दिनेश बावरा तथा हास्य कलाकार रवींद्र जानी भी उपस्थित लोगों को गुदगुदाएंगे। पूर्व विधायकों को भी दिया जाएगा विशेष सम्मान इस समारोह में राज्य के पदक विजेता खिलाड़ियों, पूर्व विधानसभा अध्यक्षों और पूर्व विधायकों को भी समारोह में विशेष सम्मान दिया जाएगा। साथ ही उत्कृष्ट विधायक के रूप में राज सिन्हा तथा विधानसभा के छह उत्कृष्ट कर्मियों को भी सम्मानित किया जाएगा।  

बैटरी साइज़ बनाम बैकअप: खरीदने से पहले दूर करें ये बड़ा भ्रम

नया स्मार्टफोन खरीदते समय लोग उसकी बैटरी लाइफ पर बहुत ध्यान देते हैं। फोन कंपन‍ियां भी बैटरी फीचर को खूब प्रमोट करती हैं क‍ि फलां मोबाइल में 7000 एमएएच बैटरी है। तमाम लोगों को लगता है कि जितना ज्यादा mAh वाली बैटरी होगी, उतना लंबा चलेगी। यह एक भ्रम है क्‍योंकि 2025 में स्मार्टफोन की बैटरी लाइफ सिर्फ बैटरी की क्षमता (mAH) पर निर्भर नहीं करती, बल्कि और कई चीजों पर निर्भर करती है। जैसे- फोन कितनी पावर का इस्तेमाल करता है। उसका डिस्प्ले कैसा है। सॉफ्टवेयर कितना बेहतर है और नेटवर्क कनेक्शन को कैसे मैनेज करता है। नई बैटरी टेक्नोलॉजी जैसे सिलिकॉन-कार्बन की वजह से फोन बनाने वाली लगभग सभी चीनी कंपनियां 5,000mAH की सीमा को पार कर चुकी हैं। Xiaomi 17 Pro Max को 7,500mAH की बड़ी बैटरी के साथ लाया गया है। वहीं, iQOO 15, OnePlus 15 और Realme GT के कई मॉडल लगभग 7,000mAH की बैटरी के साथ आ रहे हैं। अगर आप नया फोन खरीदने वाले हैं तो बैटरी को लेकर अपना भ्रम दूर कर लें। ट‍िकाऊ स्‍मार्टफोन बैटरी में ड‍िस्‍प्‍ले का रोल फोन की बैटरी कितनी देर चलेगी, यह उसके डिस्प्ले पर काफी हद तक निर्भर करती है। 120Hz या 144Hz OLED पैनल ज्यादा पावर इस्तेमाल करते हैं। जो फोन लगातार हाई रिफ्रेश रेट पर चलते हैं, उनकी बैटरी जल्दी खत्म हो जाती है। स्क्रीन का रेजोल्यूशन भी मायने रखता है। Full HD+ पैनल वाले फोन, QHD+ डिस्प्ले वाले फोन की तुलना में कम पावर इस्तेमाल करते हैं। चाहे ब्राइटनेस और रिफ्रेश रेट एक जैसे हों। बैटरी ज्यादा बड़ी है, लेकिन डिस्प्ले हाई रिफ्रेश रेट पर है तो बैटरी ज्यादा पावर खपत करती है। प्रोसेसर से भी पड़ता है फर्क फोन के प्रोसेसर भी बैटरी लाइफ पर असर डालते हैं। नए प्रोसेसर जैसे Snapdragon 8 Elite Gen 5 या Dimensity 9500 फोन की बैटरी को बेहतर ढंग से संभालते हैं। किसी भी फोन में हैवी गेमिंग करने या कैमरा का ज्‍यादा इस्‍तेमाल करने पर हीट‍िंग हो सकती है। इससे पावर की खपत बढ़ जाती है। फोन खरीदते समय हमेशा अपग्रेडेड प्रोसेसर को प्राथम‍िकता दें। फास्‍ट चार्जिंग वाला फोन लें फास्ट चार्जिंग का चलन काफी बढ़ गया है। कई फोन में 100W से 120W वायर्ड चार्जिंग और 50W वायरलेस चार्जिंग मिलती है। इससे फोन जल्दी चार्ज हो जाते हैं। यह देखना बहुत जरूरी है कि चार्जिंग के समय फोन हीटिंग को कैसे मैनेज कर रहा है। बाईपास चार्जिंग और शेड्यूल नाइट चार्जिंग जैसी सुविधाओं को भी देखें। सॉफ्टवेयर ऑप्टिमाइजेशन से लंबी चलती है बैटरी क‍िसी भी फोन में सॉफ्टवेयर ऑप्टिमाइजेशन बहुत जरूरी है। यह बैटरी को बचाता है। iPhone 17 Pro Max और Galaxy S25 Ultra में सबसे बड़ी बैटरी नहीं होती, लेकिन उनका सॉफ्टवेयर ऑप्‍टमाइजेशन बहुत अच्‍छा है। iOS और One UI बैकग्राउंड में चल रही चीजों को मैनेज करने, लोकेशन सेवाओं को कंट्रोल करने और नेटवर्क के बीच स्विच करने में बहुत अच्छे हैं। इन बातों का हमेशा रखें ध्‍यान ज्यादा mAH या वॉट-आवर (Wh) का मतलब है ज्यादा चार्ज स्टोर होना। एक 7,000mAH फोन की बैटरी, 5000mAH फोन की बैटरी से जल्दी खत्म हो सकती है। कभी-कभी बजट फोन की बैटरी प्रीमियम फ्लैगशिप की बैटरी से ज्यादा चलती हैं, क्योंकि उनमें कम पावर खर्च करने वाले फीचर्स शाम‍िल होते हैं।

ऐसे करें सैलिसिलिक एसिड का इस्तेमाल, चेहरे से पिंपल्स होंगे गायब

चेहरे पर होने वाले पिंपल्स न सिर्फ स्किन की खूबसूरती को प्रभावित करते हैं, बल्कि सेल्फ कॉन्फिडेंस को भी कम कर सकते हैं। ऐसे में अगर आप एक ऐसा उपाय ढूंढ़ रहे हैं, जो पिंपल्स को जड़ से खत्म करने में मदद करे, तो सैलिसिलिक एसिड एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। यह एक बीटा हाइड्रॉक्सी एसिड (BHA) है, जो स्किन की गहराई में जाकर पोर्स को साफ करता है, साथ में डेड स्किन को तो हटाता ही है और नए पिंपल्स बनने से भी रोकता है। आइए विस्तार से जानते हैं इसके उपयोग का तरीका, फायदे और इससे जुड़ी जरूरी सावधानियां- सैलिसिलिक एसिड का उपयोग कैसे करें     फेस वॉश के रूप में- 1% या 2% सैलिसिलिक एसिड युक्त फेस वॉश से दिन में दो बार चेहरा वॉश करें। यह रोमछिद्रों को खोलने, एक्स्ट्रा ऑयल और डस्ट हटाने में मदद करता है।     टोनर और सीरम- नहाने या चेहरा धोने के बाद सैलिसिलिक एसिड टोनर या सीरम लगाएं। यह धीरे-धीरे स्किन को क्लियर करता है और ब्रेकआउट्स को कंट्रोल करता है।     स्पॉट ट्रीटमेंट- अगर किसी खास जगह पर पिंपल है, तो उस पर सैलिसिलिक एसिड जेल या क्रीम लगाएं। यह पिंपल को सुखाने में मदद करता है।     साप्ताहिक पील या मास्क- हफ्ते में एक बार इसका फेस पील या मास्क का प्रयोग करें, लेकिन स्किन टाइप के अनुसार और एक्सपर्ट की सलाह से ही। फायदे     पिंपल्स को जड़ से सुखाता है और नए पिंपल्स बनने से रोकता है।     रोमछिद्रों को खोलकर डेड स्किन और सीबम हटाता है, जिससे स्किन साफ दिखती है।     ऑयली स्किन पर विशेष रूप से प्रभावी है क्योंकि यह सीबम प्रोडक्शन को कंट्रोल करता है।     ब्लैकहेड्स और व्हाइटहेड्स को कम करता है।     स्किन की ऊपरी परत को एक्सफोलिएट कर निखार लाता है।     सूजन और लालिमा को कम करता है, जिससे स्किन शांत और हेल्दी दिखती है। सावधानियां     शुरुआत में हफ्ते में 2–3 बार ही प्रयोग करें, ताकि स्किन को इसकी आदत हो सके।     सैलिसिलिक एसिड लगाने के बाद त्वचा को सूरज की रोशनी से बचाएं और सनस्क्रीन जरूर लगाएं।     अगर स्किन बहुत ज्यादा ड्राई, लाल या पील होने लगे तो उपयोग की मात्रा कम करें या कुछ दिन बंद करें।     सेंसिटिव स्किन वालों को पैच टेस्ट जरूर करना चाहिए।     हमेशा सॉफ्ट औरफ़ हाइड्रेटिंग मॉइश्चराइज का इस्तेमाल करें ताकि स्किन बैलेंस बनी रहे। सैलिसिलिक एसिड पिंपल्स और ऑयली स्किन के लिए एक इफेक्टिव उपाय है, लेकिन इसका सही उपयोग और नियमित देखभाल बेहद जरूरी है। अगर स्किन के लिए सही मात्रा और प्रॉडक्ट्स चुना जाए, तो यह आपकी स्किन को क्लियर, स्मूद और ग्लोइंग बना सकता है।  

कैंसर उपचार में क्रांतिकारी खोज: वैज्ञानिकों ने फेफड़ों के ट्यूमर घटाने का नया तरीका विकसित किया

फेफड़ों के कैंसर से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए विज्ञान की दुनिया से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। दरअसल, वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका खोजा है जिससे फेफड़ों के ट्यूमर को उसकी सबसे बड़ी कमजोरी पर वार करके खत्म किया जा सकता है। जी हां, इस शोध के दौरान, उन्होंने एक बेहद जरूरी प्रोटीन की पहचान की। बता दें, यह प्रोटीन कैंसर कोशिकाओं को 'मरने' से बचाता है। ऐसे में, शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर इस खास प्रोटीन की गतिविधि को रोक दिया जाए, तो कैंसर कोशिकाएं खुद-ब-खुद नष्ट होने लगती हैं और ट्यूमर सिकुड़ जाता है। वैज्ञानिकों ने खोजी सबसे बड़ी कमजोरी हाल ही में शोधकर्ताओं ने फेफड़ों के कैंसर की एक महत्वपूर्ण कमजोरी का पता लगाया है- एक ऐसा प्रोटीन, जिसे रोक दिया जाए तो कैंसर कोशिकाएं खुद को ही नष्ट करने लगती हैं। यह खोज न सिर्फ इलाज के नए रास्ते खोलती है, बल्कि भविष्य में ऐसे कई मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती है, जिन्हें अब तक सीमित विकल्प ही उपलब्ध थे। 'सेल्फ-डिस्ट्रक्शन' से बच निकलते थे कैंसर सेल्स अमेरिका के एनवाइसी लैंगोन हेल्थ के वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर क्यों कुछ कैंसर कोशिकाएं शरीर की रक्षा प्रणाली से बचकर बढ़ती चली जाती हैं। इसी खोज के दौरान उन्होंने एक खास प्रोटीन- एफएसपी1 (FSP1) की पहचान की। यह प्रोटीन कैंसर कोशिकाओं को एक खास तरह की कोशिका मृत्यु, जिसे फेरोप्टोसिस कहा जाता है, से बचाता है। फेरोप्टोसिस वह प्रक्रिया है जिसमें शरीर अत्यधिक तनाव में आ चुकी कोशिकाओं को खुद-ब-खुद नष्ट कर देता है। आमतौर पर यह प्रक्रिया शरीर की सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा है, लेकिन कैंसर कोशिकाएं इसी से बचकर बढ़ती रहती हैं। एफएसपी1 को रोकने से क्या हुआ? शोधकर्ताओं ने चूहों पर प्रयोग करते हुए एफएसपी1 प्रोटीन को रोका। परिणाम इतने चौंकाने वाले थे कि उन्हें वैज्ञानिक ‘ड्रामेटिक’ कह रहे हैं।     चूहों के फेफड़ों में मौजूद ट्यूमर तेजी से सिकुड़ने लगे     कई कैंसर कोशिकाओं ने खुद को नष्ट करना शुरू कर दिया     कुल मिलाकर ट्यूमर का आकार लगभग 80% तक घट गया यह परिणाम बताते हैं कि एफएसपी1 को निष्क्रिय करने से कैंसर कोशिकाओं के पास बचने का कोई रास्ता नहीं रहता और वे फेरोप्टोसिस की प्रक्रिया में फंसकर खत्म होने लगती हैं। क्यों जरूरी है यह खोज? फेफड़ों के एडेनोकार्सिनोमा जैसे कैंसर का इलाज अक्सर मुश्किल हो जाता है क्योंकि ये कोशिकाएं सामान्य उपचार का प्रतिरोध करने लगती हैं। परंतु यदि कैंसर की ऐसी कमजोरी मिल जाए, जिसमें वह खुद को खत्म करने लगे, तो यह उपचार की दिशा पूरी तरह बदल सकता है। इस शोध से यह स्पष्ट होता है कि एफएसपी1 को लक्ष्य बनाकर बनाई गई दवाएं भविष्य में कैंसर थेरेपी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। खास बात यह है कि यह तरीका कैंसर की प्राकृतिक कमजोरी का उपयोग करता है, यानी शरीर की अपनी सेल-डिस्ट्रक्शन प्रक्रिया को सक्रिय कर दिया जाता है। कैंसर से जंग को मिलेगी नई दिशा? हालांकि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है और प्रयोग चूहों पर किए गए हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इसी सिद्धांत को मानव उपचार में सुरक्षित रूप से लागू किया गया तो फेफड़ों के कैंसर से लड़ाई को एक नई दिशा मिल सकती है। शोधकर्ता अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि एफएसपी1 को रोकने वाली दवाइयां इंसानों में कितनी प्रभावी और सुरक्षित होंगी। अगर यह सफल हुआ तो आने वाले वर्षों में कैंसर मरीजों के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है।  

रिसर्च का सच: पूरे जीवन में कम सिगरेट पीने से भी बढ़ जाता है बीमारी का जोखिम

नई दिल्ली सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक होता है। सिगरेट पीने से होने वाले नुकसान के बारे में सभी को पता है। लेकिन अब इसके बारे में एक नई रिसर्च सामने आई है। इस रिसर्च में दावा किया गया है कि पूरे जीवन में सिर्फ 100 सिगरेट पीने से भी दिल की बीमारी और समय से पहले मौत का खतरा काफी बढ़ सकता है। अमेरिका के मैरीलैंड राज्य के बाल्टीमोर में स्थित जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस पर रिसर्च की है। रिसर्च में क्या हुआ खुलासा? जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 20 सालों तक 3 लाख से ज़्यादा वयस्कों की आदतों ओर रिसर्च की। उन्होंने पाया कि हर दिन सिर्फ दो सिगरेट पीने वाले पुरुषों और महिलाओं में मौत का खतरा 60% तक बढ़ जाता है। वहीं इन लोगों में दिल की बीमारी का खतरा भी 50% ज़्यादा होता है। सिगरेट पीने से स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है। रिसर्च में यह भी सामने आया कि सिर्फ सिगरेट कम कर देने से खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता। जो लोग स्मोकिंग छोड़ चुके हैं, उनमें भी 20 साल बाद तक दिल की बीमारी का खतरा बना रहता है। स्मोकिंग छोड़ने का मिलता है फायदा स्मोकिंग छोड़ने का फायदा तुरंत मिलता है। पहले 10 साल में सबसे ज़्यादा फायदा होता है। एक्सपर्ट्स ने कहा कि लोगों को स्मोकिंग कम करने के बजाय इसे पूरी तरह छोड़ने की सलाह दी जानी चाहिए। दिन में एक सिगरेट से भी दिल की समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।